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जब जीवाश्म ईंधन उत्पादन दोगुना करने का है इरादा, कैसे पूरा होगा तब पेरिस समझौते का वादा?

संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक प्रोडक्शन गैप रिपोर्ट 2021

बात अगर पेरिस समझौते के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस या 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित करने की हो, तब कायदे से तो दुनिया को अपना जीवाश्म ईंधन उत्पादन को बंद कर देना चाहिए। लेकिन हो ये रहा है कि सरकारें पेरिस समझौते की तापमान सीमा से तालमेल बैठाने की जगह स्वीकार्य स्तरों से कहीं अधिक कोयला, तेल और गैस का उत्पादन करने की योजना बना रही हैं।

इस बात का पता चलता है संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक प्रोडक्शन गैप रिपोर्ट से। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और प्रमुख शोध संस्थानों द्वारा जारी वार्षिक प्रोडक्शन गैप रिपोर्ट-2021 , सरकारों की ओर से वर्तमान जीवाश्म ईंधन उत्पादन योजनाओं का आकलन दर्शाती है।

2021 Global Status Report for Buildings and Construction

साल 2021 की प्रोडक्शन गैप रिपोर्ट से पता चलता है कि बढ़ी हुई जलवायु महत्वाकांक्षाओं और नेट-ज़ीरो प्रतिबद्धताओं के बावजूद, तमाम देश साल 2030 तक ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लक्ष्य के अनुरूप स्वीकार्य मात्रा से दोगुने से अधिक मात्रा में जीवाश्म ईंधन उत्पादन करने का इरादा किये हुए हैं। इतना ही नहीं, वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के अनुरूप अगर उत्पादन देखा जाये तो उससे 45% अधिक जीवाश्म ईंधन की मात्रा का उत्पादन करने की योजना बना रही हैं सरकारें।

devastating effects of climate change

इस ताज़ा रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए UNEP (यूएनईपी) के कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा,

“जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव सभी के देखने के लिए सामने हैं। अभी भी लंबी अवधि की वार्मिंग (तापमान वृद्धि) को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने का समय है, लेकिन अवसर की यह खिड़की तेज़ी से बंद हो रही है। COP26 और उसके बाद, दुनिया की सरकारों को जीवाश्म ईंधन उत्पादन अंतर को पाटने और न्यायसंगत और सामान संक्रमण सुनिश्चित करने के लिए तेज़ी से और तत्काल क़दम बढ़ाने चाहिए। जलवायु महत्वाकांक्षा कुछ ऐसी दिखती है।”

अपने वर्तमान प्रक्षेपवक्र पर, दुनिया 1.5°C वार्मिंग को बनाए रखने के अनुरूप से 110% अधिक, और 2°C के अनुरूप से 45% अधिक जीवाश्म ईंधन का उत्पादन (production of fossil fuels) करने की दिशा में बढ़ रही है।

रिपोर्ट दो साल पहले लॉन्च होने के बाद से काफ़ी हद तक अपरिवर्तित बनी हुई है। इससे यह पता चलता है कि नेट ज़ीरो और उत्सर्जन में कमी की बढ़ती संख्या की प्रतिज्ञाओं के बावजूद, सरकारें अपनी जीवाश्म ईंधन उत्पादन योजनाओं को तेज़ी से स्थानांतरित नहीं कर रही हैं।

एक नज़र भारत पर

रिपोर्ट में भारत पर देश-विशिष्ट डाटा भी शामिल है। आत्मनिर्भर भारत अभियान (self-reliant India campaign) के तहत, सरकार “कोयले की शक्ति को उजागर करना” और 2023-24 तक आत्मनिर्भर बनना चाहती है, और “सरकारी कंपनियों के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने” के लिए प्रतिबद्धता देती है। सरकार ने इसे “कोयले से अधिकतम राजस्व के लिए उन्मुख होने से बाजार में जल्द से जल्द अधिकतम कोयला उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण में एक आदर्श बदलाव” के रूप में व्यक्त किया।

2020 में, कई मंत्रालयों ने संयुक्त रूप से भारत के संसाधनों के विकास के लिए एक विजन (दृष्टिकोण) और कार्य योजना तैयार की। यह योजना 2019 से 2024  तक कोयले के उत्पादन को लगभग 60% (730 से 1,149 टन) तक बढ़ाने के उपायों की रूपरेखा तैयार करती है, जिसमें भूमि अधिग्रहण और अन्वेषण के लिए निर्माण क्षमता की बाधाओं को दूर करने के ज़रिये शामिल है। भारत का लक्ष्य त्वरित अन्वेषण लाइसेंसिंग, खोजों के तेज़ मुद्रीकरण और गैस विपणन सुधारों जैसे उपायों के माध्यम से इसी अवधि में कुल तेल और गैस उत्पादन में 40% से अधिक की वृद्धि लाना भी है।

गैस उत्पादन प्रमुख चिंता (Gas production major concern)

वैश्विक तस्वीर से पता चलता है कि वैश्विक गैस उत्पादन प्रमुख चिंताओं में से एक है, क्योंकि यह 2020 और 2040 के बीच सबसे बड़ी वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार होगी। 2030 में 1.5 डिग्री सेल्सियस के अनुरूप रहने के लिए जो आवशयक है उस से 70% अधिक गैस होगी। इसके अतिरिक्त, रिपोर्ट से पता चलता है कि सरकारों ने स्वच्छ ऊर्जा के लिए कोविड रिकवरी फंड को निर्देशित करने का एक अवसर गंवा दिया है: विश्लेषण में, महामारी की शुरुआत से 15 देशों में 300 बिलियन अमरीकी डालर कोयले, तेल और गैस के वित्तपोषण की ओर गया है।

रिपोर्ट पर एक प्रमुख लेखक और SEI (एसईआई) वैज्ञानिक प्लॉय अचाकुलविसुट : “शोध स्पष्ट है: दीर्घकालिक वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के अनुरूप होने के लिए वैश्विक कोयला, तेल और गैस उत्पादन में तुरंत और भारी गिरावट शुरू होनी चाहिए। लेकिन, सरकारें जीवाश्म ईंधन उत्पादन के उस स्तर की योजना बनाना और समर्थन करना जारी रखती हैं जो कि हमारे द्वारा सुरक्षित रूप से जलाए जाने से काफी अधिक हैं।”

मुख्य निष्कर्ष-रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्षों में शामिल हैं :

·        विश्व की सरकारें 2030 में लगभग वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने से 110% अधिक, और 2 डिग्री सेल्सियस के अनुरूप से 45% अधिक, जीवाश्म ईंधन का उत्पादन करने की योजना बना रही हैं। पूर्व आकलनों की तुलना में उत्पादन अंतराल काफ़ी हद तक अपरिवर्तित रहा है।

·        सरकारों की उत्पादन योजनाओं और अनुमानों से 2030 में  ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के अनुरूप से लगभग 240% अधिक कोयला, 57% अधिक तेल और 71% अधिक गैस उत्पादन होगा।

·        सरकारों की योजनाओं के आधार पर 2020 और 2040 के बीच वैश्विक गैस उत्पादन में सबसे अधिक वृद्धि होने का अनुमान है। गैस उत्पादन में ये निरंतर, दीर्घकालिक वैश्विक विस्तार पेरिस समझौते की तापमान सीमाओं के साथ असंगत है।

·        देशों ने कोविड-19 महामारी की शुरुआत से जीवाश्म ईंधन गतिविधियों के लिए नए फंड्स में 300 बिलियन अमरीकी डालर से अधिक का निर्देश दिया है – स्वच्छ ऊर्जा की तुलना के बजाय ।

·        इसके विपरीत, G20 देशों और प्रमुख बहुपक्षीय विकास बैंकों (MDBs) से जीवाश्म ईंधन उत्पादन के लिए अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त में हाल के वर्षों में काफ़ी गिरावट आई है; एक तिहाई MDBs और G20 विकास वित्त संस्थानों (DFIs) ने परिसंपत्ति आकार के आधार पर ऐसी नीतियां अपनाई हैं जो भविष्य के वित्त से जीवाश्म ईंधन उत्पादन गतिविधियों को बाहर करती हैं।

आगे, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (IISD) में सीनियर पॉलिसी एडवाइजर, ल्यूसील ड्यूफोर कहते हैं, “जीवाश्म ईंधन उत्पादन के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन में कटौती के लिए विकास वित्त संस्थानों के शुरुआती प्रयास उत्साहजनक हैं, लेकिन इन परिवर्तनों के बाद, ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए, ठोस और महत्वाकांक्षी जीवाश्म ईंधन बहिष्करण नीतियों की आवश्यकता है।”

मान्स निल्सन, SEI के कार्यकारी निदेशक: “जीवाश्म-ईंधन-उत्पादक देशों को उत्पादन अंतर को बंद करने और हमें एक सुरक्षित जलवायु भविष्य की ओर ले जाने में अपनी भूमिका और ज़िम्मेदारी को पहचानना चाहिए। जैसे-जैसे देश मध्य शताब्दी तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लिए प्रतिबद्ध होते जा रहे हैं, उन्हें उनके जलवायु लक्ष्यों के लिए ज़रूरी जीवाश्म ईंधन उत्पादन में तेज़ी से गिरावट लाने की आवश्यकता को भी पहचानने की ज़रुरत है।

रिपोर्ट, जिसे पहली बार 2019 में लॉन्च किया गया था, सरकार के कोयले, तेल और गैस के नियोजित उत्पादन के स्तर और पेरिस समझौते की तापमान सीमाओं को पूरा करने के अनुरूप वैश्विक उत्पादन स्तरों के बीच के अंतर को मापती है। दो साल बाद, 2021 की रिपोर्ट में उत्पादन अंतर काफ़ी हद तक अपरिवर्तित पाया गया है।

अगले दो दशकों में, सरकारें सामूहिक रूप से वैश्विक तेल और गैस उत्पादन में वृद्धि, और केवल कोयला उत्पादन में मामूली कमी, का अनुमान दे रही हैं। एक साथ, उनकी योजनाओं और अनुमानों में वैश्विक, कुल जीवाश्म ईंधन उत्पादन कम से कम 2040 तक बढ़ रहा है, जिससे उत्पादन अंतराल लगातार बढ़ रहा है।

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