मी लॉर्ड ! क्या न्यायपालिका, ‘तुम मुझे चेहरा दिखाओ, मैं तुम्हें कानून बता दूंगा’ के आभिजात्य सिंड्रोम से ग्रस्त हो रही है ?

Supreme court of India

अर्णब प्रकरण, कुणाल कामरा के ट्वीट और सर्वोच्च न्यायालय की साख पर संकट

Arnab Case, Kunal Kamra’s tweet and Supreme Court’s credibility crisis

अटॉर्नी जनरल की संस्तुति के बाद अगर सर्वोच्च न्यायालय में, कुणाल कामरा पर मानहानि का मुकदमा चलता है तो, यह इस साल की दूसरी बड़ी मानहानि की कार्यवाही होगी जो देश की लीगल हिस्ट्री (Country’s legal history) में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखेगी। पहली प्रशांत भूषण का मुकदमा था और दूसरा कुणाल का होगा।

कुणाल न तो कोई एडवोकेट हैं और न ही समाज को बदलने की सनक में लिप्त कोई एक्टिविस्ट, बल्कि वे एक स्टैंड अप कॉमेडियन हैं और मनोरंजन करते हैं। पर उनके आठ ट्वीट, कानून के छात्रों को असहज औऱ आहत कर गए हैं, जिनकी पृष्ठभूमि अर्णब गोस्वामी के पक्ष में दिया गया सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला है।

अर्णब गोस्वामी की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि

“अगर राज्य सरकारें व्यक्तियों को टारगेट करती हैं, तो उन्हें पता होना चाहिए कि नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए शीर्ष अदालत है। हमारा लोकतंत्र असाधारण रूप से लचीला है, महाराष्ट्र सरकार को इस सब (अर्नब के टीवी पर ताने) को नजरअंदाज करना चाहिए।”

सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा,

“यदि हम एक संवैधानिक न्यायालय के रूप में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?… अगर कोई राज्य किसी व्यक्ति को जानबूझकर टारगेट करता है, तो एक मजबूत संदेश देने की आवश्यकता है।”

The state has no right to torture any citizen. But this concern should not be selective.

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में, निजी स्वतंत्रता के सिद्धांत को प्राथमिकता दी जो एक अच्छा दृष्टिकोण है और इसे सभी के लिये समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। राज्य को किसी भी नागरिक को प्रताड़ित करने का अधिकार नहीं है। पर यह चिंता सेलेक्टिव नहीं होनी चाहिए।

लेकिन क्या यह स्थिति केवल इसी विशेष मामले के लिये है या फिर सर्वोच्च न्यायालय ने इस सुप्रीम सिद्धांत को सबके लिये लागू करने के बारे में सोचा है। इस पर आरटीआई एक्टिविस्ट साकेत गोखले ने सर्वोच्च न्यायालय से, एक आरटीआई दायर कर निम्न सवाल पूछे हैं,

● लंबित अंतरिम जमानत के मामलो की संख्या,

● औसतन एक अंतरिम जमानत की अर्जी को निपटाने में लगने वाला समय,

● एक अंतरिम जमानत की याचिका को सुनवाई के लिये सूचीबद्ध करने में लगने वाला समय का विवरण।

निजी स्वतंत्रता केवल एक व्यक्ति का ही संवैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि उन सबका मौलिक अधिकार है जो अदालतों में अपनी  जमानत के लिये पहुंचते हैं। जब निजी आज़ादी के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय फिक्रमंद हो तो, यह आंकड़े भी देख लिए जाने चाहिये।

● 31 दिसम्बर 2019 को कुल 330487 लोग विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद हैं। क्या इन सभी के मामले में उचित न्यायिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ है?

● इनमें से कितने लोग ऐसे हैं, जो जमानत के पात्र नहीं होंगे या वास्तव में अपराधी होंगे?

● इनमें से 41511 लोग 2 साल से ज्यादा की अवधि से बंद हैं।

● 330487 में से 69302 लोग अनुसूचित जाति और 34756 लोग अनुसूचित जनजाति के हैं।

● मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा आदिवासी 5894 और उत्तरप्रदेश में अनुसूचित जाति के 17995 लोग जेल में बंद हैं।

● विचारधीन कैदियों में 94533 लोग निरक्षर और 134749 लोग पांचवी से कम शिक्षित हैं।

● 1212 विचाराधीन महिला कैदी अपने बच्चों के साथ कारावास में हैं। इन महिलाओं के साथ 1409 बच्चे भी जेल में हैं।

‘हम अक्सर भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व से लेकर समस्त जनतांत्रिक अधिकार फ्रांसीसी व उसके बाद की क्रांतियों के जरिये जनता ने बलपूर्वक ले लिए थे, किसी जज ने फैसले में लिखकर नहीं दिये थे। जजों के फैसले अधिकार छीन सकते हैं, उन्हें लेना तो जनता ने खुद ही पड़ता है।’

अब कुछ उदाहरण पढ़िए जो अपनी जमानत के लिये लम्बे समय से प्रयासरत हैं और उन्हें वह राहत नहीं मिली है जो सर्वोच्च न्यायालय ने अर्णब को आनन फानन में दे दी है।

अब कुछ उदाहरण देखिये।

पहला प्रकरण है, भीमा कोरेगांव मामले में जेल में बंद 85 वर्ष के अभियुक्त स्टेन स्वामी का। उनकी ज़मानत की अर्जी यूएपीए की विशेष अदालत मे लंबित है, जिस पर सुनवाई चल रही है। स्टेन स्वामी पारकिंसन रोग से पीड़ित है और, इस कारण वे किसी खुले बर्तन से कोई भी तरल पदार्थ नहीं पी सकते हैं। उन्होंने अदालत से यह अनुरोध किया कि, उन्हें पानी या तरल पदार्थ पीने के लिए एक स्ट्रा या सिपर उपलब्ध करा दिया जाय। वे अपने साथ अपने बैग में स्ट्रा और सिपर लेकर चलते भी हैं। जब उनकी गिरफ्तारी हुई थी तो यह सब उनके बैग में था भी। अदालत ने स्ट्रा दिलाने की उनकी प्रार्थना पत्र पर इस केस के विवेचक एनआईए से आख्या मांगी। एनआईए ने इस पर आख्या देने के लिए बीस दिन का समय मांगा। बीस दिन में एनआइए यह तय कर पाएगा कि स्ट्रा दिया जाय या नहीं। अब स्वामी तब तक या तो मुंह के अगल-बगल पानी चुआते पानी पिए या फिर प्यासे रहें।

दूसरा प्रकरण है, वरवर राव का जो अर्णब गोस्वामी के मुकदमे से पहले का है। लेकिन राव से अर्णब तक,  कानून तो नहीं बदला पर उनकी व्याख्या औऱ प्राथमिकताएं बदल गई या अदालत का दृष्टिकोण बदल गया, यह विचारणीय है।

वरवर राव की याचिका (Petition of Varavara Rao) पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट को यह निर्देश दिया था कि, वह वरवर राव के स्वास्थ्य को देखते हुए मेडिकल आधार पर जमानत के लिये विचार करे। लेकिन खुद जमानत नहीं दी थी। याचिका में कहा गया था कि, निरन्तर जेल में रहने और उनके साथ अमानवीय तथा क्रूरतापूर्ण व्यवहार होने के काऱण, उनकी हालत बहुत खराब हो गयी है और वे बीमार हैं। उनकी वकील सर्वोच्च न्यायालय की वरिष्ठ एडवोकेट इन्दिरा जयसिंह ने कहा था कि,

“राव को उनके खराब हो रहे स्वास्थ्य के आधार पर जमानत न देना, नागरिक के स्वस्थ रहने के अधिकार का उल्लंघन है। संविधान न केवल जीवन का अधिकार देता है, बल्कि वह सम्मान औऱ स्वास्थ्य पूर्वक जीने का भी अधिकार देता है। इस प्रकार याचिकाकर्ता सम्मान और स्वस्थ होकर जीने के अधिकार से भी वंचित रखा जा रहा है।”

इतने भारी भरकम शब्दो की दलील को न भी समझें तो यह समझ लें कि वरवर राव बीमार हैं और उन्हें इलाज चाहिये।

मुंबई की जेल वरवर राव को, जुलाई में कोरोना का संक्रमण हो गया था और उनकी उम्र, तथा अन्य व्याधियों को देखते हुए, नानावटी अस्पताल के चिकित्सको ने चेक अप कर, माह जुलाई के अंत मे, यह सलाह दी थी कि उन्हें गहन चिकित्सकीय देखरेख की ज़रूरत है। लेकिन, अस्पताल की इस गंभीर रिपोर्ट के बाद भी 28 अगस्त को उन्हें सिर्फ इसलिए, तलोजा जेल वापस भेज दिया गया ताकि कहीं मेडिकल आधार पर उनकी जमानत अदालत से न हो जाय। यह बात इंदिरा जयसिंह द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में कही गयी,

“वह किसी की अभिरक्षा में हुयी मृत्यु के लिये जिम्मेदार नहीं होना चाहती, इसलिए अगर जमानत नहीं, तो कम से कम यही आदेश अदालत जारी कर दे कि, जब तक बॉम्बे हाईकोर्ट उनकी जमानत अर्जी पर कोई फैसला नहीं कर देता है, उन्हें बेहतर चिकित्सा के लिये नानावटी अस्पताल में भर्ती करा दिया जाय।”

अब सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा, उसे पढ़िए औऱ अर्णब गोस्वामी के मामले में 11 नवम्बर 2020 को सर्वोच्च न्यायालय ने जो व्यवस्था दी, उसे भी देखिए तो लगेगा कि क्या यह सर्वोच्च न्यायालय की निजी आज़ादी के मसले पर किसी चिंता का परिणाम है या कोई अन्य कारण है। जस्टिस यूयू ललित ने कहा कि इस मुकदमे के तीन पहलू हैं –

●  प्रथम, सक्षम न्यायालय ने इस मामले में संज्ञान ले लिया है और अभियुक्त न्यायिक अभिरक्षा में जेल में है, अतः यह गिरफ्तारी अवैध गिरफ्तारी नहीं है।

● द्वितीय, जमानत की अर्जी विचार के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट में लंबित है।

● और अंतिम, राव की जमानत पर विचार करते हुए हाईकोर्ट, उन्हें मुक़दमे के गुण दोष के आधार पर जमानत देता है या उनके स्वास्थ्य के आधार पर, यह क्षेत्राधिकार फिलहाल हाईकोर्ट का है।अतः ” हम यह मामला कैसे सुन सकते हैं ?

यानी सर्वोच्च न्यायालय के दखल देने का कोई न्यायिक अधिकार नहीं है। पीठ ने इस बात पर तो चिंता जताई कि हाईकोर्ट ने इस मुकदमे की सुनवाई करने में देर कर दी। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्तर पर कोई भी दखल देने से इनकार भी कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय का मानना था कि हाईकोर्ट के समक्ष इस मामले में कई बिंदु हैं और वह इन पर विचार कर रही है तो सर्वोच्च न्यायालय का फिलहाल दखल देना उचित नहीं होगा।

केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन का प्रकरण

तीसरा प्रकरण है, केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन का है। अर्णब के मुकदमे के दौरान जब सर्वोच्च न्यायालय में निजी आज़ादी के सवाल पर बहस (Debate on the question of personal freedom in the Supreme Court) चल रही थी तो केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन का उल्लेख भी हुआ, किया जो हाथरस गैंगरेप कांड की कवरेज (Coverage of Hathras gang rape case) में जाते समय गिरफ्तार किये गए थे। कप्पन की गिरफ्तारी यूएपीए कानून में की गई है और वे महीने भर से अधिक समय से जेल में हैं। लेकिन इस बिन्दु पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक शब्द भी नहीं कहा, जबकि उसी के कुछ घंटे पहले जस्टिस चन्दचूड़ यह कह चुके थे कि निजी स्वतंत्रता की रक्षा के लिये वह सदैव तत्पर रहेंगे।

अर्णब का मुकदमा तो उनकी निजी आज़ादी से जुड़ा भी नहीं है। अर्णब गोस्वामी धारा 306 आइपीसी के मुलजिम के रूप में शीर्ष न्यायालय में खड़े थे न कि एक पीड़ित के रूप में। वे गिरफ्तार गये गए औऱ मैजिस्ट्रेट ने 14 दिन की ज्यूडिशियल कस्टडी रिमांड स्वीकृत कर उन्हें जेल भेजा था।

अर्णब ने बॉम्बे हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने खुद तो कोई राहत नहीं दी, पर सेशन कोर्ट को यह निर्देश दिया कि वह चार दिन में मुलजिम की जमानत अर्जी पर सुनवाई करे। अर्णब ने सेशन में जमानत की अर्जी दायर भी की।

पर वे तुरंत सर्वोच्च न्यायालय चले गए और वहां भी उन्होंने अंतरिम जमानत का प्रार्थनापत्र दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने निजी आज़ादी की बात की और पूरी बहस इस पर केंद्रित कर दी गयी, कि पुलिस ने मुलजिम की निजी आज़ादी को बाधित किया है और जो भी किया है। पूरी बहस में यह कानूनी बिन्दु उपेक्षित रहा कि, धारा 306 आइपीसी के अभियुक्त की जमानत की अर्जी अगर सत्र न्यायालय में है और दूसरे ही दिन उसकी सुनवाई लगी है तो आज ही अनुच्छेद 142 के अंतर्गत दी गयी शक्तियों का उपयोग कर अर्णब को उसी दिन छोड़ना क्यों जरूरी था, जबकि पहले भी ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय में निचली और सक्षम न्यायालय में जाने के लिये निर्देश दिए जाने की परंपराएं रही हैं।

अर्णब को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम जमानत पर रिहा किये जाने की अलग अलग प्रतिक्रिया हुयी है। शीर्ष अदालत (Supreme Court) के इस निर्णय पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं, क्योंकि अर्णब के मामले में जो उदार रुख सर्वोच्च न्यायालय का रहा है वह इसी तरह के अन्य मामलों में नहीं रहा है। अंतरिम राहत या अन्य जो भी मामले सर्वोच्च न्यायालय में गए, उनमे या तो यही निर्देश मिला कि वे अधीनस्थ न्यायालय में जायं।

स्टैंड अप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर कई ट्वीट किए और यह कहा कि यह सर्वोच्च न्यायालय नहीं सुप्रीम जोक बन गया है। कुणाल कामरा के ट्वीट (Kunal Kamra’s tweets) पर कुछ एडवोकेट औऱ कानून के छात्र आहत हो गए, और उन्होंने कुणाल कामरा के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही (Contempt proceedings against Kunal Kamra) चलाने के लिये कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट के अंतर्गत अटॉर्नी जनरल से अपनी याचिका पर सहमति देने के लिये कहा जिसे अटॉर्नी जनरल ने दे भी दी। अटॉर्नी जनरल की सहमति के बाद कुणाल कामरा का एक और ट्वीट उनके एक पत्र के साथ आया है जो उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के जजो को संबोधित करते हुए लिखा है।

“मेरे विचार बदले नहीं हैं क्योंकि दूसरों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय की चुप्पी की आलोचना न हो, ऐसा नहीं हो सकता. मेरा अपने ट्वीट्स को वापस लेने या उनके लिए माफ़ी माँगने का कोई इरादा नहीं है. मेरा यक़ीन है कि मेरे ट्वीट्स ख़ुद अपना पक्ष बख़ूबी रखते हैं।”

“क्या मैं सुझा सकता हूँ कि मेरी सुनवाई का वक़्त नोटबंदी की याचिका, जम्मू-कश्मीर का ख़ास दर्जा वापस मिलने को लेकर दायर की गई याचिका और इलक्टोरल बॉन्ड जैसे उन अनगिनत मामलों को दिया जाए, जिन पर ध्यान दिए जाने की ज़्यादा ज़रूरत है। अगर मैं वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे की बात को थोड़ा घुमाकर कहूँ तो, क्या अगर ज़्यादा महत्वपूर्ण मामलों को मेरा वक़्त दे दिया जाए तो आसमान गिर जाएगा ?”

कुणाल कामरा के इस ट्वीट को लेकर सोशल मीडिया और अखबारों में काफ़ी चर्चा हो रही है। ट्विटर पर हैशटैग कुणाल कामरा और कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट ट्रेंडिंग में ऊपर है और पक्ष विपक्ष के लोग अपनी अपनी बातें कह रहे हैं। कुणाल के ट्वीट न्यायालय की अवमानना हैं या नहीं, यह तो न्यायालय ही तय करेगा पर कुणाल ने अपने पत्र में जो सवाल उठाए हैं, उनके उत्तर जानने की जिज्ञासा भी हम सबको होनी चाहिए। अगर अर्णब गोस्वामी अपनी एंकरिंग के कारण, जेल में बंद होते तो उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ हम सब का भी खड़े होते। पर वे तो धारा 306 आइपीसी, (आत्महत्या के लिये उकसाना) के आरोप में जेल में थे।

इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत दी गयी असाधारण शक्तियों का उपयोग सर्वोच्च न्यायालय ने किसी पीड़ित याचिकाकर्ता के लिये नहीं बल्कि एक आपराधिक मुक़दमे में गिरफ्तार एक मुलजिम के लिये किया है, जिसके पास नियमित रूप से विधिक उपचार प्राप्त करने के साधन उपलब्ध हैं।

अर्णब के मामले में सवाल, उनके मुक़दमे की सुनवाई के लिये कतार तोड़ कर, प्राथमिकता के आधार पर हुयी लिस्टिंग के बारे में भी उठ रहे हैं। याचिका दायर करने के चौबीस घंटे के अंतर्गत उनकी याचिका सुनवाई के लिये सूचीबद्ध भी कर दी गयी। सर्वोच्च न्यायालय में लिस्टिंग को लेकर पहले भी विवाद उठ चुके हैं। चार जजों की प्रसिद्ध प्रेस कॉन्फ्रेंस जो 12 जनवरी 2018 को हुयी थी में एक मुद्दा याचिकाओं की लिस्टिंग का भी था और इसे लेकर तब भी यही कहा गया था कि, सर्वोच्च न्यायालय में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। साथी जजो के इस कृत्य को न तो अदालत की अवमानना मानी गयी और न ही इसे निंदा भाव से देखा गया। सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने इस सम्बंध में सीजेआई को एक पत्र भी लिखा था और रजिस्ट्री में व्याप्त अनियमितता पर सवाल भी उठाए थे।

अर्णब गोस्वामी को 50 हजार रुपये के मुचलके पर अंतरिम जमानत सर्वोच्च न्यायालय ने दी है। अर्णब धारा 306 आइपीसी के एक मुलजिम हैं और उनका एक नियमित जमानत के लिए प्रार्थनापत्र सेशन कोर्ट रायगढ़ के पास सुनवाई के लिये लंबित थी। इस राहत पर कुछ कानूनी सवाल भी खड़े होते हैं। 

● चूंकि उनकी जमानत जब शीर्ष कोर्ट ने स्वीकार कर ली तो सेशन कोर्ट में उक्त जमानती अर्जी का कोई महत्व रह ही नहीं जाता है।

● सर्वोच्च न्यायालय ने जो जमानत दी है वह उसने, अपने विशेषाधिकार जो उसे अनुच्छेद 142 में प्राप्त हैं के अंतर्गत दिए हैं। जबकि सेशन कोर्ट में जमानत की अर्जी धारा 439 सीआरपीसी के अंतर्गत दी गईं है।

● क्या अब हर वह मुलजिम जिसकी जमानत की अर्जी धारा 439 सीआरपीसी में सेशन कोर्ट में लंबित है वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अपनी अपील दायर कर सकता है ?

● अगर ऐसा होता है तो क्या यह न्यायिक अनुक्रम की अवहेलना नहीं होगी ?

● फिर हर वह व्यक्ति जो धन और सम्पर्क बल से सक्षम है सेशन में अर्जी डालने के बाद सीधे सर्वोच्च न्यायालय का रुख करेगा और सबसे आसान आरोप पुलिस पर यही लगाएगा कि उसे फंसाया गया है।

● रहा सवाल निजी आज़ादी के तर्क और आज के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के इस बिन्दु को रेखांकित करने का है तो निजी आज़ादी का हक़ हर नागरिक को है और वह इस मुद्दे को उठाएगा ही।

अर्णब की अंतरिम जमानत, सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी शक्तियों के अंतर्गत ही स्वीकार किया है, पर क्या न्यायालय इसी प्रकार के अन्य उन सभी मामलों में, जो आपराधिक धाराओं के हैं और जिनकी नियमित रूप से जमानत की अर्जियां अधीनस्थ न्यायालयों में सुनवाई के लिये लगी हुयी हैं, पर भी निजी आज़ादी के संरक्षक की अपनी भूमिका को बरकरार रखते हुए राहत देगी या यह विशेषाधिकार, विशिष्ट याचिकाकर्ता और अभियुक्तो के लिये ही सुरक्षित है ? यह सवाल कुणाल कामरा ने अपने पत्र में उठाया है औऱ यही जिज्ञासा हम सब की है।

आज सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका, ‘तुम मुझे चेहरा दिखाओ, मैं तुम्हें कानून बता दूंगाके आभिजात्य सिंड्रोम से ग्रस्त हो रही है ?

अर्णब के केस में सर्वोच्च न्यायालय की जो अनुकंपा दिखी और उसी प्रकार के अन्य मामलों में जो अन्य और लगभग विपरीत दृष्टिकोण दिखा, उसे देखते हुए यह कहना पड़ रहा है कि शीर्ष अदालत इस सिंड्रोम से कहीं न कहीं संक्रमित हो रही है। अब यह दायित्व सर्वोच्च न्यायालय का ही है कि वह खुद को इस संक्रमण से संक्रमित न होने दे और संविधान की सबसे महत्वपूर्ण संस्था की गरिमा हर दशा में बनाये रखे।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।

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