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अनसुनी आवाज़ : एक संदर्भ ग्रंथ, जिसमें पिछले तीस सालों का भारत है

पाठकीय दुनिया में दो तरह की पत्रिकाएं दिखायी पड़ती हैं। एक, जो व्यावसायिक हैं, दूसरी, जो ध्येयपरक हैं। व्यावसायिक पत्रिकाओं का योगदान (Contribution of professional journals) यह है कि वे व्यवसाय-वृत्ति के अंतर्गत पाठकों को साहित्य, संस्कृति, राजनीति आदि से संबंधित सूचनाएं और सृजन उपलब्ध कराती हैं जिसमें लेखक-समूह का एलिट क्लास लगा होता है और इनके​ सम्पादक अप्रतिबद्ध किंतु प्रबुद्ध और कुशल प्रबंधक होते हैं, जबकि ध्येयपरक पत्रिकाओं के सम्पादक जन-सरोकारों से प्रतिबद्ध साधक क़िस्म के होते हैं। वे पत्रिका इन्हीं जन-सरोकारों की सिद्धि के लिए निकालते हैं। इसके पीछे वे आर्थिक तंगी और यंत्रणाएं झेलते हैं। वे साधक होने के साथ-साथ ख़ासे संघर्षशील स्वभाव के भी होते हैं।

एक ऐसी ही पत्रिका है “प्रेरणा-अंशु”। इसके संस्थापक सम्पादक मास्टर प्रताप सिंह एक ऐसे ही सम्पादक थे। बारह जुलाई 1958 को जन्मे प्रताप सिंह ‘मास्साब’ का निधन अठारह मार्च 2018 को हो गया। एक असामयिक मृत्यु, जिसने हमसे बहुत कुछ छीन लिया। जनता के लिए संघर्ष करता एक विचारक, लोकतंत्र के मोर्चे का एक योद्धा, मूल्यों की पैरवी करने वाला मनीषी, जन-आंदोलनों को समर्थन और संदेश देने वाला ज़मीनी कार्यकर्ता, दशा समझने और दिशा देने वाला दूरदर्शी और साधनहीनता के बावजूद अपनी भाषा और साहित्य से गहरा प्रेम करने वाला जागरूक और प्रेरक सम्पादक।

प्रेरणा-अंशु में प्रताप सिंह मास्साब के समय भी मेरी कविताएं छपती थीं, आज भी छपती हैं। अब इसके सम्पादक वीरेश कुमार सिंह और कार्यकारी सम्पादक पलाश विश्वास हैं। प्रताप सिंह मास्साब नहीं हैं लेकिन जो ज्योति वे इस पत्रिका के माध्यम से जला गये हैं, उसकी चमक को बढ़ाने में उनकी पूरी टीम लगी हुई है।

मास्साब को श्रद्धांजलि स्वरूप पलाश विश्वास जी ने उनके सम्पादकीयों का संग्रह प्रकाशित कराया है – “अनसुनी आवाज़” (Ansuni Awaz) नाम से। लेकिन यह शानदार उपक्रम सिर्फ़ श्रद्धासुमन समर्पित करने तक नहीं है। इसके पीछे बड़ा कारण और उद्देश्य है मास्टर प्रताप सिंह के सम्पादकीयों के महत्व को सामने लाना।

सम्पादकीय (Editorial) में सम्पादक अपनी दृष्टि और विचारों​ से वस्तु और रचना-जगत के यथार्थ को देखते और दिखाते हैं​ तथा सामयिकता के संदर्भ में उपजे सवालों, द्वंद्वों, विरोधाभासों, विसंगतियों और आवश्यकताओं का आकलन करते हुए अपने मूल्य और मंतव्य प्रस्तुत करते हैं।

कई ऐसी पत्रिकाएं रही हैं जिनकी प्रसिद्धि न सिर्फ़ उनमें प्रकाशित सामग्री के कारण रही बल्कि उनके सम्पादकीय के लिए भी रही है। साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर हंस के सम्पादक राजेंद्र यादव और अकार पत्रिका के सम्पादक गिरिराज किशोर के विचारोत्तेजक और भावाकुल सम्पादकीय बड़े पैमाने पर पढ़े जाते रहे हैं। वे अपने पाठकों को जहां सूचना और ज्ञान देते हैं वहीं रस और प्रेरणा भी देते हैं।

मास्टर प्रताप सिंह ज़रूर राजेंद्र यादव और गिरिराज किशोर की तरह स्थापित और महान साहित्य-सर्जक नहीं थे, लेकिन वे ज़मीनी, मौलिक और जनता के बीच निरंतर सक्रिय रहने वाले बौद्धिक व्यक्ति और लेखक थे जिसकी दृष्टि अपने देश-काल पर यथार्थपरक, व्यापक और गहरी थी। दिलचस्प है कि वे अपने जीवन के प्रारंभ में संघ से जुड़े थे, लेकिन जनमुद्दों पर संघी पाखंडों को देख-सुन और झेलकर वे उससे अलग हो गये और अपने को साम्यवादी विचारों और आंदोलनों से जोड़ लिया। अपने सपनों और संघर्षों के लिए उन्होंने पत्रिका प्रेरणा-अंशु को अपना और अपने साथियों का मंच और हथियार बनाया और इस तरह से लघु पत्रिका आंदोलन को भी आगे बढ़ाया। प्रेरणा-अंशु के माध्यम से उन्होंने न सिर्फ़ भाषा और साहित्य की सेवा की बल्कि जनमुद्दों के लिए वैचारिक संघर्ष भी छेड़ा।

प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक पलाश विश्वास ने अगस्त 1995 से मार्च 2018 तक लिखे गये उनके सम्पादकीय प्रस्तुत करते हुए इनकी विशेषता पर लिखा है कि जटिल से जटिल विषय को देशज अंदाज़ में सरल बनाकर वक्तव्य को संप्रेषित करने में वे मास्टर थे। उनके सम्पादकीय में विलक्षण रस-बोध ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ है जो पाठकों को बांधे रखता है।

प्रेरणा-अंशु संभवतः 1986 से निकल रही है। लेकिन अनुपलब्धता के कारण शुरुआती वर्षों के सम्पादकीय इस पुस्तक में नहीं हैं। बीच में कुछ अंकों के भी सम्पादकीय नहीं हैं। लेकिन दो सौ अस्सी पृष्ठों में उनके ज़्यादातर सम्पादकीय शामिल हैं जिनमें जुलाई 2006 से मार्च 2018 के सभी सम्पादकीय हैं।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए हम उन घटनाओं में जा सकते हैं जो सोवियत विघटन, मंडल-कमंडल और उदारीकरण के दौर से वर्तमान मोदी काल तक राष्ट्रीय या प्रादेशिक या स्थानीय स्तर पर अस्तित्व में आकर एक बड़ी हलचल का कारण बनीं। सूचना, सम्वेदना, समझ और संदेश से भरे उनके सम्पादकीय हमें हमारे विगत का दर्शन कराते हैं जिन्हें भूलना या नज़रंदाज़ करना उचित नहीं होगा क्योंकि आजकल इतिहास ऐसे भी बहुत तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। शायद इसी सांदर्भिक प्रयोजनीयता और प्रासंगिकता को लेकर यह पुस्तक हमारे सामने लायी गयी है।

नवम्बर 1994 का सम्पादकीय लेते हैं। इसका शीर्षक है- संघ परिवार का स्वदेशी अभियान

ज्ञातव्य है कि उस समय भाजपा प्रतिपक्षी पार्टी थी और संघ ने उदारीकरण के प्रारंभिक दौर में स्वदेशी का मामला बड़े ज़ोर-शोर से उठाया था। आज संघ के पास राजनीतिक शक्ति है और भाजपा मोदी के नेतृत्व में सत्ता पर क़ाबिज़ है। लेकिन स्वदेशी कहां है ? बिल्कुल नई पीढ़ी को भी यह मालूम होना चाहिए क्योंकि अगर वह इससे अनजान रहती है तो उसे बहकावों से बचाना संभव नहीं होगा।

Keshav Suman
केशव शरण

मास्टर प्रताप सिंह के सम्पादकीयों की यह पुस्तक एक संदर्भ ग्रंथ है जिसमें पिछले तीस सालों का भारत है। इनमें वे समय-समय पर विकास, बज़ट, अर्थव्यवस्था, काला धन, टैक्स, किसानों की आत्महत्या, प्रादेशिक समस्याओं, प्रदेश और भारतीय संघ में विरोध के बिंदुओं, नेताओं, पार्टियों, सरकारों, लोकपाल, चुनावों, रेल, खेल, महामारी, साहित्य, संस्कृति, साम्प्रदायिकता, फासीवाद, भय, भूख, भ्रष्टाचार, महंगाई, धार्मिक पाखंड, पर्यावरण-विनाश, स्त्री-सुरक्षा, जनसंख्या, जुझारू व्यक्तियों, असमानता, अन्याय, न्याय-व्यवस्था, शिक्षा का अधिकार, वैकल्पिक राजनीति, हिंदी भाषा और भारत से जुड़े अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर अपने मूल्यवान विचार रखे हैं। और ये विचार जनता के लिए लड़ने वाले एक ईमानदार और प्रखर बौद्धिक के हैं जो जितना संवेदनशील और संवेदना से परिपूर्ण है उतना ही सजग और निर्भीक है। समयांतर के सम्पादक और लेखक पंकज बिष्ट ने प्रस्तावना में उनके बारे में लिखा है कि अपनी रेडिकल समझ की उन्होंने वह क़ीमत चुकायी जो आज़ाद भारत में हर ईमानदार व्यक्ति को चुकानी पड़ती है। यहां तक कि उन्हें माओवादी घोषित कर जेल में ठूंस दिया गया।

निस्संदेह, मास्टर प्रताप सिंह के ये सम्पादकीय हमारे देश-काल का एक वक़्ती आईना हैं। ये अपने वर्तमान में शिद्दत से लिखे गये हैं इसलिए भविष्य की रूपरेखा तैयार करने में भी काम आने वाले हैं। ये सम्पादकीय कहीं से भी पुराने नहीं पड़े हैं। इनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता इन्हें पढ़ते हुए हम जान पाते हैं।

मास्टर प्रताप सिंह की स्मृति को सादर नमन और भाई पलाश विश्वास जी को साधुवाद कि उन्होंने वह काम किया जो किया जाना चाहिए था। पुस्तकाकार में उनके सम्पादकीय सुविधाजनक ढंग से हमें उपलब्ध हैं जो अपनी जनसंवेदना और इतिहास-दृष्टि के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

केशव शरण

(लेखक प्रतिष्ठित कवि हैं, आजकल वाराणसी में प्रवास कर रहे हैं।)

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