ट्रेन से कुचल गए 14 : महामारी के पर्दे में ग़ुलाम बनाये जाने के खिलाफ लड़ते हुए मारे गये

Ghar Se Door Bharat Ka Majdoor

8 मई को 14 प्रवासी कामगार ट्रेन से कुचल गए | 14 migrant workers crushed by train on 8 May

प्रवासी मजबूर महामारी के पर्दे में ग़ुलाम बनाये जाने के खिलाफ लड़ते हुए मारे गये

वे थकावट से मर गए, अपने घरों में वापस चले गए, तयशुदा भूख से दूर, यह जानते हुए कि उन्हें कोई वेतन नहीं मिलने वाला है और न घर से दूर 10 फुट वर्ग कमरे के कमरे में वायरस से बचना संभव था। वे यह जानते हुए भी चले कि वे सरकारों के लिए सिर्फ आँकड़े हैं, इस बात को चुपचाप स्वीकार करते हुए कि परिवहन सुविधाओं की व्यवस्था तो अमीरों के लिए की जाती है, न कि अनगिनत बेनामी मज़दूरों के लिए। वे संगरोध घरों (क्वारंटाइन) में भर दिये गए, औपनिवेशिक अवशेष- महामारी अधिनियम के तहत जेलों में वापस भरे गये अपनी बस्तियों में वापस छोड़ दिये गये।

पुलिस द्वारा रास्ते से पीटा जाना उनके जोखिम का हिस्सा था। उन्हें शासकों से न्याय की कोई उम्मीद नहीं रही; वे उस परिवहन के तरीके का इस्तेमाल करते हैं जो पूरी तरह से निजी है- उनके पैर।

राजमार्गों पर, उनकी टक्कर कभी-कभी ट्रकों और उन वीआईपी वाहनों से हुई जो लॉकडाउन में चल रहे हैं। पुलिस टोका-टोकी से बचने के लिए, अब पूरे देश में वे रेलवे लाइनों के किनारे चल रहे हैं, क्योंकि ट्रेनें तो उनके लिए चलेगी नहीं। उन्हें अपने ही देश के भीतर कैदी घोषित किया गया है, अगर अँग्रेज़ चले गए तो क्या? इसलिए वे रेल की पटरियों पर सोते हुए मर जाते हैं, जैसा कि आज सुबह महाराष्ट्र के 14 मज़दूरों की मौत हुई।

वे महाराष्ट्र से घर पैदल लौट रहे थे। कर्नाटक सरकार खुले आम आदेश करती है कि प्रवासी घर नहीं जा सकते- बिल्डर्स को उनकी जरूरत है।

केंद्रीय श्रम मंत्री ट्रेड यूनियनों से कहते हैं कि वे मज़दूरों को ‘रहने’ के लिए तैयार करें ताकि उद्योग खुल सके! दिल्ली सरकार ट्रेनों की मांग करने में टालमटोल करती है। ओडिशा उच्च न्यायालय का फैसला है कि ट्रेनों को रद्द कर दिया जाए ताकि प्रवासियों का अपने घर में कदम रखने से पहले जांचा जा सके; वे खुद ओडिशा में जांच क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि वे कोई नहीं हैं, बस जब जरूरत होती है तब इस्तेमाल की चीज हैं।

क्या किसी ने ‘ग़ुलाम श्रम’ कहा? – लेकिन यूपी सरकार भी बंधुआ श्रम अधिनियम को निलंबित करने के लिए नहीं जा रहा है, जबकि यह अन्य सभी को निलंबित कर रहा है।

घूमने वाले प्रवासी भारत के मजबूर वर्ग को दर्शाते हैं। वे अब गावों से होकर घर जा रहे हैं, जहां भोजन के लिए स्थानीय किसानों पर निर्भर हैं और जहां हो पा रहा है, उन्हें यह मदद भी मिल रही है। हाँ, वे मर रहे हैं, लेकिन घर जाने के उनके आग्रह के सामने, शासक हार रहे हैं। उनकी ही वह ताकत है जो देश का निर्माण, उत्पादन, सेवा करती है।

पैदल चलने वाले प्रवासी कामगार को जिंदाबाद, को इस प्रयास में मरने वाले बहादुरों को जोहार। चलने वाले ये प्रवासी मजबूर शासकों को अपनी नजर के दायरे के बाहर नहीं फेंकने देंगे।

आवाज उठाओ! महामारी के नाम पर हत्या और मज़दूरों को बांधने पर रोक लगाने की मांग करो। सभी प्रवासी मज़दूरों के लिए सभी सावधानियों और सुरक्षा उपायों के साथ उनके घरों तक परिवहन के अधिकार मांग करो।

अपर्णा

अध्यक्ष, IFTU

8 मई, 2020 (Aparna
National President
Indian Federation Of Trade Unions (IFTU))

पाठकों से अपील

“हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें