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Lalit Surjan

अजीत जोगी : एक ऐसा राजनेता श्वेत और श्याम के बीच जो स्लेटी रंग को नहीं मानता था… ललित सुरजन की कलम से

Ajit Jogi (अजीत जोगी) | अजीत जोगी का जीवन परिचय | अजीत जोगी बायोग्राफी | Ajit Jogi Biography

देशबन्धु : चौथा खंभा बनने से इंकार – 27

छत्तीसगढ़ का एक पृथक राज्य के रूप में उदय हुआ तो स्वाभावत: प्रदेश में सभी ओर उल्लास का वातावरण निर्मित हुआ। जनता के मन में विश्वास जागा कि उसकी आशाएं- आकांक्षाएं पूरी होने का समय आ गया है। एक उदाहरण सामने रखना बेहतर होगा। राष्ट्रीय राजमार्ग 6 (अब क्रमांक बदल गया है) पर पश्चिम दिशा में नागपुर की ओर राजनांदगांव के आगे एक स्थान पर बाकायदा सरकारी सूचना पटल लगा था- ‘आगे बत्तीस किलोमीटर गड्ढा-मुक्त सड़क है‘।

कल्पना की जा सकती है कि प्रदेश में उन दिनों सड़कों की क्या हालत रही होगी! बिजली आपूर्ति की व्यवस्था इससे बेहतर नहीं थी।

दरअसल, पूर्ववर्ती सरकार के मुखिया का मानना था कि चुनाव सड़क-बिजली-पानी से नहीं, वरन ‘मैनेजमेंट’ से जीते जाते हैं। ऐसे में जब मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने काम सम्हालने के एक सप्ताह के भीतर ही तमाम नियम-कायदों व प्रोटोकॉल को धता बताते हुए प्रदेश के बिजली संयंत्रों से मध्यप्रदेश को बिजली आपूर्ति बंद करने की घोषणा की तो प्रदेश में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। वह दिन और आज का दिन- छत्तीसगढ़वासियों को मनमानी बिजली कटौती से पूरी न सही, बहुत बड़ी राहत मिल गई। इसी के साथ दूर-दराज के इलाकों में विद्युत वितरण सुनिश्चित करने के लिए उपकेन्द्रों की स्थापना भी तेजी से होने लगी।

जब छत्तीसगढ़ की जनता को लगा सरकार उसके करीब आ गई है

इसी दौरान प्रदेशवासियों ने एक और परिवर्तन महसूस किया।

अभी तक राजधानी भोपाल में थी जो आम जनता के लिए उतनी और उसी तरह दूर थी जैसे देश की राजधानी दिल्ली। रायपुर में राजधानी आई तो जनता को लगा कि सरकार उसके करीब आ गई है। सरकारी दफ्तरों के माहौल में किसी कदर खुलापन नजर आने लगा। मंत्रालय हो या विधानसभा, राजभवन हो या मुख्यमंत्री निवास, आम लोगों की आवाजाही बहुत कठिन नहीं थी। सुरक्षाकर्मी अधिक पूछताछ नहीं करते थे। इसमें कहीं स्वयं श्री जोगी का अप्रत्यक्ष योगदान था।

हमें पहली बार ऐसा मुख्यमंत्री मिला था जो सहज भाव से छत्तीसगढ़ी में जनता से गोठियाता था यानी बातचीत करता था। उनकी कलेक्टरी के दिनों वाली एक आदत की झलक भी कभी-कभार देखने मिल जाती थी कि निवास पर फोन करो तो दूसरे छोर पर टेलीफोन अटेंडेंट की बजाय खुद अजीत जोगी ही फोन उठा लें।

संयोग से प्रथम राज्यपाल के रूप में प्रदेश को दिनेश नंदन सहाय जैसा सरल व्यक्तित्व का धनी मिला। वे भी जनता को सहज उपलब्ध थे। एक दिन तो वे घूमते-घामते निकट स्थित प्रेस क्लब पत्रकारों से मिलने चले गए। मुझे आश्चर्य हुआ कि कुछेक जिम्मेदार तबकों में इस खुलेपन की आलोचना की गई।

आज जिस तरह मुख्यमंत्री निवास पर सुरक्षा का घेरा कसते चला जा रहा है और राजभवन की चारदीवारी ऊंची और ऊंची होती गई हैं, वह आम जन को भयभीत करता है, दूरी का एहसास कराता है, जिसे देखकर दु:ख होता है।

इस बीच यह संवैधानिक अनिवार्यता सामने आई कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन अजीत जोगी चूंकि विधायक नहीं हैं अत: वे छह माह के भीतर प्रदेश में किसी विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ें और जीतकर सदन में आएं। राजनीतिक हल्कों में कयास लगाया जा रहा था कि कांग्रेस का कौन सदस्य उनके लिए सीट खाली करेगा। लेकिन जोगीजी ने अपने गृहक्षेत्र मरवाही के भाजपा विधायक रामदयाल उइके से इस्तीफा दिलवाकर एकबारगी सबको अचरज में डाल दिया। उनके इस कौशल की काफी प्रशंसा हुई, किंतु मेरा मानना था कि उनकी यह चतुराई नैतिक दृष्टि से बिल्कुल उचित नहीं थी, और इससे आगे चलकर उनके लिए परेशानी ही खड़ी होगी। लेकिन यह सिर्फ एक ट्रेलर था। पूरी फिल्म तब देखने मिली जब कुछ समय पश्चात भाजपा के बारह विधायक एक साथ दलबदल कर कांग्रेस में शामिल हो गए। तत्कालीन नियमों के तहत उनकी सदस्यता बरकरार रही।

विधानसभा में कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत था अर्थात कोई संकट की स्थिति नहीं थी। फिर जोगीजी को यह करतब करने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? क्या इसलिए कि कांग्रेस के अधिकतर विधायकों की निष्ठा निजी तौर पर जोगीजी के प्रति नहीं थी और वे विधायक दल में अपना खेमा तैयार कर भविष्य के प्रति आश्वस्त हो जाना चाहते थे? ऐसा करते हुए उन्होंने तनिक भी परवाह नहीं की कि इससे उनकी छवि पर आंच आ रही है।

नवगठित विधानसभा में स्वस्थ संसदीय परंपरा के अनुरूप विपक्ष यानी भाजपा के बनवारी लाल अग्रवाल उपाध्यक्ष निर्वाचित किए गए थे। उन्हें भी श्री जोगी ने बहुमत के सहारे अपदस्थ किया व उनके स्थान पर कांग्रेस के धर्मजीत सिंह नए उपाध्यक्ष चुन लिए गए। इससे एक गलत परंपरा की शुरूआत हुई जो आज तक चली आ रही है।

यह निर्विवाद है कि अजीत जोगी एक बेहतरीन प्रशासक थे। उन्हें मैंने ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में जाना जो अफसरों से काम लेना जानता था, न कि उनकी सलाह पर चलता था। उनके एक राजनीतिक-प्रशासनिक कदम का उल्लेख करना उचित होगा।

मध्यप्रदेश में मदिरा व्यवसाय का एक कार्टेल बन गया था जिसका नियंत्रण भोपाल के एक व्यवसायी के हाथों में हुआ करता था। यह अत्यंत ताकतवर कार्टेल सरकार से मनमर्जी काम करवाने में सक्षम था। कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी सरकार का काम शराब के वैध-अवैध व्यापार के बिना नहीं चलता। छत्तीसगढ़ की पहली सरकार भी इसका अपवाद नहीं थी।

तथापि जोगीजी ने कुछ ही समय के भीतर शराब लॉबी को इतना संदेश दे दिया था कि सरकार उसके इशारे पर नहीं चलेगी। उन्होंने सत्ता के गलियारों में घूमने वाले अहंकार-दीप्त पुराने मध्यस्थों को भी दरकिनार कर दिया था, लेकिन जल्दी ही इनका स्थान उन भाईबंदों ने ले लिया जो इंदौर में जोगीजी के करीबी होने का विश्वास-योग्य दावा करते थे।

शराब लॉबी को नियंत्रित करना स्वागतयोग्य था किंतु मुख्यमंत्री ने आत्मविश्वास के अतिरेक में प्रदेश के समूचे व्यापारी समाज को ही अपने निशाने पर ले लिया। यह सही है कि जिन मांगों को लेकर व्यापारी वर्ग ने आंदोलन किया था उनमें से अधिकांश अव्यवहारिक तथा अनुचित थीं, लेकिन विधानसभा मार्ग पर उन पर पुलिस का लाठीचार्ज पूरी तरह अवांछित, अनावश्यक व अदूरदर्शी था। यह एक और ऐसा कदम था जिसने प्रदेश में जोगी-विरोधी माहौल को हवा देने का काम किया।

मुख्यमंत्री अजीत जोगी के ऐसे कुछ शुरुआती कदमों का विश्लेषण करें तो प्रतीत होता है कि वे श्वेत और श्याम के बीच जो स्लेटी रंग होता है या दूसरे शब्दों में इस पार और उस पार के बीच जो जमीन होती है, उसे नहीं मानते थे। उन्होंने कई बार आपसी बातचीत में मुझसे कहा भी कि मैं तो आदिवासी हूं। सीधी-सीधी बात ही समझता और करता हूं। उनका यह कथन कितना स्वीकार योग्य था, यह पाठक तय करें।

बहरहाल, जोगीजी ने मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद से ही एक ऐसी टीम बनाने पर ध्यान दिया जो पूरी तरह उनके प्रति समर्पित हो, वहीं जिन्हें वे अपना नहीं समझते थे उन्हें काटने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी।

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन होना था तो अध्यक्ष पद के लिए उन्हें दुर्ग के रामानुजलाल यादव सबसे बेहतर व्यक्ति नजर आए और जब राज्यसभा के लिए प्रत्याशी चयन करना था तो बिलासपुर के रामाधार कश्यप का नाम तय हो गया।

कहने की जरूरत नहीं कि कांग्रेस पार्टी को इनसे कितना लाभ हुआ। दूसरी ओर देखें तो युवा मंत्री भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री ने अपने साथ संबद्ध करने के बावजूद उन पर विश्वास नहीं किया। इसी तरह टी.एस. सिंहदेव को राज्य वित्त आयोग का अध्यक्ष तो बनाया, लेकिन उनके घर अंबिकापुर में ही उनकी सार्वजनिक रूप से आलोचना करने से परहेज नहीं किया।

श्री जोगी ने राजनीति से इतर भी अपना निजी प्रभाव क्षेत्र तैयार करने में यही नीति अपनाई। कतिपय उदाहरणों से बात स्पष्ट होगी।

उन्होंने एक सराहनीय निर्णय लिया कि प्रदेश की पंचायतों के अंतर्गत राजीव गांधी ग्रामीण पुस्तकालय स्थापित किए जाएं। इस हेतु एक तीन सदस्यीय पुस्तक चयन समिति गठित की गई जिसके एक सदस्य की संघ से प्रतिबद्धता जगजाहिर थी। इसी तरह 2001 में शासन द्वारा स्थापित विभिन्न पुरस्कारों के लिए पृथक-पृथक जूरियों का गठन हुआ। इसमें भी एक जूरी में संघ के एक पुराने कार्यकर्ता सदस्य बनाए गए। उनके कारण कांग्रेस राज में एक पुरस्कार संघ के ही एक कार्यकर्ता को दे दिया गया। ऐसा तो नहीं कि मुख्यमंत्री इन दोनों सज्जनों के राजनीतिक रुझान से अपरिचित थे, फिर भी इन्हें अपनी योजनाओं में शामिल कर वे क्या संदेश देना चाहते थे? क्या यह सहज उदारता थी? क्या वे इनके अनुभवों का लाभ लेना चाहते थे? या फिर वे मौका आने पर कांग्रेस से परे जाकर अपनी राजनीति को आकार देना चाहते थे? (अगले सप्ताह जारी)

ललित सुरजन

टीप : यह आलेख पूर्व लिखित है और मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित है। अभी कुछ हफ़्तों तक इस आलेख की कड़ियां देशबन्धु में प्रकाशित होती रहेंगी।

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