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Corona virus

एक बड़ा झूठ है कोरोना से मौत… क्योंकि सरकार को कोरोना की जरूरत है ?

A big lie is a death by corona … because the government needs corona?

यह शीर्षक किसी सनसनी या चौंकाऊ हेडलाइन के जरिए आपकी उत्सुकता बढ़ाने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। यह एक हकीकत है। ऐसी हकीकत जिसे हमसे, आपसे, इस देश की जनता से छुपाया ही नहीं जा रहा है, बल्कि इस हकीकत तक कोई न पहुंचे इसके भी माकूल प्रबंध किए जा रहे हैं।

Death from Corona is a big lie.

कोरोना से मौत एक बड़ा झूठ है। इसे सरकार, सरकार समर्थक और सरकार विरोधी मीडिया, पक्ष, विपक्ष और हम सब भी बहुत बार दोहरा रहे हैं। इसी वजह से सच सात तहों के भीतर छुप गया है। जहां से इस आपाधापी में न यह दिखाई दे रहा है, न हम देखने के प्रति उत्सुक हैं।

इस सच्चाई तक पहुंचने के लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है। बहुत बौद्धिक बाजीगरी की भी दरकार नहीं है। बस आसपास के उस परिवार तक पहुंचिये जहां दुख अपनी सबसे धीमी लय में बह रहा है। जहां आंखों की कोरे बहने के बाद अब सूख चुकी हैं। जिस परिवार ने कोरोना काल में इस बीमारी के चलते किसी अपने को खोया है।

आप देखेंगे और पाएंगे कि किसी को कोरोना हुआ। वो चल फिर रहा है। बात कर रहा है। अचानक थोड़ी तकलीफ बढ़ती है। परिजन अस्पतालों की राह लेते हैं। और दुख, उदासी का लंबा सिलसिला अपने कदम लेने लगता है।

बस यही वो कड़ी है, जहां कोरोना से मौत का झूठ अपना आकार लेता है।

मौत हुई है, ये सच है। अकाट्य सच। ये भी सच है कि मरने वाले को कोरोना था। बस इसकी अगली खबर झूठ है कि उस चलते फिरते सपनों से लबरेज इंसान को कोरोना ने मारा है- यह झूठ है।

असल में, उस व्यक्ति की जान अस्पताल में बिस्तर की अनुपलब्धता ने, दवाओं की कमी, वेंटिलेटर की कमी और इन सबसे ज्यादा पूरे तंत्र की लापरवाही ने ली है।

जान बचाने के लिए जरूरी साधन जुटाने, उपलब्ध कराने, जरूरत पूरी करने की जिम्मेदारी किसकी थी? इस व्यवस्था की, इस तंत्र की। वह नाकाम रहा। नतीजा, जो व्यक्ति कल तक सांस ले रहा था, अब मिट्टी में तब्दील हो चुका है।

फिर उसे कोरोना ने कैसे मारा? कोरोना ने बस उसका सामना अपने शरीर की कमजोरियों से कराया।

व्यवस्था ठीक हो, तो यह वायरस न तो घातक है, और न ही परेशान करने वाला।

बस सही समय पर सही दवा और जरूरी हिदायत अगर व्यवस्थित ढंग से लोगों तक पहुंचें, तो संभव है कि यह वायरस कोई जान न ले पाए। ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि व्यवस्था ऐसा न चाहती है, न उसकी ऐसी सोच है।

कोरोना के कारण जो नागरिक अब हमारे बीच नहीं हैं, उन्हें इस व्यवस्था की लापरवाही ने मारा है। यह व्यवस्था का हत्याकांड है।

व्यवस्था जो अंधी है, बहरी है, असंवेदनशील है। एक दो नहीं, करीब 2 लाख लोग हैं, जिनका इस व्यवस्था ने कत्ल किया है। उन दो लाख लोगों के दो लाख परिवार हैं, जिनमें 10 से 12 लाख लोग शामिल हैं।

तो अगर आप मानते हैं कि ये जानें कोरोना ने ली हैं, तो आप झूठ को अपने भीतर घर बनाने दे रहे हैं। बात यहीं नहीं थमती। जैसे ही आप झूठ को सच मान लेते हैं, तो और 20 लाख नागरिकों की मौत को सहने के लिए तैयार हो जाते हैं।

व्यवस्था यही चाहती है। असल बात यही है कि यह व्यवस्था कुछ लोगों की मौत से बहुत लोगों को डराए रखना चाहती है, और ये साबित करते रहना चाहती है कि व्यवस्था के बाहर आपका कोई जीवन नहीं है।

इस डर के साथ व्यवस्था इंसानों की जान के बदले बहुत सारे लोगों को अपनी जकड़ में कैद रखना चाहती है। आपके लिए नियमों का ऐसा घटाटोप तैयार किया जा रहा है, जिससे बच निकलना संभव ही नहीं।

असल में सरकार आंकड़ों को समझती है। अभी यह लेख लिखने से कुछ समय पहले एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी से बात हो रही थी। उनसे इस उम्मीद के साथ बात की, कि वे अस्पतालों के बीच समन्वय के काम को आसान कर सकते हैं। जिम्मेदार पद पर हैं।

बातों बातों में उन्होंने कहा –

“आप संवेदनशील लोगों की यही दिक्कत है। इतनी बड़ी महामारी में अगर 2, 3 लाख तक मौत का आंकड़ा पहुंच भी जाए तो मानिए कि हमने मुस्तैदी से काम किया। अगर व्यवस्था काम न कर रही होती, तो ये आंकड़ा 10 या 50 लाख भी हो सकता था।”

इन पंक्तियों का लेखक उनसे नहीं कह पाया कि

“अगर आपकी व्यवस्था और आप जैसे जिम्मेदार ठीक से काम करें और संवेदनशील हों तो ये आंकड़ा 2 लाख क्या 2 तक भी नहीं पहुंच पाएगा।”

वे जल्दी में थे, बस अपनी सुनाने में माहिर।

सत्ता के करीबी के इस बयान से आप व्यवस्था की संवेदनशीलता का अंदाजा लगा सकते हैं। उनके लिए आप महज एक आंकड़ा हैं। जब तक कि उनके घर में मौत की आहट न सुनाई दे, तब तक।

और संभवतः वे किसी अपने की मौत पर भी नहीं रोएंगे, क्योंकि रोने के लिए जिस साफगोई की जरूरत है, वो व्यवस्था के कर्णधारों में सिरे से गायब है। इसलिए हम ये चाहेंगे कि किसी भी घर में मातम न पसरे। किसी आसमानी ताकत से नहीं, अपने दिल से सिर्फ मनुष्यों से यह प्रार्थना है। क्योंकि प्रार्थनाएं सिर्फ मनुष्य सुनते हैं। ईश्वर या सरकारों के लिए सारे मनुष्य या तो वोट हैं, या महज एक जीव।

अब एक दूसरी बात, आंकड़ों से ही जुड़ी हुई।

इस पूरे 13 महीने के आंकड़ों के खेल में आपने एक बात नोटिस की है क्या? यह तंत्र अगर चाहे तो एक-एक आंकड़े को बेहद बारीकी से नोट करता है।

पूरे देश में लाखों लोग कोरोना से एक दिन में पॉजिटिव होते हैं, और शाम तक वे सारे आंकड़े आपके मोबाइल पर आपकी पहुंच में आ जाते हैं। यह इसी लापरवाह तंत्र में हो रहा है। यानी सरकार आपको जो बताना चाहती है, जो दिखाना चाहती है, उसे तुरंत आप तक पहुंचा सकती है।

क्या यह संभव है कि इसी मुस्तैदी से सरकार बेरोजगारी के आंकड़े, देश में होने वाले महिला अपराध के मामले, बच्चों की पढ़ाई के आंकड़े, फसलों की पैदावार की पूरी सूची और बिजली की उपलब्धता के आंकड़े या प्राथमिक स्कूलों में आज टीचर्स की मौजूदगी से लेकर सरकारी दफ्तरों में आई अर्जियों की सूची भी सीधे जारी कर दे। यह संभव है, पूरी तरह संभव है।

कोरोना के इस मुश्किल समय में एक एक आंकड़े को बारीकी से जांचकर जारी किया जा सकता है, तो फिर जरूरी सेवाओं से जुड़े आंकड़े भी जनता की पहुंच तक सीधे आसानी से पहुंचाए जा सकते हैं। हालांकि हम आप अच्छी तरह से जानते हैं कि सरकार ऐसा नहीं करेगी। क्यों नहीं करेगी? क्योंकि सरकार ऐसा चाहती ही नहीं।

इस बिंदु पर सोचिये और समझिये। यानी सरकार हमें वही बता रही है, जो वह चाहती है। वह नहीं जो हम चाहते हैं। इस फर्क को समझने के साथ ही पूरी तस्वीर साफ हो जाती है। जाहिर है इन आंकड़ों को सरकार जब समझ रही है, उन्हें संकलित कर रही है, तो इन आंकड़ों में कमी भी लाई जा सकती है। यह फिलहाल संभव नहीं है।

क्योंकि सरकार को कोरोना की जरूरत है। इसलिए कि उसकी आड़ में बहुत से जरूरी अधिकारों को सीमित कर दिया गया है। यह सरकार के लिए बेहद आसान स्थिति है। अपने ऑर्डर, अपने एकतरफा नियमों को लागू करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने की आसानी मुहैया कराने वाले कोरोना को सरकार देश से जाने नहीं दे सकती है। जाने देगी भी नहीं, जब तक कि कोई दूसरी वजह सरकार को न मिल जाए।

और अंत में

इन हालात में अपना ध्यान रखें और जब भी कोई दुखद खबर आए तो कोरोना को दोष न दें, दोष उस कमी को दें, और उसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति से सवाल करें। आप जब पूरी मुस्तैदी से ऐसा कर पाएंगे तो यह भी जान पाएंगे कि आखिर आपकी मुश्किलों के लिए जो जिम्मेदार है, वह आपके बिल्कुल करीब का व्यक्ति है। वह कोई भी है, उससे सवाल करें और आंखों में आंख डालकर करें।

सवाल करना जरूरी है। अगर एक नागरिक के तौर पर हम जिम्मेदारों से सवाल करना भूल जाएंगे तो यकीन मानिये कोरोना काल के बाद अपनी आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर कल देने में भी नाकाम रहेंगे।

सचिन श्रीवास्तव

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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