ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2022 के आइने में असमानता ख़त्म करने का एक अभिनव विचार !

ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2022 के आइने में असमानता ख़त्म करने का एक अभिनव विचार !

ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2022 : एक और रिपोर्ट जो खोल रही मोदी सरकार की पोल

विश्व आर्थिक महाशक्ति बनने का ढिंढोरा पीटने वाली मोदी सरकार की पोल खोलने वाली एक और रिपोर्ट सामने आई है. वह है ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2022, जिसे मोदी सरकार ने नकार दिया है. हर वर्ष अक्तूबर के दूसरे सप्ताह के अंत में प्रकाशित होने वाली ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) की ताजी रिपोर्ट 15 अक्तूबर, 2022 को प्रकाशित हुई है, जिसमें बताया गया है कि वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2022 में भारत की रैंकिंग 121 देशों में 107 है. दक्षिण एशिया में अफगानिस्तान को छोड़कर तकरीबन सभी देशों से भारत लिस्ट में पीछे है.

मोदी राज में किसी भी क्षेत्र में शर्मनाक परिणाम देने वाला भारत यदि पकिस्तान से थोड़ा भी बेहतर परिणाम दे देता है तो राष्ट्रवादी सारी बातें भूल जाते हैं. किन्तु जीएचआई की ताजी रिपोर्ट में ऐसी कोई राहत नहीं मिली है. अगर भारत के पड़ोसी मुल्कों में श्रीलंका का रैंक 64, नेपाल का 81 और चीन का सामूहिक रूप से 1 से 17 के बीच है तो पाकिस्तान का रैंक भी 99 है. भारत थोड़ी राहत की सांस ले सकता कि अफगानिस्तान जैसे एक मुस्लिम देश की रैंकिग उससे कुछ बदतर है। अफगानिस्तान का रैंक 109 है!

ऐसा अचानक नहीं हुआ है, मोदीराज में लगातार बढ़ रही है भुखमरी

मोदी राज में लगभग हर साल यही स्थिति रही है. मोदी राज जमकर स्थापित होने के पहले भुखमरी से उबरने के लिए प्रयासरत देशों में भारत की रैंकिंग 2011, 2012, 2013 और 2014 में क्रमशः67, 66, 63 और 55 रही. मोदी राज के ठीक से स्थापित होने के बाद यह अचानक जम्प करके 2015 में 80 तो 2016 में 97 और 2017 में 100 हो गयी और भारत पड़ोसी मुल्कों से मात खाता रहा.

2021 की सूची में पड़ोसी देश- पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल भारत से आगे थे.

बहरहाल जीएचआई की इस रिपोर्ट का सम्पर्क मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से है और मोदी राज में इससे जुड़ी हर रिपोर्ट/इंडेक्स में भारत की स्थिति बद से बदतर होती गयी है.     

बहरहाल मोदी राज  में भारत ने हंगर इंडेक्स में ही शर्मनाक रैंकिग हासिल नहीं किया है,  विगत वर्षों में मानव विकास सूचकांक, क्वालिटी ऑफ़ लाइफ, जच्चा-बच्चा मृत्यु दर , प्रति व्यक्ति डॉक्टरों की उपलब्धता, क्वालिटी एजुकेशन इत्यादि से जुड़ी जितनी भी इंडेक्स/रिपोर्ट्स जारी होती रही हैं, उसकी स्थिति बद से बदतर ही नजर आई है. किन्तु जिस रिपोर्ट ने भारत की स्थिति सबसे शर्मनाक की है, वह है ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट! वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम द्वारा 2006 से हर वर्ष जो ‘वैश्विक लैंगिक अन्तराल रिपोर्ट’ प्रकाशित हो रही है, उसमें साफ़ पता चलता है कि भारत में महिलाओं की स्थिति करुण से करुणतर हुए जा रही है और भारत दक्षिण एशियाई देशों सबसे नीचले पायदान पर है.

बहरहाल आधी आबादी की करुणतर स्थिति को देखते हुए ‘वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट: 2020’  में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि भारत में महिलाओं को आर्थिक रूप से पुरुषों के बराबर आने में 257 साल लग सकते हैं. यह कितनी चिंताजनक स्थिति इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी 2019 की रिपोर्ट में 202 साल लगने का अनुमान लगाया गया था. लेकिन अगले एक साल में 202 से बढ़कर 257 हो गया, जो इस बात का संकेतक कि मोदी-राज में महिलाओं की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से बद से बदतर होती जा रही है.

अब यदि आधी आबादी को पुरुषों के बराबर आने में ढाई सौ साल से अधिक लग सकते हैं तो मानना पड़ेगा कि भारत में आर्थिक और सामाजिक विषमता की स्थिति अत्यंत भयावह है.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के रूप चिन्हित भारत विश्व के सबसे असमान देशों में से एक है. ऐसी असमानता विश्व में शायद ही कहीं और हो, इस बात पर मोहर वर्ष 2021 में लुकास चांसल द्वारा लिखित और चर्चित अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटि, इमैनुएल सेज और गैब्रियल जुकमैन द्वारा समन्वित जो ‘विश्व असमानता रिपोर्ट-2022’ में भी लगी.

2015 के बाद क्रेडिट सुइसे और ऑक्सफैम की प्रकाशित सभी रिपोर्टों में ही भारत में बढ़ती भयावह आर्थिक विषमता को लेकर चिंता जाहिर की जाती रही है. पर, मोदी सरकार इसकी अनदेखी करती इसलिए हम विगत वर्षों से प्रकाशित रिपोर्टों में देश की स्थित देखकर शर्मसार हुए जा रहे हैं. बहरहाल जो लोग देश की शर्मनाक स्थिति से चिंतित हैं, उन्हें ही सारी समस्याओं की जननी आर्थिक और सामाजिक विषमता से पार पाने का कोई क्रांतिकारी उपाय ढूँढना होगा.

इस मामले में काबिले गौर है कि विषमता से पार पाने के सारे उपाय विफल हो चुके हैं और यह समस्या नित नयी ऊँचाई छूती जा रही है. ऐसे में इससे पार पाने के लिए किसी अभिनव परिकल्पना पर विचार करना होगा .

आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के लिए हमारे देश के योजनाकारों की ओर से कई प्रयास हुए पर, इस मामले में एक साधे, सब सधे की कहावत को चरितार्थ करने का प्रयास नहीं हुआ. ऐसा करने पर विषमता-जन्य किसी खास समस्या पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ता और उस समस्या के खात्मे के रास्ते आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे का पूरा लक्ष्य पा जाते. इससे विषमता के खात्मे के कई मोर्चों पर मुस्तैद नहीं होना पड़ता. अगर लगता है कि इस बात में दम है तो हम विषमता से उपजी ऐसी किसी खास समस्या पर ध्यान करें जो सबसे गंभीर हो. और जब हम ऐसी किसी समस्या पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो सबसे पहले जेहन में उभरती है भारत की आधी आबादी की समस्या, जिसके बारे में वैश्विक लैंगिक अन्तराल 2020 में बताया गया है कि भारत की महिलाओं को आर्थिक रूप से पुरुषों के बराबर आने में 257 साल लगने हैं.

क्या आधी आबादी की समानता को ध्यान में रखे बिना विषमता के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है?

ध्यान रहे हमारी आधी आबादी 66 करोड़ है,  यूरोप के प्रायः तीन दर्जन देशों से अधिक, अमेरिका की कुल आबादी का डबल और लैटिन अमेरिका की सकल आबादी के बराबर है. ऐसे में क्या हमारी आधी आबादी की आर्थिक असमानता से बड़ी कोई समस्या पूरे विश्व में है! अगर नहीं तो यदि आधी आबादी की समानता को ध्यान में रखकर विषमता के खिलाफ लड़ाई लड़ें, तो शायद बहुत ही बेहतर परिणाम दे पाएंगे! 

इसमें ज्यादा मगजपच्ची की जरूरत नहीं कि भारत में आर्थिक और सामाजिक असमानता  का सर्वाधिक शिकार महिलायें हैं और महिलाओं में भी सर्वाधिक शिकार क्रमशः दलित और आदिवासी महिलाएं! यदि सवर्ण समुदाय की महिलाओं को आर्थिक समानता अर्जित करने में 250 साल लग सकते हैं तो दलित-आदिवासी महिलाओं को 350 साल से अधिक लग सकते हैं.

बहरहाल भारतीय महिलाओं को 257 वर्षो के बजाय आगामी कुछेक दशकों में आर्थिक समानता दिलाना है तो इसके लिए अबतक आजमाए गए उपायों से कुछ अलग करना होगा. इस मामले में मेरे पास एक नया विचार है. इसके लिए हमें अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में दो उपाय करने होंगे.

सबसे पहले यह करना होगा कि अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में सवर्ण पुरुषों को, जिनकी आबादी बमुश्किल 7-8 प्रतिशत होगी, उनको उनकी संख्यानुपात पर लाना होगा. इसके लिए सवर्ण पुरुषों को प्राथमिकता के साथ समस्त क्षेत्रों में उनकी संख्यानुपात में उनको आरक्षण देकर उन्हें शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक- में 7-8 प्रतिशत सीमित कर दिया जाय  ताकि उनके हिस्से का औसतन 70 प्रतिशत अतिरक्त (Surplus) अवसर वंचित वर्गों, विशेषकर आधी आबादी में बंटने का मार्ग प्रशस्त हो सके.

दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासियों की दुर्दशा के मूल में यही कारण था कि विदेशी मूल के गोरों ने अवसरों और संसाधनों पर अपने संख्यानुपात से कई गुना कब्ज़ा जमा कर बहुसंख्य लोगों के समक्ष भयावह समस्या खड़ी कर दिया था. बाद में कानून बनाकर गोरों को संख्यानुपात पर रोकने के बाद ही वहां के मूलनिवासियों में वाजिब मात्रा में अवसर बंटने की शुरुआत हुई.

बहरहाल अवसरों के बंटवारे में सवर्ण पुरुषों को उनके संख्यानुपात में सिमटाने के बाद दूसरा उपाय यह करना होगा कि अवसर और संसाधन प्राथमिकता के साथ आधी आबादी के हिस्से में जाए! इसके लिए अवसरों के बंटवारे के पारंपरिक तरीके से निजात पाना होगा. पारंपरिक तरीका यह है कि अवसर पहले जनरल अर्थात सवर्णों के मध्य बंटते हैं, उसके बाद बचा हिस्सा वंचित अर्थात आरक्षित वर्गो को मिलता है. यदि हमें 257 वर्षो के बजाय आगामी कुछ दशकों में लैंगिक समानता अर्जित करनी है तो अवसरों और संसाधनों के बंटवारे के रिवर्स पद्धति का अवलंबन करना होगा अर्थात सबसे पहले एससी/एसटी, उसके बाद ओबीसी, फिर धार्मिक अल्पसंख्यक और शेष में जेनरल अर्थात सवर्णों को अवसर निर्दिष्ट करना होगा.

हमें भारत के विविधतामय प्रमुख सामाजिक समूहों- दलित, आदिवासी, पिछड़े, धार्मिक अल्पसंख्यकों और जनरल अर्थात सवर्ण – को दो श्रेणियों -अग्रसर अर्थात अगड़े और अनग्रसर अर्थात पिछड़ों-  में विभाजित कर, सभी सामाजिक समूहों की महिलाओं को प्राथमिकता के साथ 50 प्रतिशत हिस्सेदारी देने का प्रावधान करना होगा. इसके तहत संख्यानुपात में क्रमशः अति दलित और दलित; अनग्रसर आदिवासी और अग्रसर आदिवासी; अति पिछड़े और पिछड़े ;अनग्रसर और अग्रसर अल्पसंख्यकों तथा अनग्रसर और अग्रसर सवर्ण महिलाओं को संख्यानुपात में अवसर सुलभ कराने का अभियान युद्ध स्तर पर छेड़ना होगा. एससी/एसटी, ओबीसी,धार्मिक अल्पसंख्यकों और सवर्ण समुदाय की अगड़ी-पिछड़ी महिलाओं को इनके समुदाय के संख्यानुपात का आधा हिस्सा देने के बाद फिर बाकी आधा हिस्सा इन समुदायों के अगड़े- पिछड़े पुरुषों के मध्य वितरित हो. यदि विभिन्न समुदायों की महिलाएं अपने प्राप्त हिस्से का सदुपयोग करने की स्थिति में न हों तो उनके हिस्से का बाकी अवसर उनके पुरुषों के मध्य ही बाँट दिया जाय, किसी भी सूरत में उनका हिस्सा अन्य समुदायों को न मिले.

यदि हम शक्ति के विविध स्रोतों – सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की,सभी प्रकार की नौकरियों, पौरोहित्य, डीलरशिप; सप्लाई,सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों, पार्किंग, परिवहन; शिक्षण संस्थानों, विज्ञापन व एनजीओ को बंटने वाली राशि, ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधानसभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा; राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि के कार्यबल- में क्रमशः दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक, और सवर्ण समुदायों की महिलाओं को इन समूहों के हिस्से का 50 प्रतिशत भाग सुनिश्चित कराने में सफल हो जाते हैं तो भारत 257 वर्षों के बजाय 57 वर्षों में लैंगिक समानता अर्जित कर विश्व के लिए एक मिसाल बन जायेगा. तब मुमकिन है हम लैंगिक समानता के मोर्चे पर आइसलैंड, फ़िनलैंड, नार्वे, न्यूलैंड, स्वीडेन इत्यादि को भी पीछे छोड़ दें.

यही नहीं उपरोक्त क्षेत्रों के बंटवारे में सर्वाधिक अनग्रसर समुदायों के महिलाओं को प्राथमिकता के साथ 50 प्रतिशत हिस्सेदारी देकर लैंगिक असमानता के साथ भारत से मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या, आर्थिक और सामाजिक के खात्मे में भी शर्तिया तौर पर सफल हो सकते हैं. कारण, सर्वाधिक पिछड़े समुदायों की महिलाओं के साथ उन समुदायों का बाकी बचा 50 प्रतिशत हिस्सा अनिवार्य रूप से उनके पुरुषों को मिलेगा. इस तरह विविधतामय सभी समाजों को उनका शत प्रतिशत हिस्सा मिलने का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा. ऐसा होने पर कोई भी समुदाय वंचित नहीं रहेगा. सभी को उनकी महिलाओं के रास्ते उनका पूरा हिस्सा मिलने का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा.

यदि हम इस अभिनव परिकल्पना को जमीन पर उतार सके तो ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट हो या ग्लोबल हंगर इंडेक्स, हम हर रिपोर्ट/इंडेक्स पर शर्मसार होने के बजाय गर्व करने की स्थिति में आ जायेंगे!

एच. एल. दुसाध

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  

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