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स्वतंत्रता के 74 साल : अब उल्टी यात्रा?

74 Years of Independence: Now the reverse journey?

We are moving towards the 75th year of independence, but the question is whether we are going forward or going back!

यह अगर संयोग भी हो तब भी बहुत कुछ कहने वाला संयोग है कि स्वतंत्रता की 74वीं सालगिरह की ऐन पूर्व-संध्या में, संसद का मानसून सत्र (monsoon session of parliament) अचानक और समय से पहले समाप्त कर दिया गया है। और इस पूरे सत्र के गिर्द और इसके दौरान, सत्तापक्ष और ज्यादा से ज्यादा एकजुट होते विपक्ष के बीच तीखे से तीखे होते टकराव के ही असाधारण प्रदर्शन में, जिसे सामान्य संसदीय शिष्टाचार के दायरे में बांधे रखना असंभव हो चला लगता है, समय से पूर्व दोनों सदनों की कार्रवाई अनिश्चित काल के लिए स्थगित किए जाने के एलान के अगले ही दिन, एकजुट विपक्षी सांसदों ने राजधानी में संसद भवन से विजय चौक तक, विरोध जुलूस निकाला। बाद में उन्होंने विशेष रूप से राज्यसभा में एक दिन पहले हुई आसाधारण घटनाओं और खासतौर पर बीमा संशोधन विधेयक (insurance amendment bill) पर सदन से मोहर लगवाने के लिए, भारी संख्या में मार्शलों के लाए जाने तथा उनके विपक्षी सदस्यों से धक्का-मुक्की की घटनाओं के संबंध में, राज्यसभा के सभापति की हैसियत से उपराष्ट्रपति से मिलकर ज्ञापन दिया। इसके जवाब में, उसी रोज संसदीय कार्यमंत्री समेत तीन केंद्रीय मंत्रियों ने उपराष्ट्रपति से मुलाकात कर, उनके सामने सरकार का पक्ष ही नहीं रखा बल्कि आठ केंद्रीय मंत्रियों की एक असाधारण प्रैस कान्फ्रेंस के साथ सरकार ने, देश भर में इसके प्रचार की मुहिम ही छेड़ दी कि विपक्ष संसद नहीं चलने दे रहा था और उसके हंगामे की वजह से, खासतौर पर राज्यसभा में 11 अगस्त की शाम के हंगामे की वजह से, समय से पहले मानसून सत्र खत्म करना पड़ा है।

राज्यसभा के 11 अगस्त की शाम के हंगामे से ही शुरू करें। सरकार और विपक्ष, दोनों ही पक्षों से आए विवरणों से साफ है कि इस हंगामे से ठीक पहले, राज्यसभा ने इन मानसून सत्र की असाधारण रूप से सामान्य बहस के बाद, बिना किसी विरोध के एक संविधान संशोधन विधेयक पारित किया था, जो राज्यों को अपने यहां किसी भी समूह को अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में रखने का अधिकार देता है। सचाई यह है कि केंद्र सरकार द्वारा इस कदम को अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची तय करने के मामले में राज्यों को अधिकार देने के, राज्यों तथा पिछड़ा वर्ग दोनों के प्रति अपनी उदारता के साक्ष्य के रूप में प्रचारित किए जाने के विपरीत, वास्तव में इस संविधान संशोधन की जरूरत ही इसलिए पड़ी थी कि मोदी सरकार ने 2018 के अगस्त में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए जो संविधान संशोधन कराया था, उसमें विपक्ष के एक हिस्से के चेताने के बावजूद, ऐसे केंद्रीयकरणकारी प्रावधान रखे गए थे, जो अपने क्षेत्र के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में किसी समूह को शामिल करने के राज्यों के पहले से चले आते अधिकार को छीन कर, केंद्र सरकार के ही हाथों में दे देते थे। अब ठीक इसी गड़बड़ी को दूर करने के लिए, एक और संविधान संशोधन करना जरूरी हो गया था। इससे पहले, लोकसभा भी इसी प्रकार निर्विरोध इस संविधान संशोधन को पारित कर चुकी थी।

बहरहाल, गौर करने वाली बात यह है कि पूरे मानसून सत्र के दौरान चले विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच के टकराव के बावजूद, दोनों पक्षों की सहमति के आधार पर यह संविधान संशोधन निर्विरोध पारित हुआ।

जाहिर है कि विपक्ष अगर अकारण हंगामा कर के संसद को ही चलने से रोक रहा होता, तो यह संविधान संशोधन इस तरह पारित नहीं हो सकता था।

इस संविधान संशोधन के राज्यसभा में पारित होने के फौरन बाद, राज्यसभा में हंगामा हुआ। लेकिन, यह हंगामा अप्रत्याशित कतई नहीं था। यह हंगामा इसलिए हुआ कि दोनों पक्षों के बीच संविधान संशोधन पर बनी सहमति को तोड़कर, सरकार ने बीमा संशोधन विधेयक थोपने की कोशिश की। खुद एक केंद्रीय मंत्री के दावे के अनुसार, विपक्ष ने पहले ही सत्तापक्ष को उसके शब्दों में ‘‘धमकी’’ दे दी थी कि अगर संविधान संशोधन के बाद, बीमा विधेयक या कोई और विधेयक पारित कराने की कोशिश की गयी, तो पिछले दिन के हंगामे से भी ज्यादा हंगामा होगा! लेकिन, सत्ता पक्ष तो पहले ही हंगामे के बीच बीमा संशोधन विधेयक पारित कराने की पूरी तैयारी कर चुका था।

आखिरकार, सरकार की नजरों में आवश्यक विधेयकों पर मोहर लगवाने के बाद, लोकसभा की कार्रवाई एक दिन पहले ही अनिश्चित काल के लिए स्थगित की जा चुकी थी और राज्यसभा को भी अगले दिन मुख्यत: उक्त संविधान संशोधन को पारित कराने के लिए ही चलाया जा रहा था। लेकिन, सत्ताधारी भाजपा ने तय कर लिया कि इस आखिरी दिन ही राज्यसभा से बीमा संशोधन विधेयक पर भी मोहर लगवानी है। आखिरकार, मोदी सरकार सार्वजनिक बीमा कंपनियों में सरकारी पूंजी की बिक्री की अपनी योजना को अगले सत्र के लिए टाला जाना कैसे मंजूर कर सकती थी! इसलिए, सत्तापक्ष ने बीमा विधेयक को राज्यसभा में जबरन थोपने की कोशिश ही नहीं, विपक्ष के सरकारी संपदा की बिक्री के इस प्रस्ताव की विस्तार से पड़ताल करने के लिए, इस विधेयक को संसदीय कमेटी को भेजने के सुझावों को हिकारत से ठुकराने के साथ ही, मार्शलों के नाम पर अभूतपूर्व रूप से बड़ी तादाद में बाहरी सुरक्षा बलों को सदन में बुला लिया गया, ताकि बलपूर्वक विपक्ष को सदन से बाहर धकेल कर, विधेयक पर राज्यसभा की मोहर लगवायी जा सके। इस क्रम में होने वाली धक्का-मुक्की, झूमा-झटकी के बाद ठीक यही हुआ और बीमा विधेयक को पारित घोषित कर दिया गया।

याद रहे कि यह सिर्फ एक विधेयक का ही मामला नहीं है। अपनी प्रस्तावित अवधि से दो दिन पहले ही समाप्त कर दिए गए संसद के इसी मानसून सत्र में, जिसमें संसद चलने ही नहीं देने के सरकार और सत्ताधारी गठजोड़ द्वारा विपक्ष पर आरोप लगाए जा रहे हैं, दोनों पक्षों की सहमति से पारित हुए संविधान संशोधन के अलावा भी सरकार ने लोकसभा से पूरे 20 और राज्यसभा से 19 विधेयकों पर मोहर लगवायी है। यह शब्दश: मोहर लगवाने का ही मामला है क्योंकि इन सभी विधेयकों पर शोर-शराबे के बीच और बिना किसी चर्चा के, सदनों से कथित रूप से मौखिक हामी भरवा ली गयी है।

बनाया गया संसदीय व्यवस्था का मजाक | Made a mockery of the parliamentary system

एक गणना के अनुसार, औसतन दस से पंद्रह मिनट तक के कुल कार्रवाई समय में, विधेयकों को ‘पारित’ कराया गया है। इसे संसदीय व्यवस्था का मजाक बनाने के अलावा और क्या कहा जा सकता है? याद रहे कि यह संसद के इसी एक सत्र का मामला नहीं है, जो विशेष रूप से हंगामी रहा है। पिछले साल के मानसून सत्र में भी इसी प्रकार, जोर-जबर्दस्ती से तीन विवादित कृषि कानूनों और दर्जनों श्रम कानूनों की जगह पर लायी गयीं तीन श्रम संहिताओं को, बिना बहस के पारित घोषित कराया गया था।

बाद में ऐतिहासिक किसान आंदोलन का कारण बने इन कृषि कानूनों को तो पारित घोषित कराने में बुनियादी संसदीय नियम-कायदों तक को तिलांजलि दे दी गयी। विपक्ष की मत-विभाजन की मांगों को अनसुना करते हुए, राज्यसभा में इन विधेयकों को पारित घोषित कर दिया गया और इसका विपक्ष ने विरोध किया तो आधा दर्जन से ज्यादा विपक्षी सदस्यों के निलंबन के आदेश जारी कर दिए गए। नतीजा यह कि संसदीय इतिहास में पहली बार, विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में दिन-रात का धरना दिया।

इसलिए, यह कोई संयोग नहीं है कि  हाल का मानसून सत्र हंगामी था। यह सत्र कोरोना की दूसरी लहर (second wave of corona) की भयंकर तबाही और मोदी सरकार की वैसी भी भयंकर लापरवाही की पृष्ठभूमि में हो रहा था। यह सत्र गहरी आर्थिक मंदी की मार और इस मार से तबाह मेहनतकश जनता की मदद करने के बजाए, मोदी सरकार के कदमों से संचालित बेलगाम महंगाई के घातक वार की पृष्ठभूमि में हो रहा था। यह सत्र, नये कृषि कानूनों के खिलाफ तथा एमएसपी पर गारंटीशुदा खरीद की मांग को लेकर, किसानों के आठ महीने से ज्यादा से जारी अभूतपूर्व आंदोलन की पृष्ठभूमि में हो रहा था। और यह सत्र, पेगासस जासूसी कांड के भंडाफोड़ की पृष्ठभूमि में हो रहा था, जिसके जनतंत्र तथा नागरिक अधिकारों के लिए खतरनाक निहितार्थ हैं। ऐसे सत्र में विपक्ष अगर सरकार को संसद के कटघरे में खड़ा करने की कोशिश नहीं करता, तो ही अचरज की बात होती। जनता की वास्तविक चिंता के मुद्दों को भी प्रतिबिंबित नहीं करे तो संसद का अर्थ ही क्या है? वास्तव में, कार्यपालिका या सरकार की संसद के सामने और उसके माध्यम से देश की जनता के सामने जवाबदेही सुनिश्चित करना ही तो, संसदीय जनतंत्र का सार है। इस जवाबदेही के बिना, संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था, एक जनतांत्रिक व्यवस्था न रहकर, बहुमत की निरंकुशता या चुनावी तानाशाही बन जाती है। स्वतंत्रता के 75वें वर्ष की पूर्व-संध्या में आज हम मोदी सरकार के हाथों, भारतीय संसदीय जनतंत्र के बहुमत की निरंकुशता या चुनावी तानाशाही में इस रूपांतरण से ही दो चार हो रहे हैं।

पर स्वतंत्रता के 75वें वर्ष की पूर्व-संध्या में, हम मोदी राज के हाथों स्वतंत्रता के हिस्से के तौर पर हासिल हुए जनतंत्र के इस एक रूपांतरण को ही नहीं देख रहे हैं। बहुमत की इस निरंकुशता का, बहुसंख्यक निरंकुशता में रूपांतरण भी तो हम हर रोज देख ही रहे हैं। यह रूपांतरण तो अब उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां सत्ताधारी पार्टी के एक पूर्व-प्रवक्ता की बुलायी एक भीड़ में, देश की राजधानी के बीचौ-बीच और संसद से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर, जंतर-मंतर पर ‘जब मुल्ले काटे जाएंगे’ के नारे लगते हैं और इसके वीडियो सोशल मीडिया पर वाइरल होने के बावजूद, पुलिस को हरकत में आने तक में छत्तीस घंटे से ज्यादा लग जाते हैं, फिर दोषियों को ऐसी सजा मिलने का तो सवाल ही कहां उठता है, जो दूसरों के लिए सबक बने। और इस रूपांतरण में स्वतंत्रता का ही बढ़ता हुआ लोप, हमें संसद के  हालिया सत्र में, रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स को वापस लेने का विधेयक (Bill to repeal retrospective tax) पारित कराने की, मोदी सरकार की बेहिसाब हड़बड़ी में देखने को मिला।

हालांकि, रस्मअदायगी के लिए मोदी सरकार ने इस विधेयक को पारित कराते हुए यह भी दोहराया कि वह कर लगाने के संप्रभु अधिकार पर समझौता नहीं करेगी, लेकिन यह एक संप्रभु देश के रूप में कर लगाने के अधिकार के समर्पण के सिवा और कुछ नहीं है। हां! यह समर्पण ऐसे बड़े विदेशी कार्पोरेटों के सामने है, जिनके पांव भारतीय अर्थव्यवस्था में भी जमाए जा चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने सीआइआइ के हालिया सम्मेलन में इस साहसपूर्ण कदम के लिए खुद अपनी पीठ भी ठोक ली!

हम स्वतंत्रता के 75वें साल की ओर तो बढ़ रहे हैं, पर सवाल यह है कि हम आगे जा रहे हैं या पीछे लौट रहे हैं!                                                                                           

0 राजेंद्र शर्मा

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व लोकलहर के संपादक हैं। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

        

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