2022 : चुनौतियां और संभावनाएं | भारतीय जनतंत्र का संकट गहरे रंगों में उभरकर सामने आया है

rajendra sharma

2022: Challenges and Prospects

नये साल की दहलीज पर खड़ा भारत, अपने साथ क्या लेकर उस नये साल में जा रहा है, जो एक स्वतंत्र देश के रूप में उसके पचहत्तर वर्ष पूरे होने का वर्ष भी होगा। एक छोटी सी विडंबना, उस विरासत को बखूबी उजागर कर देती है, जो लेकर भारत, 2022 में जा रहा है। यह विडंबना इस तथ्य में निहित है कि नव-वर्ष के ठीक दो दिन पहले, सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो (A video went viral on social media) में, बारह दिन पहले हरिद्वार में ही हुई तथाकथित धर्म संसद में, अल्पसंख्यकों के नरसंहार (massacre of minorities) का और आतंकवादी तौर-तरीकों के इस्तेमाल का आह्वान करने के लिए, एफआइआर में नामजद शकुन पांडेय उर्फ अन्नपूर्णा मां, धर्मदास, यती नरसिम्हानंद आदि, हरिद्वार में पुलिस के आला अफसरों से एक बहुत ही खुशगवार मुलाकात करते दिखाई दे रहे थे।

हिंदुत्व के ये ‘योद्धा’, हरिद्वार के मौलवियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने पहुंचे थे! वीडियो में शकुन पांडे के अपनी शिकायत की ‘निष्पक्ष जांच’ की मांग करने पर, उनकी बात में सुधार करते हुए नरसिम्हानंद को यह कहते सुना जा सकता है कि निष्पक्ष क्यों, ये तो हमारे पक्ष वाले हैं!

असली विडंबना, ज्यादा से ज्यादा आतंकवादी स्वर अपनाते हिंदुत्ववादी भगवाधारी योद्धाओं के जवाबी एफआइआर दायर कराने के कानूनी दांव-पेच का सहारा लेने में नहीं बल्कि मुसलमानों के नरसंहार (massacre of muslims) तथा 20 लाख को मारने, तलवार से ज्यादा मारक हथियार जमा करने से लेकर, 1857 से भी भयंकर स्वतंत्रता युद्ध छेड़ने का आह्वान करने वालों के, इसे लेकर निश्चिंत होने में है कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करना तो दूर, पुलिस उनकी सरासर फर्जी शिकायत से खुश ही होगी। इससे पुलिस व शासन के लिए, उनके खिलाफ कुछ भी न करना और आसान जो हो जाएगा।

अब जरा हिंदुत्ववादियों की इस आश्वस्ति को, इस तथ्य के साथ रखकर देखिए कि उत्तर प्रदेश के भाजपा के ही शासन की पुलिस, वर्ल्ड कप क्रिकेट मैच के दौरान, भारत से मुकाबले के समय,पाकिस्तान की टीम के प्रदर्शन की तारीफ करने के लिए जेल में बंद तीन कश्मीरी इंजीनियरिंग छात्रों पर, राजद्रोह के आरोप में मुकद्दमा चलाने के लिए, सरकार की इजाजत की प्रतीक्षा कर रही है! कहने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की प्रशंसा करने के ‘अपराध’ में ये मुसलमान नौजवान, तभी से बिना किसी जमानत के जेल में बंद हैं! उग्र हिंदुत्ववादियों सौ खून माफ और अल्पसंख्यकों का अपने नागरिक अधिकारों का प्रयोग करना भी गुनाह–भाजपा-शासित भारत के इसे नये नॉर्मल के साथ, हम 2022 का स्वागत कर रहे हैं।

लेकिन, यह किस्सा सिर्फ स्वतंत्रता की पिचहत्तरवीं सालगिरह तक, धर्मनिरपेक्ष भारत के संविधान (secular constitution of india) के होते हुए, भारत को व्यवहार में, पाकिस्तान की तर्ज पर करीब-करीब एक हिंदुत्ववादी धर्म-राज्य बना रख दिए जाने पर ही खत्म नहीं हो जाता है।

‘भव्य’ विश्वनाथ कॉरीडोर के उद्घाटन के भव्य और सर्वप्रचारित आयोजन के क्रम में अपने संबोधनों में प्रधानमंत्री ने जिस तरह परंपरा तथा इतिहास के पुनरुत्थान को विकास का समानार्थी बताया है, वह ऊपर-ऊपर से देखने पर भले ही परंपरा और विकास को जोड़े जाने का मामला लगे, जो संबंध उनके दावे के अनुसार स्वतंत्रता के बाद, बड़े बांधों, बुनियादी कारखानों आदि को ‘नये भारत के मंदिर’ बताने वाले नेहरूवादी भारत में टूट गया था, वास्तव में प्रधानमंत्री इतिहास और परंपरा की अपनी एकांगी तथा वास्तव में सांप्रदायिक प्रस्तुति के जरिए, हिंदुत्ववादी राज्य की उक्त बढ़ती हुई मांग के लिए, सैद्धांतिक स्वीकार्यता का आधार ही मुहैया करा रहे थे।

औरंगजेब बनाम शिवाजी का प्रधानमंत्री का राग विधानसभा चुनाव के लिए उपयोगी, परंतु…

प्रधानमंत्री का अपने संबोधन में औरंगजेब बनाम शिवाजी के जरिए, ‘वे’ बनाम ‘हम’ के द्वैध की दुहाई को आगे बढ़ाना, बेशक उत्तर प्रदेश के आने वाले विधानसभाई चुनाव के लिए उपयोगी है, पर उसका असर दूर तक जाता है। यह भारत को हिंदुत्ववादी धर्म राज्य बनाने उस प्रोजैक्ट का हिस्सा है, आरएसएस जिसके अपनी स्थापना की शताब्दी के वर्ष, 2025 तक पूरा होने की उम्मीद लगाए हुए है।

यह संयोग ही नहीं है कि ‘भव्य काशी’ के अनावरण के बाद से, हमलावर तरीके से अल्पसंख्यकविरोधी अधर्म संसदों में ही नहीं, नमाज से लेकर क्रिसमस तक, अल्पसंख्यकों के धार्मिक आयोजनों पर भी, हमलों में नाटकीय तेजी देखने को मिली है।

हिंदुत्ववादी उग्रवादियों को शासन के उनके पक्ष में होने की आश्वस्ति जो मिल गयी है। हरिद्वार में पुलिस के आला अधिकारियों के साथ, धर्म संसद के आरोपियों की मुलाकात में लगे ठहाके, इसी का बयान करते हैं।

इस सिलसिले में इसकी याद दिलाना भी अप्रासांगिक नहीं होगा कि 2022 की दहलीज पर खड़े देश की एक लगभग धर्मनिरपेक्ष राज्य से लगभग ‘हिंदुत्ववादी राज्य’ तक की इस यात्रा के पीछे, प्रधानमंत्री की हैसियत से खुद नरेंद्र मोदी की भी लंबी यात्रा है।

गोरक्षा के नाम पर अखलाक और पहलू खान की मॉब लिंचिंग के प्रकरणों पर उठे शोर के दबाव में, 2016 के आखिर में प्रधानमंत्री मोदी ने गोभक्तों और तथाकथित गोरक्षकों में अंतर करते हुए, अधिकांश गोरक्षा योद्धाओं को गोरक्षा के नाम पर अपना धंधा चलाने वाले करार दिया था। उसके कुछ ही दिनों के अंदर, आरएसएस प्रमुख भागवत, प्रधानमंत्री के अनुसार जो गोरक्षा के नाम पर धंधा चलाने वाले थे, उनका यह कहकर बचाव कर चुके थे कि गोरक्षा के नाम पर ज्यादातर अच्छा काम हो रहा है। उसके बाद से प्रधानमंत्री ने एक बार भी, आरएसएस प्रमुख की खींची लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण नहीं किया है और हिंदुत्ववादी उग्रवादियों की किसी भी करतूत की शाब्दिक आलोचना तक नहीं की है।

राजधानी की ऐन बगल में, गुड़गांव में महीनों से जारी नमाज में बाधा डालने के अभियान से लेकर, क्रिसमस पर ताजातरीन हमलों तक, अल्पसंख्यकों के खिलाफ सारी जघन्यताओं पर, प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की चुप्पी इसी चीज को दिखाती है। अचरज नहीं कि सारी दुनिया इसे दर्ज कर रही है और भारत में धर्मनिरपेक्षता के क्षय पर बाकायदा चिंता जता रही है।

और दुनिया, भारत में सिर्फ धर्मनिरपेक्षता के क्षय पर ही चिंता नहीं जता रही है। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत के ‘स्वतंत्र से आंशिक रूप से स्वतंत्र’ और ‘जनतंत्र से निर्वाचित तानाशाही’ में तब्दील हो जाने को भी रेखांकित किया है।

अचरज की बात नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता समेत, भारतीय जनतंत्र का यह संकट, कोरोना महामारी के दौर में खासतौर पर गहरे रंगों में उभरकर सामने आया है।

इसकी सरल सी वजह यह है कि महामारी के संकट ने, मौजूदा व्यवस्था में निहित असमानताओं को, जिन्हें मोदी राज ने पहले से भी ज्यादा तेजी से आगे बढ़ाया है, एक बड़े विस्फोट के साथ सामने लाकर खड़ा कर दिया है। मोदी राज और मेहनतकश अवाम के बीच यह संबंध विच्छेद, कोरोना की पहली लहर में लाखों प्रवासी मजदूरों की शहरों से सैकड़ों किलोमीटर, अपने गांव-घर के लिए भूखे-प्यासे, पैदल ही निकल पड़ने के करुण दृश्यों के रूप में सारी दुनिया ने नोट किया था।

कोरोना की दूसरी और भी घातक लहर के दौरान, शासन और आम जनता के बीच के इसी संबंध विच्छेद को श्मशानों में जलती लाशों के अंतहीन सिलसिले, शव वाहिनी बनी गंगा और ऑक्सीजन की कमी से तड़प-तड़पकर जान देते लोगों की तस्वीरों के जरिए दुनिया ने नोट किया था।

Fears of an Omicron-powered third wave are worrying everyone.

अचरज नहीं कि ओमिक्रॉन संचालित तीसरी लहर की आशंकाएं सभी को चिंतित कर रही हैं। इस सिलसिले में इतना कहना ही काफी होगा कि नये साल के पहले पखवाड़े में ही चिकित्साकर्मियों समेत फ्रंटलाइन वर्करों तथा साठ वर्ष से अधिक आयु के विभिन्न रोगों से ग्रसित लोगों को टीके की अतिरिक्त ‘प्रीकॉशनरी’ खुराक लगाया जाना शुरू जरूर किया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद सचाई यही है कि हम नये साल में ऐसी आबादी के साथ प्रवेश कर रहे हैं, जिसमें 40 फीसद से ज्यादा वयस्कों का पूर्ण टीककारण नहीं हो पाया है और अठारह साल तक आयु के बच्चों का टीकाकरण तो अभी शुरू ही होना है। यह तब है जबकि इस पर सभी वैज्ञानिक एकमत हैं कि पूर्ण-टीकाकरण, कोविड-19 के संक्रमण के गंभीर रूप लेने से बचाव की और इसलिए, दूसरी लहर जैसे कहर के तीसरी लहर में दोहराए जाने से बचाव की भी, इकलौती गारंटी है। और यह सब क्यों हो रहा है, इसका जवाब एक निर्विवाद तथ्य से मिल जाता है।

कोरोना से तबाही के इन दो वर्षों में, जहां देश की विकास दर बैठ गयी है और आम जनता की आय में भारी गिरावट हुई है, देश की कुल आय में शीर्ष की एक फीसद आमदनी के हिस्से में और डालर अरबपतियों की संख्या में, तेजी से बढ़ोतरी होती रही है। और मौजूदा शासन के दो चहेते धनपति, पूरे एशिया के धनपति नं0 1, धनपति नं0 2 बन गए हैं!

आपदा में अवसर तीन किसान विरोधी कानून

बहरहाल, इस घने अंधेरे के बावजूद, इसी बुनियादी नीतिगत झुकाव को ‘आपदा में अवसर’ देखकर, आगे बढ़ाने की कोशिश में, मोदी सरकार द्वारा थोपे गए तीन किसानविरोधी तथा देशी-विदेशी कार्पोरेटपरस्त कानूनों के खिलाफ किसानों के साल भर चले ऐतिहासिक प्रतिरोध ने, 2022 में प्रवेश करते भारत के मेहनतकशों हाथों में रौशनी की मशाल थमा दी है।

यह संयोग नहीं है कि यह मशाल, उस रौशनी को आगे ले जाती है, जो 2021 में प्रवेश करते हुए भारत को सीएए-एनआरसी के विरुद्ध संघर्ष ने दी थी, जिसका प्रतीक शाहीन बाग का सत्याग्रह था। यह रौशनी इसी की याद दिहानी की है कि सांप्रदायिक गोलबंदी समेत शासन के सारे साधनों से कुछ लोगों को तो हमेशा मूर्ख बनाया जा सकता है, सब लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बनाया जा सकता है, लेकिन सब लोगों को हमेशा मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है!

राजेंद्र शर्मा

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By राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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