एक बड़ी चुनौती प्लास्टिक कचरे और पॉलिथीन पर नियंत्रण

एक बड़ी चुनौती प्लास्टिक कचरे और पॉलिथीन पर नियंत्रण

स्वतंत्र टिप्पणीकार निर्मल रानी का लेख “पॉलिथीन व प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण : एक बड़ी चुनौती” लगभग ग्यारह वर्ष पूर्व हस्तक्षेप पर जनवरी 9, 2011 को प्रकाशित हुआ था। इन ग्यारह वर्षों में प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण पर नियंत्रण तो नहीं हुआ, हां इतना अवश्य हुआ कि सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध, फोटो सेशन और प्रचार का जरिया बन गया। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा अब तक का सबसे लंबा समुद्र तटीय स्वच्छता अभियान ‘स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर’ अभियान (Swachh Sagar Surakshit Sagar) बीती 03 जुलाई को शुरू हुआ। 75 दिन तक चलने वाले इस अभियान का समापन आगामी 17 सितंबर, 2022 को ‘अंतरराष्ट्रीय तटीय स्वच्छता दिवस’ (International Coastal Cleanup Day 2022) के अवसर पर होगा। इस अवसर पर निर्मल रानी का पुराना लेख कुछ संपादन के साथ पुनर्प्रकाशित…

पॉलिथीन व प्लास्टिक पर प्रतिबंध की कागज़ी घोषणा

देश के कई राज्यों में पॉलिथीन व प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की कागज़ी घोषणा (Paper announcement of ban on polythene and plastic) की जा चुकी है। इन में हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य और चंडीगढ़ जैसे केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल हैं। सरकार द्वारा इस लिए पॉलिथीन तथा प्लास्टिक आदि के सार्वजनिक प्रयोग पर प्रतिबंध (Ban on public use of polythene and plastic etc.) लगाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं क्योंकि इनके कचरों का समूल नाश नहीं हो पाता। और यह मिट्टी की उर्वरक क्षमता को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। इसके  कारण हमारे पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

इसके अतिरिक्त शहरों व क़स्बों में बहने वाले नालों व नालियों में भी यही अनाश्य कचरा इनके जाम होने का कारण बनता है। परिणामस्वरूप बरसात के दिनों में यही कचरा शहरों में बाढ़ जैसे हालात पैदा कर देता है। इन्हीं हालात से बचने के लिए सरकार प्राय: इस विषय पर विचार करती रहती है कि क्यों न पॉलिथीन व प्लास्टिक के सार्वजनिक रूप से होने वाले बेतहाशा प्रयोग को प्रतिबंधित कर दिया जाए।

देश के जिन जिन राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में पॉलिथीन पर प्रतिबंध (Ban on polythene in the states) लगाने की बात होती है, वहां पहले रेहड़ी, ठेलों तथा रोज़मर्रा के प्रयोग में आने वाले सामानों की दुकानों पर आम ग्राहकों को प्राप्त होने वाले पॉलिथीन कैरी बैग पर सर्वप्रथम प्रतिबंध (ban on polythene carry bags) लगा दिया जाता है।

क्या केवल कैरी बैग को प्रतिबंधित करने से कचरे को फैलने से रोका जा सकता है?

ऐसी ख़बरें भी आती हैं कि पॉलिथीन प्रतिबंध राज्यों में पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों को भारी जुर्माना भुगतना पड़ता है तथा वह दुकानदार जिसने कि ग्राहक को उक्त बैग मुहैया कराया है उसे और भी अधिक जुर्माने का भुगतान करना पड़ता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि पॉलिथीन व प्लास्टिक का कचरा हमारी धरती, पर्यावरण, स्वास्थ्य आदि सभी के लिए अत्यंत हानिकारक है। परंतु क्या मात्र कैरी बैग अथवा आम लोगों के हाथों में लटकने वाले प्लास्टिक थैलों को प्रतिबंधित करने मात्र से ऐसे अनाश्य कचरे को फैलने से रोका जा सकता है?

क्या हमारे देश में पॉलिथीन तथा प्लास्टिक पैक के बदले में किसी ऐसी वस्तु की खोज की जा चुकी है जो हमें पूरी तरह से अनाश्य कचरों से मुक्ति दिलवा सके?

दरअसल हमारे देश में पॉलिथीन व प्लास्टिक पैक में आने वाले सामानों की सूची इतनी लंबी है कि उसे गिन पाना शायद संभव ही नहीं है। खासतौर पर आम लोगों के दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली तमाम वस्तुएं ऐसी हैं जो केवल प्लास्टिक या पॉलिथीन पैक में ही बाज़ार में उपलब्ध होती हैं। उदाहरण के तौर पर ब्रेड, दूध, दही, पनीर, लस्सी, मिनरल वॉटर की बोतलें, लगभग सारे ही ब्रांड के शीतल पेय पदार्थ, शराब की बोतलें, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट, बीड़ी के बंडल, गुटखा, शैंपू, साबुन, चाय की पत्ती के पैकेट, वाशिंग पाऊडर, टुथपेस्ट, क्रीम, रिफिल, बॉलपेन, दवाईयों की पैकिंग, इंजेक्शन, सिरिंज, फ्लेक्स, कंप्यूटर कचरा जैसे सीडी, डीवाडी  लॉपी आदि, मोबाईल का कचरा, बैटरी का कचरा, सीमेंट बैग, आटा व बेसन बैग, यूरिया बैग आदि ऐसी न जाने कितनी वस्तुएं हैं जो अनाश्य अवशिष्ट के रूप में हमारे पर्यावरण को अत्यधिक प्रभावित करती हैं।

सवाल यह है कि क्या देश की कोई भी सरकार इन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात कभी सोच सकती है? और यदि उपरोक्त वस्तुओं के कचरे को नियंत्रित करने या उन्हें प्रतिबंधित करने के समुचित उपाय नहीं किये जाते तो क्या मात्र साधारण व गरीब आदमी द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले कैरी बैग पर प्रतिबंध लगने मात्र से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है?

हमारे देश में प्राय: आम आदमी यह कहता सुनाई देता है कि देश के कानून व कानूनी बंदिशें संपन्न व अमीर लोगों के लिए नहीं बल्कि साधारण व गरीब लोगों के लिए हैं। पॉलीथिन को प्रतिबंधित किए जाने वाले कानून को लेकर भी आम लोगों द्वारा कुछ ऐसी ही व्या या की जा रही है।

आज आम आदमी यह सवाल कर रहा है कि पॉलिथीन व प्लास्टिक कचरा फैलाने की शुरुआत सूर्योदय होने से पूर्व ही हज़ारों करोड़ थैलियों को आम लोगों के घरों तक पहुंचाने का कारण देश का डेयरी मिल्क व्यापार ही बनता है। अब आखिर इस पर नियंत्रण पाने के क्या उपाए हो सकते हैं और कौन सी सरकार इन्हें प्रतिबंधित कर सकती है। क्योंकि  इस कारोबार में अधिकांशत: देश की तमाम राज्य सरकारें भी सांझीदार बनी हुई हैं।

इसी प्रकार गुटखा व्यापार भी देश के अति संपन्न व उद्योगपति घरानों के हाथों में है, जिनके हितों की अनदेखी कर पाना आसान बात नहीं है।

पाठकों को याद होगा कि देश के एक केंदीय स्वास्थ्य मंत्री ने जब देश के युवाओं के स्वास्थ्य के मद्देनज़र गुटखा जैसी नुकसानदेह वस्तु पर प्रतिबंध लगाने तथा इसके उत्पादन को बंद करने की बात सोची थी तथा इस सिलसिले में अपने विचार व्यक्त किए थे, बताया जाता है कि उस समय देश की ताकतवर गुटखा उत्पादक लॉबी ने उस मंत्री का मंत्रालय तक बदलवा दिया था।

लगभग यही हाल शराब तथा चाय की पत्ती व डिटर्जेंट पाऊडर एवं शैंपू आदि के पाऊच उत्पादन को लेकर है।

संक्षेप में यह समझा जा सकता है कि आम लोगों के दैनिक जीवन में प्रयोग में आने वाली रोज़मर्रा की चीज़ों के उत्पादन से जुड़े लोग तथा औद्योगिक घराने कोई साधारण लोग बिल्कुल नहीं हैं। लिहाज़ा हो न हो देश की सरकारें इन बड़े घरानों के हितों को भी ध्यान में रखकर ही कोई कानून बनाती हैं या निर्देश जारी करती है। ऐसे में प्रश्र यह है कि आखिरकार हमें इन समस्याओं से निजात कैसे मिल सकती है और हम अपने पर्यावरण व स्वास्थ्य को इन प्रदूषित व अनाश्य कचरों से होने वाले नुकसान से कैसे बचा सकते हैं। इसके लिए हमें हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे से पहाड़ी राज्य से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है।

हिमाचल प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है जिसने पॉलिथीन व प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है। इसके बावजूद भी वहां पाए जाने वाले प्लास्टिक कचरे, जो कि मजबूरीवश अथवा पर्यटकों के कारण पाए जाते हैं, उन्हें भी समाप्त करने का माकूल प्रबंध सरकार द्वारा किया गया है।

सर्वप्रथम तो यह कि हिमाचल प्रदेश की आम जनता ने यह स्वीकार व महसूस कर लिया है कि अनाश्य कचरे उनके पहाड़ी सौंदर्य, पर्यावरण तथा स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। अपनी इसी जागरुकता के चलते वहां के आम लोग यह कोशिश करते हैं कि पॉलिथीन व प्लास्टिक जैसे अनाश्य कचरे को स्वयं इधर-उधर फेंकने से परहेज़ करें। उधर प्रदेश सरकार द्वारा 3 रुपये प्रति किलो की दर से ऐसे कचरे को खरीदने की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त वहां कई जगहों पर ऐसे प्लांट लगाए गए हैं जहां इन कचरों को रिसाईकल किया जाता है। इन कचरों का इस्तेमाल हिमाचल प्रदेश में सड़कों के निर्माण में किया जाता है। ऐसे कचरे को गलाकर सड़कों के निर्माण में इस्तेमाल करने से सड़कें मज़बूत बनती हैं। इन सब के अतिरिक्त सरकार की ओर से सख्ती भी बरती जाती है कि कोई व्यक्ति ऐसी अनाश्य पैकिंग का प्रयोग न करने पाए।

वैसे तो पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय को गंभीरता से लेते हुए गुटका पैकिंग पॉलिथीन व प्लास्टिक के पाऊच में न किए जाने के आदेश जारी किए थे। परंतु सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बावजूद आज भी बाज़ार में प्लास्टिक पाऊच में ही गुटखा बिकते देखा जा रहा है। ज़ाहिर है उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन करना तथा इसको अमल में लाना शासन व प्रशासन का ही काम है।

ऐसी विरोधाभासी परिस्थितियों में हमें साफ नज़र आता है कि किसी ऐसे विषय को लेकर दोहरे मापदंड अपनाया जाना ही हमारे व हमारे समाज के लिए, हमारे स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिए घातक साबित होता है।

इन हालात में हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ऐसे अनाश्य कचरे को लेकर हम स्वयं सचेत व जागरूक बनें। अनाश्य कचरे से होने वाले नुकसान (damage caused by waste) तथा इनके दूरगामी परिणामों को खुद अच्छी तरह समझें तथा इनके समूल नाश का स्वयं पुख्ता उपाय ढंूढें। हमारी लापरवाही तथा अज्ञानता ही हमारे लिए पर्यावरण असुंतलन,बाढ़,बीमारी तथा अन्य कई प्रकार की तबाही का कारण बनती है।

जहां तक हो सके हम अपने घरों में ऐसे अनाश्य कचरों को एकत्रित कर उन्हें स्वयं या तो समाप्त करें या रिसाईकल होने हेतु उसे किसी कबाड़ी की दुकान तक पहुंचाने के उपाय करें। नाली, नालों व सड़कों पर न तो स्वयं ऐसे कचरे फेंके न ही दूसरों को फेंकने दें। हम इस बात की प्रतीक्षा कतई न करें कि सरकार इन अनाश्य कचरों पर स्वयं प्रतिबंध लगाएगी। हमें स्वयं जागरुक होना होगा तथा ऐसी नकारात्मक परिस्थितियों से स्वयं ही जूझना होगा।

A big challenge is the control of plastic waste and polythene

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