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Dead bird colliding with a windmill Photo Mohammed Samsur Ali,

पक्षियों के लिए खतरा बन रही हैं पवन-चक्कियां

Birds are dying due to windmills hitting the blades : Study

पवन अक्षय ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत (Wind, a major source of renewable energy, मानी जाती है। लेकिन, पवन-चक्की की टरबाइनें (Windmill turbines) आसपास के क्षेत्रों में पक्षियों के जीवन के लिए खतरा बनकर उभर रही हैं। एक नए अध्ययन में पता चला है कि पवन-चक्कियों के ब्लेड से टकराने के कारण पक्षियों की मौत हो रही है।

गुजरात के कच्छ में स्थित सामाख्याली और कर्नाटक के हरपनहल्ली और दावणगेरे में पवन-चक्की संयंत्रों के आसपास पक्षियों की मौतों के कारणों की पड़ताल करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं।

इस अध्ययन के दौरान सामाख्याली में 11 प्रजातियों के पक्षियों के 47 कंकाल मिले हैं। इसी तरह, हरपनहल्ली के पवन-चक्की संयंत्रों के आसपास तीन प्रजातियों के सात पक्षी कंकाल पाए गए हैं।

मृत पक्षियों के कंकालों का पता लगाने के लिए टरबाइनों के 130 मीटर के दायरे में खोजबीन की गई है। टरबाइन के आसपास के क्षेत्रों की पूरी तरह से खोजबीन करने के लिए पवन-चक्की के आधार से सर्पिल मार्ग चुना गया ताकि अधिक संख्या में मृत पक्षी कंकाल खोजे जा सकें।

शोधकर्ताओं ने पवन-चक्की टावरों के आसपास पाए गए पक्षियों के शवों, उनके शरीर पर चोट के निशान और पंखों एवं हड्डियों के अवशेषों की पड़ताल की है। इस तरह मिले आंकड़ों को मृत पक्षियों के अवशेष, प्रजाति और टरबाइन से जैविक अवशेषों की दूरी के अनुसार वर्गीकृत किया गया है। अध्ययनकर्ताओं ने अन्य जीवों द्वारा पक्षियों के जैविक अवशेषों के निस्तारण की दर पर भी पर विचार किया है।

कच्छ के कुल 59 पवन-चक्की संयंत्रों में से प्रत्येक संयंत्र के आसपास औसतन 40 दिन के अंतराल पर क्रमशः 23 चक्रों में खोजबीन की गई है। चार प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों से घिरा यह क्षेत्र पक्षियों की विविध प्रजातियों का आवास है, जहां सर्दियों में आर्कटिक, यूरोप और मध्य एशिया से प्रवासी पक्षी भी आते हैं।

पक्षी विज्ञानी डॉ रमेश कुमार सेल्वाराज ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि

“आसपास के घास के मैदान चील और बाज जैसे शिकारी पक्षियों की शरणगाह हैं। इस कारण इन पक्षियों के पवन चक्की के ब्लेड से टकराने का खतरा बना रहता है। शिकारी पक्षियों की उम्र लंबी होती है और ये बहुत कम अंडे देते हैं। इनकी मौतें अधिक होने से इन पक्षी प्रजातियों पर लुप्त होने का संकट बढ़ सकता है।”

सामाख्याली पाए गए पक्षी कंकालों में से 43 कंकाल प्रवासी पक्षियों के आगमन के मौसम में मिले हैं। इनमें से अधिकतर कंकाल टरबाइन के 20 मीटर के दायरे में पाए गए हैं। टरबाइन से टकराने के कारण कबूतर की प्रजाति ढोर फाख्ता (यूरेशियन कॉलर डव) की मौतें सबसे अधिक हुई हैं। हौसिल (डालमेशियन पेलिकन) और कठसारंग (पेंटेड स्ट्रोक) जैसे दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों के शव भी शोधकर्ताओं को मिले हैं।

अध्ययन में शामिल पक्षी विज्ञानी डॉ रमेश कुमार सेल्वाराज ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि

“आसपास के घास के मैदान चील और बाज जैसे शिकारी पक्षियों की शरणगाह हैं। इस कारण इन पक्षियों के पवन चक्की के ब्लेड से टकराने का खतरा बना रहता है। शिकारी पक्षियों की उम्र लंबी होती है और ये बहुत कम अंडे देते हैं। इनकी मौतें अधिक होने से इन पक्षी प्रजातियों पर लुप्त होने का संकट बढ़ सकता है।”

दावणगेरे में जिन पवन-चक्कियों के आसपास यह अध्ययन किया गया है वे पर्णपाती वनों के करीब हैं, जहां स्थानीय पक्षियों की 115 प्रजातियां पायी जाती हैं। वर्ष 2014-15 के दौरान यहां पवन-चक्की क्षेत्रों में नौ चरणों में अध्ययन किया गया है। यहां सात पक्षी कंकाल मिले हैं, जिसमें से चार कंकाल प्रवासी पक्षियों के आगमन के मौसम में पाए गए हैं। ये सभी पक्षी कंकाल पवन-चक्की के 60 मीटर के दायरे में मिले हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि

“इस अध्ययन से प्रति टरबाइन से औसतन 0.5 पक्षियों के मारे जाने का पता चलता है। यह एक सीमित आंकड़ा हो सकता है क्योंकि पक्षियों के पवन-चक्कियों के ब्लेड से टकराने से होने वाली मौतें 40 दिन के अंतराल पर दर्ज की गई हैं। नियमित निगरानी से पक्षियों की मौतों से संबंधित आंकड़े अधिक हो सकते हैं।”

वैज्ञानिकों के अनुसार, पक्षियों की नियमित निगरानी और पवन-चक्की लगाते समय पक्षियों के आवास को ध्यान में रखते हुए स्थान का चयन करना इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसा करने से पक्षियों को पवन-चक्कियों के खतरे से बचाया जा सकता है।

शोधकर्ताओं में रमेश कुमार सेल्वाराज (बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, मुंबई), अनूप वी., अरुण पी.आर., राजा जयपाल, और मोहम्मद समसूर अली (सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र, कोयंबत्तूर – Sálim Ali Centre for Ornithology and Natural History) शामिल थे। यह अध्ययन शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित किया गया है।

सुशीला श्रीनिवास

(इंडिया साइंस वायर)

भाषांतरण : उमाशंकर मिश्र

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