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अफगानिस्तान मीडिया कवरेज और अमेरिकी प्रोपेगेंडा

Afghanistan Media Coverage and American Propaganda

मीडिया में अफ़ग़ानिस्तान, आतंकवाद और तालिबान (Afghanistan, terrorism and the Taliban in the media) के संदर्भ में बीस साल पुराने मीडिया कवरेज की पुनर्वापसी हो गई है। इस तरह के कवरेज के दो लक्ष्य हैं, पहला लक्ष्य है जनता की राय को युद्धोन्माद के इर्द-गिर्द गोलबंद करना। मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत के आधार पर गोलबंद करना। उन लोगों को बाँधे रखना जो ‘युद्धोन्माद’, मुसलिम विरोधी घृणा और ‘बदले की कार्रवाई’ के एडिक्ट हैं।

कुछ इस तरह के वीडियो फ़ुटेज भी सामने आए हैं जिनमें कुछ लोग अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का विरोध कर रहे हैं। इनमें अधिकांश वे लोग हैं जो अमेरिका-सीआईए के एजेंट या मुखबिर के तौर पर काम करते रहे हैं।

भारत में भी एक बड़ा तबका है जिसे ‘बदले की कार्रवाई’ और समुदाय विशेष और विचारधारा विशेष के खिलाफ आए दिन ज़हर उगलते सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक सहज ही देखा जा सकता है। इस वर्ग के मन संतोष के लिए भारत में कई लोगों को तालिबान के समर्थन के नाम पर गिरफ्तार किया गया है।

एक सांसद के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई है। दुखद बात यह है कि विदेशों में क्या हो रहा है, उस पर भी नागरिकों को बोलने से रोका जा रहा है। निर्दोष लोगों पर दमन चक्र तेज कर दिया गया है।

आश्चर्य है विश्व में कहीं पर तालिबान के पक्ष-विपक्ष में बोलने पर मुकदमे या गिरफ्तारियां नहीं हो रहीं। यहां तक कि अमेरिका में भी गिऱफ्तारियां नहीं हुई हैं, जब कि वहां पर बड़ी संख्या में लेखकों-पत्रकारों और आम लोगों ने अपनी अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ तक प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं।

विदेश की घटनाओं, खासकर अफगानिस्तान की घटनाओं पर भारत सरकार का कोई नीतिगत बयान अभी तक नहीं आया है ऐसे में आम नागरिकों को बयान देने के नाम पर गिरफ्तार करना गलत है। यह सीधे मानवाधिकारों का उल्लंघन है। यूपी में एक एसपी सांसद के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है। असम में 14 लोग गिरफ्तार किए गए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि भारत सरकार ने तालिबान की निंदा में एक बयान तक जारी नहीं किया है। विगत सात सालों में, मोदी के पीएम बनने के बाद एक भी बयान जारी नहीं किया है। उलटे विभिन्न तरीकों से तालिबान के साथ विदेश मंत्रालय के स्तर पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संवाद चलता रहा है।

मोदी सरकार तुरंत तालिबान के बारे में अपना रुख साफ करे और बताए कि क्या उनकी सरकार तालिबान को आतंकी संगठन मानती है ? क्या अफगान सरकार को आतंकी सरकार मानती है ? तालिबान जब तक शासन में रहेंगे क्या उनसे कोई संवाद नहीं करेगी ?

भारत के विदेश मंत्री ने सुरक्षा परिषद तक में तालिबान के ख़िलाफ़ एक वाक्य तक नहीं बोला। आखिरकार यह चुप्पी क्यों ?

तालिबान के प्रसंग में विदेश नीति में स्पष्टता के अभाव में जमीनी स्तर भारत के निर्दोष लोगों को मात्र बयान देने की वजह से गिरफ्तार करना और उनके खिलाफ एफआईआर करना निंदनीय है।

यह असल में उस मीडिया प्रौपेगैंडा का असर है जो एक सिरे उन्माद और बदले की कार्रवाई के फ्रेम में हम सबके बीच में चल रहा है।

It is true that Taliban is a terrorist organization.

यह सच है तालिबान एक आतंकी संगठन है और उसका नाम आतंकी संगठनों की सूची में संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर अमेरिका तक में दर्ज है। लेकिन मात्र इतने से या अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना पड़ा, इस बिना पर मीडिया के तालिबान संबंधी मीडिया कवरेज को संतुलित नहीं कह सकते।

बेहद महत्वपूर्ण है रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन का बयान

मीडिया लगातार आतंकवाद के ख़िलाफ़ कवरेज के सवालों दुरंगा-तिरंगा रवैय्या व्यक्त करता रहा है। इस प्रसंग में रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन का बयान बेहद महत्वपूर्ण है।

पुतिन ने यह बयान जर्मन चांसलर मार्केल के साथ एक प्रेस कॉंफ़्रेंस में मास्को में दिया है। पुतिन ने कहा है विश्व को अफ़ग़ानिस्तान के यथार्थ को स्वीकार कर लेना चाहिए। तालिबान का व्यवहार में समूचे अफ़ग़ानिस्तान में शासकीय नियंत्रण स्थापित हो चुका है। हमें अफ़ग़ानिस्तान को नष्ट होने से बचाने पर ध्यान देना चाहिए। तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान में नियंत्रण है यह ज़मीनी हक़ीक़त हमें स्वीकार कर लेनी चाहिए और कोशिश करें कि अफ़ग़ानिस्तान में शरणार्थियों की आड़ में विभिन्न आतंकी संगठन बाहर से आकर सक्रिय न होने पाएँ। तालिबान ने शांति, सामान्य प्रशासन, जनता को सुरक्षा देने और विदेशी राजनयिक मिशनों की सुरक्षा का वायदा किया है। मैं उम्मीद करता हूँ कि वे अपने वायदे लागू करेंगे।

इसी तरह चीन ने भी महत्वपूर्ण बयान दिया है और कहा है कि अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान से सबक़ लेकर सीखना चाहिए कि सैन्य कार्रवाई से राजनीतिक समस्या का समाधान संभव नहीं है।

अब संक्षेप में, तालिबान के सत्ता में वापसी के बहाने आतंकवाद के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे प्रचार अभियान पर गौर करें। मसलन्, अमेरिकी मीडिया में उन लोगों की कवरेज की बाइटस अधिक आ रही हैं जो अमेरिका के समर्थक हैं, रिपब्लिकन-डेमोक्रेट पार्टी के सैन्यवादी प्रचार अभियान में लगे रहे हैं। मसलन्, जलालाबाद में एक घटना घटी तो उसका कवरेज इस तरह आया गोया तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में कत्लेआम मचा रहे हैं। जबकि अमेरिकी सेना ने विगत बीस साल में हर सप्ताह अफगानिस्तान में व्यापक कत्लेआम किया, तकरीबन एक लाख से अधिक नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया लेकिन उसका कोई कवरेज नहीं आया।

सन् 2001 के अक्टूबर में येलो क्लस्टर बमों से हमला करके हज़ारों अफ़ग़ान औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया लेकिन कोई कवरेज नहीं आया। इसी तरह मिस्र में सन् 2013 में हज़ारों प्रदर्शनकारियों-आंदोलनकारियों को तानाशाह अब्देल-फ़तह इल -सिसी ने मौत के घाट उतार दिया लेकिन अमेरिकी मीडिया ने कोई कवरेज नहीं दिया। हजारों लोगों को वहाँ जेलों में डाल दिया गया, सैकड़ों को सज़ा के तौर पर मौत की सज़ाएँ दी गयीं लेकिन अमेरिकी मीडिया चुप रहा। क्योंकि इन दिनों अमेरिकी विदेशी नीति की धुरी के रूप में मिस्र काम कर रहा है।

अमेरिका की पिछलग्गू सरकार के रूप में काम कर रही है मोदी सरकार

नया क़ायदा यह है कि अमेरिका के साथ रहो, मनमाने ज़ुल्म करो, मीडिया में कोई कवरेज नहीं आएगा। यही स्थिति भारत में है। मोदी सरकार अमेरिका की पिछलग्गू सरकार के रूप में काम कर रही है। मोदी के ख़िलाफ़ मीडिया में कवरेज एक सिरे से नदारत है।

भारत का मीडिया कवरेज के मामले में अमेरिकी मीडिया का अंधानुकरण करता है। चूंकि अमेरिकी मीडिया में तालिबान विरोधी तथ्यहीन प्रौपेगैंडा शुरु हो गया है तो भारत का मीडिया पीछे कैसे रह सकता है, वह भी तालिबान के ख़िलाफ़ तथ्यहीन, उन्मादी प्रौपेगैंडा कर रहा है।

अमेरिकी मीडिया की तर्ज़ पर भारतीय मीडिया अफ़ग़ानी औरतों के दमन-उत्पीड़न के क़िस्से और आख्यान बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है। इसी मीडिया ने अमेरिकी सेना के द्वारा विगत बीस साल में हज़ारों अफगानी औरतों को मौत के घाट उतार दिया गया लेकिन कोई कवरेज पेश नहीं किया। यहां तक कि हज़ारों अफगानी नागरिक जेलों और यातना शिविरों में अकथनीय यातनाएँ झेलते रहे, उनके बारे में कोई कवरेज पेश नहीं किया।

यही हालत सऊदी अरब की औरतों की है, वहाँ औरतें अकथनीय यातना की शिकार हैं लेकिन मीडिया में कोई न्यूज़ आइटम नज़र नहीं आएगा, क्योंकि सऊदी अरब का प्रशासन पूरी तरह अमेरिका के साथ है।

सऊदी अरब में औरतों को वोट का अधिकार नहीं है, कार चलाने का अधिकार नहीं है। वे बाज़ार में अकेले नहीं जा सकतीं, उनके साथ परिवार के मर्द का होना जरूरी है, लेकिन भारतीय मीडिया को यह सब नज़र ही नहीं आता। वह तो अमेरिकी मीडिया का अंधानुकरण करते हुए अफ़ग़ानिस्तान की औरतों के फेक नरेटिव परोसने में व्यस्त है।

जो लोग अमेरिकी मीडिया को परम पवित्र और श्रेष्ठ मीडिया मानते हैं वे जान लें कि अमेरिकी मीडिया असत्य के प्रौपेगैंडा में सारी दुनिया में अव्वल है और उसके मालिकों में यहूदी लॉबी का वर्चस्व है। यही यहूदी कारपोरेट लॉबी सैन्य उद्योग की भी सबसे बड़ी मालिक है।

इसी तरह सऊदी अरब ने यमन में वहाँ की जनता के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा हुआ है। पूरे देश को भुखमरी की आग में झोंक दिया गया है लेकिन मीडिया में एक पंक्ति की ख़बर नहीं मिलेगी। भुखमरी को यमन में सबसे बड़े अस्त्र के रुप में सऊदी अरब इस्तेमाल कर रहा है और अमेरिका का उसको पूर्ण समर्थन है। नौ सेना की नाकेबंदी और अमेरिकी उपग्रहों से निर्देशित एयर स्ट्राइक के ज़रिए यमन में जनता का भयानक दमन जारी है लेकिन अमेरिकी-भारतीय मीडिया में एक भी न्यूज़ आइटम नहीं मिलेगा।

भारत के उन तथाकथित बुद्धिजीवियों और स्त्री समर्थकों का कोई बयान और फ़ेसबुक पोस्ट तक नज़र नहीं आएगी जो इन दिनों अफ़ग़ानी औरतों के दमन के क़िस्सों को अतिरंजित ढंग से पेश कर रहे हैं।  

अमेरिकी मीडिया के प्रौपेगैंडा में यह बात बार-बार संप्रेषित की गई कि अफ़ग़ानिस्तान तो आतंकियों, अलकायदा, तालिबान का स्वर्ग है। जबकि हक़ीक़त यह है कि अलक़ायदा का अफ़ग़ानिस्तान में निर्माण अमेरिका ने सन् अस्सी के दशक में किया। अमेरिका की गुरिल्ला रणनीति के तहत इस्लामिक फंडामेंटलिज्म को ओसामा बिन लादेन और मुजाहिद्दीन के गुलबुद्दीन हिकमतयार के नेतृत्व में आतंकी गुटों को सीधे सीआईए के नेतृत्व में खड़ा किया गया, बाद में लीबिया और सीरिया में अलकायदा-आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों को अमेरिका ने खड़ा किया।

लीबिया में अमेरिका ने अलकायदा एयरफ़ोर्स की बमबारी में मदद ली, लेकिन अमेरिकी-भारतीय मीडिया में यह सब ग़ायब रहा। अमेरिका ने लीबिया में कर्नल गद्दाफ़ी को अपदस्थ करने के लिए अलक़ायदा को खड़ा किया उसे सैन्य मदद दी और लीबिया की जनता पर युद्ध थोप दिया गया। उसी तरह सीरिया में अलकायदा – आईएस आदि जैसे आतंकी संगठनों को खड़ा किया, उनको सीधे सीआईए के संरक्षण में प्रशिक्षित किया गया और सभी क़िस्म के अत्याधुनिक युद्धास्त्र दिए गए। लेकिन यह सब कभी मीडिया में सामने नहीं आया।

वाशिंगटन पोस्ट (16 अगस्त 2021) में माइग्रेट सुलीवन ने लिखा कि बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ जो सोशल मीडिया दे रहा है, वह ऐतिहासिक संदर्भ के बिना आ रही है। जबकि इस तरह की ख़बरें ऐतिहासिक संदर्भ के साथ दी जानी चाहिए। पार्टी जान तरीक़े से आरोप न लगाए जाएँ। मीडिया में ‘पराजित और विजेता’ के आख्यान फ़्रेमवर्क में अफ़ग़ानिस्तान की खबरें पेश की जा रही हैं। इस तरह के कवरेज में ख़बर के ऊपर विश्लेषकों -विशेषज्ञों की राय हावी है। ख़बर नदारद है। जबकि हक़ीक़त यह है अफ़ग़ानिस्तान में राजनीतिक परिस्थिति धीरे धीरे विकसित हो रही है, उसे पूरी शक्ल अख़्तियार करने में समय लगेगा।

मीडिया में ‘न्यूज़ उपभोक्ता’ को केन्द्र में रखकर ख़बरें पेश की जा रही हैं। यह एक तरह से मांग-पूर्ति के सिद्धांत के अनुसार ‘क्विक-टेक जर्नलिज़्म’ है। इस तरह की पत्रकारिता ख़बर कम और प्रौपेगैंडा अधिक परोस रही है। वे यह देखने में असमर्थ हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में आधुनिक विचारों को प्रचारित प्रसारित करने में एक ज़माने में वहाँ सक्रिय कम्युनिस्टों की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन आपको मीडिया कवरेज में कहीं पर भी कम्युनिस्टों की शानदार भूमिका का कोई सूत्र या संकेत तक नहीं मिलेगा।

कम्युनिस्टों ने अफगानिस्तान में नए आधुनिक विचारों को संप्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, वे जब तक सक्रिय थे वहाँ आतंकवाद और धार्मिक फंडामेंटलिज्म का जन्म नहीं हुआ। अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से कम्युनिस्टों का सफ़ाया करने की नीति के तहत विभिन्न क़िस्म के आतंकी संगठनों को खड़ा किया, बड़े पैमाने पर हज़ारों कम्युनिस्टों की हत्याएं की गईं, लेकिन मीडिया चुप रहा। कम्युनिस्टों का एकमात्र अपराध यही था कि उन्होंने आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान की परिकल्पना को आम जीवन का अंग बनाया था।

अमेरिकी प्रशासन अफ़ग़ानिस्तान में किस तरह की भूमिका निभाता रहा है इसे ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के सन् 2019 में जारी अफ़ग़ान दस्तावेज़ों के ज़रिए समझा जा सकता है। इन दस्तावेज़ों को सूचना प्राप्ति अधिकार के तहत अमेरिकी प्रशासन से हासिल किया गया, इनमें तक़रीबन दो हज़ार दस्तावेज शामिल हैं। इन दस्तावेज़ों के आधार पर अख़बार ने अफ़ग़ानिस्तान के संदर्भ में निष्कर्ष निकाला कि अमेरिकी अधिकारी 18 साल तक अफ़ग़ान युद्ध के बारे में अपने प्रचार अभियान के दौरान अमेरिकी जनता को सत्य बताने में असफल रहे। वे रंगबिरंगे दावे करते रहे,जिनमें असत्य भरा हुआ था। और इनमें प्रमाणों और अनेक भयानक भूलों को छिपाया गया। ऐसी स्थिति में युद्ध में पराजय अवश्यंभावी थी।

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

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