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जानिए औद्योगीकरण के लाभ हानि

Advantages and disadvantages of industrialization

देश के आर्थिक विकास और प्रदूषण का संबंध (The relationship between the country’s economic development and pollution)

यदि हम अपने देश का आर्थिक विकास सॉफ्टवेयर, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन, सिनेमा, संगीत, एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद, पर्यटन आदि सेवाओं के माध्यम से हासिल करें तो हमें स्टरलाइट कॉपर प्लांट (sterlite copper plant in india) जैसी परियोजनाओं से होने वाले प्रदूषण को भी नहीं झेलना पड़ेगा और हम अपनी जनता को भारी मात्रा में रोजगार भी दे सकेंगे। लेकिन सरकार को सेवाक्षेत्र में रुचि कम होती है क्योंकि सेवाक्षेत्र में लाइसेंस, ठेके और घूस खाने के अवसर कम होते हैं। इसलिए देश की सरकार ना तो फैक्ट्रियों की समग्र लाभ हानि का आकलन करना चाहती है और ना ही सेवाक्षेत्र को बढ़ाना चाहती हैं।

देश का पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है और युवा बेरोजगार होते जा रहे हैं क्योंकि सरकार उद्यमों का सही आकलन (Correct assessment of enterprises by the government) करने में रूचि नहीं रखती है।

तमिलनाडु के तूतीकोरिन { Thoothukudi (तूतूकुड़ी) } में स्टरलाइट कंपनी की विशाल तांबा बनाने की फैक्ट्री स्थित है। इस फैक्ट्री द्वारा वायु में जहरीली गैस छोड़ी जा रही है जिससे आसपास के लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। फैक्ट्री द्वारा प्रदूषित पानी छोड़ा जा रहा है जिसके कारण भूमिगत पानी जहरीला होता जा रहा है (Underground water is becoming toxic) और उस जहरीले पानी की सिंचाई से उपजाई जा रही सब्जियां भी जहरीली होती जा रही हैं। उसी जहरीले पानी के समुद्र में पहुँचने पर समुद्र की मछलियाँ भी मर रही हैं। इन दुष्प्रभावों को देखते हुए तमिलनाडु के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Tamil Nadu Pollution Control Board) ने उस फैक्ट्री को बंद करने के आदेश पारित किये थे। लेकिन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड के आदेशों को निरस्त कर दिया है और फैक्ट्री को पुन: चालू करने का आदेश पारित कर दिया है।

क्या प्रदूषण करने वाली कंपनियों को देश में उत्पादन करने की छूट होनी चाहिये? (Should polluting companies be allowed to produce in the country?)

यहाँ प्रश्न उठता है कि प्रदूषण करने वाली कम्पनियों को देश में उत्पादन करने की छूट होनी चाहिये या नहीं। इस विषय पर गहन चिंतन की जरूरत है।

वास्तव में किसी भी फैक्ट्री के कुछ लाभ उद्यमी सीधे हासिल करता है। उसे प्रॉफिट होता है और वह कम्पनी लाभांश या डिविडेंड वितरित करती है। लेकिन उस फैक्ट्री के तमाम लाभ समाज को भू मिलते हैं। उदाहरण के लिए स्टरलाईट की फैक्ट्री से देश में तांबे का भारी उत्पादन होता है जिसके कारण हमें तांबे का आयात कम करना पड़ता है। हम आर्थिक दृष्टि से स्वाबलंबी हो जाते हैं। यह फैक्ट्री का बाह्य लाभ हुआ जो कि उद्यमी को नहीं बल्कि शेष पूरे समाज को मिलता है।

फैक्ट्री की बाह्य हानि क्या होती है? What are the external losses of the factory?

इसी प्रकार फैक्ट्री की बाह्यहानि भी होती है। जैसे ऊपर बताया गया है वायु तथा जल के प्रदूषण से समाज को हानि (Damage to society due to water pollution) होती है। इस प्रकार किस फैक्ट्री को चलने दिया जाये अथवा ना चलने दिया जाये इसके लिए जरूरी है कि उद्यमी को होने वाले लाभ मात्र के आधार पर निर्णय ना लिया जाये। यह भी देखा जाये कि फैक्ट्री के बाहरी लाभ और हानि कितने हैं।

सम्भव है कि स्टरलाईट कम्पनी के मालिक को तांबे की फैक्ट्री से लाभ हो लेकिन समाज को उसी फैक्ट्री से इससे अधिक हानि हो। ऐसा समग्र आकलन करने में सरकार और हमारे न्यायालयों को रूचि कम ही दिखती है।

स्टरलाईट कम्पनी द्वारा भारतीय जनता पार्टी और अन्नाद्रमुक दोनों को ही भारी मात्रा में अनुदान दिये जाते हैं। इससे इन पार्टियों की फैक्ट्री के समाज पर दुष्प्रभावों का सही आकलन कराने में रूचि नहीं बनती है।

लगभग आठ वर्ष पूर्व नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में उत्तराखण्ड में गंगा पर बनने वाली विष्णुगाड पीपलकोटी योजना की वन स्वीकृति पर वाद दायर किया था। इस वाद में ट्रिब्यूनल ने माना कि परियोजना के लाभ और हानि का सही आकलन नहीं किया गया है।

जंगल संरक्षण कानून में जंगल काटने की क्या व्यवस्था है?

देश में जंगल संरक्षण कानून में व्यवस्था है कि जंगल काटने की स्वीकृति देने के पहले पर्यावरण मंत्रालय को देखना होता है कि परियोजना से समाज को लाभ अधिक हो और तुलना में हानि कम हो। तब ही जंगल काटने की अनुमति दी जाती है। लेकिन परियोजनाओं से लाभ हानि के आकलन में जो बाह्य प्रभाव होते हैं उनकी गणित नहीं की जाती है। जैसे यदि स्टरलाईट के कारखाने से समुद्र में मछली मरती है तो उस हानि का आकलन नहीं किया जाता है। अथवा भूमिगत जल के जहरीले हो जाने से और जहरीली सब्जियों के सेवन से जन स्वास्थ्य बिगड़ता है उसका आकलन नहीं होता है। उस वाद में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (National Green Tribunal) ने निर्णय दिया था कि पर्यावरण मंत्रालय लाभ हानि के आकलन के नियम बनाये। पर्यावरण मंत्रालय ने यह कार्य भोपाल स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट (Indian Institute of Forest Management, Bhopal) को दिया।

इंस्टीट्यूट ने लाभ हानि का समग्र आकलन करने के लिए नियम सुझाये। इन नियमों में कहा गया कि जितने भी पर्यावणीय दुष्प्रभाव होते हैं उनका आर्थिक मूल्य निकालकर जोड़ा जाना चाहिये। जैसे जहरीली सब्जी खाने से जो जन स्वास्थ्य बिगड़ता है उसमें जो उपचार का खर्च आता है, उसको भी परियोजना की हानि में जोड़ना चाहिए। लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने इंस्टिट्यूट और फॉरेस्ट मैनेजमेंट के इन सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

समस्या है कि यदि हम परियोजनाओं के बाह्य प्रभावों का सही आकलन करते हैं तो तमाम परियोजनाएं निरस्त हो जायेंगी। लेकिन दूसरे देशों में प्रदूषण करने की तुलना में छूट ज्यादा है। इसलिए प्रदूषण करने वाले कारखाने भारत में बंद हो जायेंगे और वे चीन को स्थानान्तरित हो जायेंगे जिससे कि भारत में औद्योगीकरण नहीं हो सकेगा। इस समस्या का उपाय यह है कि हम प्रदूषण करने वाले उद्योगों को प्रोत्साहन देने के स्थान पर सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहन दे। दूसरे देशों की तुलना में अपने देश में भूमि कम है और जनसंख्या ज्यादा है। ऐसे में हमको सेवाक्षेत्र पर विशेष ध्यान देना चाहिये। यदि हम अपने देश का आर्थिक विकास सॉफ्टवेयर, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन, सिनेमा, संगीत, एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद, पर्यटन आदि सेवाओं के माध्यम से हासिल करें तो हमें स्टरलाईट के तांबे की फैक्ट्री जैसी परियोजनाओं से होने वाले प्रदूषण को भी नहीं झेलना पड़ेगा और हम अपनी जनता को भारी मात्रा में रोजगार भी दे सकेंगे। लेकिन सरकार को सेवाक्षेत्र में रूचि कम होती है क्योंकि सेवाक्षेत्र में लाइसेंस, ठेके और घूस खाने के अवसर कम होते हैं। इसलिए देश की सरकार ना तो फैक्ट्रियों की समग्र लाभ हानि का आकलन करना चाहती है और ना ही सेवाक्षेत्र को बढ़ाना चाहती हैं। देश का पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है और युवा बेरोजगार होते जा रहे हैं क्योंकि सरकार उद्यमों का सही आकलन करने में रूचि नहीं रखती है।

भरत झुनझुनवाला

(24-01-2019)

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप)

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