चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस का पूरी मानवता के भविष्य के लिए दूरगामी महत्व होगा

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस का पूरी मानवता के भविष्य के लिए दूरगामी महत्व होगा

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस पर टिप्पणी

सीपीएसयू की 20वीं कांग्रेस और सीपीसी की 20वीं कांग्रेस

आज से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस (20th Congress of the Communist Party of China) शुरू हो गई है।

दुनिया के कम्युनिस्ट आंदोलन के जानकारों के लिए ‘20वीं कांग्रेस’ पद ही खुद में एक रोमांचकारी पद है। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएसयू) की ऐतिहासिक 20वीं कांग्रेस (1956) को भला कौन भूल सकता है। स्तालिन की मृत्यु (1953) के बाद सीपीएसयू की वह पहली कांग्रेस थी। इस कांग्रेस में पार्टी के महासचिव और सोवियत संघ के राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव ने स्तालिन काल की ज़्यादतियों पर से पर्दा उठाने वाले अपने गोपनीय भाषण से सारी दुनिया को हतप्रभ कर दिया था। ख़ास तौर पर कम्युनिस्टों के बीच समाजवादी राज्य और नागरिक के अधिकारों के बीच संतुलन की समस्याओं के बारे में गहरे प्रश्न उठा दिये थे। सोवियत समाजवाद के रूप में एक नई दुनिया के निर्माण का सपना देखने वालों की क़तार में अनेक लोगों को गहरा सदमा लगा था।

बहरहाल, तब से अब तक दुनिया की सभी नदियों से बहुत सारा पानी बह चुका है। बाद के इन 67 सालों के बहाव में न सिर्फ़ सोवियत संघ और उससे जुड़ा समाजवादी शिविर ही बह गए, बल्कि इस दौरान जिस अमेरिका ने इतिहास को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का दंभ ज़ाहिर किया था, उसका प्रभुत्व भी धराशायी हो चुका है। सोवियत संघ नहीं तो इसी बीच एशिया का चीन दुनिया की एक टक्कर की महाशक्ति के रूप में पश्चिम की दुनिया के लिए नई चुनौती बन चुका है।

चीन की अर्थव्यवस्था आज दुनिया में दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था है। बताया जा रहा है कि तकनीक के क्षेत्र में चीन तेज़ी से अमेरिका को बराबर की टक्कर देने की स्थिति में पहुँचता जा रहा है। रिसर्च एंड डेवलपमेंट में चीन का निवेश अमेरिकी निवेश के तक़रीबन पचीसी प्रतिशत तक पहुँच चुका है। 5जी और कृत्रिम बुद्धि के क्षेत्र में चीन को आज दुनिया में सबसे आगे माना जा रहा है।

तथापि, राज्य और नागरिक के अधिकारों के बीच सही संतुलन के जो सवाल सोवियत समाजवाद ने अपने पीछे छोड़े थे, वे आज चीन में भी काफ़ी हद तक असमाधित ही दिखाई पड़ते हैं। इस मामले में समाजवाद-विरोधियों का यह दावा निराधार नहीं लगता है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग अभी दुनिया के उन सभी राजनेताओें के लिए आदर्श की तरह हैं, जो एकधिकारवादी नीतियों पर विश्वास करते हैं।

फिर भी, चीन में इस प्रकार के कथित असंतुलन से किसी प्रकार का कोई राजनीतिक अस्थिरता तो दूर की बात, पार्टी के नेतृत्व में भी कोई बड़ा परिवर्तन हो सकता है, इसकी धुर तीन-विरोधी ताक़तें भी कल्पना नहीं करती हैं। उल्टे ‘इकोनॉमिस्ट’ की तरह की पत्रिका व्यंग्य में कहती है कि यहाँ तक कि चाय के प्याले और तश्तरी के स्थान में भी कोई तब्दीली नहीं होगी।

बहरहाल, सीपीसी की इस बीसवीं कांग्रेस के राजनीतिक परिणामों के बारे में कोई क़यास लगाने के बजाय देखने की बात यह होगी कि चीन का नेतृत्व आज की दुनिया में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने लिए कौन सी चीजों को प्रमुख चुनौती मानता हैं।

कोविड की समस्या चीन की सरकार के लिए आज भी एक बड़ी चुनौती

दुनिया के अनुसार, चीन की सरकार के लिए कोविड की समस्या आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। दुनिया के बाक़ी सारे देशों ने तो कोविड के संक्रमण के साथ जीना सीख लिया है। लेकिन चीन की सरकार अब भी कोविड को सामाजिक अस्थिरता पैदा करने वाले एक बड़े कारक के रूप में देखती है और देश के किसी भी कोने में इसके लक्षण मात्र के संकेतों पर उसके दमन के लिए लॉक डाउन समेत कड़े से कड़े आपातकालीन कदम उठाने से परहेज़ नहीं करती है।

कहा जा रहा है कि चीन की सरकार की कोविड को लेकर ज़ाहिर हो रही यह अति-संवेदनशीलता खुद में चीन के समाज में एक समस्या का रूप लेती जा रही है। इस पार्टी कांग्रेस के वक्त भी सारे कोविड प्रोटोकॉल का सख़्ती से पालन हो रहा है। विगत पाँच साल की परिस्थिति को अनपेक्षित और असाधारण कहा जा रहा है। वैसे बाज़ हलकों से वहाँ कोविड के प्रसंग को राज्य की दमन शक्ति के निरंतर प्रदर्शन और राजनीतिक यथास्थिति को बनाए रखने का बहाना भी कहा जा रहा है।

इस बीसवीं कांग्रेस में सीपीसी के संविधान में भी पिछले अनुभवों के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किये जाने की बात भी कही जा रही है।

अमेरिका के मुकाबले अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है चीन

जहां तक अन्तर्राष्ट्रीय चुनौतियों का सवाल है, चीन अपने वजूद के लिए ही अमेरिका के ताक़त से किसी मायने में पीछे नहीं रहना चाहता है। ख़ास तौर पर तकनीकी खोज के मामले में वह बढ़त बनाना चाहता है और उसमें भारी निवेश भी कर रहा हैं। लेकिन इस मामले में भी देखने की बात यह रहेगी कि अन्वेषण और विकास के कामों में केंद्रीयकृत कमांड सिस्टम से ज़्यादा कारगर ढंग से आगे बढ़ा जा सकता है या नागरिक मात्र की पहलकदमियों को निजी स्तर पर बढ़ावा दे कर ?

सीपीसी की आर्थिक नीतियों का सारी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

जो भी हो, सीपीसी के सामने प्रमुख चुनौती चीन को एक आधुनिक समाजवादी समाज और मज़बूत राष्ट्र के रूप में विकसित करना है। आज की दुनिया में चीन की अभी से जो स्थिति है. उसमें सीपीसी की आर्थिक नीतियों का जहां सारी दुनिया पर गहरा असर पड़ेगा, वहीं इसकी अन्य नीतियों का भी पूरी मानवता के भविष्य के लिए दूरगामी महत्व होगा।

-अरुण माहेश्वरी

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