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Namdev dhasal

एक अप्रतिम महानायक : नामदेव ढसाल

15 January: Today is the death anniversary of Namdev Dhasal

15 जनवरी : आज है नामदेव ढसाल की पुण्यतिथि

आज 15 जनवरी है। पहले से ही मायस्थेनिया जैसी गंभीर बीमारी शिकार विश्वकवि नामदेव ढसाल तीन महीनों से आंत के कैंसर (Bowel cancer) से जूझते हुए 2014 में आज ही के दिन मुंबई के बॉम्बे हास्पिटल में आखिरी साँस लिए थे। निधन के बाद इमेल के जरिये उनकी शव यात्रा की जानकारी देते हुए सुप्रसिद्ध कवि विष्णु खरे ने इस लेखक को बताया था, ’पता नहीं नामदेव की शव-यात्रा के चित्र आपने देखे हैं या नहीं, किन्तु वह एक बड़े नेता के सम्मान जैसी निकली थी। उसमें करीब साठ हजार के करीब लोग शामिल हुए थे। मुंबई का ट्रैफिक रुक गया था। दिल्ली में हिंदी के साठ लेखकों की यदि इकट्ठी मृत्यु हो तो छः सौ से ज्यादा लोग नहीं आयेंगे और जो आयेंगे, उनमें भी अधिकांश पारिवारी होंगे’।

सिर्फ मुंबई ही नहीं महाराष्ट्र के पुणे, नासिक, नागपुर इत्यादि विभिन्न शहरों में आयोजित शोकसभाओं में भी भारी संख्या में इकट्ठे होकर लोगों ने महान पैंथर के प्रति जो सम्मान प्रदर्शित किया, वह लेखकों को नहीं, राजनीति, फिल्म इत्यादि से जुड़े बेहद खास लोगों को ही मय्यसर होता है।

15 फरवरी, 1949 को महाराष्ट्र के पुणे के निकट ‘पुर-कानेरसर’ को अपने जन्म से धन्य करने वाले ढसाल साहेब थे ही इतनी विरल शख्सियत के स्वामी, जिनके निधन के बाद महाराष्ट्रवासी अपनी श्रद्धा उड़ेलने से खुद को रोक नहीं पाए।

Namdev Dhasal was the link between Dr. Ambedkar and Kanshi Ram in the history of Dalit movements

दलित आन्दोलनों के इतिहास में डॉ. आंबेडकर और कांशीराम के बीच की कड़ी ढसाल की पहचान वैसे तो मुख्य रूप से कवि के रूप में रही है पर, वह एक बड़े चिन्तक, पेंटर, असाधारण संगठनकर्ता और दूरदर्शी राजनेता सहित अन्य कई गुणो के स्वामी थे।

अब जहां तक कविता का सवाल है वे नोबेल विजेता कवि टैगोर से भी बड़े कवि थे। इस मामले में मुझे 2012 में दिल्ली के 20 वें अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में चर्चित कवि विष्णु खरे की उस टिप्पणी की बार-बार याद आती है जो उन्होंने उनकी हिंदी में पहली अनुदित पुस्तक ‘आक्रोश का कोरस‘ का विमोचन करते हुए कही थी। संयोग से उस विमोचन समारोह में मैं भी उपस्थित था। वैसे तो मैंने एक बड़े कवि के रूप में उनके विषय बहुत कुछ सुन रखा था। किन्तु खरे साहब ने जो सत्योद्घाटन किया, वह चौंकाने वाला था।

उन्होंने कहा था, ’पिछले दिनों कोलकाता पुस्तक मेले में आयोजित लेखकों की एक संगोष्ठी में तमाम लोगों ने ही एक स्वर में नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भारत के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में स्वीकृति प्रदान किया। किन्तु मेरा मानना है कि ऐसी मान्यताएं ध्वस्त होनी चाहिएं। आज की तारीख में रवीन्द्रनाथ ठाकुर पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुके हैं। आज भारत जिन समस्यायों से जूझ रहा है, उसका कोई भी समाधान उनकी कविताओं में नहीं है। अगर कविता का लक्ष्य मानव-जाति की समस्यायों का समाधान ढूँढना है तो मेरा दावा है कि ढसाल, टैगोर से ज्यादा प्रासंगिक और बड़े कवि हैं।’

उन्होंने आगे कहा था ’रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे लोग हमारे लिए बोझ हैं जिसे उतारने का काम ढसाल ने किया है। अंतर्राष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता का विजिटिंग कार्ड का नाम नामदेव ढसाल है। उन्होंने कविता की संस्कृति को बदला है; कविता को परंपरा से मुक्त किया एवं उसके आभिजात्यपन को तोड़ा है। संभ्रांत कविता मर चुकी है और इसे मारने का काम ढसाल ने किया है। आज हिंदी के अधिकांश सवर्ण कवि दलित कविता कर रहे हैं तो इसका श्रेय नामदेव ढसाल को जाता है। ढसाल ने महाराष्ट्र के साथ देश की राजनीति को बदल कर रख दिया है, ऐसा काम करने वाला भारत में दूसरा कोई कवि पैदा नहीं हुआ। नामदेव ढसाल किसी व्यक्ति नहीं, आंदोलन का नाम है। अगर देश में 5,6 ढसाल पैदा हो जाएँ तो इसका चेहरा ही बदल जाय।’ क्या कोई कवि, वह भी दलित समाज से निकला, नोबेल विजेता टैगोर से बड़ा और ज्यादा प्रासंगिक हो सकता है?

बहरहाल नोबेल विजेता की खूबियों से लैस ढसाल एक विशेष नजरिये से अपने किस्म के इकलौता कवि रहे। दुनिया में एक से एक बड़े लेखक, समाज सुधारक, राजा – महाराजा, कलाकार पैदा हुए किन्तु जिन प्रतिकूल परिस्थितियों को जय कर ढसाल साहब ने खुद को एक विश्व स्तरीय कवि, एक्टिविस्ट के रूप में स्थापित किया, वह बेनजीर है। मानव जाति के समग्र इतिहास में किसी भी विश्वस्तरीय कवि ने दलित पैंथर जैसा मिलिटेंट आर्गनाइजेशन नहीं बनाया। दुनिया के दूसरे बड़े लेखक-कवियों ने सामान्यतया सामाजिक परिवर्तन के लिए पहले से स्थापित राजनीतिक/सामाजिक संगठनों से जुड़कर बौद्धिक अवदान दिया। किन्तु किसी ने भी उनकी तरह उग्र संगठन बनाने की जोखिम नहीं लिया।

दलित पैंथर के पीछे कवि ढसाल की भूमिका का दूसरे विश्व – कवियों से तुलना करने पर मेरी बात से कोई असहमत होना कठिन है। इसके लिए आपका ध्यान दलित पैंथर की खूबियों की ओर आकर्षित करना चाहूँगा।

अब से चार दशक 9 जुलाई 1972 को नामदेव ढसाल ने अपने साथी लेखकों के साथ मिलकर ‘दलित पैंथर’ जैसे विप्लवी संगठन की स्थापना किया था। इस संगठन ने डॉ. आंबेडकर के बाद मान-अपमान से बोधशून्य दलित समुदाय को नए सिरे से जगाया था। इससे जुड़े प्रगतिशील विचारधारा के दलित युवकों ने तथाकथित आंबेडकरवादी नेताओं की स्वार्थपरक नीतियों तथा दोहरे चरित्र से निराश हो चुके दलितों में नया जोश भर दिया जिसके फलस्वरूप उनको अपनी ताकत का अहसास हुआ तथा उनमें ईंट का जवाब पत्थर से देने की मानसिकता पैदा हुई। इसकी स्थापना के एक महीने बाद ही ढसाल ने यह घोषणा कर कि यदि विधान परिषद् या संसद सामान्य लोगों की समस्यायों को हल नहीं करेगी तो पैंथर उन्हें जलाकर राख कर देंगे, शासक दलों में हड़कंप मचा दिया।

दलित पैंथर के निर्माण के पृष्ठ में अमेरिका के उस ब्लैक पैंथर आन्दोलन से मिली प्रेरणा थी जो अश्वेतों को उनके मानवीय, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक अधिकार दिलाने के लिए 1966 से ही संघर्षरत था। उस आन्दोलन का नामदेव ढसाल और उनके क्रन्तिकारी युवकों पर इतना असर पड़ा कि उन्होंने ब्लैक पैंथर की तर्ज़ पर दलित मुक्ति के प्रति संकल्पित अपने संगठन का नाम ‘दलित पैंथर’ रख दिया।

जहाँ तक विचारधारा का सवाल है पैन्थरों ने डॉ. आंबेडकर की विचारधारा को न सिर्फ अपनाया बल्कि उसे विकसित किया तथा उसी को अपने घोषणापत्र में प्रकाशित भी किया, जिसके अनुसार संगठन का निर्माण हुआ। यद्यपि यह संगठन अपने उत्कर्ष पर नहीं पहुच पाया तथापि इसकी उपलब्धियां गर्व करने लायक रहीं। बकौल चर्चित मराठी दलित चिन्तक आनंद तेलतुम्बडे, ’इसने देश में स्थापित व्यवस्था को हिलाकर रख दिया और संक्षेप में बताया कि सताए हुए आदमी का आक्रोश क्या हो सकता है। इसने दलित राजनीति को एक मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की जोकि पहले बुरी तरह छूटी थी। अपने घोषणापत्र पर अमल करते हुए पैन्थरों ने दलित राजनैतिक मुकाम की खातिर परिवर्तनकामी अर्थो में नई जमीन तोड़ी। उन्होंने दलितों को सर्वहारा परिवर्तनकामी वेग की पहचान प्रदान की तथा उनके संघर्ष को दुनिया के अन्य दमित लोगों के संघर्ष से जोड़ दिया।’

बहरहाल कोई चाहे तो दलित पैंथर की इन उपलब्धियों को ख़ारिज कर सकता है किन्तु दलित साहित्य के विस्तार में इसकी उपलब्धियों को नज़रंदाज़ करना किसी के लिए भी संभव नहीं है।

Dalit panther and Dalit literature are two sides of the same coin.

दलित पैंथर और दलित साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसकी स्थापना करनेवाले नेता पहले से ही साहित्य से जुड़े हुए थे। दलित पैंथर की स्थापना के बाद उनका साहित्य शिखर पर पहुँच गया और देखते ही देखते मराठी साहित्य के बराबर स्तर प्राप्त कर लिया। परवर्तीकाल में डॉ. आंबेडकर की विचारधारा पर आधारित पैन्थरों का मराठी दलित साहित्य (Marathi Dalit Literature) हिंदी पट्टी सहित अन्य इलाकों को भी अपने आगोश में ले लिया। दलित साहित्य को इस बुलंदी पर पहुचाने का सर्वाधिक श्रेय ढसाल साहब को जाता है।’

Namdeo dhasal poet of the underworld : Namdeo dhasal golpitha

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‘गोल पीठा’, ‘पी बी रोड’ और ‘कमाठीपुरा’ के नरक में रहकर ढसाल साहब ने जीवन के जिस श्याम पक्ष को लावा की तरह तपती कविता में उकेरा है उसकी विशेषताओं का वर्णन करने की कूवत अंततः मुझमें तो नहीं है।

और अंत में !

ढसाल साहब के परिनिर्वाण के ठीक दो महीने बाद 15 मार्च, 2014 को मैंने उनके अत्यंत स्नेहपात्र सुरेश केदारे के साथ मिलकर एक किताब निकाली थी, जिसका नाम था, ’ महाप्राण नामदेव ढसाल’।

एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  
एच.एल. दुसाध
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)

मैं इस लेख का अंत उनके ही उद्गार से करना चाहता हूँ, जो इस पुस्तक के पृष्ठ 9-10 पर लिपिबद्ध है। भाई केदारे जी ने लिखा है-

‘अपने पूरे जीवन संघर्ष में ढसाल हमेशा विवादों में घिरे रहे। सामाजिक और राजकीय जीवन में जो भी भूमिका लेनी पड़ी, वह अपनी जमीर को साक्षी मानकर लिए। भूमिका लेते समय उन्होंने कभी किसी की भी परवाह नहीं की। हाल ही में प्रकाशित समयांतर मासिक में श्रद्धांजलि के रूप में प्रकाशित एक कॉलम ऐसा है- ‘ उनके (नामदेव ढसाल) राजनीतिक जीवन में भटकाव को लेकर अक्सर उनकी आलोचना की जाती है। वह यही नहीं कि कांग्रेस के साथ गए बल्कि नेशनलिस्ट कांग्रेस और शिवसेना में भी शामिल हुए। यहां तक कि वह भाजपा, शिवसेना और आरपीआई संगठन के करीब रहे।’ किन्तु ढसाल न कभी शिवसेना में शामिल हुए न नेशनलिस्ट कांग्रेस में: शिवसेना के साथ पैंथर का राजनीतिक गठबंधन कभी नहीं रहा। जो कुछ था केवल भाईचारा बढ़ाने के लिए था, ताकि दलितों पर हुए अत्याचार की तीव्रता कम हो, इस उद्देश्य से वो मित्रता थी।

साहित्य के क्षेत्र में उनके बारे में कई दिग्गजों ने लिखा है : विजय तेंदुलकर, दिलीप चित्रे, अर्जुन डांगले, सतीश काट्टासेकर, प्रभा गणोरकर, प्रज्ञा पंवार और अन्य कई। लेकिन मेरे बड़े भाई साहब एच. एल. दुसाध जी जब 4 दिसंबर, 2013 को उनसे मिलने के लिए लखनऊ से मुबई आये और बॉम्बे हॉस्पिटल के आईसीयू में पड़े दादा (नामदेव ढसाल) से जब डॉक्टर ने मिलने की इजाजत नहीं दी तब मैं उन्हें ढसाल साहब की कर्मभूमि ‘गोलपीठा’ दिखाने ले गया। हमारे साथ पैंथर कार्यकर्ता आत्माराम मिरके भी थे।

गोलपीठा रेड लाइट एरिया का पूरा माहौल देखने के बाद दुसाध जी बरबस कह उठे, ’धरती के नरक से निकला एक अप्रतिम महानायक नामदेव ढसाल’।

उनके निधन के बाद श्रेष्ठ साहित्यकार विष्णु खरे जी ने कहा, ’भारतीय कविताओं का आंबेडकर : नामदेव ढसाल’। इससे आगे मेरे जैसा पैंथर कार्यकर्त्ता और क्या कह सकता है। मेरे होठों पर रफ़ी साहब के गाए हुए गीत के चंद अल्फाज़ हैं ढसाल साहब की स्मृति में, ’कल चमन था , आज एक सहेरा हुआ, देखते ही देखते ये क्या हुआ…’ मेरे प्रिय नेता को मेरा विनम्र अभिवादन।’

एच. एल. दुसाध 

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

 

 

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