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आओ, बजट-बजट खेलें

Aao, Budget-Budget Khelen

बजट 2022-23 : व्याख्या तो होती है, पर बजट पर बहस नहीं होती

नियमानुसार फरवरी सन् 2022 के पहले दिन भारत वर्ष की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) ने लोकसभा में बजट पेश कर दिया। जब एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक ने बजट के विभिन्न प्रावधानों की व्याख्या आरंभ की तो नैशनल बेस्टसैलर पुस्तक ” व्हाई इंडिया नीड्स द प्रेसिडेंशियल सिस्टम” के यशस्वी लेखक (Author of Why India Needs the Presidential System) भानु धमीजा ने ट्वीट किया कि हमारे देश में बजट की व्याख्या तो होती है, पर उस पर बहस नहीं होती।

अपनी ट्वीट में धमीजा ने स्पष्ट किया कि चूंकि सत्तासीन सरकार, सत्तारूढ़ दल अथवा गठबंधन के सदस्य और विपक्ष सभी जानते हैं कि उनका पेश किया बजट ही नहीं, बल्कि कोई भी बिल पास हो ही जाएगा, अंतत: कानून बन ही जाएगा, तो किसी को भी किसी भी बिल पर सार्थक बहस की चिंता ही नहीं होती, उसकी आवश्यकता ही महसूस नहीं होती।

संसद में विपक्ष की क्या भूमिका है?

सत्तासीन सरकार का पेश किया हुआ हर बिल कानून बन ही जाएगा, यह एक निर्विवादित तथ्य है, फिर संसद में न तो विपक्ष की कोई भूमिका है और न ही सत्तासीन दल के किसी ऐसे सदस्य की जो मंत्रिपरिषद् में नहीं है।

जानिए संसद में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है, ऐसे समझें

गौर कीजिए, संसद में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है, इसे समझना शायद ज्यादा मुश्किल नहीं है क्योंकि विपक्ष, विपक्ष में है ही इस कारण से क्योंकि उसके पास बहुमत नहीं है। बहुमत के अभाव में विपक्ष न तो कोई कानून बनवा सकता है, न रुकवा सकता है और न ही उसमें कोई संशोधन करवा सकता है। इसके साथ ही बड़ा सच यह भी है कि सत्तासीन दल के शेष सदस्य, जो मंत्रिपरिषद् में नहीं हैं, उनकी भी कोई भूमिका नहीं है क्योंकि नेताओं के भय से वे अपनी सरकार के खिलाफ बोल नहीं सकते और खुद उनका पेश किया कोई बिल, निजी बिल होने के कारण, पास हो नहीं सकता।

नियम यह है कि मंत्रिपरिषद् के सदस्यों के अतिरिक्त किसी भी दल के किसी भी सदस्य द्वारा पेश किये गये बिल को निजी बिल माना जाता है, चाहे वह व्यक्ति सत्तासीन दल का ही क्यों न हो।

यह एक दुखद सच है कि पिछले 50 वर्षों के संसदीय इतिहास में एक भी निजी बिल पास नहीं हुआ है। परिणाम यह है कि सत्तासीन दल के सदस्यों ने निजी बिल पेश करने ही बंद कर दिये।

चूंकि संसद में न विपक्ष की भूमिका रही, न सत्तासीन दल के शेष सदस्यों की, सो बिलों पर बहस में रुचि ही खत्म हो गयी। यह स्थिति धीरे-धीरे बद से बदतर होती चली गई और कानून क्या बने, उसकी धाराएं क्या हों, यह शासक वर्ग पर निर्भर होता चला गया। सार्थक बहस का स्थान कानफोड़ू शोर ने ले लिया और बजट भी अव्यवस्था और कोलाहल के बीच पास होने लग गया। सदन का स्थगन रीति बन गया, यहां तक कि कोरम पूरा करके सदन की कार्यवाही चलाने के लिए सांसदों को घेर कर लाने की आवश्यकता पड़ने लगी। परिणामस्वरूप संसद में पेश बिल बिना किसी जांच-परख के ध्वनि मत से पास होने लगे।

पिंजरे का तोता बन गए सांसद

जब सांसदों के लिए दल के मुखिया से असहमत होना असंभव हो गया। दल की नीति के अनुसार वोट देना कानून हो गया तो सांसद पिंजरे के तोते बन गए। जब यह कानून बन गया कि पार्टी के ह्विप की अवहेलना नहीं की जा सकती और सांसदों के लिए पार्टी की लाइन पर चलना ही विवशता हो गई तो फिर बिल पर मतदान की प्रासंगिकता ही खत्म हो गई।

संसद में बहस का स्तर क्यों गिरा?

मतदान की प्रासंगिकता खत्म होने का परिणाम दूरगामी रहा, इससे बहस का स्तर गिरा, सदन के भाषणों में जनहित की चिंता खत्म हो गई और वोट की चिंता शुरू हो गई। भाषणों का स्वर राजनीतिक हो गया। संसद की बैठकों का समय तेजी से घट गया। पचास के दशक में जहां साल भर में सदन की बैठकें 130 दिन हुआ करती थीं, सन् 2000 आते-आते इनकी संख्या घट कर 50 के आसपास रह गई। यही नहीं, काम का समय भी कम हो गया। संसद, सरकार की रबड़ स्टैंप बन कर रह गई। इससे कानूनों के स्तर और गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। सन् 2000 में पास हुए रासायनिक हथियार सम्मेलन अधिनियम पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाने के बाद अलग-अलग किस्म की 40 गलतियां पकड़ी गईं।

जब सत्तापक्ष के ही सदस्यों की भूमिका शून्य हो गई, वे सिर्फ कोरम पूरा करने और मेजें थपथपाने के लिए रह गए तो विपक्ष की भूमिका पर किसी टिप्पणी की आवश्यकता ही नहीं है। जब अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए विपक्ष के पास कोई रचनात्मक साधन नहीं बचा तो मीडिया और जनता को अपनी मौजूदगी दिखाने के लिए विपक्ष शोर-शराबे पर उतर आया। विपक्ष द्वारा शोर मचाने, माइक फेंकने, कुर्सियां तोड़ने आदि की घटनाएं बढ़ गईं।

सांसदों की विवशता यह है कि चुनाव जीतने के लिए पार्टी का मंच होना जरूरी है। पार्टी का टिकट पाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ लोगों की निगाह में रहना, उनकी चापलूसी करना आवश्यक हो गया। चुनाव के लिए टिकट देने का अधिकार हाईकमान के हाथों में सिमट गया। इस प्रकार सत्ता की बागडोर बहुमत वाले दल से आगे बढ़कर बहुमत प्राप्त दल के नेता के पास सिमट गई। इसका परिणाम और भी भयानक हुआ, कोई एक शक्तिशाली व्यक्ति अपने पूरे दल को अपनी उंगलियों पर नचाना आरंभ कर देता है। लोकतंत्र वस्तुत: एक व्यक्ति या एक बहुत छोटे से गुट के शासन में बदल जाता है। सत्तासीन व्यक्ति कोई भी कानून बनवा सकता है, वह जनता की गाढ़ी कमाई से आये टैक्स के पैसे का कितना भी दुरुपयोग करे, कोई सवाल नहीं उठता है।

ये दोष किसी एक व्यक्ति के नहीं हैं, ये प्रणालीगत दोष हैं।

भारतवर्ष में लागू संसदीय प्रणाली इतनी दूषित है कि इसे बदले बिना इन कमियों से निजात पाना संभव नहीं है। इसकी तुलना में अमरीकी शासन प्रणाली बहुत बेहतर है। वहां राष्ट्रपति कानून नहीं बनाता, संसद कानून बनाती है। भारतवर्ष में यदि सरकार द्वारा पेश कोई बिल संसद में गिर जाए तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है, इसीलिए पार्टियां ह्विप जारी करती हैं।

अमरीका में कोई बिल पास हो या न हो इससे राष्ट्रपति को कोई फर्क नहीं पड़ता। वह अपनी निश्चित अवधि तक काम करने के लिए स्वतंत्र है, वह अपने मंत्रिमंडल में विशेषज्ञों को लेने के लिए स्वतंत्र है क्योंकि उसके मंत्रिमंडल के सदस्य चुनाव नहीं लड़ते, उन्हें राष्ट्रपति नियुक्त करता है, इसके विपरीत भारत में वही व्यक्ति मंत्रिपरिषद् में शामिल हो सकता है जो किसी सदन का सदस्य हो। इससे योग्यता गौण हो जाती है, चुनाव जीतना प्रमुख कार्य हो जाता है। ऐसे लोग मंत्री हो जाते हैं जिन्हें अपने विभाग का जरा भी ज्ञान नहीं होता, यही कारण है कि नौकरशाही मंत्रियों पर हावी रहती है। शासन व्यवस्था की दूसरी बड़ी कमी यह है कि इसमें जनता की भागीदारी का कोई प्रावधान नहीं है, जनता की राय के बिना बनने वाले कानून अक्सर अधकचरे होते हैं जो जनता का हित करने के बजाए नुकसान अधिक करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में जनहित के कानून नहीं बन पाते।

लब्बोलुबाब यह कि शासन प्रणाली ऐसी हो कि उसमें जनता की भागीदारी हो, विपक्ष की सबल भूमिका हो, हर बिल पर सार्थक चर्चा हो ताकि कानून वो बनें जो जनहित में हों ताकि देश उन्नति कर सके, फल-फूल सके।     

पी. के. खुराना

लेखक एक हैपीनेस गुरू और मोटिवेशनल स्पीकर हैं।

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