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Albert Camus

अल्बेयर कामू के तर्क बिखरे हुए ज़रूर थे लेकिन व्यावहारिक थे

अल्बेयर कामू जैसे निर्मम राजनैतिक चिन्तक को सार्त्र ने अपना पिछलग्गू अस्तित्ववादी लेखक बना दिया…….

कलावादी यहाँ तक कि मनोवैज्ञानिक-कुंठाओं का फ्रायडीय लेखक बना दिया….

 “हर नयी क्रांति सत्ता के नाम पर दमन का नये से नया मुखौटा लगाकर खड़ी हो जाती है जो आम आदमी के ख़िलाफ़ जाता है.”——–कामू

अल्बेयर कामू की यह घोषणा (Albert Camus Quotes) थी लगभग.तब जब यूरोप की नयी नींव पड़ रही थी. इस घोषणा ने उन्हें दक्षिणपंथियों के निशाने पर रख दिया लेकिन वामपंथ ने इसी घोषणा के चलते कामू के विचारों की हत्या कर दी. कामू कभी भी दलगत होकर स्थिर काम नहीं कर सके. वे हमेशा प्रश्नों और परेशानियों में रहे इसीलिए अपने युग के सबसे महान लेखकों के बीच भी वे शून्यता और अकेलेपन से जूझते रहे.

प्रभा खेतान कहतीं हैं कि “कामू राजनैतिक संस्कृति का शिकार हुए.”

पाब्लो, लोर्का, ब्रेख्त, मायकोवस्की जैसे अनेक लेखक इस राजनीति के शिकार हुए लेकिन कामू इन सभी लेखकों में अकेलेपन का सबसे धीमा और भितरघाती शिकार बने.

फ़िदेल कास्त्रो, चे ग्वेरा और सार्त्र सीधे तौर पर राजनीति में सक्रिय रहे और आन्दोलन के स्तर पर काम करते थे. पाब्लो नेरुदा तो ख़ुद ही राजदूत थे. कवि होते हुए भी वे राजनीति के पलटवारों को समझते थे.

कामू नारेबाजी वाला आन्दोलन न कर सके न सत्ता के सीधे संपर्क में वे टिक सके. बहुत कम उम्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बावजूद तत्कालीन राजनीतिक विचारधारा की साझीदारी से कामू को बेदख़ल कर दिया गया. उन्होंने अपने समाज के लिए संगठन से जुड़कर नहीं बल्कि अपने लेखन और व्यक्तिगत प्रतिबद्धता के आधार पर काम किया और धीरे-धीरे विशवास बनाया. उन्होंने अपनी ही नस्ल के फ्रेंच-अल्जीरियन बुद्धिजीवियों को अरब आतंकवाद का कारण बताया और निर्भीक होकर अल्जिरीयाँ राष्ट्रवादियों को जवाब देते रहे.

संगठनों ने उन पर निहलिस्ट, फ़ासीवादी, आत्महंता और व्यक्तिवादी होने के आरोप लगाए. एक लेखक, पत्रकार,चिन्तक और नाट्य-निर्देशक के रूप में प्रभा खेतान ने बड़ी शिद्दत और आत्मीयता से उनका अनुवाद करते हुए बुद्धिजीवियों द्वारा उन्हें ना समझने का सवाल उठाया है.

पश्चिम के ऐसे अनेक लेखक-विचारक हैं जिन्हें मौजूदा पूंजीवादी-राष्ट्रवाद को समझने के लिए ज़रूर पढना चाहिए. सुपठित फासीवादीयों ने पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान की घृणास्पद आलोचना इन कारणों से भी की है.

कामू ने घोषित रूप से मार्क्सवाद की सदस्यता ली थी लेकिन मार्क्स-एंगेल्स को पढ़े बिना बहुत खुले तौर पर व्यावहारिक और अनुभूत बात कह देते थे. मार्क्स को पढ़कर भी वे पार्टी की नीतियों के अनुसार नहीं बन सके. ’दि रिबेल’ किताब में तो वे मार्क्स से सीधे मुख़ातिब होते हैं. कामू के तर्क बिखरे हुए ज़रूर थे लेकिन व्यवहारिक थे इसीलिए किसी सैद्धांतिक पार्टीबद्धता में उनका मन नहीं लगा. दरअसल वे स्वभाव से पार्टीबद्ध व्यक्ति थे ही नहीं. संभवतः इसी कारण वे अल्जीरिया के श्रमिकों और आदिवासी-मुसलमानों के साथ दिली रिश्ता क़ायम कर सके.

अल्जीरिया में राजनैतिक अव्यवस्था (Political chaos in Algeria) के दौरान कामू की व्यक्तिगत/लेखकीय प्रतिबद्धता के कारण ही वहां के मुसलमान अपने राजनैतिक हक़-हूक़ूक के लिए जुटना शुरू हुए.

अल्जीरिया के समावेशन के दौरान उन्होंने मुसलमानों और श्रमिकों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया और अपनी पार्टी को अपने समय की गज़ालत से ऊपर उठने का आहवान किया. लेकिन सार्त्र ने हमेशा ही उन पर निर्णायक/नियंत्रक होने का आरोप लगाकर उनके लेखन और सोच को ख़ारिज कर दिया.

कामू की ग़रीबी और उनकी कमुनिस्ट सोच पर व्यक्तिगत आक्षेप करते रहे. नोबेल पुरस्कार स्वीकृति पर भी सार्त्र ने उन पर संवेदनशील व्यक्तिगत आक्षेप लगाये.

नोबेल पुरस्कार के स्वीकार के पीछे कामू का बहुत तार्किक बोध था. उन्होंने कहा कि मैं यह पुरस्कार इसलिए लेता हूँ कि अल्जीरिया के लिए इतना महत्वपूर्ण यह पहला पुरस्कार है. यह अल्जीरिया में बुद्धिजीवियों को ले आएगा और अल्जीरिया एक दिन बुद्धिजीवियों की राजधानी होगी.

सार्त्र के अस्वीकार के पीछे प्रतिबद्धता से ज़्यादा संभवतः बुर्जुवा लेखकीय अहंकार काम कर रहा था. सार्त्र की हैसियत बहुत बड़ी थी. यह वह समय था जब बुद्धिजीवियों में सार्त्र का सम्मोहन ज़बरदस्त था. लेनिन सहित लगभग हर बड़ा बुद्धिजीवी सार्त्र के साथ खड़ा था. सार्त्र की बात उनके विरोधी भी मानने को विवश होते थे. सार्त्र ने अपने व्यक्तिवादी अस्तित्ववाद का दायरा अपने बुर्जुवा प्रभा-मंडल से अधिक सम्मोहक और प्रभावशाली बना दिया और और कामू के ‘व्यापक व्यक्तिवाद’ जिसका मूल सामाजिक था उसे मनोविज्ञानिक-कुंठा के रूप में प्रस्तुत कर उसका प्रभाव बिखरा दिया.

भारत की मिश्रित अर्थ-व्यवस्था (India’s mixed economy) ने कहीं न कहीं हमें एकबारगी गिरने से बचाया लेकिन यूरोप और तीसरी दुनिया के देशों ने आक्रामक पूँजीवाद का बहुत विद्रूप चेहरा देखा है. युद्धों के निशान आज भी पश्चिम के भरे नहीं हैं और अब तो अस्थिर-तकनीक और और ‘आवारा पूँजी’ का बहुत उर्वर समय है. वह इतिहास,संस्कृति-साहित्य को कुचलने का मुखर समय था; यह हथियाने-हड़पने की कन्विंसड अनुकूलन की व्यवस्था है. यूरोप की तुलना में भारत ने यह सब कम झेला है.

इस सन्दर्भ में अपने आज को समझने के लिए हमें भारतीय लेखकों की अपेक्षा पश्चिम के प्रारम्भिक पूँजीवाद के दौर के लेखकों/विचारकों को पुनः पढ़ना चाहिए. इन लेखकों ने उग्र-पंथों और विचारधाराओं के लिए बड़े निर्मम आत्म-विश्लेषण की बात की है. फ़िदेल कास्त्रो ने भी जो सीधे-सीधे राजनीति से जुड़े हुए हैं.. पाब्लो नेरुदा कवि के साथ स्वयं राजदूत थे. कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़कर भी अपनी विचारों के प्रति सजग रहे. लोर्का और तमाम विचारकों ने भी गहरे आत्म-विश्लेषण की बात की है.. अपनी पार्टी के प्रति पूर्वग्रह-रहित होकर खिन्न होने की हद तक ये लेखक अपने अंतर्विरोधों पर बात करते रहे और तत्कालीन चपेट की प्रतिक्रियाओं से दूर रहे.

इन लेखकों को पढ़कर बहुत सी बुनियादी चिंताएं साफ़ होतीं हैं.

यह जान लीजिये कि ‘हम लड़ेंगे साथी’ वाला ज़माना नहीं है. वह समय था जब दुश्मन बहुत ‘लाऊड’ दिखा करते थे. अब यह तय करना कठिन है कि दरअसल आप को लड़ना किससे है! उस समय चार्ली चैप्लिन की तमाम फ़िल्मों को देखें तो उसके मूल में अनियंत्रित पूँजी से उपजी मर्मान्तक भूख के चित्रांकन सबसे पहले हैं, मुखर भी और प्रतीकात्मक भी. चार्ली का ख़ुद का जीवन भी भूख में बीता है जिसने उनकी ‘हँसोड़’ लगने वाली फ़िल्मों की तह में भूख की ख़ामोश क्रूरता का चित्रांकन किया है. इसे दर्शाने के लिए उन्होंने फ़िल्में मूक बनायीं लेकिन समूची फ़िल्म को वायलिन का मर्मभेदी लय से बिद्ध कर दिया. यह दर्द चार्ली की व्यक्तिगत ज़िन्दगी से ही वाबस्ता नहीं है बल्कि समूचे यूरोप का हाल बयाँ करता है. ‘The Modrern Times’, ‘दि डिक्टेटर’ ऐसे समय में ज़िम्मेदारी से देखने लायक फ़िल्में हैं. बावजूद इसके यह कहा जा सकता है कि वह समय पूँजी की उस गिरफ़्त में नहीं था जिस तरह आज है.

The differences between Kamu and Sartre

कामू और सार्त्र के आपसी मतभेदों ने तत्कालीन दक्षिणपंथ की नींव बहुत मज़बूत कर दी.

अंततः भयावह तपेदिक और अकेलेपन में कामू ने ‘दि फ़ॉल’ नाम का आत्मपरक उपन्यास लिखा और तमाम बुद्दिजीवियों का ध्यान उनकी तरफ केन्द्रित हुआ. सार्त्र का भी.

सार्त्र ने कामू की उद्घोषणा हंगरी की सड़कों पर घटित होते देखा. पहली बार सार्त्र पश्चाताप से घिर गये. सिमोन दि बोउवार ‘दि फॉल’ पढ़कर रो पड़ीं. ”हंगरी में तानाशाही उद्भूत गृहयुद्ध की स्थति में एक लेखक-संगठन का एक पत्र बहुचर्चित रहा- “ सारी दुनिया के वैज्ञानिकों,लेखकों और कवियों! तुम्हे हंगरी के लेखक पुकार रहे हैं.हमारी अपील सुनो. हम अपने देश को काँटों से घिरा हुआ नहीं देखना चाहते न यूरोप ऐसा चाहता है और न ही ऐसी पराधीनता और दलन को किसी की मानवीय गरिमा स्वीकार कर सकती है. इस अंतिम घड़ी में एक मृत-राष्ट्र के नाम पर हम लेखक तुम्हे संबोधित करते हैं. यह अपील है कामू, मालरो, मंरिंक्य, बर्टेंड रसेल, कार्ल यास्पर, टी.एस. इलियट, कोयसेलर, कज़ान जकिंस, लैक्स्नेस, हर्मन हेस और उन सभी से जो हमारी आत्मा से लगाव रखते हैं. हम चाहते हैं तुम हमारे लिए कुछ करो.”

कामू कि मौत पर सार्त्र ने पूरी दुनिया के सामने कहा-

“वह आदमी था. आदमी का दर्द पहचानता था. आदमी की भाषा में सोचता था .वह ख़ामोश चला गया क्योंकि उसे आसपास आदमी का मुखौटा लगाये शैतान नज़र आ गये थे.

डॉ वन्दना चौबे (DR. vandana choubey) युवा कवि एवं समीक्षक. बनारस के दो सौ वर्षों के रचनात्मक इतिहास का बेहद पठनीय उपन्यास 'बहती गंगा' पर आधारित शिल्पायन प्रकाशन से संदर्भ-पुस्तक 'बहती गंगा में काशी' में प्रकाशित। आलोचना, प्रगतिशील वसुधा, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, बनास जन,संबोधन,अपूर्वा जैसी देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख एवं लिए गए साक्षात्कार। फ़िलहाल आर्य महिला पी.जी.कॉलेज (सम्बद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत। डॉ वन्दना चौबे (DR. vandana choubey)

युवा कवि एवं समीक्षक. बनारस के दो सौ वर्षों के रचनात्मक इतिहास का बेहद पठनीय उपन्यास ‘बहती गंगा’ पर आधारित शिल्पायन प्रकाशन से संदर्भ-पुस्तक ‘बहती गंगा में काशी’ में प्रकाशित। आलोचना, प्रगतिशील वसुधा, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, बनास जन,संबोधन,अपूर्वा जैसी देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख एवं लिए गए साक्षात्कार।

फ़िलहाल आर्य महिला पी.जी.कॉलेज (सम्बद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत।

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