भारत समेत पूरी दुनिया में विस्थापितों की समस्या कोई नहीं सुनता, करोड़ों होंगे विस्थापित

refugee problem in Hindi

Nobody hears the problem of the displaced in the whole world including India, crores will be displaced

पिछले एक दशक से राष्ट्रवादी सरकारें (Nationalist government) ही लगभग हरेक देश में चुनकर आ रहीं हैं या फिर थोपी जा रही हैं. दूसरी तरफ पूरी दुनिया में अशांति बढ़ती जा रही है और इस अशांति से विस्थापितों और अप्रवासियों की संख्या (Number of migrants) भी बढ़ती जा रही है. तमाम राष्ट्रवादी सरकारों को अप्रवासी और विस्थापित समूह देश पर एक भार जैसे लगने लगे हैं और इन्हें देश की सीमा से बाहर करने के आदेश जारी करते रहते हैं.

अमेरिका में ट्रंप प्रशासन तो बाहरी लोगों की तुलना कभी नाजियों से करता है तो कभी अप्रवासियों को दूसरे ग्रह के निवासी बताता है.

इंग्लैंड में ब्रेक्सिट का मसला भी इसी पर आधारित है और स्पेन और फ्रांस समेत यूरोप के अनेक देश सीरिया के अप्रवासियों (Syrian immigrants) को खदेड़ने में लगे हैं.

इन सब पर खूब चर्चा की जाती है, पर ऐसा ही हाल भारत का भी है, जिसपर मानवाधिकार संगठन और मीडिया कुछ नहीं कहती.

हमारे प्रधानमंत्री स्वयं समय-समय पर इसे देश की गंभीर समस्या बता चुके हैं. पिछले चुनावों में प्रधानमंत्री और बीजेपी अध्यक्ष दोनों ही उत्तर और उत्तर-पूर्व की हरेक जनसभा में इसे देश की सबसे गंभीर समस्या करार देते रहे हैं. इसका फायदा भी चुनावों में मिला.

बीजेपी अध्यक्ष तो इन लोगों को दीमक कहकर संबोधित कर चुके हैं, जो देश को खोखला कर रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में लगभग 7 करोड़ शरणार्थी हैं, जिनमें से लगभग 3 करोड़ ऐसे हैं जिन्होंने अपना देश छोड़कर किसी और देश में शरण ली है, या फिर इसके लिए प्रयासरत हैं. ऐसे शरणार्थियों में से लगभग आधे 18 वर्ष या इससे कम उम्र के हैं.

According to the United Nations, within two seconds a new person in the world becomes a refugee.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार हरेक दो सेकंड के भीतर दुनिया में एक नया व्यक्ति शरणार्थी बन जाता है.

वर्ष 2018 के दौरान केवल 92400 शरणार्थियों को किसी और देश में ठिकाना मिला. अधिकतर बड़े और अमीर देश अब शरणार्थियों से बचने लगे हैं, पर अनेक गरीब देश और कुछ यूरोपीय देश अब भी इन्हें शरण देते हैं. लगभग 67 लाख शरणार्थी दुनिया के सबसे गरीब देशों में बसे हैं.

Investigation report on human rights violations and genocide by Myanmar military

म्यांमार के रोहिंग्या विस्थापितों (Myanmar’s Rohingya displaced) की खूब चर्चा होती है. इस समस्या पर संयुक्त राष्ट्र की भी नजर है. वर्ष 2017 में संयुक्त राष्ट्र ने एक तीन सदस्यीय दल बनाया था जिसे म्यांमार की फौज द्वारा किये जाने वाले मानवाधिकारों के उल्लंघन और नरसंहार के बारे में जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी. म्यानमार की फौज ने रोहिंग्या लोगों के साथ जो अमानवीय व्यवहार किया था, इसी की पुष्टि करने के लिए यह रिपोर्ट बनायी गयी. वहां की फ़ौज ने संयुक्त राष्ट्र के किसी भी सदस्य को म्यांमार में प्रवेश नहीं करने दिया था. फिर इस दल के सदस्यों ने लगभग 875 विस्थापितों के साक्षात्कार के आधार पर 440 पृष्ठों की एक रिपोर्ट सितम्बर 2018 में प्रस्तुत किया. ये सभी विस्थापित फ़ौज द्वारा रोहिंग्या के शोषण और नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी भी थे.

इस रिपोर्ट के अनुसार म्यांमार की फ़ौज नरसंहार, ह्त्या, बिना कारण जेल में डालना, महिलाओं और बच्चियों से बलात्कार, बच्चों के शोषण और इनके गाँव में आगजनी के लिए दोषी है.

रिपोर्ट में सभी देशों से अनुरोध किया गया है कि वे म्यानमार की फ़ौज के साथ किसी भी तरह के रिश्ते न रखें. इन शरणार्थियों के लिए बांग्लादेश ने एक बड़ा कैम्प बनाया है, पर उसमें सुविधाओं का अभाव है. इसीलिए हरेक वर्ष हजारों रोहिंग्या छोटी नावों के सहारे समुद्री रास्ते से लम्बी दूरी तय कर दूसरे देशों में जाने का प्रयास करते हैं. इनमें से कुछ पहुंचते हैं, और शेष यात्रा में ही भूख, प्यास, थकान या फिर नाव डूबने के कारण मर जाते हैं.

हाल में ही इंडोनेशिया के सागर तटीय एक गांव, अचेह, के लोगों ने ऐसी ही एक नाव को तट के पास देखा, जिसमें लगभग 100 रोहिंग्या शरणार्थी थे. गाँव के लोगों ने पूरे दिन अधिकारियों से उन्हें तट पर उतरने की अनुमति देने की गुजारिश की, पर अधिकारियों ने कोविड-19 के प्रसार के अंदेशा का हवाला देते हुए तट पर उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया.

शाम को, गाँव वालों ने निश्चय किया कि अनुमति नहीं भी मिलती है तब भी वे लोग 100 लोगों को मरने के लिए समुद्र में नहीं छोड़ सकते. अंत में शाम को गाँव के लोगों ने रस्सियों और छोटी नावों के सहारे हरेक व्यक्ति को किनारे पंहुचाया. गाँव की एक खाली हवेली में इन लोगों के रुकने का इंतजाम किया, खाने और कपड़ों का प्रबंध किया. हालांकि, अभी तक अधिकारियों ने इन शरणार्थियों के रुकने की अनुमति नहीं दी है, पर पूरे गाँव का कहना है कि यदि अनुमति नहीं भी मिलती है, तब भी अब इन शरणार्थियों को वे वापस समुद्र में मरने के लिए नहीं जाने देंगें, भले ही सरकार उन पर कोई भी कार्यवाही करे.

गाँव के मुखिया नसरुद्दीन गुएचिक के अनुसार मानवता यही है, जो हम लोगों ने किया है.

दूसरी तरफ नीदरलैंड में इन दिनों एक बड़ा जन-आन्दोलन लगभग 500 अनाथ शरणार्थी बच्चों को बसाने के लिए किया जा रहा है. ग्रीस के सागर तट पर हजारो शरणार्थी, जो सीरिया, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से आये हैं, शिविरों में रहते हैं. इनमें से 2200 बच्चे ऐसे हैं जो अनाथ हैं. इनके लिए अलग शिविर हैं.

अक्टूबर 2019 में ग्रीस ने यूरोपीय यूनियन के देशों से इन बच्चों को अपने देश में रखने की गुजारिश की थी. अब तक लगभग 1700 बच्चों को कुछ देशों ने अपने देश में रखने के लिए हामी भरी है. इन देशों में नीदरलैंड शामिल नहीं है. अब, नीदरलैंड में एक बड़ा जन-आन्दोलन सरकार पर इन बच्चों को अपने देश में लाने के दबाव बनाने को लेकर किया जा रहा है.

नीदरलैंड की लगभग एक तिहाई नगर परिषद्, लगभग 120 स्थानीय निकाय जिसमें लगभग 90 लाख लोग रहते हैं, ने सरकार को इन बच्चों को अपने देश में बुलाने के लिए ज्ञापन दिया है. इस आन्दोलन में विश्वविद्यालय, राजनैतिक पार्टियां और तमाम बुद्धिजीवी शामिल हैं. पर, अभी तक प्रधानमंत्री मार्क रुत्ते ने कोई फैसला नहीं लिया है.

सरकार में चार राजनैतिक दल शामिल हैं, जिनमें से दो दल शरणार्थी बच्चों को अपने देश बुलाना चाहते हैं, जबकि अन्य दो दल ग्रीस में ही वित्तीय सहायता के माध्यम से शरणार्थी शिविरों की दशा सुधारना चाहते हैं. पर, यह आन्दोलन लगातार चल रहा है.

स्वीडन के मानवाधिकार कार्यकर्ता आजकल शरणार्थियों से सम्बंधित सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं.

स्वीडन के क़ानून के अनुसार वहां 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे ही शरणार्थी रह सकते हैं. वहां ऐसे ही एक शिविर में रहने वाली अफ़ग़ानिस्तान से आयी शरणार्थी, यारा, की उम्र जिस दिन 18 वर्ष हुई, ठीक उसी दिन सरकारी अधिकारियों ने उसे एक नाव में बैठाकर समुद्र में अपनी सीमा से दूर भेज दिया. मानवाधिकार कार्यकर्ता अब सरकार से अपने कानूनों की समीक्षा कर उसे मानवीय स्वरुप देने का अनुरोध कर रहे हैं.

महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

अमेरिका में अधिकतर शरणार्थी मेक्सिको के लगी सीमा से प्रवेश करते हैं. अनेक शहरों में इनके लिए शिविर बनाए गए हैं, जहां इन लोगों को लम्बी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक रखा जाता है. कोविड-19 के दौर में अनेक शिविरों में भी यह महामारी पहुँच चुकी है, पर इन शिविरों में स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं.

कुछ महीनों से मानवाधिकार संगठन इन कैम्पों में लोगों की संख्या कम करने और अधिक संक्रमण की स्थिति में लोगों के लिए बाहर बेहतर इंतजाम करने की मांग कर रहे थे. जब प्रशासन ने कुई कदम नहीं उठाया तब इन संगठनों ने टेक्सास के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में इससे सम्बंधित मुक़दमा दायर कर दिया. पिछले सप्ताह इसकी सुनवाई करते हुए जज डॉली गी ने इस मामले में ट्रम्प प्रशासन को फटकार लगाते हुए उन परिवारों को वहां से हटाने का आदेश दिया है, जिसमें छोटे बच्चे भी हैं.

यह एक दुखद तथ्य है कि पूरी दुनिया ग्लोबलाइजेशन की बातें करती है, अपना बाजार सबके लिए खोलती है, पर इंसान को एक देश की सीमा से बाहर नहीं आने देती. इस सन्दर्भ में आज मानव की हस्ती निश्चित तौर पर बाजार के किसी उत्पाद की तुलना में गौण हो गई है.

महेंद्र पाण्डेय

 

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