आपकी नज़रस्तंभहस्तक्षेप

मधुमेह की शिकार है हमारी यह दुनिया

Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

उस रसगुल्ले (Rosgulla) की देहगंध अब इस कायनात में कहीं नहीं। कहीं भी नहीं। पाकिस्तान के आर्य हिंदुओं और सिखों (Arya Hindus and Sikhs of Pakistan) को अब पांच साल पहले आने पर भी हिंदुत्व की सरकार (Government of Hindutva) नागरिकता और नौकरी (Citizenship and job) दोनों दे रही है और कश्मीर समस्या उसके लिए कश्मीरी पंडितों की समस्या (Problem of Kashmiri Pandits) है,  बाकी कश्मीर (Kashmir) और बाकी देश की नहीं। तो पूर्वी बंगाल (East Bengal) के अनार्य हिंदू विभाजन पीड़ित शरणार्थी (Partition Victim Refugees) जो सन् सैंतालीस में भारत में बसने के बावजूद अस्पृश्य (Untouchables) और बेनागगरिक हैं,  वोट बैंक समीकरण के अलावा रंगभेदी भेदभाव के अलावा संघ परिवार की कोई मिठाई नहीं है उनके लिए।

रंगभेदी नस्ली मनुस्मृति नवउदार मुक्तबाजारी राजकाज के इतिहास भूगोल का यह दर्पण है। चाहें तो अपना चेहरा देख लें।

शोर नहीं सोर यानी कोलाहल नहीं,  चेतना का अंतस्थल,  अंतःप्रवाह आज के रोजमनामचे में सबसे पहले हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी का यह वक्तव्य,  मेरी रचना ’आधी रात के सोर’ के ’सोर’ को कतिपय पाठक शोर (कोलाहल) समझ रहे हैं। वस्तुत: यह शब्द कुमाऊनी भाषा का है और stream of conscousness या हिन्दी के ’चेतना प्रवाह’ का समानार्थक है।

सोते समय दिमाग में एक के बाद एक अनेक यादों और विचारों का उभर आना ही ’सोर’ है। इस भूल के अपराधी हम हैं क्योंकि हम खुद इसका मायने समझ नहीं सके।

कृपया आधी रात का शोर शीर्षक प्रकाशित कविता को आधी रात का सोर पढ़ें।

ब्रह्मराक्षस के दिखाये रोशनदान की रोशनी में इसी सोर के तहत फिर पढ़ें – पाकिस्तान के आर्य हिंदुओं और सिखों को अब पांच साल पहले आने पर भी हिंदुत्व की सरकार नागरिकता और नौकरी दोनों दे रही है और कश्मीर समस्या उसके लिए कश्मीरी पंडितों की समस्या है,  बाकी कश्मीर और बाकी देश की नहीं।

तो पूर्वी बंगाल के अनार्यहिंदू विभाजन पीड़ित शरणार्थी जो सन सैतालीस में भारत में बसने के बावजूद अस्पृश्य और बेनागगरिक हैं,  वोट बैंक समीकरण के अलावा रंगभेदी भेदभाव के अलावा संघ परिवार की कोई मिठाई नहीं है उनके लिए। रंगभेदी नस्ली मनुस्मृति नवउदार मुक्तबाजारी  राजकाज के इतिहास भूगोल का यह दर्पण है। चाहें तो अपना चेहरा देख लें। मौलिक हलवाई दुर्गापद अधिकारी बसंतीपुर वालेबात का सिरा फिर वहीं बसंतीपुर में उलझ गया है।

अपने वीरेनदा के निर्देशानुसार यह गप्प उसी बसंतीपुर से शुरु करता हूँ।

हमारे बचपन में वहाँ दुर्गापद अधिकारी मानक एक मौलिक हलावाई हुआ करते थे जो जाति से लेकिन कायस्थ थे। जात पांत के बारे में बसंतीपुर की दुनिया और हिमालय छोड़कर कोलकाता आने से पहले हमें कुछ खास मालूम न था। कोलकाता में ही हमें अपनी सामाजिक हैसियत और कुल औकात के बारे में समझा दिया गया। पहाड़ में किसा ने समझाया नहीं। जाति परिचय उजागर होने,  जगजाहिर होने के बावजूद,  बाहैसियत कुत्ता बन जाने के बावजूद मैं अब भी उत्तराखंड के कोने-कोने में उनका अपना बच्चा हूँ,  जहाँ जाति भाषा पहचान अस्मिता बेमतलब है।

अगर उत्तराखंड मेरे वजूद में न होता तो यह सब लिखना मेरे लिए असम्भव ही होता।

ताराचंद्र त्रिपाठी से मुलाकात नहीं होती तो मैं बड़ा कोई चाकर कामयाब हो सकता है, हो जाता और देश दुनिया के सरोकारों से बेखबर बेहद कामयाब भी हो जाता, लेकिन त्रिपाठी जी से स्ट्रीम आफ कांशसनेस के संक्रमण की वजह से मैं अब भौंकता हुआ कुत्ता हूँ और मुझे बिना काटे इस भौकने की विरासत पर गर्व है।

थोड़ी सी जगह दें उत्तराखंड में मुझे बंगाली बंगाल में कोई नहीं मानता और मैं बतौर बंगाली मरना भी नहीं चाहता।

मुझे लोग उत्तराखंडी मानकर अपनी माटी में थोड़ी सी जगह दे दें मरने के लिए तो मेरा जीवन मरण सार्थक हो जाये। लेकिन दुर्गापद अधिकारी की जाति इसलिए मालूम है कि वे बसंतीपुर में अव्वल तो अकेले कायस्थ थे और शरणार्थी जनपद दिनेशपुर में कायस्थ जनसंख्या लगभग शून्य है। अब तो उस परिवार के बच्चों के जैसे इने- गिने ब्राह्मण परिवारों के बच्चों की शादी भी दूसरी जातियों में हो रही हैं और इस तरह उनकी वैवाहिक समस्या सुलझ गयी।

दुर्गापद अधिकारी के एकमात्र पुत्र विधू अधिकारी, जो हमारे बड़े भाई हैं और अब बसंतीपुर में कार्तिक काका जात्रा कलाकार की तरह सबसे बुजुर्ग भी हैं, उनकी विवाह की भारी समस्या हो गयी क्योंकि कायस्थ परिवार में ही उनका विवाह हो, ऐसा दुर्गापद जी की जिद थी। और कायस्थ परिवार शरणार्थी उपनिवेश में कहीं थे नहीं कि कन्या मिल जाये। बाकायदा विधूदा कुंआरा बनकर रह जाने से बाल-बाल बच गये क्योंकि हमारी भाभी जान की शुभदृष्टि के अधिकारी बनने को वे कामयाब हो गये।

मुश्किल यह है कि कायस्थ ब्राह्मण शरणार्थी होकर भी बंगाल में बस गये और बाहरी राज्यों में निनानब्वे फीसद दलितों का ही बसेरा है। वहाँ इक्के दुक्के कायस्थ ब्राह्मणों के लिए विशुद्ध जाति की रक्षा कर पाना आर्थिक संगति के मुताबिक कभी सम्भव ही नहीं रहा है।

पुलिनबाबू की मूर्ति तोड़ो का जश्न वे बाहैसियत शरणार्थी दलित ही रहे हैं और उनके नेता पुलिनबाबू, जो संजोग से मेरे पिता हैं और अंबेडकर जोगेंद्र नाथ मंडल के कट्टर अनुयायी भी और मार्क्सवादी भी और अपढ़ भी, बार-बार यही कहते रहे कि बेनगरिक सारे शरणार्थी दलित ही हैं और उनकी कोई जाति नहीं है और उनमें रोटी-बेटी के रिश्ते में भेदभाव होना नहीं चाहिए। यह संघ परिवार की विशुद्धता आधारित हिंदुत्व का महान दर्शन के खिलाफ है।

शायद इसीलिए अब केसरिया हुए दिनेशपुर वाले रोज-रोज पुलिन बाबू की मूर्ति नये सिरे से गढ़कर रोज-रोज तोड़कर उनकी शरणार्थी जिंदगी का जश्न मना रहे हैं।

हकीकत फिर भी यही है कि बंगाल के बाहर बसे ब्राह्मण और कायस्थ और सवर्ण शरणार्थी भी चाहे-अनचाहे अनार्य भूगोल में शामिल हैं। बंगाल में उनके एकाधिकारवादी वर्चस्व के विपरीत। बाकी देश के मुक्त बाजार में ब्राह्मणत्व और सवर्ण अस्मिता का सच भी लेकिन यही है। सबकुछ लुट पिट तबाह हो जाने के बाद सवर्ण अस्मिता के मध्य लोग हिंदुत्व का गीता महोत्सव मना रहे हैं और तमाम मूर्तियाँ तोड़कर नाथूराम गोडसे की मूर्तियाँ लगा रहे हैं और विधर्मियों का शुद्धिकरण करके उन्हें हिंदू बना रहे हैं।

तो विधूदा की दुल्हन बंगाल से लायी गयी। भइया हमारे साढ़े चार फुट कद के और भाभी छह फुटिया। उस भाभी से बचपन से हमारे बेहद मीठे संबंध हैं। लेकिन ऐसी अजब गजब जोड़ी हमने कोई दूसरी कहीं देखी नहीं हैं। उन दुर्गापद अधिकारी का पहचान उनके बनाये रसगुल्लों से होती थी जिसकी दक्षता वे पूर्वी बंगाल से बसंतीपुर तक ढो कर लाये थे। उन्होंने ही दिनेशपुर में एक दूसरे कायस्थ परिवार को आयातित किया जो संजोग से हलवाई थे। कर्तिक मयरा। जिनकी दुकान दिनेशपुर की खास पहचान बनी रही जबतक न कि अपनी बेटी अर्पणा के विवाह के बाद वे दुकान जमीन बेचकर बंगाल नहीं चले गये।

अर्पणा मेरी सहपाठिन रही है। हम लोग उसे रसगुल्ला कहकर ही बुलाया करते थे। कारीगर हमारे विधू दा भी खूब हैं लेकिन वे स्वभाव से कलाकार हैं। बसंतीपुर जात्रा पार्टी के वे प्रोमटर रहे हैं और उनके बच्चे अब संगीतकार हैं। लेकिन मिठाइयाँ विधूदा भी खूब बना लेते हैं। व्यवसाय दुर्गापद अधिकारी का स्वभाव नहीं था। वे मिठाइयाँ कलाकार के तेवर में बनाते थे और कारोबार में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। मिठाइयाँ बनाने के बाद तमाम लोग उनकी कला और रसगुल्लों की मिठास की तारीफ करें , उनकी सारी कोशिश यही होती थी। इसलिए दिनेशपुर में पहली मिट्ठाई की दुकान खोलने के बावजूद उनकी दुकानदारी चली नहीं और दिनेशपुर की मिठाइयों की पहचान हमारी सहपाठिन अर्पणा के पिता की दुकान ही रही है।  

अर्पणा खुद बेहद सुंदर थी लेकिन उससे भी सुंदर थीं उनकी मां जो रात दिन अपने पति के साथ रसगुल्ला बनाया करती थीं। अर्पणा उनकी इकलौती संतान थीं और उसके बंगाल चले जाने की वजह से उनकी दुकान भी बंद हो गयी। कार्तिर मयरा वहीं दिवंगत हो गये, ऐसा हमें इस बार दिनेशपुर जाकर पता चला है।

अपने विधू दा तो साक्षात भोलेनाथ हैं। ऐसा सज्जन आदमी हमने कभी कहीं देखा नहीं है। गांव के सारे पर्व त्योहार या फिर किसी के यहाँ किसी भी आयोजन में निःशुल्क सेवा के लिए सबसे पहले वे तैयार थोड़ा बहुत जलपान की व्यवस्था हालांकि उनके लिए करनी होती है और वे किसी से कभी मेहमाताना मांगते हों, ऐसा मुझे कभी मालूम नहीं पड़ा। इस परिवार की ज्यादा दिलच्सपी अपनी खेती-बाड़ी में रही हैं। मिठाइयाँ वे बैठे-ठाले बनाते रहे हैं जैसे इस देस की हम मां बहन तीज त्योहार पर अपना मिठाइयाँ शौक पूरी करने के लिए विशुद्ध हलवाई बन जाती हैं वैसे ही उनका हलवाई होने का किस्सा है। फिर गांव में ही ठेला लगाकर बेचते हैं और दुकान उनने कभी लगायी ही नहीं।रसगुल्ले की उत्पत्ति गांव बसंतीपुर में ही हुई अगर मुझसे कोई पूछे कि रसगुल्ले की उत्पत्ति कहाँ से हुई तो मैं बेहिचक कोलकाता और बंगाल के सारे दावे खारिज करके, देवघर के रसगुल्लों को खारिज करके बाबुलंद आवाज में कह सकता हूँ कि रसगुल्ले की उत्पत्ति गांव बसंतीपुर में ही हुई।

बसंतीपुर से बने उस रसगुल्ले की देहगंध से महमहाते रहे हैं हमारे बचपन, कैशोर्य और यौवन। तब हम कितनी ही रसगुल्ले खा लेते थे।आज हम मधुमेह के शिकार हैं। पूरा देश मधुमेह का शिकार है। पहाड़ में भी लोग मधुमेह से पीड़ित हैं। जैसे मैदानों में रसगुल्ले नहीं हैं वैसे ही लालाबाजार अल्मोड़े में कब तक बने रहेंगे बाल मिठाई, इसकी हमारी कोई धारणा नहीं है। नैनीताल में तो बमुश्किल मिलती है।

अब उस रसगुल्ले की देहगंध इस कायनात में कहीं नहीं है। कहीं भी नहीं है। सबसे मजे की बात है कि बंगाली शरणार्थी जो तराई में बसे और उनका जो अपना शहर उन लोगों ने बनाया, बसंतीपुर का या बाकी किसी शरणार्थी गांव का कुछ भी नहीं बचा है।वहाँ हमें कोई पहचानने वाला नहीं है।

दिनेशपुर हाईस्कूल में मेरे सीनियर अरविंद मिष्टिवाल महज नाम के मिष्टिवाला हैं क्योंकि उनकी मिष्टि की दुकान चली नहीं और बंगालियों की कोई मिठाई की दुकान दिनेशपुर में है या नहीं, मुझे मालूम नहीं है।

कार्तिक मयरा ने बेहद निजी कारण से जो अपनी दुकान जमीन बेच दी तो एक एक करके सारे बंगालियों ने बेशकीमती दुकान और जमीन मुंहमांगे दाम पर बेच देने में कोई हिचकिचाहट दिखायी नहीं है।

अब दिनेशपुर बहुत बड़का शहर हो गया है जहाँ हमारी जवानी में हमारे साथ झुंड के झुंड लोग होते थे, जहाँ हमारी एक आवाज पर दसियों हजार लोग इकट्ठा हो जाते ते, वहाँ हमें कोई पहचानने वाला नहीं है।

स्थानीय सारे लोग दिनेशपुर से बेदखल हैं।हमारे बैठने की कोई जगह है ही नहीं क्योंकि बंगाली हो या गैर बंगाली स्थानीय सारे लोग दिनेशपुर से बेदखल हैं।

मित्रों यह किस्सा एक अधूरी प्रेमकथा जैसी कुछ नहीं है, स्कूल की क्यारी पर खड़े कनेर के फूल की खुशबू की चर्चा के अलावा अर्पणा से हमारा कोई संवाद नहीं रहा है। हम नहीं जानते कि वह जीवित है कि दिवंगत हो गयी है और इस जनम में उससे मिलने की कोई संभावना नहीं है। इसलिए उसे इस किस्से की नायिका समझने की भूल न करें। उससे मेरी कोई मुलाकात सन सत्तर के बाद हुई भी नहीं। तब हम लोग बारह तेरह चौदह साल की दहलीज पर थे।

दरअसल यह किस्सा हिमालय का है, सारा देश का किस्सा है यह, प्रेम कथा नहीं, भोगा हुआ यथार्थ।

दरअसल यह किस्सा पूरे हिमालय का है, जहाँ पहाड़ी प्रकृति और पर्यावरण से बेदखल हो रहे हैं। यह किस्सा तमाम नदियों के किनारे, समुद्रतट पर रहने वाले, जंगलों में रहने वाले और भारत देश के हर जनपद के वाशिंदों की व्यथाकथा है जहाँ रसगुल्ले की कोई देहगंध इस कायनात में कहीं नहीं है।

सारे रंग रूप रस गंध बेदखल हैं। रस्सगुल्ले की गुमशुदगी दरअसल मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था का भोगा हुआ यथार्थ है। 

O- पलाश विश्वास

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: