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Today's Deshbandhu editorial

कोरोना के बाद अब ब्लैक फंगस का खौफ

After corona, fear of black fungus now

(देशबन्धु में संपादकीय आज | Editorial in Deshbandhu today)

कोरोना की दूसरी लहर (Second wave of corona) के असर से अभी भारत मुक्त हुआ नहीं है और इस बीच तीसरी लहर का अंदेशा जतलाया जाने लगा है। तीसरी लहर न जाने किस रूप में, किस तरह से सामने आएगी और सरकार उससे निपटने की क्या तैयारी कर रही है, ऐसे सवालों के जवाब अभी मिलना बाकी है। मगर इससे पहले ब्लैक फंगस नाम की नई बीमारी का खौफ भारत पर छा रहा है।

गुरुवार को ही केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को अहम निर्देश देते हुए कहा है कि ब्लैक फंगस को महामारी कानून के तहत अधिसूचित करें और सभी केस रिपोर्ट किए जाएं। इसके मायने यह हैं कि ब्लैक फंगस के सभी पुष्ट और संदिग्ध केस, स्वास्थ्य मंत्रालय को रिपोर्ट किए जाएंगे। अब सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को इस रोग की जांच और इलाज के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के निर्देशों का पालन करना होगा।

क्या है ब्लैक फंगस | What is black fungus

गौरतलब है कि ब्लैक फंगस या म्यूकोर्मिकोसिस – Mucormycosis एक तरह का फंगल इंफेक्शन है। कोविड-19 के मरीजों में खासकर जो लोग स्टेरॉयड थेरेपी पर हैं और जिनका शुगर अनियंत्रित है, उन पर इसका असर देखा जा रहा है। देश में ब्लैक फंगस के मामले बढ़ते जा रहे हैं। महाराष्ट्र में ही अब तक ब्लैक फंगस के 1500 केस रिपोर्ट हो चुके हैं और 90 लोगों को जान गंवानी पड़ी है, वहीं राजस्थान और तेलंगाना पहले ही ब्लैक फंगस को महामारी घोषित कर चुके हैं। तमिलनाडु में भी इस बीमारी के 9 केस रिपोर्ट हुए हैं।

ब्लैक फंगस के इलाज और दवा के लिए अभी से मारामारी देखी जा रही है। इसके इलाज में एंटी फंगल मेडिसिन एम्फोटेरेसिन-बी इंजेक्शन (Antifungal Medicine Amphotericin-B Injection) की जरूरत पड़ती है। जिसकी उपलब्धता अभी सब को नहीं है और कालाबाजारी की तैयारी हो चुकी होगी।

ब्लैक फंगस के इलाज (Treatment of black fungus) में आंख के सर्जन, न्यूरोसर्जन, जनरल सर्जन, डेंटल सर्जन और ईएनटी स्पेशलिस्ट की जरूरत होगी। इसलिए सरकार को देशव्यापी स्तर पर यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि इस नई बीमारी की दवाओं और संबंधित डाक्टरों तक जनता की पहुंच आसान हो।

The second wave of Corona has exposed the truth of health facilities in the country.

कोरोना की दूसरी लहर ने देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का सच खोलकर रख दिया है। देश के कई सरकारी अस्पताल कोरोना के इलाज में संसाधनों से जूझते नजर आए। लेकिन इसी दौरान निजी अस्पतालों की मनमानी भी भरपूर देखी गई। न जाने कितने वीडियो और खबरें सोशल मीडिया पर प्रसारित हुई हैं, जिनमें आयुष्मान योजना के तहत मरीजों को इलाज न मिल पाने की घटनाएं दिखाई गई हैं, या दवाओं की कालाबाजारी पकड़ाई है या डाक्टरों का मरीजों के साथ असंवेदनशील व्यवहार सामने आया है।

सामान्य दिनों में भी भारत की सरकारी स्वास्थ्य सुविधा का स्तर निम्नस्तरीय रहा है। जो मजबूर होते हैं, जिनके पास महंगे इलाज के लिए साधन नहीं होते, वे मरीज ही सरकारी अस्पतालों का रुख करते हैं। यह कड़वा सच दशकों से भारतीय समाज देखता आया है, फिर भी चुनावों में अच्छे अस्पताल, सस्ता इलाज जैसे मुद्दे कभी वोट हासिल करने का जरिया नहीं बने। राजनैतिक दल धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगते रहे, और जनता अपने प्रतिनिधियों को इसी आधार पर अधिकतर चुनती रही। राजनीति की इस जमीन पर हमने बबूल बोया, तो अब हमें आम की मिठास नहीं मिल रही, केवल कांटों की पीड़ा मिल रही है। यही वजह है कि आज कोरोना से निपटने में सरकारी तंत्र पस्त नजर आ रहा है और इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है।

सरकारें अब भी बहाने से काम चला रही हैं या फिर आंकड़ों के जरिए यह बताने की कोशिश हो रही है कि हालात नियंत्रित हैं। लेकिन इस नियंत्रण का एक सच ये है कि कोरोना से ठीक हुए मरीजों पर ब्लैक फंगस का नया खतरा मंडरा रहा है। बीते एक महीने से रोजाना तीन-चार लाख लोग कोरोना संक्रमित हुए हैं, उनमें से बहुतों का इलाज स्टेरॉयड के जरिए हुआ होगा और बहुत से मरीजों में शुगर की बीमारी भी होगी। इस तरह उन सब पर ब्लैक फंगस की चपेट में आने की आशंका बनी रहेगी। इस स्थिति को अभी नहीं संभाला गया तो आगे हालात बेहद भयावह साबित हो सकते हैं। केंद्र सरकार ने बेशक इसे भी महामारी कानून के तहत लाने की पहल जल्द कर ली है, अब उससे भी अधिक जल्दी इस बीमारी की रोकथाम और इसके सही इलाज की होनी चाहिए।

भारत पिछले दो महीनों में हजारों अकाल मौतों का गवाह बन चुका है, इंसानी जीवन की बेकद्री पर अब रोक लगनी ही चाहिए।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप.

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Deshbandhu is a newspaper with a 60 years standing, but it is much more than that. We take pride in defining Deshbandhu as ‘Patr Nahin Mitr’ meaning ‘Not only a journal but a friend too’. Deshbandhu was launched in April 1959 from Raipur, now capital of Chhattisgarh, by veteran journalist the late Mayaram Surjan. It has traversed a long journey since then. In its golden jubilee year in 2008, Deshbandhu started its National Edition from New Delhi, thus, becoming the first newspaper in central India to achieve this feet. Today Deshbandhu is published from 8 Centres namely Raipur, Bilaspur, Bhopal, Jabalpur, Sagar, Satna and New Delhi.

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