Home / समाचार / दुनिया / #विटिलिगो (सफ़ेद दाग की बीमारी) छुआछूत से नहीं फैलती : डॉ. सिद्धार्थ टंडन
विटिलिगो बीमारी की बारे में एक मिथक या लोगों में एक भ्रम है कि यह छूने से फैलता है। जबकि ऐसा नहीं होता है। इसलिए विटिलिगों को पीडि़तों के साथ सामान्य व्यवहार कर उनके जीवन में उमंग भरना चाहिए।

#विटिलिगो (सफ़ेद दाग की बीमारी) छुआछूत से नहीं फैलती : डॉ. सिद्धार्थ टंडन

dr siddharth tandon speaking on World Vitiligo Day

#विटिलिगो बीमारी का इलाज अब संभव, सर्जरी भी उपलब्ध : डॉ सिद्धार्थ टंडन

हर साल 25 जून को मनाया जाता है विश्व विटिलिगो दिवस ( World Vitiligo Day)

गाजियाबाद 25 जून 2019 : विटिलिगो (Vitiligo) एक प्रकार का त्वचा रोग (skin disease) है। दुनिया भर की लगभग 0.5 प्रतिशत से एक प्रतिशत आबादी विटिलिगो से प्रभावित है, लेकिन भारत में इससे प्रभावित लोगों की आबादी (Population) लगभग 8.8 प्रतिशत तक दर्ज किया गया है। देश में इस बीमारी को समाज में कलंक के रूप में भी देखा जाता है। विटिलिगो किसी भी उम्र में शुरू हो सकता है, लेकिन विटिलिगो के आधा से ज्यादा मामलों में यह 20 साल की उम्र से पहले ही विकसित हो जाता है, वहीं 95 प्रतिशत मामलों में 40 वर्ष से पहले ही विकसित होता है।

यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, कौशाम्बी के त्वचा रोग विशेषज्ञ (Dermatologist in Delhi/NCR) डॉ सिद्धार्थ टंडन बताते हैं कि विटिलिगो एक प्रकार का त्वचा विकार (skin disorder) है, जिसे सामान्यत: ल्यूकोडर्मा (Leucoderma) के नाम से जाना जाता है। इसमें आपके शरीर की स्वस्थ कोशिकाएं प्रभावित होती हैं। इस बीमारी का क्रम बेहद परिवर्तनीय है। कुछ रोगियों में घाव स्थिर रहता है, बहुत ही धीरे-धीरे बढ़ता है, जबकि कुछ मामलों में यह रोग बहुत ही तेजी से बढ़ता है और कुछ ही महीनों में पूरे शरीर को ढक लेता है। वही कुछ मामलों में, त्वचा के रंग में खुद ब खुद पुनर्निर्माण भी देखा गया है। इतना ही नहीं मरीज का परिवार भी समाज की भ्रांतियों में पड़कर परेशान होता है।

उन्होंने कहा कि सफेद दाग की बीमारी को लेकर लंबे समय से एक लड़ाई चल रही है। भारतीय सैन्य सेवाओं से लेकर कई तरह की सरकारी नौकरी में भी सफेद दाग की वजह से मौका नहीं मिल पाता।

यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, कौशाम्बी के त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ कुलदीप शर्मा जब आपके शरीर में मेलेनोसाइट्स (Melanocytes) मरने लगते हैं, तब इससे आपकी त्वचा पर कई सफेद धब्बे (White spots) बनने शुरू होते हैं। इस स्थिति को सफेद कुष्ठ रोग (leprosy) भी कहा जाता है। यह आमतौर पर शरीर के उन हिस्सों जो कि सूरज की रोशनी के सीधे संपर्क में आते हैं, चेहरे, हाथों और कलाई के क्षेत्र इससे ज्यादा प्रभावित होते है।

डॉ. कुलदीप बताते हैं कि विटिलिगो के होने का सटीक कारण को अभी तक पहचाना नहीं जा सका है, हालांकि यह आनुवांशिक (Genetic) एवं पर्यावरणीय (Environmental) कारकों के संयोजन का परिणाम प्रतीत होता है। कुछ लोगों ने सनबर्न या भावनात्मक तनाव जैसे कारकों को भी इसके लिए जिम्मेवार बताया है। आनुवंशिकता विटिलिगो का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है, क्योंकि कुछ परिवारों में विटिलिगो को बढ़ते हुये देखा गया है।

यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, कौशाम्बी की त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ गरिमा गुप्ता की अनुसार सफेद दाग की बीमारी छुआछूत की बीमारी नही है, इसके प्रति समाज में फ़ैली भ्रांतियों को दूर करने की आवश्यकता है। इतना ही नहीं मरीज का परिवार भी समाज की भ्रांतियों में पड़कर परेशान होता है।

उन्होंने कहा कि सफेद दाग की बीमारी को लेकर लंबे समय से एक लड़ाई चल रही है। भारतीय सैन्य सेवाओं से लेकर कई तरह की सरकारी नौकरी में भी सफेद दाग की वजह से मौका नहीं मिल पाता। अगर हम एकजुट होकर इस बीमारी से लड़ेंगे तो इस रोग को जड़ से ख़त्म कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि विटिलिगो के इलाज के लिए, टोपिकल, विभिन्न सर्जरी, लेजर चिकित्सा एवं अन्य वैकल्पिक उपचार (Alternative treatment) उपलब्ध हैं।

यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, कौशाम्बी के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. पी. एन. अरोड़ा ने कहा कि विटिलिगो बीमारी की बारे में एक मिथक या लोगों में एक भ्रम है कि यह छूने से फैलता है। जबकि ऐसा नहीं होता है। इसलिए विटिलिगों को पीडि़तों के साथ सामान्य व्यवहार कर उनके जीवन में उमंग भरना चाहिए। समाज में अछूत की नजर से देखे जाने के कारण अक्सर सफेद दाग के पीड़ितों में हीन भावना औऱ मानसिक अवसाद (Mental depression) घर कर लेता है। ऐसे में लोगों को इस बीमारी के बारे में जागरूक होना बहुत जरूरी है।

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