अमेरिका द्वारा चीन पर बढ़ते हमले : अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रसारवादी हितों की सेवा में नीति

Donald Trump and Xi Jinping

दो साल पहले अमेरिका ने छेड़ा था चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध

बीते कुछ हफ़्तों में शायद ही कोई एक ऐसा दिन हुआ हो जब अमेरिका ने किसी न किसी मुद्दे को लेकर चीन पर हमला न किया हो। लगभग चार साल पहले से अमेरिका ने चीन पर निशाना साधना शुरू किया, जब कि दो साल पहले अमेरिका ने चीन के खिलाफ खुलेआम व्यापार युद्ध छेड़ दिया (America openly waged trade war against China)। विदित है कि चीन के साथ अमेरिका का सबसे ज्यादा व्यापार होता है। आजकल, कोरोना वैश्विक महामारी की हालतों में, इन हमलों की गति और कठोरता बहुत बढ़ गयी है।

सबसे हाल के हमलों से शुरू करते हुए, इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :

3 जून को अमेरिका ने चीन को व चीन से सभी चीनी विमानों की उड़ानें रोक दीं। इससे पहले, अमेरिका ने चीन पर दबाव डाला (America put pressure on China) था कि अमेरिकी विमानों को चीन जाने की इजाज़त दी जानी चाहिए, ऐसे समय पर जब चीन ने कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के कारण अंतर्राष्ट्रीय विमान उड़ानों पर पाबंदियां नहीं हटाई थीं।

1 जून को अमेरिकी विदेश सचिव माइक पोम्पिओ (United States Secretary of State Mike Pompeo) ने यह घोषणा की कि अमेरिका में चीनी छात्र, जो उन संस्थानों से जुड़े हुए हैं, जिनका, अमेरिकी दावों के अनुसार, चीनी पी.एल.ए. (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) से सम्बन्ध है, उनके वीसा कैंसिल कर दिये जायेंगे, क्योंकि वे तकनीकी और अन्य गुप्त सूचनाओं की चोरी कर सकते हैं! खास तौर पर, वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हजारों-हजारों चीनी छात्रों के लिए इससे काफी सारी कठिनाइयां खड़ी हो जायेंगी।

27 मई को पोम्पिओ ने घोषणा की कि चीन ने हाँग-काँग के लिए एक नया सुरक्षा क़ानून पास किया है, इसलिए अमेरिका हाँग-काँग के साथ तरजीही व्यापार व्यवस्थाओं को रद्द कर देगा, क्योंकि नया क़ानून हाँग-काँग की स्वायत्तता का ‘हनन’ (Hong Kong’s autonomy abuses) है। वास्तव में, अमेरिका के साथ व्यापार में हाँग-कॉग को कोई खास सुविधाएं नहीं मिलती हैं, परन्तु इस घोषणा का असली मक़सद था चीन को चेतावनी देना।

23 मई को अमेरिका ने 33 चीनी कंपनियों पर पाबंदियां लगा दीं (US bans 33 Chinese companies), क्योंकि उनका चीनी सेना के साथ या चीन में ‘मानव अधिकार हनन’ के साथ तथाकथित गठबंधन है।

अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में एक “चीन नहीं अधिनियम” तैयार किया जा रहा है। इसके ज़रिये यह सुनिश्चित किया जायेगा कि कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के सन्दर्भ में अमेरिका में कंपनियों को जो फण्ड की सहायता मिल रही है, वह सहायता चीनी कंपनियों को नहीं मिलेगी।

इससे पहले, 2020 में अमेरिका ने उइगर मानव अधिकार नीति अधिनियम (Uyghur Human Rights Policy Act,) लागू किया, जिसके ज़रिये चीन के शिनजियांग प्रदेश में उयघुर राष्ट्रीयता के लोगों के बारे में चीनी नीतियों को निशाना बनाया जायेगा।

2019 में अमेरिका ने हाँग-काँग, तिब्बत और ताइवान की तरफ चीन की नीतियों को निशाना बनाकर, कई कानून पास किये, ताकि चीन पर दबाव डाला जा सके। इनमें शामिल हैं हाँग-कॉग मानव अधिकार और लोकतंत्र अधिनियम, तिब्बत नीति समर्थन अधिनियम और ताइवान के मित्रों को अंतर्राष्ट्रीय रक्षा और उन्नति पहल (तायपेई) अधिनियम।

दो साल पहले, 2018 में ट्रम्प की सरकार ने वाणिज्य सम्बन्धी मामलों पर चीन के ख़िलाफ़ कई क़दम उठाना शुरू किया। इसके तहत अमेरिका ने बहुत सारी चीनी वस्तुओं के आयात पर एकतरफा तरीके से भारी शुल्क लागू कर दिए, जिसके कारण अमेरिका और चीन के बीच में ‘व्यापार युद्ध’ जैसा शुरू हो गया।

ये सारे क़दम चीन, चीनी राष्ट्रीयता के लोगों और चीनी कंपनियों के ख़िलाफ़ बेहद भेदभावकारी हैं। इसके अलावा, हाल के हफ़्तों में ट्रम्प की सरकार ने चीख-चीखकर यह झूठा प्रचार किया है कि कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के लिए चीन ज़िम्मेदार है, इसलिए चीन से भुगतान किया जाना चाहिए। अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) पर चीन से पक्षपात करने का आरोप लगाकर, उस संगठन से खुद बाहर निकल गया है।

गहराते संकट और तनाव की वर्तमान विश्व स्थिति के चलते, चीन के ख़िलाफ़ लिए गए ये सारे क़दम एक साम्राज्यवादी महाशक्ति द्वारा अपनी ताक़त दिखाने के प्रयास हैं, जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इन क़दमों की वजह से एक बेहद ख़तरनाक स्थिति पैदा हो रही है और दुनिया को एक नए साम्राज्यवादी युद्ध की ओर धकेला जा रहा है।

चीन के ख़िलाफ़ अमेरिकी साम्राज्यवाद के इस चौ-तरफ़ा अभियान के पीछे क्या कारण हैं?

अमेरिकी साम्राज्यवाद ने पहले सोच-समझकर चीन के साथ मित्रता बनाई थी, ताकि मुख्य दुश्मन, सोवियत संघ को अलग-थलग व कमज़ोर किया जा सके। जब सोवियत संघ का विघटन हो गया, तो अमेरिका ने चीन को वैश्विक पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था में और ज्यादा घुलमिल जाने के लिए खूब प्रोत्साहित किया। अमेरिका चीन में पूंजीवादी विकास को प्रोत्साहित करना चाहता था, इस उम्मीद के साथ कि चीन आगे चलकर अमेरिकी साम्राज्यवाद की पूंछ बन जायेगा और चीन की सत्ता पर बैठी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन कमज़ोर हो जायेगा। परन्तु कुछ ही दशकों के अन्दर यह स्पष्ट हो गया कि चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका की आर्थिक ताक़त को टक्कर देने वाली प्रमुख प्रतिस्पर्धी बनकर आगे आ रही थी, जबकि अमेरिका की अर्थव्यवस्था संकट और मंदी के दौर से गुज़र रही थी। इसके साथ-साथ, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता (Power of chinese communist party) पूरी ताक़त के साथ बनी रही, हालांकि अमेरिका और अन्य ताक़तों ने चीन के अन्दर लोगों को सत्ता के ख़िलाफ़ भड़काने की कई कोशिशें कीं।

भू-राजनीति के क्षेत्र में चीन ने अमेरिका और उसके मित्र-देशों से स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन ने अपनी वीटो ताक़त का इस्तेमाल करके अमेरिका के कई क़दमों को रोका है। अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा प्रतिबंधित देशों, जैसे कि ईरान, वेनेज़ुएला, उत्तरी कोरिया, आदि की चीन ने मदद की है। अपने महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (Belt and Road Initiative) के ज़रिये चीन यूरोप-एशिया क्षेत्र और अफ्रीका के देशों के साथ ढांचागत और आर्थिक सम्बन्ध बनाने का प्रयास कर रहा है। शंघाई कोऑपरेशन आर्गेनाईजेशन (एस.सी.ओ.), ब्रिक्स और उसके न्यू डेवलपमेंट बैंक, आर.सी.ई.पी. आदि जैसी कई बहु-राष्ट्रीय पहल-कदमियों में चीन सक्रियता से भाग लेता है। इन सब कारणों से अमेरिकी साम्राज्यवाद चीन से बहुत खफ़ा है।

इस दौरान चीन ने अपनी सैनिक ताक़त को भी खूब बढ़ा लिया है और खास तौर पर दक्षिण-चीनी समुद्र में तथा पड़ोसी इलाकों में अमेरिकी सैनिक ब्लैकमेल के प्रयासों का मुंहतोड़ जवाब दे रहा है। अब उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में, खास तौर पर 5जी, आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और बिग डाटा जैसे क्षेत्रों में, चीन अमेरिका से आगे बढ़ गया है।

अमेरिकी साम्राज्यवाद की सारी दुनिया पर हावी होने की अनवरत कोशिशों के चलते, चीन उसके गले में काँटा बना हुआ है। हालाँकि अमेरिका और चीन की अर्थव्यवस्थाएं बहुत नज़दीकी से जुडी हुयी हैं और हालाँकि चीन ने अमेरिका पर कोई हमला नहीं किया है, परन्तु अमेरिकी साम्राज्यवाद ने चीन को अलग-थलग करने और उस पर दबाव डालने का अपना वैश्विक अभियान बहुत तेज़ कर दिया है।

अमेरिकी साम्राज्यवाद चीन पर इस हमले को दूसरे देशों और लोगों के हित में दखाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस बात पर कोई शक नहीं होना चाहिए कि अमेरिका की नीति एशिया और पूरी दुनिया पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के एकमात्र उद्देश्य से ही प्रेरित है।
 बिरजू नायक (birju nayak) लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
बिरजू नायक (birju nayak) लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

इन हालात में, जब मोदी सरकार चीन पर दबाव और ब्लैकमेल की अमेरिकी साम्राज्यवादी कोशिशों के साथ ज्यादा से ज्यादा हद तक जुड़ने की नीति अपना रही है, तो यह हिन्दुस्तानी लोगों के लिए बहुत ख़तरनाक है। इसके कई उदाहरण देखने में आये हैं।

जब अमेरिका चीन को कोरोना वायरस के लिए ज़िम्मेदार बताने की कोशिश कर रहा है, तो हिन्दुस्तान की सरकार इस पर ढुलमुल रवैया अपना रही है। हिन्दुस्तान की सरकार कोरोना महामारी के बाद, वैश्विक सप्लाई चेन में चीन की जगह लेने की अपनी आकांक्षाओं के बारे में खुलकर बात कर रही है।

हाल में मोदी ने हिन्दोस्तान-चीन सीमा के मुद्दों को लेकर ट्रम्प के साथ फ़ोन पर “चर्चा’ की। इस तंग-नज़रिए वाली नीति से हिन्दुस्तान को कोई फायदा नहीं होगा। इसके साथ-साथ, हमारे इलाके में तनाव बहुत बढ़ जायेगा और हमारा देश अमेरिकी साम्राज्यवाद की हमलावर और दुष्ट नीतियों में फंस जायेगा।

बिरजू नायक

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें