काशी विश्वनाथ कॉरिडोर : मोदी के हिंदुत्व पर अखिलेश के ‘हिन्दू’ की बढ़त

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर : मोदी के हिंदुत्व पर अखिलेश के ‘हिन्दू’ की बढ़त

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर को अखिलेश यादव ने बनाया ‘हिंदुत्व बनाम हिन्दू’

इस लेख में वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र प्रसाद चर्चा कर रहे हैं कि किस तरह उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए हर दिन और मुश्किल होता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताबड़तोड़ रैलियां, एक्सप्रेसवे, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन और गंगा में पीएम की डुबकी जैसे टोटके भाजपा के काम नहीं आ रहे हैं। एक ओर जहां किसान आंदोलन ने भाजपा के विरुद्ध जनमत तैयार किया है वहीं काशी विश्वनाथ कॉरिडोर पर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने इसे ‘हिंदुत्व बनाम हिन्दू‘ बना दिया है जिसमें अखिलेश यादव का हिन्दू मोदीजी के हिंदुत्व पर भारी पड़ रहा है.. पढ़ें और शेयर करें

भाजपा के लिए यह चुनाव निश्चय ही एक कठिन चुनाव है और इसे जीतने के लिए ही काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन उस समय किया गया, जबकि यह अभी तक पूरा भी नहीं हुआ है। इसे कॉरिडोर के प्रथम फेज का उद्घाटन कहा जा रहा है। जाहिर है, कॉरिडोर का पूरा काम होना अभी बाकी है। इस उद्घाटन के द्वारा भाजपा योगी सरकार को एक सफल सरकार बताने और दिखाने की कोशिश कर रही है। वह अयोध्या को भी अपनी उपलब्धि बता रही है। बहुत ही तामझाम और धूम-धड़ाके के साथ बनारस में बहुचर्चित काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन (Kashi Vishwanath Corridor inaugurated) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले 13 दिसंबर को किया। यह आयोजन बनारस में हुआ, लेकिन इसमें पूरे देश और खासकर पूरे उत्तर प्रदेश को डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से शामिल करने की कोशिश की गई। कहने को तो यह एक धार्मिक आयोजन था, लेकिन इसका मकसद पूरी तरह से राजनैतिक ही था और तात्कालिक मकसद आगामी कुछ महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election 2022) में भाजपा को जीत दिलाना था।

क्या पीएम मोदी यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में भाजपा को जीत दिला पाएंगे?

सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने इस मकसद में कामयाब हो पाएंगे? पश्चिम बंगाल चुनाव (west bengal election 2021) में लाख जतन लगाने के बावजूद भी उनकी पार्टी हार गई और उसके बाद हुए उपचुनावों में भी उसका स्थिति अच्छी नहीं रही। फिलहाल हिन्दी प्रदेश उसके लिए ज्यादा मायने रखते हैं, लेकिन हिन्दी प्रदेशों में ही भाजपा की सबसे खराब हालत रही।

भाजपा के लिए नकारात्मक है उपचुनावों का संदेश

हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में तो भाजपा के उम्मीदवारों की सबसे ज्यादा दुर्गति हुई और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश तो हिन्दी का हृदय प्रदेश है (Uttar Pradesh is the heart state of Hindi)। यदि आसपास के इलाकों में हुए उपचुनाव का कोई संदेश है, तो वह भाजपा के लिए नकारात्मक ही है।

बहुत मुश्किल है यूपी में भाजपा की जीत

महंगाई, बेरोजगारी, किसान असंतोष बगैरह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को अत्यंत कठिन बना दिया है। किसानों के बढ़ते असंतोष को थामने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीनों विवादास्पद कानूनों को वापस ले लिए। तीन कृषि कानूनों को वापस नहीं लेने का राजहठ नरेन्द्र मोदी का था, लेकिन चुनाव जीतने का मोह राजहठ पर भारी पड़ा और मोदीजी ने उसे अपने अंदाज में वापस ले लिया, लेकिन किसान आंदोलन के कारण जो असंतोष पैदा हुआ (The discontent that arose due to the peasant movement) था, वह अभी भी समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। यह मोदी और उनकी भाजपा के लिए सबसे ज्यादा चिंता का कारण है। देखने से तो लगता है कि यह आंदोलन सिर्फ पश्चिम उत्तर प्रदेश तक ही सीमित था, लेकिन सच कहा जाय, तो इसका असर पूरे उत्तर प्रदेश पर था।

क्या कहती है अखिलेश यादव की सभाओं में उमड़ती भीड़?

अखिलेश यादव की सभाओं में उमड़ती भीड़ (Crowds gathered in the meetings of Akhilesh Yadav) भी भाजपा के लिए चिंता का सबब है। प्रतिपक्ष के मुख्य नेता और मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार अखिलेश अभी विजय यात्रा पर निकले हुए हैं। यात्रा के दौरान उन्हें भारी जनसमर्थन तो मिल ही रहा है, बीच-बीच में होने वाली सभाओं में जुटी भीड़ भी अपूर्व और अप्रत्याशित है। लोग वहां लाए नहीं जा रहे हैं, बल्कि खुद आ रहे हैं। जिन इलाकों में अखिलेश की जाति के लोगों की आबादी नहीं है, वहां भी लोग भारी संख्या में उन्हें देखने और सुनने को उमड़ रहे हैं। इसका मतलब है कि अखिलेश यादव का समर्थन उनकी जाति तक सीमित नहीं रह गया है। समाज के अधिकांश तबकों में उनके समर्थन का आधार बढ़ता चला गया है।

मुकाबला आमने सामने का होने लगा है

भारतीय जनता पार्टी के लिए चिंता (Concern for Bharatiya Janata Party) की एक बात यह भी है कि मुकाबला वहां लगभग आमने सामने का होता जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति पिछले कुछ दशकों से त्रिकोणीय संघर्ष वाली रही है। भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बसपा मुख्य राजनैतिक ताकतें रही हैं, लेकिन इस बार बहुजन समाज पार्टी पर लगभग पूरी तरह ग्रहण लग गया है और मुकाबला भाजपा और सपा के बीच तक सीमित होता जा रहा है। तीन तरफा मुकाबला सत्तारूढ़ दल के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है, क्योंकि सत्ताविरोधी फ्लोटिंग मतदाता (anti-incumbency floating voter) दो खेमे में बंट जाते हैं, लेकिन जब मुकाबला आमने सामने का होता है, तो सत्ता विरोधी फ्लोटिंग मतदाता सामने की विपक्षी पार्टी की ओर ध्रुवीकृत हो जाता है। इसका लाभ अखिलेश यादव को मिल रहा है।

क्या अभी भी मायावती उत्तर प्रदेश में राजनैतिक ताकत हैं?

मायावती अब उत्तर प्रदेश की राजनैतिक ताकत नहीं रह गई हैं। उनका समर्थन आधार सिर्फ उनकी जाति तक सिमटकर रह गया है। उसके बाहर उनके प्रति समर्थन का कोई भाव नहीं रहा है। यह सच है कि मायावती की जाति (Mayawati’s caste) प्रदेश में सबसे अधिक आबादी वाली जाति है, लेकिन उसका प्रतिशत मात्र 12 ही है। ध्रुवीकरण की स्थिति में पूरे 12 प्रतिशत लोग उनको मत देंगे, इसमें भी शक है। जो घोर भाजपा विरोधी हैं, वे सपा में चले जाएंगे और जो घोर सपा विरोधी हैं वे भाजपा में चले जाएंगे। इसलिए हो सकता है, मायावती को इस बार 10 फीसदी वोट भी नहीं मिले और उनकी पार्टी अपने इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन इस बार दर्ज करे।

यूपी विधानसभा चुनाव 2022 : भाजपा के लिए कठिन चुनाव

बहरहाल हम बात भाजपा की कर रहे हैं। भाजपा के लिए यह चुनाव निश्चय ही एक कठिन चुनाव है और इसे जीतने के लिए ही काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन उस समय किया गया, जबकि यह अभी तक पूरा भी नहीं हुआ है। इसे कॉरिडोर के प्रथम फेज का उद्घाटन कहा जा रहा है। जाहिर है, कॉरिडोर का पूरा काम होना अभी बाकी है। इस उद्घाटन के द्वारा भाजपा योगी सरकार को एक सफल सरकार बताने और दिखाने की कोशिश कर रही है। वह अयोध्या को भी अपनी उपलब्धि बता रही है, लेकिन अभी वहां काम जारी है और उससे संबंधित कोई इवेंट भाजपा आयोजित नहीं कर सकती, जबकि इसकी राजनीति इवेंट मैनेजमेंट के आधार पर चलती है और इवेंट मैनेज करना का मौका उसके बनारस में मिला है।

अखिलेश यादव को भी पता है कि इस तरह के आयोजनों का असर मतदाताओं के दिमाग पर पड़ता है। हिन्दू धार्मिकता का चैंपियन खुद को बताकर भाजपा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। इसलिए अखिलेश यादव भी इस कॉरिडोर का श्रेय लेने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं। वे कह रहे हैं कि इस कॉरिडोर की परिकल्पना उनकी सरकार के समय में हुई थी और उसके लिए उन्होंने अनुमति भी प्रदान कर दी थी। सरकार बदल जाने के कारण वे आगे कुछ कर नहीं पाए। अब वह कह रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी की योगी सरकार ने उनके ही द्वारा शुरू किए गए कार्य को आगे बढ़ाया है, इसलिए इस कॉरिडोर के श्रेय के असली हकदार वे खुद हैं न कि योगी और मोदी।

इसके पहले पूर्वाचल एक्सप्रेस वे के उद्घाटन (Inauguration of Poorvanchal Expressway) के समय भी उन्होंने इसी तरह की बात की थी। वे अपनी बातों के समर्थन में दस्तावेजी सबूत भी जारी कर रहे हैं।

अखिलेश के दावों का भाजपा के पास कोई जवाब नहीं

जाहिर है कि अखिलेश के दावों के कारण भारतीय जनता पार्टी हिन्दू हितों की एक मात्र अलंबरदार पार्टी अपने को बनाने में विफल हो गई है। अखिलेश के दावों का उसके पास कोई जवाब नहीं। बस वह यही कह रही है कि पहले उन्होंने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बारे में लोगों को क्यों नहीं बताया?

लोहिया की पुस्तक हिन्दू बनाम हिन्दूकी याद दिलाती है यह लड़ाई

यानि इस कॉरिडोर पर हिन्दू बनाम हिन्दू की लड़ाई चल रही है। यह लड़ाई हमें लोहिया की पुस्तक ‘हिन्दू बनाम हिन्दू’ की याद दिला देता है, जिसके अनुसार भारत में हजारों साल से हिन्दू बनाम हिन्दू का संघर्ष चल रहा है और आने वाले दिनों में भी यह संघर्ष चलता रहेगा।

उपेन्द्र प्रसाद

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