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इंसान ईमानदार हो तो उसके गाने में तासीर पैदा होती है : यथार्थबोध से उपजी एक जुझारू आवाज़ बेग़म अख़्तर

आबिदा परवीन की दुनियावी भरम से मुक्ति की आवाज़ और किशोरी अमोनकर का कुलीन, पवित्र और स्थिर स्वर.. दोनों छोरों को अतिक्रमित करती यथार्थबोध से उपजी एक जुझारू आवाज़ बेग़म अख़्तर की!

बेग़म अख़्तर पर बारहा लिखने का मन हुआ करता था लेकिन ‘और फिर तल्ख़िए एहसास ने दिल तोड़ दिया’ जैसा हाल हो गया। कमउमरी में उन्हें सिर्फ़ उनकी मक़बूलियत के कारण सुना था इसलिए ज़हन और ज़िन्दगी पर उनका कोई ख़ास असर न पड़ा।

थोड़ा संगीत सीखा तो है! संगीत मर्मज्ञ नहीं हूं लेकिन बहुत बाद में लगातार और बार-बार अख़्तरी को सुनते हुए सबसे पहले उनके बारे में यह मिथ टूटा कि वे मख़मली और जादुई आवाज़ की मल्लिका हैं! न मुझे वे जादुई लगती हैं न मख़मली! मेरे व्यक्तिगत सुनने में वे मुझे लगभग रूखी लगती हैं!!

वे गंवई तीखी दुपहरी की गायिका हैं। उनकी गायिकी में मुझे कभी सम्मोहक किस्म का सुकून और आराम नहीं मिला! मिला एक कठोर यथार्थबोध। कोठे और बैठकी के ख़्याल और ग़ज़ल गायिकी में ही नहीं लुभावनी अदाकारियों वाली ठुमरियों और दादरे तक में वे अपनी आवाज़ से अपने दिल के इर्द-गिर्द जैसे एक किला बनाती हैं। उनकी गायिकी सुनने वाले के दिल में खिंचती है लेकिन उनके दिल तक पहुँचने का रास्ता रोक देती है।

बेग़म अख़्तर के समकाल और उनके आगे तलक भी बैठकी की लुभावनी गायिकी इस तरह यथार्थबोध से टकराती नज़र नहीं आती। आज भी नहीं। कलात्मक गंभीरता और पवित्रता किशोरी अमोनकर में है। एक साफ़ और गरिमामयी आवाज़! किशोरी अमोनकर गहरे में माँ लगती हैं।

विविधता के आधार पर दूसरे छोर पर मैं आबिदा परवीन को देखती हूँ! सूफ़ियाने फ़लसफ़े से दुनयावी भरम को तोड़ने की मुक्त आवाज़!

बेग़म अख़्तर की आवाज़ यह दोनों न हो सकी। जिस ज़मीन पर वे खड़ी थीं वहाँ वे सूफ़ियाना रास्ते से पलायन नहीं कर सकती थीं और जिस दुनिया मे वे जी रही थीं वह कला का क्षेत्र होकर भी प्रतिष्ठित नहीं माना जाता था इसलिए सम्भ्रांत पवित्रतावाद भी उनके इर्द-गिर्द नहीं टिकता था। उन्होंने खड़ी बैठकी तक की भी प्रस्तुतियां दी। खड़ी बैठकी में नृत्य की भंगिमा के साथ सुनने वालों तक घूम घूम कर गायन पेश किया जाता था। वे न ही सूफ़ी मुक्त हो सकती थीं न ही एलीट शुचितावादी! कठोर जीवन की ज़मीन पर रिश्तेदारों और उनकी बच्चियों के परवरिश की ज़िम्मेदारी थी उन पर।

Akhtari Bai Faizabadi, also known as Begum Akhtar

अपनी माँ मुश्तरी बाई का रूपांतरित जीवन अख़्तरी बाई ने जिया। मां-बेटी में जाने कौन रिश्ता था कि मुश्तरी की मौत के बाद बेग़म अख़्तर दर्द और नशे के इंजेक्शन लेने लगीं। कहा जाता है कि उनके लिए बड़े बड़े आलीशान लोगों के प्रेम-प्रस्ताव आते रहे। वे जीवन को मज़े में देखतीं रहीं और हँसती रहीं, गाती रहीं क्योंकि जानती थीं कि यह प्रेम नहीं है। ये आलीशान लोग उन्हें अपनी कोठियों में एक नगीने की मानिंद सजावटी पत्थर की तरह सजाना चाहते हैं। उन्होंने किसी की दूसरी, तीसरी या चौथी बीवी बनना स्वीकार नहीं किया। बाद में किन्हीं विधुर वकील साहब से उन्होंने शादी की लेकिन अपनी स्वतंत्र तबीयत की वजह से परिवार में वह रह न पायीं।

गायिकी की खोज, दोस्ताने, महफिलें और शराब-सिगरेट की लत ने उन्हें सांसारिक स्थिरता न दी। परिवार में रहकर वे जान गईं कि स्वतंत्र-चेतना की क़ीमत देनी होती है।

कहीं कभी पढा था और यूट्यूब पर देखा है कि 13 साल की उम्र में बेग़म अख़्तर के साथ किसी राजा ने ज़बरदस्ती की। रेप अटेम्प्ट किया और उस छोटी उम्र में ही उन्हें एक बेटी हुई लेकिन बहुत बाद तक बेग़म उस बच्ची को अपनी बहन बताती रहीं। आधिकारिक रूप से इस घटना की कोई पुष्टि नहीं मिलती।

यतीन्द्र मिश्र द्वारा संपादित किताब ‘अख़्तरी: सोज़ और साज़ का अफ़साना’ में कुछ पुराने गुणीजनों के लेख हैं। वहां भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। उनके जीवन पर आधारित दूरदर्शन के कार्यक्रमों और विविध भारती के आर्काइव्स में भी कोई उल्लेख नहीं है। क

हना चाहती हूँ कि यदि यह घटना सत्य है तो यतीन्द्र मिश्र जी के संपादकीय या लेख में या कहीं तो इसका उल्लेख होना चाहिए और यदि यह घटना निर्मूल है तो यूट्यूब और ऐसे दूसरे माध्यमों पर एक आपत्ति नोट भेजी जाना चाहिए। यह यतीन्द्र जी को देखना चाहिए।

बेग़म अख़्तर का जीवन कठोर तरीके से बदल गया। रियाज़ी तो वे थीं लेकिन पारम्परिक बनावटी रियाज़ उन्होंने कभी नहीं किया।

अर्से बाद किसी फ़नकार से गायिकी की इतनी सच्ची और कसी हुई परिभाषा सुनी कि गायिकी के लिए रियाज़ से ज़्यादा ज़रूरी चीज़ ‘तासीर’ और ‘सचाई’ है। बेग़म कहती हैं ‘इंसान ईमानदार हो तो उसके गाने में तासीर पैदा होती है।गाने पर असर ईमान से पड़ता है।सच बोलने, मेहनत करने, दिल पर बोझ न रखने और दिल मे सफ़ाई रखने से सुर सच्चे लगते हैं और आवाज़ खुलती है।’

Begum Akhtar Ghazals
डॉ वन्दना चौबे (DR. vandana choubey) युवा कवि एवं समीक्षक.  बनारस के दो सौ वर्षों के रचनात्मक इतिहास का बेहद पठनीय उपन्यास 'बहती गंगा' पर आधारित शिल्पायन प्रकाशन से संदर्भ-पुस्तक 'बहती गंगा में काशी'  में प्रकाशित। आलोचना, प्रगतिशील वसुधा, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, बनास जन,संबोधन,अपूर्वा जैसी देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख एवं लिए गए साक्षात्कार।  फ़िलहाल आर्य महिला पी.जी.कॉलेज (सम्बद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत।
डॉ वन्दना चौबे (DR. vandana choubey)
युवा कवि एवं समीक्षक.
बनारस के दो सौ वर्षों के रचनात्मक इतिहास का बेहद पठनीय उपन्यास ‘बहती गंगा’ पर आधारित शिल्पायन प्रकाशन से संदर्भ-पुस्तक ‘बहती गंगा में काशी’ में प्रकाशित।
आलोचना, प्रगतिशील वसुधा, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, बनास जन,संबोधन,अपूर्वा जैसी देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख एवं लिए गए साक्षात्कार।
फ़िलहाल आर्य महिला पी.जी.कॉलेज (सम्बद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत।

 अपने सुनने-समझने के आधार पर मेरा यह व्यक्तिगत मानना है कि बेग़म अख़्तर ख़रज और ‘गमक’ तो लेती हैं लेकिन ‘मीड़’ उनकी गायिकी में बेहद कम है और यह मुझे मुग्ध करता है।छोटी छोटी मीड़ लेती हैं। लम्बी मीड़ लगाना सब पर अच्छा नहीं लगता। उसमें बनावटी होने का ख़तरा रहता है। बेग़म की गायिकी में ‘मीड़’ उनके गले की ख़राश और ख़लिश है। ग़ालिब की ज़बाँ में ‘ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता’।

इस ख़लिश को बरक़रार रखने के लिए दर्द को बेग़म ने लाइलाज किया। गाती हुई वे अद्भुत ढंग से स्वाभाविक होती हैं। दुनियावी आत्मस्थ!

उनके गाए दादरों के बोल एक ओर लुभावने और दूसरी ओर विरही हैं। किसी और गले में ज़रा सी असावधानी से वे सस्ती-लोकप्रियता में तब्दील हो सकती थीं।

बेग़म ने ग़ज़लों में ही नहीं.. ठुमरी-दादरे में विरह की पुकार में दर्प और मनोरंजक आस्वादन वाले आकर्षक बंदिशों में अपनी गायिकी के बल पर गंभीरता भरी है। ऐसी गम्भीरता जो एक ख़ास किस्म के कलावाद से अलग है। एक दादरा जिसे सैकड़ों बार सुना है!

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मोर बलमुआ परदेसिया मोर

सैकड़ों बार सुना ..सिर्फ़ ‘परदेसिया’ और ‘मोर’ के बीच लगने वाले सुर के लिए।

सिर्फ़ इसी सुर पर ठेठ ‘लोक’ रूपाकार लेता है। जी भर देता है।

बेग़म ने कला के लिए ‘उस्तादी’ मेहनत नहीं की इसलिए ऊपरी सुर लगाने में उनका गला टूटता था.. आवाज़ ख़राश देती थी लेकिन ऐसे शास्त्रीय दोषों की चिंता उन्होंने नहीं की। छोटी बहरें वे ख़ूब मन से गाती हैं। आज तो ‘ख़राश’ एक ग्लैमर बन चुका है। सोच-समझकर ख़राश बनाई जाती है लेकिन बेग़म के समय यह बड़ा दुर्गुण था।बाद में इसी ख़राश उन्हें मौलिकता दी।

दीवाना बनाना है दीवाना बना देग़ज़ल में गले की टूट और ख़राश सुनने बड़े बड़े गुणी आते थे और उनके मुरीद होते थे।

भावना में बहते हुए भरे मन को एक आंतरिक गाढ़ापन बेग़म को सुनकर मिल सकता है। इस स्तर पर व्यक्तिगत रूप से मुझे ऐसा कठोर, निस्संग और निर्लिप्त सुकून बहुत कम गायिकी में मिला है।

वैचारिक गायिकी है बेग़म अख्तर की गायिकी

बेग़म अख़्तर की आवाज़ में कलावादी सम्मोहन नहीं है जो आपको बेवजह बहा ले जाए। भावना के साथ वह ख़ुद में रहने का एक निस्संग सम्बल देती है। इसलिए बेग़म को सुनते हुए भौतिक तौर पर रोना मुश्किल है। उनकी आवाज़ भीतर स्थिर करती है। तकलीफ़ देती हुई जैसे धूप में खड़ा रखकर मज़बूत बनाती है। बहलाती और पुचकारती नहीं है। भटकाती तो बिल्कुल नहीं। इस अर्थ में बेग़म अख्तर की गायिकी वैचारिक गायिकी है।

कठोर उत्तर भारतीय पितृसत्ता के शिकंजे में कोठी की गायिकी कला को इस दर्ज़े पर पहुँचाना उन्हें भारत दुर्लभ उस्तादों की श्रेणी में खड़ा करता है।

डॉ. वंदना चौबे

 (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

 

Akhtari Bai Faizabadi, also known as Begum Akhtar, was an Indian actress and singer. Dubbed “Mallika-e-Ghazal”, she is regarded as one of the greatest singers of ghazal, dadra, and thumri genres of Hindustani classical music. Wikipedia

Born: 7 October 1914, Bhadarsa

Died: 30 October 1974, Ahmedabad

Spouse: Ishtiaq Ahmed Abbasi (m. 1945–1974)

Albums: Aye Mohabbat Tere Anjaam Pe Rona Aaya, MORE

Awards: Padma Shri, Padma Bhushan, Sangeet Natak Akademi Award for Hindustani Music – Vocal

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