इंसानी मन की दमित इच्छाओं का ‘आखेट’

इंसानी मन की दमित इच्छाओं का ‘आखेट’

‘आखेट’ फ़िल्म समीक्षा | ‘Aakhet’ film review

फ़िल्म के पटकथा लेखक, निर्देशक रवि बुले यूँ तो पेशे से फ़िल्म समीक्षक है लेकिन पहली बार ‘आखेट’ फ़िल्म से उन्होंने फिल्म निर्देशक के रूप में डेब्यू किया है। आखेट’ फ़िल्म की कहानी कुणाल सिंह की लिखी कहानी ‘आखेटक’ पर आधारित है। फ़िल्म जंगलों से खत्म हो रहे बाघों पर बात करती है।

नेपाल सिंह कहानी का मुख्य नायक राजपूत है और अपने बाप दादाओं। की तरह वह भी शिकार खेलना चाहता है इसके लिए वह जंगल में जाता है लेकिन खुद शिकार होकर लौटता है कैसे वो जानने के लिए आप इस फ़िल्म को देखिए।

पहले ओटीटी प्लेटफॉर्म एयरटेल एक्सट्रीम, हंगामा डॉट कॉम और वोडाफोन ऐप पर उसके बाद अब यूट्यूब पर पिछले हफ्ते रिलीज हुई यह फ़िल्म बड़ी ही संजीदा बन पड़ी है। लेकिन जितनी खूबसूरती से इसे बनाया गया है उसे बनाते हुए कहीं कहीं निर्देशन की चूक भी हमें दिखाई देती है।

‘आड़े वक्त में औरत और मर्द को एक दूसरे का सहारा चाहिए।’ ‘पेट आग और तन की आग सही गलत में फर्क नहीं करती।’ जैसे डायलॉग जिंदगी के माने सिखाते हैं। और फ़िल्म को यथार्थ का अहसास देते हैं।

फ़िल्म में एक ही गाना है जिसे पहले मेल और बाद में फीमेल वर्जन में ढाला गया है। ‘सैयां सिकारी सिकार पर गए” गाना फ़िल्म की रूह बनकर सामने आता है। यह गाना डॉ. अनुपम ओझा का लिखा है और इसे ठुमरी अंग में डॉ. विजय कपूर ने संगीतबद्ध किया है।

फ़िल्म में कुछ एक जगह हंसी के फव्वारे भी हैं लेकिन फ़िल्म का अंत बड़ा ही विचलित करता है। आज से करीबन 100 साल पहले हमारे देश में एक लाख से ज्यादा बाघ हुआ करते थे। लेकिन हमारी पाशविक प्रवृत्ति ने इन्हें धरती से गायब सा कर दिया है। यही हाल रहा तो जल्द ही वह समय आएगा जब हमारी आने वाली पीढ़ियां इन्हें सिर्फ किताबों और फिल्मों में ही देख पाएंगी।

फ़िल्म की लोकेशन एकदम रियल है। अशोक त्रिवेदी कैमरे से कमाल करते हैं। हरिशंकर गौड़ का साउंड सिस्टम भी प्रभावी है। आशुतोष पाठक, नरोत्तम बेन, तनिमा भट्टाचार्य अपनी एक्टिंग से फ़िल्म के स्तर को ऊंचा उठाते हैं। लेकिन फ़िल्म में मुरशेद मियां के पागल भाई बने रफीक यानी प्रिंस निरंजन के भीतर सिनेमाई आग नजर आती है और पूरी फिल्म में वे छाए रहते हैं। हालांकि शुरुआत में वे कुछ कुछ सुनील शेट्टी जैसे लगे लेकिन बाद में उन्होंने अपने अभिनय को भरपूर जिया है। फ़िल्म जितना लुभाती है उससे कहीं ज्यादा निराशा देती है। कारण हम खुद हैं कि हमारे पूर्वजों ने हमें इस लायक नहीं छोड़ा कि हम भी प्रकृति के साथ-साथ इनका लुत्फ भी उठा पाते।

आखेट के बाद जल्द ही रवि बुले के निर्देशन में हम अगली फिल्म का इंतजार कर रहे हैं। सम्भवतः वे अगली फिल्म में निर्देशन की जो गलतियां आखेट में है उन्हें सुधार पाएंगें।

तेजस पूनियां

कास्ट – आशुतोष पाठक, नरोत्तम बेन, तनिमा भट्टाचार्य ,प्रिंस निरंजन, रजनीकांत आदि

निर्देशक – रवि बुले

अपनी रेटिंग -3.5 स्टार

tejas punia

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