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नयी नीतियां बनाने के साथ वर्तमान नीतियों का क्रियान्‍वयन भी जरूरी : विशेषज्ञ

नयी नीतियां बनाने के साथ वर्तमान नीतियों का क्रियान्‍वयन भी जरूरी : विशेषज्ञ

परिवहन व्यवस्था के विद्युतीकरण पर जोर देते हुए अनुमिता ने कहा के सार्वजनिक परिवहन की बसों के बेड़े में बैटरी से चलने वाली नई बसें शामिल किए जाने को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही वाहनों के विद्युतीकरण के लिए समय बाद लक्ष्य तय किए जाने चाहिए। इसके अलावा वर्ग वार तथा शहरवार योजना बनाकर दोपहिया वाहनों, बसों तथा माल वाहनों का विद्युतीकरण किया जाना चाहिए। स्रोत के स्तर पर कूड़े के पृथक्करण की व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए। खुले में कूड़ा जलाने वालों पर जुर्माने के प्रावधान किए जाने चाहिए।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने महाराष्ट्र सरकार और नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम की साथ-साथ चलती भूमिकाओं के बारे में एक प्रस्तुतीकरण देते हुए आयोजनकर्ताओं का परिचय दिया। उन्‍होंने कहा कि महाराष्ट्र में वायु प्रदूषण का संकट एक राज्यव्यापी समस्या है। वर्ष 2019 में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों के मामले में महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर था। ग्रेटर मुंबई में लघु, मंझोले तथा भारी उद्योग पीएम2.5 का प्रमुख स्रोत हैं। कोयले पर अत्यधिक निर्भरता इसका एक बहुत बड़ा कारण है। नागपुर जिले में 63% औद्योगिक इकाइयां जहरीले प्रदूषण का स्त्रोत हैं। परिवहन क्षेत्र भी पूरे राज्य में प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत है।

Tips to reduce air pollution

 उन्होंने वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सुझाव देते हुए कहा कि अधिक प्रदूषण बड़े शहरों के लिए प्रदूषण नियंत्रण की अलग से योजनाएं बनाई जानी चाहिए। प्रदूषण की मार झेल रहे क्षेत्रों की पहचान कर उनकी समस्या का समाधान किया जाना चाहिये और कृषि, पर्यटन तथा आतिथ्‍य के क्षेत्रों में सरकार तथा उद्योग के बीच संवाद स्थापित किया जाना चाहिये। लैंडफिल मैनेजमेंट के लिए तकनीक का सहारा लिया जाए तथा नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम की योजना तथा उसके क्रियान्वयन के स्तर पर आम नागरिकों की भी सहभागिता सुनिश्चित की जाए।

अर्बन एमिशंस के संस्थापक सरत गुट्टीकुंडा ने महाराष्ट्र की हवा को प्रदूषित कर रहे तत्वों का जिक्र करते हुए कहा कि हम विभिन्न विचार विमर्श और वेबिनार में नई चीजों को करने पर जोर दिया जाता है लेकिन यह जरूरी है कि हम मूलभूत चीजों पर पहले काम करें। हमें हमारे पास जो भी मौजूद है उसे आगे बढ़ाने के लिए बहुत ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं है। हमें पब्लिक ट्रांसपोर्ट, वॉकिंग और साइक्लिंग को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि वाहनों से निकलने वाले धुएं और सड़कों पर उड़ने वाली धूल को कम किया जा सके। इसके अलावा खाना पकाने, ऊष्मा और लाइटिंग के लिए प्रदूषण मुक्त ईंधन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। खुले में कचरा जलाने से रोकने के लिए कचरे का प्रबंधन (waste management) किया जाना चाहिए। निर्माण स्‍थलों तथा सभी औद्योगिक स्थलों पर प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन के नियमन को सख्‍ती से लागू किया जाना चाहिए। प्रदूषण की आशंका वाले हर क्षेत्र को प्रदूषण मुक्त बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। कागज पर तो हमारी तैयारी बहुत पक्की दिखती है लेकिन उसे जमीन पर उतारने के मामले में हम बहुत पीछे हैं।

विशेषज्ञों ने कहा कि वर्ष 2017 और 2019 में वायु प्रदूषण के कारण एक लाख से ज्यादा मौतों के साथ महाराष्ट्र वायु प्रदूषण की वजह से लोगों की मौत की संख्या के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर रहा। इसके अलावा नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (National Clean Air Program) के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central pollution control board) ने वायु प्रदूषण को 30% तक कम करने के लिए चुने गए शहरों में से महाराष्ट्र के सबसे ज्यादा 19 शहरों को शामिल किया है। मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई, नासिक, पुणे, नागपुर, चंद्रपुर और औरंगाबाद जैसे शहरों को नॉन अटेनमेंट नगरों की सूची में शामिल किया गया है इनमें वसई-विरार नगर निगम को हाल ही में जोड़ा गया है। महाराष्ट्र में वायु प्रदूषण के सबसे प्रमुख कारणों में वाहनों तथा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्व, निर्माण कार्यों के दौरान उठने वाली धूल तथा ठोस ईंधन को जलाने से निकलने वाला धुआं शामिल हैं। 

ग्रीन प्लैनेट सोसायटी चंद्रपुर के योगेश दुधपचारे ने चंद्रपुर की वायु की गुणवत्ता पर थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्वों के प्रभाव और उनके समाधान के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि चंद्रपुर में जब थर्मल पावर प्लांट लगा था उस वक्त इसे तरक्की का प्रतीक माना गया था लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसकी वजह से प्रदूषण का स्तर बहुत तेजी से बढ़ा है। यहां का आसमान प्रदूषण के इन स्तरों की गवाही देता है। वर्ष 2008 में जन सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि जब कोई व्यक्ति धूम्रपान करता है तो उसका धुआं नजर आता है लेकिन कोई भी व्यक्ति आसमान की तरफ नहीं देखता जहां पर बिजली संयंत्र से निकल रहा धुआ तैर रहा है। केन्‍द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों  के मुताबिक चंद्रपुर में पीएम2.5 का चरम स्‍तर 1700 पर पहुंच गया था।

 उन्‍होंने कहा 

‘‘चंद्रपुर पर्यावरण संबंधी गंभीर स्थिति से गुजर रहा है। इसकी वजह से आंखों में जलन, दमा और त्वचा संबंधी बीमारियां पैदा हो रही हैं हालात बता रहे हैं कि चंद्रपुर की स्थिति दुनिया के प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में है। यहां जल प्रदूषण और मृदा प्रदूषण की स्थिति भी ठीक नहीं है।’’

मुम्बई रिक्शा चालक यूनियन के कार्यकारी अध्यक्ष फ्रेडरिक डिएसा ने ऑटो तथा टैक्सी चालकों की सेहत पर वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण के प्रभाव के बारे में कहा कि वर्ष 2005 में महाराष्‍ट्र के टैक्सी और रिक्शा चालकों ने अपने रिक्शा और टैक्‍सी को सीएनजी में तब्दील करने पर कुल 700 करोड़ रुपये खर्च किये। अगर ऐसा नहीं करते तो वे रोजी-रोटी का जरिया खत्म हो जाता। महाराष्‍ट्र में इस वक्‍त 35 से 40 लाख लोग रिक्शा और टैक्सी के जरिए जीवन यापन करते हैं लेकिन हम लोगों की दुर्दशा ऐसी है कि कि वायु प्रदूषण चाहे किसी भी तरह से हो, मगर सबसे पहले हम शिकार बन जाते हैं। इसके बाद हम लोगों की जिंदगी बहुत मुश्किल हो जाती है जिसे बयान करना बहुत मुश्किल है। 

उन्‍होंने कहा 

‘‘हम लोगों ने सरकार के सामने अपनी परेशानी रखी है लेकिन अभी तक कुछ हुआ नहीं है और पता नहीं आगे क्या होगा। हम लोग दिन भर लगभग 12 घंटे रोड पर अपनी जिंदगी बिताते हैं। मुंबई का यह हाल है कि टैक्‍सी और ऑटो रिक्‍शाचालक 15 से 20 सिगरेट के बराबर धुआं अपने फेफड़ों में लेता है। सरकार को हमारी समस्‍याओं पर ध्‍यान देना चाहिये।’’

घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन से जुड़े बिलाल खान ने महाराष्ट्र के माहुल में रहने वाले लोगों पर औद्योगिक कारखानों से निकलने वाले प्रदूषण के असर तथा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से जुड़े मामले पर अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि माहुल एक बहुत अनोखा मामला है। यह बेहद कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्‍ठभूमि वाला इलाका है। यहां दो बड़ी रिफाइनरी के उत्सर्जन के कारण आबादी पर बहुत प्रभाव पड़ रहा है। यह इलाका अब लोगों के रहने लायक नहीं रह गया है। वर्ष 1987 में एस. सी. मेहता केस मेहता मामले की उच्‍चतम न्‍यायालय में सुनवाई हुई थी। तब कोर्ट ने कहा था कि औद्योगिक क्षेत्रों और रिहायशी इलाकों के बीच सुरक्षा के लिहाज से एक दूरी होनी चाहिए लेकिन अभी तक इस बारे में कोई भी नीति नहीं बनाई गई है। बाद में एनजीटी ने भी इस विषय पर बहुत विस्तार से गौर किया और महाराष्ट्र सरकार को विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने के निर्देश दिए, मगर इस दिशा में भी कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।

नीरी के निदेशक डॉक्‍टर राकेश कुमार ने महाराष्ट्र के प्रमुख नगरों में वायु प्रदूषण के भार से जुड़े अध्ययनों और सोर्स अपॉर्शनमेंट स्टडी के तथ्यों पर चर्चा करते हुए कहा कि हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि अब कुछ नहीं हो सकता हमारा। भारत बहुत घनी आबादी वाला देश है। मौतों के जो आंकड़े सामने आते हैं, वे काफी जटिल होते हैं। हम देखें तो 80 और 90 के दशक में मुंबई को गैस चैंबर माना जाता था लेकिन पिछले कुछ दशकों के दौरान हालात में काफी सुधार हुआ है। मुंबई में स्थित पावर प्लांट सबसे दक्ष संयंत्रों में गिने जाते हैं। चंद्रपुर की बात करें तो पानी की कमी की वजह से वहां का पावर प्लांट 4 महीने बंद रहा लेकिन फिर भी वहां की हवा की गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं हुआ। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि प्रदूषण कहां से आ रहा है। हम प्रशासनिक सीमाओं में रहकर प्रदूषण का हल नहीं निकाल सकते। अगर हमें कामयाब होना है तो बहुत छोटे-छोटे कदम उठाने होंगे। हमें ढाई-ढाई किलोमीटर या 5-5 किलोमीटर के क्षेत्र में वर्गीकरण करके यह देखना होगा कि प्रदूषण का स्त्रोत कहां पर है। अगर यह काम किया गया तो संबंधित क्षेत्रों के लोगों के अंदर विश्वास बढ़ेगा और वे समस्या के प्रति अधिक गंभीर होंगे।

पलमोकेयर रिसर्च एंड एजुकेशन फाउंडेशन के निदेशक डॉक्‍टर संदीप सालवी ने महाराष्ट्र की जनता की सेहत पर वायु प्रदूषण के प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि वायु प्रदूषण पर पिछले कुछ वर्षों के दौरान ध्यान दिया जाना शुरू किया गया है। द ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिजीज स्टडी 2017 से इस बात को बहुत शिद्दत से महसूस किया गया कि वायु प्रदूषण के कारण हमारी सेहत पर क्या असर पड़ता है। कुछ बीमारियां वायु प्रदूषण के साथ बहुत गहरे से जुड़ी हैं। फेफड़ों में संक्रमण और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (Chronic obstructive pulmonary disease सीओपीडी) वायु प्रदूषण का नतीजा है। पहली बार यह समझ पैदा हुई कि वायु प्रदूषण और विभिन्न बीमारियों के बीच क्या संबंध है। वायु प्रदूषण के कारण उत्पन्न होने वाली वाली बीमारियों से निपटने के लिए स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी ढांचे को ठीक करना होगा।

उन्‍होंने कहा कि डॉक्‍टर के पास रोजाना जाने वाले एक दिन के बच्‍चे से लेकर 60 साल तक के बुजुर्गों तक 50% मरीज सांस से संबंधित बीमारी से ग्रस्त होते हैं। भारत में घर के अंदर का वायु प्रदूषण भी उतनी ही बड़ी समस्या है। भारत के विभिन्न इलाकों में पराली, उपले और कंडे तथा लकड़ी जलाये जाने से रोजाना खाना बनाने वाली महिला 25 सिगरेट के बराबर धुआं अपने फेफड़ों में लेने को मजबूत होती है। इसी तरह से मच्छर अगरबत्ती 100 सिगरेट के बराबर पीएम2.5 उत्‍सर्जित करती है। इसके अलावा धूपबत्ती 500 सिगरेट के बराबर धुआं छोड़ती है। पटाखे भी प्रदूषण के स्तर को बढ़ाने में बहुत योगदान करते हैं। इनडोर एयर पॉल्यूशन को दूर करने के लिए खिड़की और दरवाजे खोलने का बहुत महत्व है।

डॉक्‍टर साल्‍वी ने कहा कि ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिजीज स्टडी 2019 के मुताबिक वायु प्रदूषण से संबंधित असामयिक मौतों के कारण होने वाला आर्थिक नुकसान प्रतिवर्ष 280000 करोड रुपए है, जबकि महाराष्ट्र में यह 33000 करोड़ रुपए प्रति वर्ष है।

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