एक विलक्षण स्वतंत्रता सेनानी स्व. रतन लाल बंसल

A unique freedom fighter Late Ratan Lal Bansal

A unique freedom fighter Late Ratan Lal Bansal

नौजवान पीढ़ी को यह जानना जरूरी है कि देश सेवा और समाज सेवा की कोई कीमत नहीं होती। जिन देशभक्तों ने इस उक्ति को सच साबित किया उनमें फिरोजाबाद के स्व. रतन लाल बंसल का नाम प्रमुख है।

स्वत्रंत्रता सेनानी,लेखक एवं पत्रकार स्व. श्री रतन लाल बंसल का जन्म सन् 1919 फिरोजाबाद में एक साधारण परिवार में हुआ। पिता का साया न होने के कारण प्रारम्भिक शिक्षा न हो सकी। फिरोजाबाद के पुरानी मंडी मोहल्ले में लम्बे समय तक निवास रहा। यह सुखद संयोग रहा कि इसी इलाके में पत्रकार शिरोमणि दादा बनारसी दास चतुर्वेदी का निवास था।

नौजवान रतन लाल को दादा बनारसी दास चतुर्वेदी के सम्पर्क में आने का अवसर मिला और पढ़ने -लिखने की प्रेरणा मिली। दादाजी कलकत्ता से प्रकाशित ”विशाल भारत” के सम्पादक थे।

श्री रतन लाल बंसल ने एक कहानी लिखी तो दादाजी ने इसे ‘विशाल भारत’ में प्रकाशित किया और पारिश्रमिक भी मिला। इससे उनका उत्साहवर्धन हुआ और अपनी जीविका के लिए लेखन प्रारम्भ किया।

सन् 1927 से 1930 के मध्य का समय फिरोजाबाद में स्वाधीनता आंदोलन का स्वर्ण युग था। गाँधी के नेतृत्व में स्वाधीनता की लहर हर छोटे-बड़े शहर में थी। फिरोजाबाद में नौजवानों ने “बाल भारत सभा” का गठन किया। श्री बंसल इसके अध्यक्ष बने। १०-१२ लड़कों की बानर सेना बनाई। फिरोजाबाद में आजादी के मतवाले बालक बंसल को कंधे पर बैठाकर आसपास के ग्रामीण इलाकों में आजादी की अलख जगाने ले जाते थे। श्री बंसल बचपन से भाषण देने और नारे लगाने में माहिर थे।

सन् 1942 के ‘भारत छोडो आंदोलन’ में वे जेल चले गए, तीन माह की सजा आगरा की सेन्ट्रल जेल में काटी। इसके साथ ही उन्हें कई बार अंग्रेजी हुकूमत ने नजरबंद भी किया। आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी का प्रमाण पत्र मिला तो यह कह कर वापस कर दिया कि देश सेवा के लिए पुरस्कार की आकांक्षा रखना गलत है।

श्री बंसल जीवन भर कलम के सिपाही रहे। उनके लेखन का विषय स्वाधीनता आंदोलन, क्रांतिकारी साहित्य, नारी मुक्ति, इतिहास आदि विषय रहे। इसके अलावा उन्होंने साम्प्रदायिकता के विरुद्ध कलम चलाई और अनेक लेख लिखे और पुस्तिकाएं छापीं। अंधविश्वासों के खिलाफ अलख जगाया और नारी मुक्ति के पक्षधर बन अनेक लेख लिखे।” सरिता” ने इन लेखों को प्रमुखता से छापा। यह पत्रिका आज भी रतन लाल बंसल के लेखों के रिप्रिंट पाठकों को उपलब्ध करा रही है। इन लेखों के पक्ष और समर्थन में देश भर में प्रतिक्रियाएं हुईं। तभी महात्मा गाँधी ने बुलावा भेजा।

गाँधी जी के निकट रहे और “भारत में अंग्रेजी राज” जिसे अंग्रेजों ने जब्त किया था, के लेखक पं. सुंदरलाल के साथ उनके द्वारा प्रकाशित अखबार ”नया हिन्द” में एक लेखक के रूप में कार्य किया। दिल्ली में लम्बे वक्त तक निवास रहा तथा श्री डी आर गोयल और पूर्व सांसद सुभद्रा जोशी के साथ ”साम्प्रदायिकता विरोधी कमिटी” की नींव रखी। “सेक्यूलर डेमोक्रेसी” नामक मासिक पत्रिका के साथ वर्षों जुड़े रहे।

श्री बंसल का दिल्ली में लंबा प्रवास रहा। उन्होंने दिल्ली में समय-समय पर समाचार पत्र और पत्रिकाओं का सम्पादन किया और आजादी के परवानों के त्याग और तपस्या को रेखाँकित करने वाली अनेक प्रदर्शनियों का आयोजन किया। एक साप्ताहिक पत्र ”देश की पुकार” भी निकाला। ”अमर शहीद भगत सिंह स्मारक समिति” का गठन कर क्रांतिकारी आंदोलन की बारीकियों और अनछुए पहलुओं पर शोध कार्य किया और ”स्वाधीनता विशेषांक” प्रकाशित किये।

प्रसिद्ध कहानीकार पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की स्मृति में हास्य व्यंग की सालाना पत्रिका ”ठिठोली” का संपादन किया। इस पत्रिका ने हास्य व्यंग के कवियों, नाटककारों को पुरस्कृत करने की परम्परा प्राम्भ की। वे आत्मप्रचार से सदैव दूर रहे। आजादी के बाद अपने कर्तव्यों से विमुख होते नेताओं के आचरण पर वे सदैव अंगुली उठाते रहे और अपने आप को सक्रिय राजनीति से दूर रखा।

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरूजी ने उन्हें दो बार –एक बार फिरोजाबाद और फिर दिल्ली की चांदनी चौक इलाके की संसदीय सीट से सांसद का चुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया, लेकिन उन्होंने कलुषित राजनीति में प्रवेश करने से सदैव परहेज रखा। कोई पुरस्कार ग्रहण नहीं किया।

सन् 1972 में वे दिल्ली छोड़कर फिरोजाबाद में आ गए और सारा वक्त लेखन और सामाजिक कार्यों में बिताया। उनकी तीन पुस्तकें अंग्रेजी जमाने में जब्त हुई। मसलन, ”तीन क्रांतिकारी शहीद”,”रेशमी पत्रों का षड़यंत्र”, और ”आज के शहीद”। अपने सम्पूर्ण जीवन में उन्होंने करीब तीन दर्जन पुस्तकें और सैकड़ों लेख लिखे जो अपने वक्त की प्रमुख पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। ”मशाल” शीर्षक से उनके लेखों का संग्रह ५० के दशक में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में शामिल लेख -” गौ पूजा”, ”युग युग से पीड़ित भारतीय नारी” और ”पुरोहितवाद” बेहद चर्चित हुए। ”मशाल” ने देश के कई शहरों में तहलका मचाया। इस पुस्तक को अनेक शहरों के बुद्धिजीवियों से समर्थन मिला तो विरोध भी हुआ।

कलकत्ता में श्री सीताराम सेकसरिया ने श्री बंसल को आमंत्रित कर सम्मानित किया। उनकी अन्य पुस्तकें हैं —-‘मन के बंधन’, ‘चट्टान और लहर’ (दोनों कहानी संग्रह ), ‘आजाद हिन्द फ़ौज का इतिहास ‘,उत्तर-पश्चिम के आजाद कबीले, ‘गणेश शंकर विद्यार्थी,’ ‘शहीद चंद्र शेखर आजाद’, ‘मुस्लिम देशभक्त ‘,’आज के शहीद’, ‘तीन क्रन्तिकारी शहीद’, ‘रेशमी पत्रों का षड़यंत्र’,  ‘ बल्लभ भाई पटेल ‘ ” पांडयन भाभी “(रेखाचित्र )आदि। गणेश शंकर विधार्थी पर लिखी जीवनी को गुजरात के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया।

श्री बंसल की आखिरी पुस्तक ” चंदवार और फिरोजाबाद का प्राचीन इतिहास” थी। इस पुस्तक को लिखने में 17 वर्ष लगे। पुस्तक की भूमिका में लेखक ने लिखा है “पुस्तक में एक हजार साल के इतिहास की विलुप्त कड़ियों को तलाशने में ऐसा लगा जैसे बालू के टीले में कोई सूई खो जाये और उसे चलनी में छान- छान कर तलाशा जाय।” इस पुस्तक का विमोचन फिरोजाबाद के ‘पी डी जैन इंटर कालेज’ में पूर्व मंत्री कर्ण सिंह ने किया था। इतिहास के एक अनछुए पृष्ठ को उजागर करती इस पुस्तक के तीन संस्करण प्रकाशित हुए। यह पुस्तक फिरोजाबाद से 6 किलोमीटर दूर चंदवार नामक प्राचीन स्थल के बारे में है, जहाँ सन् 1194 में मोहम्मद गौरी और कन्नौज के राजा जयचंद का युद्ध हुआ था। इस युद्ध में जयचंद मारा गया। 11वीं से16 वीं शताब्दी के मध्य चंदवार में अनेक जैन ग्रंथों की रचना की गई। इतिहास में ऐसे उपेक्षित लेकिन महत्वपूर्ण स्थान का लेखक ने प्राचीन ग्रंथों, शिलालेखों, सनदों आदि की मदद से सिलसिलेवार विवरण प्रस्तुत किया। यह स्थल इतिहासकारों और पुरातत्ववेताओं की नजरों से आज भी ओझल है। इस पुस्तक पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ”बुलंदी खंडहरों की” का निर्माण भी किया गया। सन् 1989 में श्री रतन लाल बंसल का निधन हुआ।

जून १९९० में ‘ब्रज गरिमा ‘नामक पत्रिका ने श्री बंसल के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को लेकर एक विशेषांक प्रकाशित किया। इस अंक में श्री टी एन चतुर्वेदी (पूर्व राज्यपाल, कर्नाटक ) ने श्री बंसल की अध्यनशीलता और पैनी दृष्टि को रेखांकित करते लिखा है, ”राजनीति, इतिहास और दर्शन उनके प्रिय विषय थे। छोटे शहर में रहते हुए भी उनके विद्याव्यसन में कोई व्यवधान नहीं पड़ा। उनकी बुद्धि और दृष्टि दोनों खोजी थी। क्रांतिकारियों, साहित्यकारों -लेखकों से उनका निकट का संबंध था। उनकी पुस्तकों की भाषा सुबोध और सरल है। क्रांतिकारियों पर लिखा उनका साहित्य बहुत लोकप्रिय हुआ। ब्रिटिश शासन में सीमांत प्रान्त की समस्याओं पर उन्होंने एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी जिसका महत्व आज भी है। यह पुस्तक उनकी बौद्धिक जिज्ञासा और जागरूकता का उत्कृष्ट उदाहरण है। वे सच मायने में बुद्धिजीवी थे जो बिना तर्क और प्रमाण के कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं होते थे।”

13 अप्रैल 1990 को दैनिक हिन्दुस्तान समाचार पत्र ने ”कुरीतियों के विरूद्ध लेखनी से लड़े रतन लाल” शीर्षक लेख छापा। इसमें लिखा, “श्री रतन लाल बंसल ने अपने लेखन में सामाजिक कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया। दहेज, गौ पूजा, जाति प्रथा,  नारी पराधीनता आदि दूषित मान्यताओं पर अनवरत लेख लिखे और ऐसा उस अँधेरे दौर में किया जब ऐसा करना समाज की दृष्टि में अक्षम्य अपराध माना जाता था। इस दुस्साहस की उन्होंने कीमत भी चुकाई। सांप्रदायिक लोगों के प्रहार सहे। असत्य और अन्याय का विरोध करते उन्होंने जो कष्ट उठाये उसका उन्हें जीवन में कभी अफ़सोस नहीं रहा।”

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद श्री बंसल जीवन भर किसी राजनैतिक दल के सदस्य नहीं रहे लेकिन देश भर के प्रगतिशील मूल्यों में आस्था रखने वाले विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं से करीबी रिश्ते रहे।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी लेखक सव्यसाची ने अपने एक लेख में लिखा है,

“कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो अपने व्यक्तित्व के कारण अनायास ही किसी नगर के प्रतीक बन जाते हैं और फिर उस नगर का अस्तित्व उन्हीं के कारण सार्थक हो जाता है। फिरोजाबाद का अस्तित्व चूड़ी उद्योग के कारण होगा लेकिन मेरे लिए फिरोजाबाद का अस्तित्व स्व. रतन लाल बंसल के कारण था। मैं जब भी कानपुर, लखनऊ,इलाहाबाद जाता था, लौटते वक्त फिरोजाबाद उतर जाता था। ठीक उसी तरह जैसे तीर्थ यात्री मथुरा आते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ये लोग एक अंधी आस्था को लेकर ‘मिथ ‘ को इतिहास मानकर अँधेरे में भटकते हैं, मैं इतिहास के उजाले में सत्य की पहचान के लिए फिरोजाबाद जाया करता था।”

सव्यसाची ने लिखा है –

“श्री बंसल में मानवीय तत्व कूट-कूट कर भरा था। शायद ही कभी उनके व्यवहार से किसी के मन में चोट लगी हो। वे दूसरों की भावनाओं का विशेष ध्यान रखते थे। यही कारण था कि इस लम्बे जीवन में उनके दोस्त और प्रशंसक बहुत थे, शत्रु कोई नहीं।

एक बार ट्रेन में आते हुए पहले से बैठे यात्री ने बैठने के लिए उन्हें जगह नहीं दी। जब बात करने पर यात्री को श्री बंसल के फिरोजाबाद का होने की जानकारी मिली तो उसने रतन लाल बंसल के बारे में जानना चाहा।

श्री बंसल ने अनजान यात्री की बातों का विनम्रता से जबाब दिया लेकिन यह आभास नहीं होने दिया वह स्वयं रतन लाल बंसल हैं क्यों कि ऐसा होने पर जगह न देने के कारण वह शर्मिंदगी महसूस करता।

श्री बंसल के देहांत के बाद फिरोजाबाद के लोग उनके मानवीय गुण का स्मरण कर आज भी भावविह्वल हो उठते हैं। उनके एक बचपन के साथी डॉ. देवव्रत शर्मा ने एक लेख में लिखा है, “उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता थी परदुख कातरता। श्री बंसल की प्रेरणा से मैनपुरी जिले के नौनेर गांव में श्री कृष्ण पाल सिंह चौहान ने एक स्कूल की स्थापना की। श्री बंसल को बुलाया गया। उन्होंने प्रधानाचार्य कृष्ण पाल सिंह से पूछा –”आपने विद्यालय के छात्रों पर जूते मोज़े और जाड़े के कपड़े हैं ?” प्रधानाचार्य बोले — ” कई के पास बनियान भी नहीं। ” श्री बंसल ने फिरोजाबाद वापस आकर इन सामग्री एकत्रित की। शहर के धनाढ्य लोगों के घर -घर गए और एकत्रित सामग्री लेकर नौनेर के विद्यालय पहुंचे।

श्री बंसल को अपने परिचय का दायरा बढ़ाने में बहुत सुख मिलता था। वे साहित्य, राजनीति और इतिहास की चर्चा ही नहीं करते थे बल्कि सामने वाले के दुःख -सुख से सीधे जुड़ जाते थे। फिरोजाबाद के मुस्लिम लोग उन्हें अपनी बिरादरी का मानते थे जबकि श्री बंसल का खान पान विशुद्ध शाकाहारी था।

श्री ए एच नकवी फिरोजाबाद में क्रिकेट के शानदार खिलाड़ी थे। साहित्य में उनकी दखल एक अच्छे श्रोता जितनी थी। नकवी साहब श्री बंसल के दोस्त बन गए। श्री नकवी ने अपने लेख “एक इंसान से मुलाक़ात” में लिखा है, “हिंदी भाषा के साथ उन्हें उर्दू और फ़ारसी के शब्दों की बारीकियों का ज्ञान था कि कभी कभी उनके व्यक्तित्व पर हमें रश्क होने लगता था। वे भरपूर इंसान थे जिनके दिल में वतनवालों की मोहब्बत कूट-कूट कर भरी थी।”

फिरोजाबाद में एक सांध्य दैनिक ”युग-परिवर्तन” के संपादक जगदीश मृदुल भी श्री बंसल के इंसानी स्वभाव के कायल थे। श्री मृदुल ने लिखा है, “जितनी चिंता स्वयं कि उससे अधिक समाज की। लम्बी-चौड़ी गृहस्थी और आमदनी का कोई निश्चित जरिया न होने के बाबजूद ग़रीबों की मदद करना उनके जीवन का मिशन था।

सामने वाले के आत्मसम्मान पर चोट पहुंचाए बिना गुपचुप मदद करने की कला में वे माहिर थे। दुखी लोगों को तलाश कर उनकी मदद करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। अनेक रिक्शेवालों को उन्होंने तपेदिक और दमा का इलाज कराकर राहत पहुंचाई। एस आर के कालेज के सामने एक बुढ़िया सड़क पर दरी बिछाकर बीड़ी, लेमनचूस आदि बेचा करती थी। श्री बंसल जब भी उधर से गुजरते तो उसका सारा सामान खरीदकर लोगों को बाँट देते। ऐसे तमाम किस्सों से उनका जीवन भरा पड़ा है।”

फिरोजाबाद के रफीउद्दीन अहमद श्री बंसल के ऐसे दोस्त थे जिनके साथ वे घंटो साहित्य -समाज -इतिहास की चर्चा करते। रफीउद्दीन अहमद चूड़ी के एक कारखाने के मालिक थे लेकिन उर्दू के उम्दा जानकार थे। उन्होंने अपने लेख के लिखा है, “अब बंसल हमें कहाँ मिलेंगे ? स्वर्ग में या जन्नत में। मेरा विचार है वह जन्नत में मिलेंगे क्यों कि उन्हें रमजान मुबारक के महीने की ग्यारह तारीख़ मिली,  इस महीने में जन्नत के द्वार हर किसी के लिए खुले रहते हैं। मेरा दोस्त सीधा जन्नत में गया। उनके हिन्दू दोस्त उन्हें स्वर्ग में न तलाशें।”

रफीउद्दीन अहमद ने अपने दोस्त की खुद्दारी का एक किस्सा लिखकर उनकी साफगोई की तरफ संकेत किया है, “बंसल जी का परिवार बड़ा था लेकिन आमदनी का कोई जरिया न था। दिल्ली में केंद्रीय सरकार के एक विभाग में किसी की सिफारिश पर बंसल जी का नाम भेजा गया। काम स्वाधीनता संग्राम के इतिहास लेखन और शोध से ताल्लुक रखता था,  काम बंसल जी की रूचि का था। बंसलजी विभाग के संबंधित अधिकारी से मिलने पहुंचे।बातचीत में बंसलजी को आभास हुआ कि सरकारी माहौल में लिखा पढ़ी का काम करना मुश्किल होगा सो तत्काल अपनी असमर्थताओं का हवाला देकर फुरसत पाई।”

रफीउद्दीन अहमद ने बंसल जी की पत्रकारिता पर लिखा,

“फिरोजाबाद में सांप्रदायिक दंगे कई बार हुए। उस वक्त बंसल जी की वेदना देखने लायक होती थी। सितम्बर १९६० में फिरोजाबाद में दंगा हुआ। राम बारात पर बम फेंका गया था,  जनता भड़क गई, शहर में बलबे फूट गए। बलबे की भयानक रात जान हथेली पर रखकर बंसल मेरे घर आये और मुझे गंभीर हालात से अवगत कराया। इस बलबे में एक मुस्लिम लड़के को उन्होंने किसी तरह मौत के मुंह से निकाला और पुलिस की मदद से सुरक्षित स्थान पर भिजवाया। यह दंगा एक पुलिस अधिकारी की मदद से हुआ था। उन्होंने ”फिरोजाबाद में क्या हुआ” नाम से एक पुस्तिका छापी और दंगे की सच्चाई बेनकाब की। इसी तरह सन् 1971के भारत -पाक युद्ध में कराची पर बमबारी हुई। मैंने कहा —बंसल, यह वह शहर है जिसने स्वतंत्रता संग्राम में सरगर्मी से हिस्सा लिया था। अफ़सोस है हम इस शहर पर बम गिरा रहे हैं। बंसल ने बड़ी तख़लीफ़ के साथ कहा —-” जंग इसीलिए तो बुरी चीज है।”

फिरोजाबाद के एक शायर अजीम फिरोजाबादी ने लिखा है —–”बंसल जी में चंद बातें ऐसी थी जो सब की सब एक आदमी में नहीं मिलती।

किसी ने कहा है –‘कहाँ से लायें कि तुझ सा कहें जिसे। ‘

बंसल जी की एक पुस्तक — ” मुस्लिम देशभक्त” में १८५७ के दूरदराज के गाँवों में रहने वाले दर्जनों ऐसे देशभक्तों की बारीक जानकारी शामिल की गई है जो इतिहास में कहीं भी दर्ज नहीं हैं। बंसल जी ने यह पुस्तक बड़े श्रम से लिखी थी और उन सब गाँवों में घर-घर जाकर क्रांतिकारियों के परिजनों से इंटरव्यू लिए थे। प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर की पुस्तक ”गदर के फूल” में भी अनेक भूले बिसरे क्रांतिकारियों का विवरण है। उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में नागर जी ने एक स्थान पर लिखा है कि जब वे एक मुस्लिम परिवार में उनके पूर्वजों की बाबत बात कर रहे थे तो परिवार वाले बोले कि –”हमारे पूर्वजों के बारे में हमसे ज्यादा जानकारी फिरोजाबाद के रतन लाल बंसल के पास है।”

डॉ. अशोक बंसल

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