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मोदी-1 के मुकाबले ज्यादा बहुसंख्यकवादी और ज्यादा अल्पसंख्यकविरोधी-जनतंत्रविरोधी होगा मोदी-2

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।

मोदी-2: भिन्न होने के मुगालते

मोदी की भाजपा (Modi’s BJP) तथा एनडीए की जबर्दस्त और एक हद तक अप्रत्याशित जीत के बाद से, मीडिया का एक हिस्सा बड़ी शिद्दत से यह साबित करने की कोशिश में जुट गया है कि मोदी-2 का राज, मोदी-1 के पांच साल से काफी अलग होने जा रहा है। बेशक, इस तरह का कोई भी दावा तो दूर, अनुमान तक पेश करने से पहले, इस मोटे सवाल के जवाब से शुरू किया जाना चाहिए था कि मोदी-2, मोदी-1 से भिन्न क्यों होगा? (Why Modi-2 will be different from Modi-1?) आखिरकार, उसके भिन्न होने के क्या कोई वास्तविक कारण हैं?

… लेकिन, भक्त मीडिया इस तरह के सवालों से नहीं उलझता। वह बस दूरबीन से ऐसे छोटे से छोटे संकेतों की खोज में जुटा हुआ है, जिनके हवाले से यह दावा किया जा सके कि मोदी-2, मोदी-1 से वाकई भिन्न होने जा रहा है।

विडंबना यह है कि मोदी-2 की मिथकीय भिन्नता की इस खोज में जुटे भक्त यह तक नहीं देख पाते हैं कि भिन्नता के आश्वासन की अपनी बदहवास खोज में वे परोक्ष रूप से इस सचाई को ही स्वीकार कर रहे होते हैं कि मोदी-1 में कुछ ऐसा जरूर था, जिसे मोदी-2 में दोहराया नहीं जाना चाहिए।

अचरज की बात नहीं है कि मोदी-2 की भिन्नता और जाहिर है कि सकारात्मक रूप से भिन्नता की इस तलाश में भक्त ही नहीं, दूसरे अनेक सदाशयी मीडिया टिप्पणीकार भी, नरेंद्र मोदी के इस एलान पर टूट कर पड़े हैं कि अब उनके सांसदों को और जाहिर है कि उनकी सरकार को भी, ‘‘सब का विश्वास’’ हासिल करना है!

चूंकि प्रधानमंत्री ने ‘‘सब का विश्वास’’ हासिल करने की जरूरत अल्पसंख्यकों के सिलसिले में रेखांकित की थी, इसके आधार पर इसके अनुमान भी प्रस्तुत किए गए हैं कि नई मोदी सरकार, अल्पसंख्यकों के प्रति ज्यादा समावेशी रुख अपनाएगी। लेकिन, भाजपा व एनडीए के सांसदों द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए दोबारा चुने जाने के बाद, समर्थक सांसदों के सामने अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी ने वास्तव में जो कुछ कहा था, उस पर जरा भी गौर करने से यह साफ हो जाता है कि मोदी-2 के अल्पसंख्यकों के लिहाज से पहले से ज्यादा समावेशी होने के अनुमान, रेत के महल से ज्यादा नहीं हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि किसी भी तबके का विश्वास जीतने की किसी भी वास्तविक कोशिश के लिए, सबसे पहली जरूरत तो अविश्वास के कारणों की तलाश किए जाने की ही होगी।

अगर मोदी-1 को देश के अल्पसंख्यकों का विश्वास हासिल नहीं था, जिसे प्रकारांतर से खुद मोदी ने भी स्वीकार किया है, तो सामान्य तर्क तो यही कहता है कि इसके कारण भी तो अल्पसंख्यकों के साथ उसके सलूक में ही होने चाहिए। जाहिर है कि इस अविश्वास को दूर करने और विश्वास जीतने के लिए, इस सलूक को ही बदलने की जरूरत होगी। लेकिन, यह सामान्य तर्क की बात है जो मोदी तर्क पर लागू नहीं होती है।

मोदी तर्क, जिसे बहुत से लोग उत्तर-सत्य कहना ज्यादा पसंद करेंगे, अल्पसंख्यकों की आशंकाओं को, उनके अविश्वास की सचाई को ही सिरे से खारिज करते हुए, एक प्रति-तथ्य गढ़ता है कि अल्पसंख्यकों का अविश्वास, ही झूठ पर टिका हुआ है।

मोदी-2 के प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि वोट बैंक की राजनीति (Vote Bank Politics) में विश्वास करने वालों ने ही ‘अल्पसंख्यकों को डराकर कर रखा है।’ 2019 में इससे निपटने के लिए वह अपने समर्थक सांसदों से एक ही मांग करते हैं कि ‘इस झूठ में एक छेद कर दें।’

बेशक, प्रधानमंत्री उन्हें यह काम बताते हैं कि ‘हमें उनका (अल्पसंख्यकों का) विश्वास जीतना है।’ लेकिन, उनके हिसाब से इसके लिए उस ‘झूठ में छेद करने’ के सिवा और कुछ करने की जरूरत नहीं है।

वास्तव में इस संबंध में किसी संदेह या भ्रम की गुंजाइश नहीं रहने देते हुए कि वह सिर्फ और सिर्फ एक झूठी धारणा को मिटाए जाने की बात रहे हैं, प्रधानमंत्री गरीबी के प्रश्न से तुलना करते हुए कहते हैं कि, ‘जिस तरह गरीब को ठगा गया है, उसी तरह अल्पसंख्यकों को ठगा गया है।’ उन्हें ‘डराकर रखा गया है’ और मोदी की सेना तथा सरकार को, इसी झूठ में छेद करना है!

प्रधानमंत्री साफ तौर पर दावा कर रहे हैं कि अल्पसंख्यकों के ‘‘डर’’ (Minorities “fear”) जैसी कोई चीज वास्तव में है ही नहीं। कथित गोरक्षा के नाम पर, धर्मरक्षा के नाम पर, लव जेहाद के नाम पर, धर्मांतरण रोकने के नाम पर, संस्कृति-रक्षा के नाम पर हमले, मॉब लिंचिंग आदि, सब मिथ्या हैं। इतिहास को दुरुस्त करने के नाम पर, विदेशियों को बाहर निकालने के नाम पर, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (National register of citizenship) लागू करने के नाम पर, पाकिस्तान-प्रेरित आतंकवाद (Pakistan-induced terrorism) से लडऩे के नाम पर, देशज संस्कृति व परंपराओं का आदर करने के नाम पर, पड़ोसी देशों में भारतीय-धर्मों को मानने वालों को धार्मिक उत्पीडऩ से बचाने के नाम पर, अल्पसंख्यकों तथा खासतौर पर मुसलमानों का पराया किया जाना, सब कपोल-कल्पना हैं। वास्तव में यह सब तो वोट बैंक की राजनीति करने वालों यानी धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वालों का झूठा प्रचार है।

मोदी-2 में इसी प्रचार में छेद करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। विपक्ष के इस झूठ को ध्वस्त करने के जरिए, उसी तरह से अल्पसंख्यकों के डर को खत्म किया जाएगा, जैसे गरीबी के झूठ को ध्वस्त कर गरीबी को खत्म किया गया है। उसके बाद, अल्पसंख्यकों का विश्वास वैसे ही खुद ब खुद मिल जाएगा, जैसे मोदी-2 बनाने के लिए गरीबों का विश्वास मिल गया है। आखिरकार, ‘सब का साथ और सब का विकास’ पहले ही हो चुका है, तभी तो अब ‘सब का विश्वास’ की ओर बढ़ा जा रहा है।

यह अल्पसंख्यकों के डर को दूर करने का आश्वासन नहीं, वास्तव में उसे अदृश्य ही बना देने का और यहां तक कि अल्पसंख्यकों से भी यह कहलवा लेने का ही फासीवादी एजेंडा है कि उन्हें कोई डर, कोई अविश्वास नहीं है। गुजरात में पहले ही अल्पसंख्यकों को इस स्थिति में पहुंचाया भी जा चुका है।

तो क्या इस लिहाज से मोदी-1 और मोदी-2 में कोई अंतर ही नहीं है। बेशक अंतर है और इस अंतर की ओर इशारा नरेंद्र मोदी ने चुनाव नतीजों की तारीख की ही शाम को, नई-दिल्ली में भाजपा के भव्य मुख्यालय में कई हजार आमंत्रित कार्यकर्ताओं के सामने यानी जोरदार जीत के बाद के, अपने पहले संबोधन में ही कर दिया था।

प्रधानमंत्री मोदी ने, इस मौके पर मोदी-1 की जिन जबर्दस्त कामयाबियों की शेखी मारी थी, उनमें एक बड़ी कामयाबी थी, ‘धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों की पराजय’!

प्रधानमंत्री ने गर्व से दावा किया था कि मोदी-1 के राज के पांच सालों ने यह सुनिश्चित किया था कि उस देश में जहां बात-बात पर लोग धर्मनिरपेक्षता की तख्ती लेकर खड़े हो जाते थे, इस बार चुनाव में किसी भी पार्टी की धर्मनिरपेक्षता का नाम तक लेने की हिम्मत नहीं पड़ी थी!

जाहिर है कि धर्मनिरपेक्षता की हार से, अल्पसंख्यकों के डर के झूठ करार दिए जाने और इस झूठ को मिटाने का एजेंडा घोषित किए जाने तक, एक स्वाभाविक सिलसिला बनता है।

साफ है कि मोदी-1 के मुकाबले भी मोदी-2 ज्यादा बहुसंख्यकवादी और ज्यादा अल्पसंख्यकविरोधी-जनतंत्रविरोधी होगा।

और मोदी-2 को और ज्यादा बहुसंख्यकवादी तथा और ज्यादा अल्पसंख्यकविरोधी-जनतंत्रविरोधी होने की जरूरत, सिर्फ उस सांप्रदायिक-सवर्ण आधार को पुख्ता करने के लिए ही नहीं होगी, जिसने मोदी-1 के जनता के विशाल बहुमत के वास्तविक जीवन को बदतर ही बनाने के बावजूद, मोदी-2 का चुनाव किया है। इसकी जरूरत इसलिए भी होगी कि मोदी-2 में, जनता के और विशाल बहुमत के वास्तविक जीवन की हालत और भी बदतर होना तय है।

मोदी-2 की शुरूआत, बेरोजगारी के पेंतालीस साल में सबसे ऊपर चले जाने, सकल घरेलू उत्पाद की वृद्घि दर दशक में सबसे नीचे खिसक जाने, महंगाई के तेजी से बढ़ रहे होने, आदि की पृष्ठभूमि में यूं ही नहीं हुई है। यह मोदी-1 की ही विरासत है जिसका, मोदी-2 में और आगे बढऩा तय है। आखिरकार, मौजूदा संकट से देश तथा अर्थव्यवस्था को निकालने के लिए, इस सरकार के पास कोई रास्ता तो है ही नहीं। और जनता चुनाव भले पांच साल के लिए करती हो, उसकी नाराजगी पांच वाल इंतजार नहीं करती है।

मोदी-1 के खिलाफ जनता के असंतोष को फूटने में करीब तीन साल लगे थे, मोदी-2 के मामले में दो साल भी नहीं लगेंगे। इस असंतोष को नियंत्रित करने के लिए मोदी-2 को बहुसंख्यकवादी उन्मत्त राष्ट्रवाद और तानाशाही के उसी फार्मूले का और ज्यादा सहारा लेना होगा, जिसने जनता के ऐसे ही असंतोष से उसे चुनाव बचाया था। आदमखोर के मुंह खून लग चुका है। अब इंसान का शिकार छोड़ेगा, तो मारा जाएगा।

मोदी-2 के ठीक इसी दिशा में बढ़ रहे होने के संकेतों की भरमार है।

चुनाव नतीजे बाद में आए, अल्पसंख्यकों तथा दलितों पर और राजनीतिक विरोधियों पर हमलों अंतहीन सिलसिला पहले शुरू हो गया। इन हमलों में नई बात यह है कि न सिर्फ मीडिया द्वारा मोदी की नई-नई जीत का मजा खराब न करने के लिए भी इन्हें प्राय: अनदेखा किया जा रहा है, पुलिस व प्रशासन द्वारा हर मामले को ‘सेकुलर अपराध’ की घटना बनाया जा रहा है।

यानी सब कुछ होगा पर दिखाई नहीं देगा। इस अंधेरे की ओट में किस तरफ बढ़ा जा रहा है, इसका संकेत भाजपा शासित महाराष्ट्र में पहले मुंबई में एक स्कूल में विहिप द्वारा आयोजित प्रशिक्षिण शिविर में युवाओं को हथियारों का प्रशिक्षण दिए जाने और उसके बाद पुणे में विहिप के हथियार लहराते हुए जुलूस निकालने से लग जाता है। लेकिन, मोदी-2 के इसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे होने का और भी बड़ा संकेत है,

‘छोटा भाई’ यानी अमित शाह का न सिर्फ कैबिनेट मंत्री बनाया जाना बल्कि उन्हें राजनाथ सिंह से लेकर गृहमंत्रालय सौंपा जाना। कश्मीर से लेकर, उत्तर-पूर्व तक के लिए तथा नक्सली हिंसा के निपटने के नाम पर आदिवासी इलाकों के लिए भी और देश भर में पुलिसिंग के काम व नागरिक अधिकारों व स्वतंत्रताओं के लिए ही नहीं भारतीय नागरिक किसे माना जाएगा इसकी परिभाषा के लिए भी, इस नियुक्ति के निहितार्थ चिंताजनक हैं।

गुजरात में मोदी की ही सरकार में गृहमंत्री के पद पर रहते हुए, शाह का नाम जिस तरह के फर्जी एन्काउंटर राज से जुड़ा रहा था, उससे इसका कुछ अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है कि अगर विपक्ष ने असरदार तरीके से नहीं रोका तो मोदी-शाह जोड़ी, मोदी-2 को किस रास्ते पर ले जाएगी!

0 राजेद्र शर्मा

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