Home » Latest » सात साल : जीना मुहाल
narendra modi violin

सात साल : जीना मुहाल

Digital India

‘नीति बनाने वालों को हकीकत का पता होना चाहिए। आप डिजिटल इंडिया का नाम लेते हैं, पर ग्रामीण इलाकों में हालात अलग हैं। यह देखना चाहिए कि देश भर में क्या हो रहा है? झारखंड का श्रमिक, राजस्थान में कैसे रजिस्ट्रेशन कराएगा।’

ये शब्द देश के सर्वोच्च न्यायालय के हैं। सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय खंड पीठ ने, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस चंद्रचूड़ कर रहे थे, कोविड-19 (COVID-19) के संबंध में टीकाकरण समेत जरूरी चीजों के मामले में केंद्र सरकार की नीति तथा उसके निर्णयों के संबंध में, स्वत: संज्ञान लेकर की जा रही सुनवाई के क्रम में, मई के आखिरी दिन हुई अपनी ताजातरीन सिटिंग में यह टिप्पणी की।

यह टिप्पणी टीके लगवाने के लिए और खासतौर पर टीकाकरण के वर्तमान चरण में जब अठारह वर्ष तक आयु के सभी लोगों के लिए टीकाकरण खोल दिया गया है, केंद्र सरकार के कोविन पोर्टल पर पहले रजिस्ट्रेशन कराने के जरिए स्लॉट हासिल करना अनिवार्य किए जाने के संदर्भ में की गयी थी।

वैसे सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी इसी सिटिंग के दौरान टीकों के मुद्दे के और भी कई पहलुओं पर टिप्पणियां की हैं, जो न सिर्फ महत्वपूर्ण हैं बल्कि केंद्र सरकार की नीति तथा निर्णयों की वैधता पर, गंभीर सवाल भी उठाती हैं। यहां हम इनमें से दो पहलुओं का जिक्र करने तक ही खुद को सीमित रखेंगे। इनमें एक का संबंध टीकों की खरीद की जिम्मेदारी या नीति से है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि टीके खरीदने के लिए राज्य तथा महानगरनिगम ग्लोबल टेंडर निकाल रहे हैं। एक दूसरे से प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं। क्या केंद्र की यही नीति है? इस सिलसिले में अदालत ने केंद्र सरकार को याद दिलाया कि, ‘संविधान कहता है कि भारत राज्यों का संघ है। संघीय व्यवस्था के तहत केंद्र को टीकों का अधिग्रहण कर राज्यों को देना चाहिए। राज्यों का अधर में नहीं छोड़ सकते।’

दूसरा पहलू है, टीकों के लिए केंद्र और राज्यों के लिए लगाए जा रहे, अलग-अलग दामों का।

अदालत ने पूछा कि, केंद्र खुद सस्ते दाम पर टीका खरीद रहा है। बाकी 50 फीसद टीकों के दाम कंपनियां खुद तय कर रही हैं। इसका क्या मतलब है?

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सोलिसिटर जनरल, तुषार मेहता ने अदालत से इस पहलू में नहीं जाने का आग्रह करते हुए यह दलील दी कि, ‘मैं अदालत से गंभीरता से आग्रह करता हूं कि टीके के दाम की जांच में न जाए क्योंकि इससे टीकाकरण कार्यक्रम प्रभावित होगा।’ लेकिन, इस दलील को अमान्य करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘हम इस नीति का औचित्य जानना चाहते हैं, जिसमें केंद्र को टीका सस्ता मिल रहा है और राज्य के लिए अलग दाम है।’

केंद्र सरकार की ओर से मेहता द्वारा दी गयी यह दलील सुप्रीम कोर्ट को पर्याप्त नहीं लगी लगती है कि, ‘केंद्र ज्यादा टीके लेता है, इसलिए कीमत कम है। केंद्र ने उत्पादकों से बात कर के दाम तय किए हैं’। वास्तव में यह दलील तो इसे और भी जरूरी ही साबित करती है कि केंद्र सरकार ही देश-विदेश के टीका उत्पादकों से जाहिर है कि अनुकूलतम दाम पर टीके खरीदे और राज्यों के बीच उनका वितरण करे। याद रहे कि इसकी मांग विपक्षी मुख्यमंत्रियों के अलावा अब तो शिवराजसिंह चौहान जैसे भाजपायी मुख्यमंत्री भी कर रहे हैं।

साफ है कि इन दोनों ही पहलुओं से खुद केंद्र सरकार के वकील के लिए, अदालत में सीधे-सीधे सरकार की नीति तथा निर्णयों का औचित्य सिद्ध करना मुश्किल हो रहा है। यह दूसरी बात है कि इस सब से भी जमीनी स्तर पर शायद ही कोई फर्क पड़े क्योंकि मौजूदा केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालयों समेत, विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का खोखला किया जाना तो सुनिश्चित किया ही है, इसके साथ ही अपनी खाल भी इतनी मोटी कर ली है कि कभी-कभार इन संस्थाओं से आलोचना के सुर निकलते भी हैं, तो सरकार को उनसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। और सरकार को मुश्किल में डालने वाले फैसले लेने का साहस इन संस्थाओं में से सुनियोजित तरीके से सोख लिया गया है।

अचरज नहीं कि इतने गर्जन-तर्जन के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की बैंच ने व्यवहार में इतना ही आदेश दिया है कि केंद्र सरकार, दो हफ्ते में अपने स्पष्टीकरणों के साथ पूरक एफीडेविट पेश करे! जनता के हित के मुद्दों की अव्वल तो उच्चतर न्यायपालिका में सुनवाई ही नहीं होती है और सुनवाई होती भी है तो उन्हें ‘‘तारीख पर तारीख’’ के नुस्खे के सहारे अगर मार नहीं दिया जाता है तो भी, कोमा में जरूर धकेल दिया जाता है। मोदी के राज की, जिसने पिछले ही हफ्ते अपने सात पूरे किए हैं, एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है!

बहरहाल, हम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार के लिए की गयी उस याददिहानी पर लौटें, जिसे इस टिप्पणी की शुरूआत में उद्धृत किया गया है।

यह याददिहानी क्या देश के मौजूदा शासन के चरित्र के संबंध में बल्कि कहना चाहिए कि मोदी के राज के सात साल में देश के शासन का जो हाल कर दिया गया है उसके संबंध में, बहुत ही मारक टिप्पणी नहीं है?

बेशक, अब भी देश में इस माने में जनतंत्र है कि मौजूदा सरकार को पांच साल के लिए जनता के वोट से चुना गया है। यह खैर दूसरा ही सवाल है कि क्या यह फैसला, जनता के वोट के बहुमत का भी प्रतिनिधित्व करता है या सिर्फ इस वोट के सभी हिस्सों में से सबसे बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इसी निर्वाचितता के बल पर यह सरकार अपने दुनिया के सबसे विशाल जनतंत्र की सरकार होने का ढोल पीटती नहीं थकती है। लेकिन, जनता के वोट से निर्वाचित सरकार को, गैर-निर्वाचित न्यायपालिका को यह याद दिलाना पड़ रहा है कि, ‘नीति बनाने वालों को हकीकत का पता होना चाहिए…यह देखना चाहिए कि देश भर में क्या हो रहा है!’ इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी?

और देश का शासन चलाने वालों को यह याद दिलाने की जरूरत पड़ रही है, एक जानलेवा महामारी के संदर्भ में यानी ऐसे मामले में जहां सीधे-सीधे लोगों की जिंदगियां दांव पर लगी हुई हैं। यह मोदी राज में बनी जनतंत्र की भयंकर दुर्गति के बारे में काफी कुछ कह देता है। बेशक! जनतंत्र की ऐसी दुर्गति में मोदी से पहले केंद्र में आयी सरकारों का और खासतौर पर पिछले तीन दशक से चल रहे नवउदारवादी नीतियों के बोलबाले के दौर में आयी दूसरी सरकारों का भी, कुछ न कुछ योगदान रहा है। फिर भी चुनावी जनतंत्र के खोल के बने रहते हुए भी, देश की सरकार और शासन को आम जनता और खासतौर पर मेहनतकशों की चिंता से ऐसी आजादी, मोदी राज के सात साल ने ही दिलायी है। और यह संयोग ही नहीं है कि जहां एक सिरे पर मेहनतकशों की चिंता से परम आजादी है, वहीं दूसरे छोर पर, बड़े कार्पोरेट धनपतियों के लिए वैसा ही मोह है। यह मोह सिर्फ ऐसी कार्पोरेटपरस्त नीतियों तक ही सीमित नहीं है, जिनके बल पर मौजूदा भारी आर्थिक गिरावट के बीच भी, अंबानी-अडानी की जोड़ी को न सिर्फ एशिया का धनपति नंबर एक और धनपति नंबर दो बनाया गया है बल्कि दौर में खुद देश में जीडीपी के अनुपात में रूप में कार्पोरेट मुनाफों को, भारत के इतिहास के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचाया गया है।

इससे आगे, यह धनपति मोह, 45 वर्ष से कम आयु वालों को भी कोविड-19 का टीका लगाने की जरूरत के बहाने से, ऐसी टीका नीति बनाने तक भी जाता है, जो न सिर्फ टीका उत्पादक कार्पोरेटों के लिए अनाप-शनाम मुनाफे सुनिश्चित करती है बल्कि यह भी सुनिश्चित करने जा रही है कि जिसकी जेब में जितना पैसा है, टीके पर उसका हक उतना ही ज्यादा है।

और बेशर्मी की हद यह है कि केंद्र की सत्ताधारी पार्टी का मुख्य प्रवक्ता, दिल्ली के निर्वाचित मुख्यमंत्री को टेलीविजन पर बाकायदा इसका ताना मारता है कि मई के महीने में केजरीवाल सरकार उतने टीके भी नहीं जुटा पायी, जितने दिल्ली के निजी अस्पतालों ने जुटा लिए थे, जो टीका लगाई में तगड़ा मुनाफा कमा रहे थे। और इसका रास्ता खोला था, मोदी सरकार की तथाकथित ‘उदार’’ टीका नीति ने, जिसने देश में बनने वाले कुल टीकों में से आधे के, राज्य सरकारों और निजी अस्पतालों के बीच और अलग-अलग दरों पर, बंटने की व्यवस्था की है।

कहने की जरूरत नहीं है कि टीका उत्पादकों का ज्यादा फायदा तो, राज्यों से ज्यादा दर पर निजी अस्पतालों को अपना टीका बेचने में ही है। और निजी अस्पताल, संपन्नतर तबके को और भी बड़े मुनाफे के साथ प्राथमिकता पर टीके दे सकते हैं। याद रहे कि आपदा में अवसर का यह मंत्र बाकायदा काम भी कर रहा है। इसी अवसर का जरा सा और विस्तार करते हुए, कुछ होटल शृंखलाओं ने बड़ी अस्पताल शृंखलाओं से गठजोड़ कर, महंगे और आरामदेह ‘‘टीका पैकेज’’ देने की ओर कदम भी बढ़ा दिए थे। लेकिन, यह पैसे की ताकत का इतना ज्यादा नंगा प्रदर्शन दिखाई दे रहा था कि, मौजूदा शासक भी इसमें झिझक गए और केंद्र सरकार को एलान करना पड़ा कि अस्पताल, होटलों के साथ टीकों के ऐसे पैकेज नहीं दे सकते हैं।

बहरहाल, तरह-तरह की बड़ी अस्पताल शृंखलाओं से लेकर ड्राइव इन व्यवस्थाओं तक में, 1200 से लेकर 1800 रु. तक में टीके की एक खुराक लगाने की व्यवस्थाएं बखूबी और वास्तव में बढ़ते पैमाने पर काम कर रही हैं।

फिर भी, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को ‘हकीकत’ को देखने/ समझने की जो याद दिलायी, उसका संबंध आम लोगों को पूरी तरह से आंखों से ओझल कर देने के एक खास तरीके से भी है। और यह तरीका है, डिजिटलाइजेशन की अनिवार्यता थोपे जाने का। टीके के लिए रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता थोपा जाना न तो किसी चूक का मामला है, जिसे सुप्रीम कोर्ट दुरुस्त करा सकता है और न ही इस तरह की शर्त पहली बार लगायी गयी है। हर तरह के कामों के लिए आधार को अनिवार्य बनाने, जीएसटी के जरिए हर तरह के कारोबारों के लिए डिजिटल फाइलिंग अनिवार्य बनाने और नोटबंदी के जरिए तथा उसके बाद भी अनेकानेक पाबंदियों के जरिए गैर-डिजिटल लेन-देन को लगभग अवैध ही बना देने के जरिए, मोदी के राज के सात साल में, डिजिटल प्रौद्योगिकी को ऐसा छन्ना बना दिया गया है, जिससे छनकर नीचे रह जाने वालों का इस सरकार के लिए जैसे अस्तित्व ही नहीं है।

अचरज नहीं है कि महामारी के दौर में डिजिटल शिक्षा से लेकर टीके के लिए डिजिटल रजिस्ट्रेशन तक, इस सरकार के विभिन्न फैसलों में साधारण जनता को छानकर सरकार की चिंता के दायरे से बाहर ही कर दिए जाने की सचाई और खुलकर सामने आ गयी है।

यह कोई संयोग ही नहीं था कि पिछले साल सिर्फ चार घंटे के नोटिस पर देशव्यापी मुकम्मल लॉकडाउन का एलान करते हुए, मोदी सरकार को इसका ख्याल तक नहीं आया कि शहरों की आबादी में कितना बड़ा हिस्सा, आम तौर पर मेहनत-मजदूरी करने वालों तथा खासतौर पर प्रवासी मजदूरों का था, जो कमाएंगे नहीं तो खाएंगे कहां से! जब छोटे-बड़े सभी शहरों में दिन में एक वक्त की खिचड़ी के लिए अंतहीन कतारें लगने लगीं, तभी कहीं जाकर सरकार मोदी सरकार को मुफ्त राशन का एलान करने की याद आयी और जब हफ्तों बाद ये कतारें खत्म नहीं हुईं तब उसे इस मुफ्त राशन के लिए कार्ड की शर्त स्थगित करने की याद आयी। इसीलिए, हैरानी की बात नहीं है कि जहां उन्नत पूंजीवादी देशों तक ने महामारी के इस दौर में अपनी जनता को मदद देने पर अपने जीडीपी का पंद्रह-बीस फीसद तक खर्च किया है, मोदी सरकार ने एक फीसद पर ही बस कर दी थी और कोरोना पर जीत का एलान कर दिया था। अब दूसरी लहर में तो उसने अपनी मुट्ठी और भी कसकर बंद किए रखी है और दो महीने के मुफ्त अनाज पर ही बस कर दी है।

और एक ऐसे देश में, जहां तिहाई से ज्यादा आबादी निरक्षर है और आबादी का प्रचंड बहुमत डिजिटली-निरक्षर है, डिजिटलता यह छन्नी मेहनतकश गरीबों के प्रचंड बहुमत को और ज्यादा वंचित तथा अधिकारहीन बनाने और वास्तव में नजरों से ओझल ही करने का ही हथियार बन गयी है। मोदी सरकार इस हथियार को बड़ी निश्चिंतता से आजमा रही है और सुप्रीम कोर्ट के लताड़ के सुर में ‘हकीकत’ की याद दिलाने के बावजूद, उसके ऐसा करते रहने से पीछे हटने के कोई आसार नहीं हैं। बेशक, यह भारतीय जनतंत्र के बधिया कर दिए जाने का ही सबूत है। अंबानी-अडानी को एशिया में नंबर वन-टू बनाने के अलावा, जनतंत्र का यह बधियाकरण ही तो मोदी राज के सात साल का असली हासिल है।         

0 राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

हमारे बारे में राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

Check Also

दिनकर कपूर Dinkar Kapoor अध्यक्ष, वर्कर्स फ्रंट

सस्ती बिजली देने वाले सरकारी प्रोजेक्ट्स से थर्मल बैकिंग पर वर्कर्स फ्रंट ने जताई नाराजगी

प्रदेश सरकार की ऊर्जा नीति को बताया कारपोरेट हितैषी Workers Front expressed displeasure over thermal …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.