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ambedkar and lohia on social justice in hindi

अंबेडकर और लोहिया के दर्शन में जाति

अंबेडकर और लोहिया की वैचारिक समानताएं | Ambedkar and Lohia’s ideological similarities

लोहिया और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचार (Lohia and Dr. BR Ambedkar’s thoughts), क्रमशः, नीची जातियों और दलितों के आंदोलनों की प्रेरक शक्ति रहे हैं। लोहिया और अंबेडकर समकालीन थे एवं जातिवाद का विरोध दोनों का एजेंडा था। यह आश्चर्यजनक है कि इसके बावजूद दोनों की वैचारिक समानताएं खोजने के प्रयास बहुत कम हुए हैं।

यद्यपि अंबेडकरवादी और समाजवादी आंदोलनों ने भारतीय समाज का काफी हद तक प्रजातांत्रिकरण किया है परंतु जातिप्रथा को उखाड़ फेंककर एक समतावादी समाज के निर्माण की उनकी परियोजना अभी भी अधूरी है। प्रजातांत्रिकरण की बहुचर्चित दूसरी लहर के दो दशक बाद, ऐसा लगता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति और नीतियां एक बड़े गतिरोध का सामना कर रही हैं।

हिन्दुत्व की शक्तियों की जीत न केवल सामाजिक न्याय के विचार और उसकी नींव को कमजोर करने वाली है, वरन् वह उस ‘इज्जत‘ को भी मिटाने वाली है जिसे स्वतंत्रता के बाद के भारत में नीची जातियों ने कठिन प्रयासों से अर्जित किया है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि एक व्यापक गठबंधन का निर्माण किया जाए। इस गठबंधन का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं होना चाहिए। उसे भेदभाव, शोषण और अपमान के विरूद्ध संघर्ष और प्रजातांत्रिक सिद्धांतों और मूल्यों के संवर्धन के प्रति प्रतिबद्ध भी होना चाहिए।[3]

In this era of darkness, how can we revive the politics of social justice

हमें आज बहुजन राजनीति के चिंतकों और उसके आधारभूत ग्रंथों की ओर लौटना होगा और इस प्रश्न पर विचार करना होगा कि अंधकार के इस दौर में हम सामाजिक न्याय की राजनीति को किस तरह पुनर्जीवित कर सकते हैं

लोहिया और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचार क्रमशः नीची जातियों और दलितों के आंदोलनों की प्रेरक शक्ति रहे हैं। यह अत्यंत आश्चर्यजनक और विडंबनापूर्ण है कि इन दोनों नेताओं को अकादमीशियनों और इन दोनों के तथाकथित चुनावी गुटों ने छोटे-छोटे घेरों में कैद कर दिया है। लोहिया और अंबेडकर समकालीन थे और जातिवाद का विरोध दोनों का एजेंडा था। यह आश्चर्यजनक है कि इसके बावजूद, दोनों में वैचारिक समानताएं ढूढ़ने के बहुत कम प्रयास हुए हैं। क्या इन दोनों के विचारों के अति-सरलीकरण और उनके मतभेदों को नजरअंदाज किए बगैर, उनकी सोच में कोई सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है? क्या इन दोनों व्यक्तित्वों की विचारधारात्मक धाराओं के मिलन से न्याय और समानता का एक नया, स्वदेशी सिद्धांत उभर सकता है?

What is the difference between Ambedkarism and Lohiaism

अंबेडकरवाद और लोहियावाद में जो मतभेद हैं, उनकी जड़ में जो प्रश्न है वह यह है कि क्या जाति हिन्दू धर्म का अविभाज्य हिस्सा है – और इसलिए जाति को नष्ट करने के लिए धर्म को नष्ट करना आवश्यक है – या जाति केवल धार्मिक सिद्धांतों के विरूपण से उपजी है।

अंबेडकर और लोहिया के परिप्रेक्ष्यों में अंतर के कारण ही दोनों ने जातिगत दमन के विरूद्ध संघर्ष के लिए अलग-अलग रणनीतियों का विकास किया और उन पर अमल किया। जाति के हिन्दू धर्म से रिश्ते के मुद्दे के अलावा, दोनों के विचारों में सांमजस्य स्थापित किया जा सकता है। बल्कि हम यह भी कह सकते हैं कि लोहिया ने अंबेडकर की परियोजना को ही आगे बढ़ाया और उसे अधिक समग्र और व्यावहारिक स्वरूप दिया। परंतु समाजवादी और अंबेडकरवादी आंदोलनों ने इन विचारकों के सिद्धांतों के साथ विश्वासघात किया और ये आंदोलन मात्र बहुजनों के एक तबके के हित साधन के उपकरण बनकर रह गए।

लोहिया और अंबेडकर के बीच के मतभेदों की जड़ें, औपनिवेशवाद के विरूद्ध राष्ट्रीय आंदोलन में थीं।

स्वतंत्रता के पहले और उसके बाद भी, अंबेडकर और लोहिया, राजनीति के दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े थे। स्वतंत्रता के पहले तो उनके बीच किसी वैचारिक सेतु का निर्माण संभव ही नहीं था।

लोहिया उग्र राष्ट्रवादी थे और वे औपनिवेशिक सत्ता के ढांचे में मूलभूत विरोधाभास देखते थे। वे अंग्रेजों के साथ किसी भी प्रकार के समझौते के खिलाफ थे। इसके विपरीत, अंबेडकर के लिए राष्ट्रीय/औपनिवेशिक सत्ता के बीच का अंतर सबसे महत्वपूर्ण नहीं था। वे सामाजिक मुक्ति के अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए औपनिवेशिक सत्ताधारियों सहित किसी से भी हाथ मिलाने को तत्पर थे।

अंबेडकर का तर्क यह था कि जाति व्यवस्था हिन्दू धर्म का अविभाज्य हिस्सा है। उन्होंने लिखा,

‘‘हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हिन्दू जाति व्यवस्था का पालन इसलिए नहीं करते क्योंकि वे अमानवीय या सिरफिरे हैं। वे जाति व्यवस्था का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि वे अत्यंत धार्मिक हैं‘‘ ।

इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के बैनर तले मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ डा. अंबेडकर आश्चर्यजनक रूप से लोहिया, जाति के प्रश्न और उसके हिन्दू धर्म से संबंध के बारे में मौन साधे रहे। चूंकि इस विषय पर उनके स्पष्ट विचार उपलब्ध नहीं हैं इसलिए इस बारे में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल है।

लोहिया शायद गांधी से सहमत थे, जिनका यह मानना था कि जाति व्यवस्था हिन्दू धर्म की एक विकृति है और उसका हिन्दू धर्म के मूलतत्व से कोई संबंध नहीं है। लोहिया का कहना था कि धार्मिक सुधार महत्वपूर्ण हैं और उनके अनुसार, ‘‘धर्म को जाति के कचरे से भी मुक्त करना होगा‘‘।

लोहिया के लिए जाति व्यवस्था का सबसे बुरा पक्ष क्या था ? | What was the worst aspect of the caste system for Lohia?

लोहिया के लिए जाति व्यवस्था का सबसे बुरा पक्ष था ब्राह्मण और बनिए का पाखंड। ये दोनों जातियां ही भारत का शासक वर्ग थीं। अंबेडकर का सीधा मत था कि हिन्दू धर्म को नष्ट किया जाना चाहिए।

Why did Lohia not say anything against Hinduism

लोहिया ने हिन्दू धर्म के खिलाफ कुछ क्यों नहीं कहा, इसे समझने के लिए हमें इन दोनों चिंतकों की पृष्ठभूमि पर नजर डालनी होगी। लोहिया, हिन्दी/हिन्दू बहुल क्षेत्र से थे, जहां ऊँची जातियों के पुनरूथानवादी/सुधारवादी संगठनों का लंबा इतिहास था। इस इलाके में नीची जातियों के उस प्रकार के आंदोलनों ने कभी जड़ें नहीं पकड़ीं, जिस प्रकार के आंदोलन महाराष्ट्र में फुले और तमिलनाडु में पेरियार के नेतृत्व में चले और जिन्होंने हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवाद को चुनौती दी। हिन्दी पट्टी में हिन्दू धर्म का विरोध करना शायद बहुत कठिन था।

अंबेडकर जहां जाति और उसके हिन्दू समाज पर प्रभाव के बारे में चिंतित थे, वहीं लोहिया का मुख्य सरोकार यह था कि जाति ने किस प्रकार पूरे राष्ट्र को पतित किया है।

आदिवासियों के मसले पर भी लोहिया और अंबेडकर के बीच मतभेद थे| Lohia and Ambedkar also had differences on the issue of tribals.

जहां अंबेडकर आदिवासियों को असभ्य और बर्बर मानते थे वहीं लोहिया के लिए वे जाति के विरूद्ध संघर्ष में आवश्यक भागीदार थे। लोहिया ने अंबेडकर से कई बार यह अपील की कि वे अनुसूचित जातियों की बजाए सभी भारतीयों के नेता बनें। अंबेडकर की मृत्यु के बाद लोहिया ने लिखा-

मैं हमेशा से भारत के हरिजनों को एक विचार से परिचित करवाने का प्रयास करता रहा हूं। यह विचार मेरा अपना है। डॉ. अंबेडकर और श्री जगजीवन राम, भारत के दो अलग-अलग प्रकार के आधुनिक हरिजन हैं। डॉ. अंबेडकर विद्वान, सत्यनिष्ठ, साहसी और स्वतंत्र व्यक्ति थे। उन्हें दुनिया के सामने सच्चे भारत के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था। परंतु वे कटु और एकांतिक थे। वे गैर-हरिजनों के नेता नहीं बनना चाहते थे। मैं यह समझ सकता हूं कि पिछले पांच हजार सालों में हरिजनों ने जो कष्ट भोगे हैं उनका प्रभाव उन पर आज भी है। और ठीक यही मेरा तर्क भी है। मैं अंबेडकर जैसे महान भारतीयों से आशा करता था कि वे कभी न कभी इस प्रभाव से ऊपर उठ सकेंगे। परंतु मृत्यु जल्दी आ गई। मैं अंबेडकर को….व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता परंतु मेरे लिए यह दुःखद है कि अंबेडकर जैसे लोग संप्रदायवाद से ऊपर नहीं उठ सके।

Lohia’s politics was not about separating but connecting | Ambedkar and lohia on social justice in hindi

दोनों की यह विचारगत भिन्नता उनकी राजनैतिक रणनीतियों में भी परिलक्षित होती है। दलितों को शेष हिन्दू समाज से अलग कर, उनकी एक विशिष्ट पहचान का निर्माण करना अंबेडकर की रणनीति के मूल में था। परंतु लोहिया की राजनीति अलग करने वाली न होकर जोड़ने वाली थी। महिलाओं की समस्याओं और उनके सुलझाव की रणनीति के संबंध में भी दोनों में मतभेद थे। हालांकि लोहिया संपत्ति पर महिलाओं के अधिकार के हामी थे और विवाह की संस्था को महत्वपूर्ण मानते थे, तथापि उन्होंने बहुजन महिलाओं की दुर्दशा को नजरअंदाज करने के लिए अंबेडकर द्वारा तैयार किए गए हिन्दू कोड बिल की परोक्ष रूप से निंदा की।

उन्होंने लिखा,

‘‘महिलाओं को पुरूषों के समान अधिकार मिलने चाहिए। बल्कि, सच तो यह है कि अगर समानता हासिल करनी है तो उन्हें पुरूषों से अधिक अधिकार मिलने चाहिए…ये कानून भारत की 80 प्रतिशत से अधिक महिलाओं के लिए किसी काम के नहीं हैं…वे केवल ब्राम्हण, बनिया और ठाकुर घरों की कुछ उच्च जातियों की महिलाओं के काम के हैं…यह बिल अच्छा परंतु अधूरा और द्विज हितों से प्रेरित था…। भारत की बहुसंख्यक महिलाओं के लिए पानी के नलों और शौचालयों की अनुपलब्धता सबसे बड़ी समस्या है‘‘।

वर्तमान में महिला आरक्षण बिल के संदर्भ में महिलाओं के लिए कोटे के अंदर कोटे पर चल रही बहस, महिलाओं के प्रश्न की लोहिया की समझ से काफी हद तक प्रभावित है।

लोहिया यह मानते थे कि सभी महिलाएं पुरूषों की तुलना में पिछड़ी हुई हैं परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी तबकों की महिलाओं के साथ एक सा या बराबर भेदभाव किया जाता है। भेदभाव के स्तर और उसकी व्यापकता में फर्क हैं और इन्हें भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

Another difference between Ambedkarism and Lohiaism

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अंबेडकरवाद और लोहियावाद में एक अन्य अंतर जाति के उन्मूलन के प्रश्न के संदर्भ में भी है। कई कारणों से, जिनमें ब्राह्मणों का दृष्टिकोण, जाति व्यवस्था में उन्हें प्राप्त विशेषाधिकार और सबसे महत्वपूर्ण, जाति के धर्म के साथ संबंध, शामिल हैं, के चलते अंबेडकर यह मानते थे कि जाति का उन्मूलन असंभव है। उनकी निगाह में मुक्ति का एकमात्र रास्ता था धर्मपरिवर्तन।

इसके विपरीत, लोहिया, जाति को नष्ट करने के संबंध में आशावादी थे। जाति के विरूद्ध संघर्ष में लोहिया, अंबेडकर से भी प्रेरणा ग्रहण करते थे। उनके शब्दों में,

‘‘मेरी दृष्टि में अंबेडकर, भारतीय राजनीति के एक महान व्यक्तित्व हैं और गांधीजी को छोड़कर, वे महानतम हिन्दुओं जितने ही महान हैं। यह तथ्य मुझे हमेशा यह आत्मविश्वास और सांत्वना देता है कि हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था को किसी न किसी दिन नष्ट किया जा सकता है।

यद्यपि अंबेडकर और लोहिया ने अलग-अलग संदर्भों और कालों में अपना लेखन कार्य किया परंतु वे दोनों भारतीय समाज की अनेक बुराईयों के लिए जाति व्यवस्था को जिम्मेदार मानते थे। इनमें शामिल हैं आर्थिक गतिहीनता, सांस्कृतिक अधःपतन और बाहरी शक्तियों का मुकाबला करने में असमर्थता। दोनों ही यह मानते थे कि जाति, प्रगति, नैतिकता, प्रजातांत्रिक सिद्धांतों और परिवर्तन का नकार है।

अंबेडकर ने उन धारणाओं का विखंडन किया, जिनके आधार पर जाति व्यवस्था को औचित्यपूर्ण ठहराया जाता था। इनमें श्रम विभाजन से लेकर नस्ल की शुद्धता तक की धारणाएं शामिल थीं। उनका तर्क था ‘‘जाति से आर्थिक दक्षता में वृद्धि नहीं होती। जाति, नस्ल में सुधार नहीं कर सकती और ना ही उसने ऐसा किया है। जाति ने एक काम अवश्य किया है – उसने हिन्दुओं का विघटन किया है और उनके मनोबल को तोड़ा है‘‘।

लोहिया ने भी राष्ट्र की प्रगति के लिए विभिन्न समुदायों की एकता पर जोर दिया। उन्होंने लिखा,

‘‘देश पर उदासी की एक काली छाया छाई हुई है क्योंकि यहां कुछ भी नया नहीं है। यहां पंडित और जूते बनाने वाले के बीच खुली बातचीत की कोई संभावना नहीं है‘‘।

लोहिया का तर्क था कि जाति ने लोगों की जिंदगियों से रोमांच और आनंद गायब कर दिया है और इसलिए, भारतीय इस धरती के सबसे उदास और सबसे गरीब लोग हैं। अंबेडकर और लोहिया दोनों का यह तर्क था कि जाति व्यवस्था में किसी व्यक्ति के पेशे के पूर्वनिर्धारण के कारण ही देश गरीबी और बेरोजगारी की गिरफ्त में है। जाति प्रथा अर्थव्यवस्था की गतिशीलता पर विपरीत प्रभाव डालती है। अंबेडकर ने लिखा, ‘‘अपने पेशे को बदलने की अनुमति न देकर जाति, देश में व्याप्त बेरोजगारी का सीधा कारण बन गई है‘‘ ।

इन दोनों चिंतकों को जिस प्रश्न ने सबसे ज्यादा उद्वेलित किया वह यह था कि घोर शोषण व दमन के बावजूद इस देश में सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई? भारत में जाति क्यों और कैसे अस्तित्व में बनी रही? भारत में सत्ता की प्रकृति क्या थी और उसने जाति व्यवस्था को चिरस्थायी बनाने में क्या भूमिका अदा की? क्या जाति व्यवस्था इसलिए कायम रही क्योंकि उसे औचित्यपूर्ण सिद्ध कर दिया गया? क्या समाज के एक वर्ग पर दूसरे वर्ग के वर्चस्व ने जाति प्रथा को जिंदा रखा? या इसके पीछे ये दोनों कारण थे।

लोहिया का जोर इस प्रश्न पर था कि जाति को किस प्रकार औचित्यपूर्ण व्यवस्था निरूपित कर दिया गया, किस तरह उसे लोगों का समर्थन और एक व्यवस्था के रूप में स्वीकार्यता मिली।

लोहिया की जाति की समालोचना, जाति व्यवस्था की आंतरिक शक्ति को स्वीकार करने पर आधारित है। लोहिया की दिलचस्पी मुख्यतः यह पता लगाने में थी कि बाहर और भीतर से विकट प्रतिरोध के बावजूद, जाति सदियों तक कैसे अस्तित्व मे बनी रही? क्या उसमें कोई आंतरिक ताकत है जो उसे जिंदा रखे हुए है?

लोहिया का तर्क यह है अपने बेहतर कौशल और विचारधारा के चलते, ऊँची जातियों ने नीची जातियों को इस षड़यंत्र का हिस्सा बनने के लिए तैयार कर लिया। उनका कहना था कि नैतिक और सांस्कृतिक श्रेष्ठता के कारण नीची जातियों ने अपनी मर्जी से ऊँची जातियों की अधीनता स्वीकार की।

समाजवादी होते हुए भी, लोहिया ने अंबेडकर के तर्क को और आगे ले जाते हुए समाजवादियों की भ्रांतियों और उनके तर्क में दोषों की पहचान की। उनके अनुसार, जो लोग केवल राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की बात करते हैं और सामाजिक सुधारों के महत्व को नजरंदाज करते हैं, वे निहित स्वार्थों से प्रेरित हैं क्योंकि ‘‘राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के बाद भी उद्योग और राज्य के प्रबंधक ऊंची जातियों के सदस्य ही बने रहेगें और आमजन आर्थिक और मानसिक दृष्टि से नीचे ही बने रहेंगें, कम से कम तुलनात्मक रूप से…फर्क सिर्फ यह होगा कि जहाँ आज ऊंची जातियों की उच्च स्थिति को उनके जन्म या योग्यता के आधार पर उचित ठहराया जाता है, वहीं तब उन्हें क्षमताओं और आर्थिक आधारों पर औचित्यपूर्ण बताया जायेगा…वे जन्म के आधार पर अपना उच्च दर्जा खो देंगे परन्तु योग्यता के नाम पर वही उच्च दर्जा उन्हें हासिल रहेगा‘‘ ।

हिन्दू सुधारवादियों के विपरीत, अंबेडकर और लोहिया का यह दृढ़ मत था कि असमानता की इस व्यवस्था को सुधारना या उसका इलाज करना संभव नहीं है। जाति-आधारित असमानता का अंत तभी हो सकता है जब जाति व्यवस्था को ही समाप्त कर दिया जाए। उनका मुख्य लक्ष्य जाति का उन्मूलन था, जिसके बिना आमजनों के लिए स्वराज अर्थहीन होता। दोनों उन साधनों की तलाश में थे, जिनका इस्तेमाल कर जाति व्यवस्था को समाप्त किया जा सके।

अंबेडकर जाति व्यवस्था की समाप्ति की कोई संभावना नहीं देखते थे क्योंकि उनका मानना था कि जाति व्यवस्था की श्रेणीबद्ध असमानता के कारण लोगों को उसके विरूद्ध एकजुट करना बहुत कठिन होगा और क्रांति के बाद योद्धाओं को समान प्रतिफल नहीं मिलेगा।

लोहिया भी निहित स्वार्थों के कारण जाति-विरोधी आंदोलन के कमजोर पड़ने के खतरे की ओर संकेत करते हैं। उदाहरणार्थ, मराठा, जो एक नीची जाति थे और जो जाति-विरोधी संघर्ष के कारण आज सत्ताधारी बन सके हैं, उन्होंने हाल में दलितों के विरूद्ध आंदोलन किया और यह मांग की कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम रद्द किया जाए।

लोहिया के अनुसार,

‘‘बार-बार, लगातार नीची जातियों के विद्रोह का इस्तेमाल इस या उस जाति को बेहतर दर्जा देने के लिए किया जाता रहा है। इस विद्रोह का लक्ष्य कभी भी जाति के संपूर्ण ढांचे को नष्ट करना नहीं रहा‘‘।

डा. अंबेडकर की निगाहों में जाति के उन्मूलन के लिए शास्त्रों की सत्ता को नष्ट करना और रक्त की शुद्धता की भांति के निवारण के लिए विभिन्न जातियों के बीच रोटी-बेटी के संबंध स्थापित करना आवश्यक है। लोहिया भी अंतर्जातीय विवाहों की उपयोगिता पर जोर देते हैं परंतु वे इसमें दो चीजें जोड़ते हैं। अंतर्जातीय विवाह तभी प्रभावी होंगे जब वे शूद्रों और द्विजों के बीच हों, क्योंकि ब्राम्हणों और बनियों के बीच विवाह से जाति व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। दूसरे, यद्यपि उनकी कामना यही थी कि लोग स्वेच्छा से इस तरह के विवाह करें, परंतु उनका कहना था कि द्विजों और शूद्रों के बीच अंतर्जातीय विवाहों को संस्थागत स्वरूप देने के लिए सेना और प्रशासनिक पदों पर भर्ती के लिए इन्हें आवश्यक अर्हता बना दिया जाना चाहिए।

लोहिया का मानना था कि “जाति और लिंग पर आधारित भेदभाव को समाप्त करने का यही एकमात्र तरीका है‘‘ ।

उनका दावा था कि जाति के विरूद्ध असली लड़ाई तभी शुरू होगी जब हरिजनों, शूद्रों, आदिवासियों और महिलाओं को प्रशासन, न्यायपालिका, सेना और उद्योग में 60 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। जाति के उन्मूलन से समाज के एक बड़े वर्ग में स्वाभिमान का भाव उत्पन्न होगा और आर्थिक उन्नति से विभिन्न वर्गों के बीच के अंतर कम होंगे। इस तरह जाति और वर्ग दोनों की समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।

जाति और हिन्दू धर्म के परस्पर रिश्तों को छोड़कर, अंबेडकर और लोहिया के विचारों में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि अंबेडकरवादी और लोहियावादी एकसाथ जुड़ें।

आज बहुजनों और जाति की राजनीति केवल चुनावी गणित पर आधारित है। बहुजनवादी राजनीति की अपनी सीमाएं हैं। केवल सत्ता हासिल कर जाति से नहीं लड़ा जा सकता। बहुजनों की चुनावी राजनीति में जो कमियां हैं, उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन पूरा कर सकते हैं। केवल चुनावी गुणा-भाग की जगह गरिमा, न्याय और बंधुत्व के मूल्यों को महत्व दिया जाना आवश्यक है। ऊना जैसे आंदोलनों से यह आशा जागती है कि जाति नष्ट की जा सकती है और सामूहिक अन्याय के प्रतिरोध के लिए लोग एकजुट हो सकते हैं। यह कहना मुश्किल है कि शेल्डन वालिन के शब्दों में, ‘एक साथ काम करने के क्षण‘ (मोमेंटस ऑफ़ कामनालिटी) कितने लंबे चलते हैं। परंतु वे हममें आशा अवश्य जगाते हैं।

रामस्वरूप मंत्री

( लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और सोशलिस्ट पार्टी इंडिया की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष है)

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