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नहीं बदले महिलाओं के लिए आज़ादी के मायने

नहीं बदले महिलाओं के लिए आज़ादी के मायने

75th year of our Independence: The meaning of freedom has not changed for women

Have we come to understand the meaning of our freedom properly by now?

आज़ादी का दिन हर भारतवासी चाहे वह समाज के किसी भी तबके का हो, इस दिन को अच्छे से जानता व पहचानता है। इस वर्ष हम आज़ादी की 74 वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं। 74 सालों में 21वीं का भारत निर्भर से आत्मनिर्भर तक का सफर सफलतापूर्वक तय कर चुका है। युवा शक्ति के सहारे भारत ने ज़मीन से लेकर अंतरिक्ष तक कामयाबी के झंडे गाड़ दिए हैं। आज विश्व महाशक्तियां भारत को साथ लेकर ही विकास का तानाबाना बुनना चाहती हैं। आज़ादी से पहले जिस भारत की संकल्पना की गई थी, आज वह लगभग साकार होने को है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हम अब तक अपनी आज़ादी के मायने को सही तरीके से समझ पाए हैं? आज़ादी की खुशी, खुली हवा में इसे महसूस करने से होनी चाहिए। लेकिन आज भी महिलाओं के प्रति समाज की संकीर्ण मानसिकता (Society’s narrow mindset towards women) कभी कभी आज़ादी महसूस नहीं होने देती। हालांकि हालात बहुत बदले हैं। आज महिलाएं लगभग हर क्षेत्र में कार्यरत हैं। मीनल संपत, ऋतु करीधल तथा मौमिता दत्ता जैसी महिला वैज्ञानिक भी हैं, जिनके कुशल मार्गदर्शन में भारत ने सफलतापूर्वक मार्स मिशन पूरा किया है। लेकिन इस सच को भी नकारा नहीं जा सकता कि महिलाएं आज भी कुरीतियों से लड़ रही हैं।

लगातार बढ़ रहे हैं महिलाओं के खिलाफ अपराध

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2016 की रिपोर्ट के अनुसार 2015 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या (Number of crimes against women) 3,29,243 थी, जो साल 2016 में बढ़कर 3,38,954 हो गई। सिर्फ बलात्कार के आंकड़े देखे जाएं तो एनसीआरबी के मुताबिक हर रोज लगभग 100 से अधिक महिलाओं के साथ रेप होता है। 1971 से 2012 के बीच दुष्कर्म के मामलों में 880 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। छोटी-छोटी बच्चियां भी रेप की शिकार होती हैं। 2016 में एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार कुल 34651 मामले दर्ज हुए, जिनमें 19,765 बच्चियों के साथ बलात्कार के थे। 2015 में बलात्कार की कुल संख्या 25 हज़ार थी। एक साल में लगभग 10 हज़ार की बढ़ोतरी। यानी देश में हर घंटे बलात्कार के कहीं न कही चार मामले दर्ज होते हैं।

महिलाओं के खिलाफ अपराध का बड़ा कारण है दहेज

महिलाओं के खिलाफ अपराध में दहेज़ भी एक बड़ा कारण है, जिसकी वजह से हर घंटे एक महिला की हत्या की जाती है। हर साल औसतन 9 हजार महिलाएं दहेज की बलिवेदी पर कुर्बान हो जाती हैं।

केंद्र सरकार की जुलाई 2015 के आंकड़ों के मुताबिक, तीन सालों में देश में दहेज़ की वजह से 24,771 महिला की हत्या की गई हैं। तो वहीं दूसरी ओर उसके खिलाफ यौन अपराधों में भी बढ़ोतरी हुई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 68% लड़कियों को रोजगार और 17% को शादी के नाम पर वेश्यालयों तक पहुंचाया जाता है। इसके अलावा भारत में हर साल एसिड अटैक के 250-300 मामले दर्ज होते हैं। अफ़सोस की बात तो यह है कि घरेलू हिंसा, महिलाओं को पीटना और उन पर चिल्लाने को तो समाज गलत ही नहीं मानता है।

हमारे देश में भ्रूण हत्या के आंकड़े सीमित हो सकते हैं लेकिन बेटे की चाह रखने वालों में तथा बेटे और बेटी के अधिकारों में पक्षपात करने वालों की संख्या असीमित है।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार देश में हर वर्ष 50 लाख कन्या भ्रूणों का गर्भपात होता है। पिछले कुछ वर्षों में कन्या भ्रूण हत्या के 1.2 करोड़ मामले दर्ज हुए हैं। आज जबकि हर क्षेत्र में लड़कियां लड़कों के मुकाबले अपनी हुनर और क्षमता का दोगुना प्रदर्शन कर रही हैं और विज्ञान से लेकर ओलंपिक जैसे खेलों के महाकुंभ में देश का नाम रौशन कर रही हैं, इसके बावजूद उन्हें गर्भ में मार देना समाज की संकुचित सोच को दर्शाता है। यह बताता है कि हमें आज़ाद हुए भले ही सात दशक हो गए हों, लेकिन हम अभी भी संकीर्ण मानसिकता के गुलाम हैं।

जाति और धर्म की संकीर्ण मानसिकता ने तो हमें इस कदर घेर रखा है कि इसके नाम पर ऑनर किलिंग जैसी जघन्य हत्या तक को अंजाम देने से बाज़ नहीं आते हैं। आज भी समाज में सम्मान के नाम पर जाति से बाहर शादी करने वाली बेटियों की न सिर्फ हत्या कर दी जाती है, बल्कि पूरा समाज इसका समर्थन तक करता है। वहीं दूसरी ओर जब बेटियां मैडल जीतती हैं तो उन पर गर्व करने से पहले उनकी जाति ढूंढी जाती है। टोक्यो ओलिंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली पीवी सिंधु के जीत या संघर्ष की कहानी जानने के बजाए लोग पीवी सिंधु की जाति जानने में ज़्यादा रुचि रखते हैं। जिस दिन पीवी सिंधु ने देश के लिए पदक जीता, उस दिन गूगल ट्रेंड्स में PV Sindhu caste सबसे ज्यादा सर्च करना वाला कीवर्ड था।

इसे हम कड़वा सच ही कह सकते हैं कि आज़ादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियां या महिलाएं अपने अधिकारों से अब तक परिचित नहीं हैं। वह अब भी अपनी ज़िंदगी को किस्मत का लिखा मानकर जी रहीं हैं। वहां बच्चियां जानती ही नहीं कि शिक्षा पर उनका भी अधिकार है। देश के संविधान में उनका भी ज़िक्र है। मां के साथ दूसरों के घर में बर्तन साफ करने के अलावा उनका भी अपना अस्तित्त्व है। उन्हें अंदाज़ा हीं नहीं कि 14-15 साल की जिस उम्र में उनकी शादी कर परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी सौंप दी जाती, उनकी वह उम्र बेफिक्र होकर घूमने और कॉलेज जाने की है। दूसरों के घरों में झाड़ू बर्तन साफ़ करने में मां का हाथ बटाने वाली 10 साल की स्वीटी से स्वतंत्रता दिवस के बारे में पूछने पर बताती है, “इस दिन झंडा फहराते और जलेबी खाते हैं। मुझे जलेबियां बहुत पसंद हैं। मैं मां के साथ इस दिन काम पर ज़रूर जाती हूं, सभी के घर जलेबी खाने मिलती है।” तुम क्या करती हो इस सवाल के जवाब में अपनी पढ़ाई, खेलकूद, पसंद या नापसंद बताने के बजाए वह कहती है, “मैं बर्तन मांज लेती हूं और झाड़ू लगा लेती हूं, पोछा मुझ से नहीं होता, छोटी हूं न।”

इस संबंध में प्रयागराज में महिला सशक्तिकरण की दिशा में काम कर रहे अभिषेक शुक्ला जागरूकता की कमी, प्राथमिक विद्यालयों में अध्ययन को लेकर शिक्षकों और सरकार की लापरवाही तथा लड़की है, पढ़ कर क्या करेगी? जैसी सोच को कुसुरवार मानते हैं।

आज़ादी का अर्थ क्या है- what is the meaning of freedom

अभिषेक पिछले पांच सालों से लगातार झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाली बच्चियों को ‘शुरुआत-एक ज्योति शिक्षा’ के तहत पढ़ाने का काम कर रहें हैं। वह कहते हैं कि आज के इस दौर में भी ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों को मेंस्ट्रुअल साइकिल और मेंस्ट्रुअल हाइजीन के बारे में बहुत हीं कम जानकारी होती है, जिसकी वजह से माहवारी के दिनों में वह स्वयं की देखभाल सही तरीके से नहीं कर पाती है, जो आगे चलकर उनमें बीमारियां और कुपोषण का कारण बनता है। अभिषेक के इस क़दम से लगता है कि परेशानियां बात करने से नहीं बल्कि उसका हल निकालने से दूर होंगी।

अफ़सोस की बात यह है कि 74 साल बाद भी हमारा समाज आज़ादी का मतलब विदेशी ताकतों से देश को मुक्ति दिलाने की संकल्पना से आगे नहीं बढ़ सका है। जबकि आज़ादी का अर्थ इससे कहीं अधिक विस्तृत है। आज़ादी का अर्थ जहां जातपात की छोटी सोच से मुक्ति है तो वहीं समाज की आधी आबादी को सम्मानपूर्वक जीने और समान अधिकार देने का भी अर्थ है। लेकिन वर्तमान परिस्थिति को देख कर यही लगता है कि अभी हमें आज़ादी के अर्थ को एक बार फिर से समझने की आवश्यकता है। सच्चे अर्थों में आज़ादी उस दिन होगी जब महिलाएं घर की चारदीवारी से लेकर बाहर तक स्वयं को आज़ाद महसूस करे।

अर्चना किशोर

छपरा, बिहार

(चरखा फीचर)

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