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5 people killed during lockdown in tiger attack in Mala. Report of Prakash Adhikari on forest workers and police at Yogiraj

आदमखोरों के साए में जीते निरीह लोग : बाघ के बाद योगीराज में वनकर्मियों और पुलिस का जुल्म

लॉकडाउन के दौरान माला में बाघ के हमले में पाँच मरे, ऊपर से योगीराज में वनकर्मियों और पुलिस का जुल्म

माला में बाघ के हमले में लॉकडाउन के दौरान मरे 5 लोग। योगीराज में वनकर्मियों और पुलिस के जुल्म पर प्रकाश अधिकारी की रपट

पीलीभीत से लौटकर प्रकाश अधिकारी की रपट

बाघ के हमले और खाकी का खौफ़ (Tiger attack and khaki awe), गोयल कॉलोनी के लोगों की आँखो में स्पष्ट देखा जा सकता है। लगातार हो रहे बाघ के हमलों से भयभीत लोगों की गुहार कौन सुने? अपनों के खोने का दर्द और पुलिसिया बर्बरता ने इन्हें असहाय बना दिया। उस पर जनप्रतिनिधियों द्वारा अनदेखी और शासन-प्रशासन  की गैर जिम्मेदाराना रवैया से, बचने-बढ़ने की आस खोते जा रहे हैं।

ये लोग अपना वजूद बनाये रखने के लिये आक्रोशित हो कर ‘अपने जिंदा होने’ का एहसास कराते हैं। जीने की इस जद्दोजहद भरी चीख़ को, पुलिसिया डंडों तले चुप करने की कोशिशें जारी है।

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत टाइगर रिजर्व के माला रेंज के जंगल (Jungle of Mala Range of Pilibhit Tiger Reserve, Uttar Pradesh) से सटे 8 गांव बंगालियों समुदाय का हैं। जंगल में बाघ संरक्षित किये जा रहे हैं और मात्र 400 मीटर की दूरी पर बसे है गांव। जंगल किनारे तारबाड़ से घेराबंदी तो की गई, जो नाकाफ़ी है।

अपने खेत खलिहानों की रखवाली और खेती करने से डरे हुए छोटे किसान-मजदूर पलायन कर रहे हैं। असहाय लोगों को बाघ ने अपना निवाला बनाना शुरू किया। हमलों की फ़ेहरिस्त लम्बी है।

लॉकडाउन की अवधि में इस पंचायत क्षेत्र से बाघ के हमले से 4 की दर्दनाक मौत और दो गंभीर रूप से घायल अपने जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैं। वन विभाग से संसाधनों की अभाव व लापरवाही की वजह से दर्जनों लोग, अपनी जान गवाँ चुके हैं।

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विगत दिनों माला रेंज में बाघिन के हमले से सुमिन्दर विश्वास की मौत के बाद लोगों की सब्र का टूट गए। वन विभाग को सूचना देने के बावजूद भी कोई (गैरजिम्मेदार) अधिकारियों के न आने से, ग्रामीण आक्रोशित हो गए। पीड़ितों को आक्रोशित होते देख जिम्मेदार(गैरजिम्मेदार) अधिकारियों का वहाँ से खिसक जाना उनके उनके घोर लापरवाही को दर्शाता है। अपनी सुरक्षा की गुहार लगाते ग्रामीण, शव रख कर अपनी दर्द को (बहरी) शासन-प्रशासन तक पंहुचाना चाहते थे। उच्च अधिकारियों से सुरक्षा की मांग रखी, पर कहते हैं न “जिसकी लाठी उसकी भैंस”।

शव से लिपट कर रो रहे, पीड़ित परिजन, महिला-बच्चों को पुलिस द्वारा बेरहमी से पीटना, क्या कानून के रखवालों का वीभक्त चेहरा उजागर नहीं करते हैं? ग्रामीणों के साथ जानवरों जैसा सलूक करते हुए लाठीचार्ज किया गया। जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति, पुलिस की मनमानी तौर पर पीड़ित परिवार व ग्रामीण महिलाओं-बच्चों पर लाठी बरसाना, मौलिक अधिकार की बात करना, इनके लिए शायद त्रासदी हैं।

इस घटना के बाद पुलिस प्रशासन गोयल कॉलोनी को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया। खाकी के ख़ौफ़ से गोयल कॉलोनी के ग्रामीण बेहद डरे हुए हैं, व पलायन कर रहे हैं।

इसीलिए शीर्षक दिया गया-“आदमखोरों के साए में जीते निरीह लोग”

ग्रामीणों ने बताया कि दूसरी कड़ी में दबिश के दौरान रात 2:00 बजे पुलिस फोर्स घरों से उठा- उठा कर, मारते-पीटते हुए अपने साथ ले गई। लगभग 30 नामजद और 115-120 अज्ञात लोगों पर विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किये गए। मृतक के भाई की पत्नी व अन्य ग्रामीणों को उठा ले गए। इनकी पीड़ा सुनने वाला कौन? कहाँ गए वे लोग? जो मानव-हितैषी, समाज-हितैषी के दम भरते हैं?

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