Home » समाचार » देश » दिल्ली विश्वविद्यालय : समायोजन या षड्यंत्र ? डूटा की खतरनाक चुप्पी
Delhi University

दिल्ली विश्वविद्यालय : समायोजन या षड्यंत्र ? डूटा की खतरनाक चुप्पी

दिल्ली विश्वविद्यालय : समायोजन या षड्यंत्र ? डूटा की खतरनाक चुप्पी

प्रेमचंद ने कहा था कि चमड़े की रखवाली कुत्तों से नहीं करवाई जाती है और इसी परंपरा में आगे चलकर राजेन्द्र यादव ने लिखा – विश्वविद्यालय साहित्य के कब्रिस्तान हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘समायोजन का षड़यंत्र’ कर रहे शिक्षकों को देखकर अनायास ही प्रेमचंद और राजेन्द्र यादव नहीं याद आ जाते हैं.

लेकिन सबसे पहले जानते हैं कि मामला क्या है ? What is the absorption case in Delhi University?

28 अगस्त को एक चिट्ठी दिल्ली विश्वविद्यालय में एडहोक पर पढ़ा रहे शिक्षकों के विरुद्ध आती है. इस चिट्ठी में एडहोक व्यवस्था को खत्म करने की बात होती है. DUTA (DELHI UNIVERSITY TEACHER ASSOCIATION) द्वारा इस आदेश का विरोध किया जाता है. इस विरोध में एडहोक पर पढ़ा रहे शिक्षकों के साथ गेस्ट फैकल्टी के रूप में पढ़ा रहे शिक्षक और शोधार्थी भी शामिल होते हैं. देखते देखते विरोध आंदोलन का रूप धारण कर लेता है और 28 अगस्त की उस चिट्ठी को वापस ले लिया जाता है. साथ ही MHRD द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय को यह भी निर्देश दया जाता है कि स्थायी नियुक्तियों को सुनिश्चित किया जाए.”

अब यहाँ से दो समस्याएं शुरू होती है. आंदोलन अपने परिणाम के बाद अचानक से समायोजन की मांग करती है और दूसरा यह कि पी-एच.डी के वेटेज में 10 अंकों की कमी कर दी जाती है. पीएचडी के अंकों में कमी पर हम बाद में विचार करेंगे, पहले समायोजन की समस्या को समझना जरुरी है.

समायोजन (absorption) का मतलब हुआ कि जो दिल्ली विश्वविद्यालय में एडहोक (Ad hoc) पर पढ़ा रहे हैं उन्हें ही स्थायी पदों पर स्थान मिले. इसका अर्थ यह भी हुआ कि जो गेस्ट हैं, शोधार्थी हैं या जो पीएचडी पूरी करके आए हैं उन्हें स्थायी पदों के योग्य न समझा जाए. यह अलोकतांत्रिक मांग है शिक्षकों की. मसला यह हुआ कि पहले वे एडहोक पर नौकरी करें फिर बाद में वे ही स्थायी भी हों. जबकि आदर्श स्थिति यह है कि यह अवसर एडहोक के साथ साथ गेस्ट और शोधार्थी सभी के लिए एक सामान हो. लेकिन समायोजन के तहत सिर्फ एडहोक ही लाभान्वित होना चाहते हैं. इसीलिए स्वाभाविक रूप से मुझे प्रेमचंद को कोट करना पड़ा.

एम. ए. और नेट के आधार पर एडहोक पर नौकरी करना एक तरह का चुनाव है और आगे एम.फिल तथा पीएचडी करना दूसरे तरह का चुनाव भी है और मज़बूरी भी. मज़बूरी इसलिए कि पदों के अभाव में किसी-किसी को ही यह सुविधा प्राप्त हो पाती है. खुलकर कहा जाए तो पद कई बार ‘पापाओं’ और ‘पुरखों’ पर भी निर्भर करता है. इससे यह कतई सिद्ध नहीं होता कि जिन्हें यह अवसर नहीं मिला वे कमजोर या अयोग्य होते हैं.

अब आते हैं योग्यता के पैमाने पर. सारी प्रक्रिया (एम.ए., एम.फिल, पीएचडी) पूरी करने के बाद स्क्रीनिंग का क्या अर्थ है? किसे इंटरव्यू में शामिल किया जाए और किसे नहीं यह कैसे तय होगा? तो यह ठीक वैसे ही है कि सभी उम्मीदवारों के हाथों में तलवार दे दी जाए और कहा जाए कि एक दूसरे को काटो. जो बच जाएगा उसे साक्षात्कार में प्रवेश का मौका मिलेगा. लगभग ऐसे ही युद्ध का नजारा दिल्ली विश्वविद्यालय में फैला हुआ है. जो लोग यह दलील दे रहे हैं कि अध्यापन में व्यस्त होने के कारण हमारा एपीआई कमजोर रह गया, उन्हें यह भी समझना चाहिए कि यह उनका अपना चुनाव था.

पी-एच.डी. के भारांक (weightage) में 10 में 10 अंकों की गिरावट 

पीएचडी के भारांक को कम करने की आवश्यकता को किसी भी दृष्टि से तार्किक सिद्ध नहीं किया जा सकता है. यह एक किस्म की कमजोरी है जिसकी आड़ में स्थायी नियुक्तियों से गेस्ट और शोधार्थियों को बाहर करने का षड्यंत्र खेला जा रहा है. कुछ दिनों पहले तक एक शोध आलेक का भारांक 5 अंक था (जो वर्तमान में 2 अंकों का है). इस आधार पर भी यदि पीएचडी का मूल्यांकन किया जाए तो लगभग 6 अध्याय (निष्कर्ष सहित) का एक पीएचडी होता है. पीएचडी की कुल अवधि के हिसाब से लगभग एक वर्ष का समय एक अध्याय पर पड़ता है. इस गणित से भी पीएचडी के 30 अंक होते हैं जबकि शोध आलेख और पीएचडी के अध्यायों की तुलना नहीं की जा सकती. यह तुलना ठीक वैसे ही है जैसा कि एम. फिल और पीएचडी की तुलना लोग टीचिंग एक्सपेरिएंस से जोड़कर करते हुए पीएचडी को कम महत्व देते हैं. यह सरासर बैमानी है.

एडहॉक की स्क्रीनिंग संबंधी कमजोरी  Adhoc screening weakness 

एडहोक पर पढ़ा रहे शिक्षक यदि स्क्रीनिंग में कमजोर हैं तो इस कमजोरी को उन्हें जिम्मेदारी और साहस के साथ स्वीकार करने की जरुरत है. ऐसा इसलिए क्योंकि न तो उन्हें लेखन से मना किया जाता है और ना ही शोध करने से. फिर वे क्यों नहीं कर पाते? क्योंकि जिस वक्त पीएचडी के शोधार्थी तमाम किस्म की दिक्कतों का सामना करते हुए अपना शोध कार्य कर रहे होते हैं ठीक उसी समय वेतन भोगी एडहोक आराम फरमा रहे होते हैं. इस आधार पर तो यह भी मांग उठाई जा सकती है कि स्थायी नियुक्ति में एडहोक को शामिल न किया जाए. लेकिन गनीमत है कि ऐसी मांगे नहीं उठाई जा रही है. बावजूद इसके अगर उन्हें स्क्रीनिंग को लेकर अपने लिए मार्ग खोलना ही था तो वे अपने मार्ग बनाते लेकिन पीएचडी के भारांक को कम करने की वकालत या उसपर चुप्पी नहीं साधते.

DUTA और मार्क्सवाद

डूटा में मार्क्सवादियों को स्थान प्राप्त है. किसी को भी इस बात से दिक्कत भी नहीं होनी चाहिए. मार्क्सवाद का संबंध जन पक्षधरता से किस रूप में जुड़ा हुआ है यह लिखने और बताने की आवश्यकता भी नहीं है. इसीलिए यह भी समझ से परे हो जाता है कि जनपक्षधरता की वकालत करने वाली संस्था छोटे स्तर पर काम कर रहे लोगों के अधिकारों को ऊँचे स्तर के लोगों द्वारा छीनने पर चुप्पी साधे क्यों है? क्या समायोजन और पीएचडी के भारांक को कम करने जैसी व्यवस्था से देश के लाखों शोधार्थियों के अधिकारों का हनन नहीं है? डूटा इस पर त्वरित कार्रवाई करे ताकि आंदोलनों के सामूहिक प्रयास की अवधारणा बची रहे.

स्क्रीनिंग का खेल/ साहित्य के शिक्षक और साहित्य के एडहोक

स्क्रीनिंग का खेल आज अपने स्थायित्व को प्राप्त कर चुका है. क्या यह असंवैधानिक नहीं है? क्या भीड़ से बचने जैसे तर्कों का प्रयोग लोकतांत्रिक अधिकारों के विरुद्ध नहीं है? विश्वविद्यालयों में पहले बेरोजगारी की समस्या को बढ़ाना और फिर यह कहना कि भीड़ बहुत है, पूंजीवादी व्यवस्था का शैक्षणिक संस्करण नहीं है?

इन प्रश्नों के आलोक में स्क्रीनिंग से जुड़े रोज रोज के नए पचड़ों पर खुलकर विचार नहीं करना शिक्षकों के व्यक्तिकता को ही उजागर करता है. यदि स्कीनिंग को लेकर नए फरमान जरुरी होते हैं तो इसे अकादमिक गतिविधियों में शुरू से लागू किया जाए ताकि मसला सबके समक्ष पूर्ववत हो.

साहित्य के संदर्भ में विचार किया जाए तो स्थिति और गंभीर है. जो एपीआई के मानक अन्य अनुशासनों के लिए जरुरी हैं क्या वे साहित्य के लिए भी जरुरी हैं? एक फिजिक्स के शोधार्थी द्वारा कविता लेखन को उसके शोध से जोड़कर नहीं देखा जाना और इस आधार पर उसे अतिरिक्त अंक नहीं मिलना समझ में आता है लेकिन क्या ये बातें इसी रूप में साहित्य पर भी लागू हो सकता है? यह कैसे सिद्ध किया जा सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर कविता लिखने पढ़ने वाला साहित्य की कक्षा में कविता ही नहीं पढ़ा पाएगा? उपन्यास लिखने वाला उपन्यास नहीं पढ़ा पाएगा? लेकिन आलोचना लिखने वाला सब कुछ पढ़ा लेगा? सिर्फ इसलिए कि आलोचना के अंक स्वीकार हैं? एपीआई के लिए मानक पत्रिकाओं पर क्या विचार किया जाना जरुरी नहीं है? 4000 रुपए तक लेकर आलेख छापने वाले गुमनाम संपादकों के तिलस्मी पत्रिकाएं मानक कैसे हो जाती हैं?

यह कैसी होड़ खड़ी कर दी गई है? जितनी चिंता तिकड़मबाजों पर होनी चाहिए उससे अधिक चिंता इस बात पर भी होनी चाहिए कि दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय के शिक्षक होने को लेकर इतराने वाले साहित्य के शिक्षकों को अपने अनुशासन के प्रति कोई चिंता क्यों नहीं है?. नौकरी मिली मामला ख़तम. और इसी मार्ग के अनुयायी एडहोक होते जा रहे हैं. क्या इस बात से भी शर्म नहीं आती कि नौकरी और वेतन की लालच में आप ये भी भूल जाते हैं कि कल को आपने देश के गरीब वर्गों से कहा कि हम क्रांति ला देंगे. हम लड़ेंगे तुम्हारी लडाई. क्या सच में तुम लड़ रहे हो? अपने समाज के प्रति चिंता तो दूर की बात है सच्चाई तो यह है कि स्टेट ने मांस का एक टुकड़ा फेंक दिया तो आप अपने ही लोगों का खून तक कर देगे.

ये सवाल मौजूं हैं इसलिए राजेन्द्र यादव के ‘विश्वविद्यालय साहित्य के कब्रिस्तान हैं’ संबंधी विचारों को आलेख के आरंभ में ही याद करना पड़ा.

स्क्रीनिंग की व्यावहारिक स्थिति   

सामान्य सी बात है कि एम. ए. तक आते आते लगभग सभी शोधार्थियों का अपना दृष्टिकोण और अपनी मजबूती का एहसास हो चुका होता है. इसलिए वह अपने अनुशासन के दायरे में रहकर वह अपनी मजबूती को निखारता है. इसलिए कोई आलेख अधिक लिखता है तो कोई उपन्यास या कहानी तो कोई कविता या आलोचना. अब यदि ऐसे में किसी की क्षमता का परीक्षण होना है तो उसके उस पक्ष को देखते हुए ही उसकी योग्यता का निर्धारण किया जा सकता है.

उचित स्थिति यह भी है कि एम.ए +नेट या पीएचडी की योग्यता को आधार बनाकर सभी को एक सामान अवसर मिले.

आग्रह

अभी जो लड़ाई शोधार्थी और गेस्ट फेकल्टी मिलकर लड़ रही है. मैं उसमें शामिल हूँ और देश भर के शोधार्थियों से अपील करता हूँ कि वे इस लड़ाई में शामिल हों. पीएचडी के भारांक का कम होना और समायोजन आपके अधिकारों पर खुला हमला है इसलिए इसे किसी भी सूरत में लागू होने से रोकें. यह तात्कालिकता की दृष्टि से एक जरुरी लडाई है लेकिन साथ ही मैं इसे अधूरी लड़ाई भी मानता हूँ और इस अधूरेपन के कारणों में साहित्य के स्थायी शिक्षकों और एडहोक के शिक्षकों को जिमेदार समझता हूँ.     

डॉ. संजीव ‘मजदूर’ झा

 

हमारे बारे में hastakshep

Check Also

Shailendra Dubey, Chairman - All India Power Engineers Federation

विद्युत् वितरण कम्पनियाँ लॉक डाउन में निजी क्षेत्र के बिजली घरों को फिक्स चार्जेस देना बंद करें

DISCOMS SHOULD INVOKE FORCE MAJEURE CLAUSE TOSAVE FIX CHARGES BEING PAID TO PRIVATE GENERATORS IN …

Leave a Reply