सीएए विरोधी आंदोलन : मैग्सेसे पुरस्कार विजेता ने आदित्यनाथ के नाम खुला पत्र लिखकर कहा, लगते तो आप समझदार हैं

Sandeep Pandey Mohd. Shoaib

Anti-CAA Movement: Magsaysay Award winner wrote an open letter to Adityanath and said, “You seem sensible

Magsaysay Award Winner Dr. Sandeep Pandey’s open letter to Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath

लखनऊ, 26 दिसंबर 2019. सीएए विरोधी आंदोलन में पुलिस जुल्म पर मैग्सेसे पुरस्कार विजेता डॉ. संदीप पाण्डेय ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम खुला पत्र लिखकर सवाल किया है कि देश के अन्य बड़े शहरों में लाखों की भीड़ एकत्र हुई और कहीं कोई हिंसा नहीं हुई, लेकिन उत्तर प्रदेश में ही क्यों हुई ? उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर भी सवाल खड़े किए हैं।

डॉ. संदीप पाण्डेय के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम खुला पत्र का मजमून निम्न है –

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम खुला पत्र

दिनांकः 26 दिसम्बर, 2019

आदरणीय मुख्य मंत्री जी,

मैंने 21 दिसम्बर, 2019 को सुबह आपसे मिलने का समय मांगा था। समय न मिलने पर मैंने सोचा कि इस खुले पत्र के माध्यम से ही अपनी बातें रख दूं। लखनऊ व प्रदेश भर में नागरिकता संशोधन अधिनियम व राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के विरोध में प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और शासन-प्रशासन के रवैए के बारे में कुछ कहना चाहता हूं। देश के दूसरे शहरों में लाखों की भीड़ एकत्र हुई और कोई हिंसा नहीं हुई तो उ.प्र. में क्यों हुई यह सोचने वाली बात है? कुछ अराजक तत्वों की हिंसा के बाद शासन-प्रशासन द्वारा निर्णय लेकर बदले की भावना से जो कार्यवाही की गई है वह तो और भी निंदनीय है क्योंकि एक लोकतंत्र में शासन-प्रशासन से धैर्य व विवेक से काम करने की अपेक्षा की जाती है।

हिंसा अराजक तत्वों ने की है किंतु कार्यवाही ऐसे भी सामाजिक छवि वाले लोगों के खिलाफ की जा रही है जिन्होंने जिन्दगी भर शांतिपूर्ण तरीकों से ही काम किया है और जिनकी इस देश के संविधान में निष्ठा है।

लखनऊ में एडवोकेट मोहम्मद शोएब और सेवा निवृत आई.पी.एस. एस.आर. दारापुरी जो मेरी तरह 19 दिसम्बर, 2019 को अपने-अपने घरों में नजरबंद रहे को गिरफ्तार किया गया है। मो. शोएब लखनऊ विश्वविद्यालय से 1972 में एल.एल.बी. करते समय ही सोशलिस्ट पार्टी के नगर सचिव रहे और आज सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के राज्य अध्यक्ष हैं। उन्होंने 14 ऐसे निर्दोष नवजवानों को न्यायालय से मुकदमा लड़ कर बरी कराया है जिन्हें विभिन्न आतंकी मामलों में आरोपी बनाया गया था। उनके ऊपर न्यायालय के अंदर वकीलों ने हमला किया लेकिन मो. शोएब ने आज तक जीवन में किसी के साथ हिंसा नहीं की है।

दारापुरी जी तो मानवाधिकार व अम्बेडकरवादी कार्यकर्ता हैं और इस राज्य से लोक सभा व विधान सभा के चुनाव लड़ चुके हैं। मैंने उनके साथ 2008 में लखनऊ से जयपुर बम विस्फोट कांड में गिरफ्तार किए गए शाहबाज पर एक तथ्यान्वेषण आख्या तैयार की थी, जिसमें हमने शाहबाज को निर्दोष पाया था, अभी हाल ही में न्यायालय से भी शाहबाज बरी हो गया।

मो. शोएब रिहाई मंच के भी अध्यक्ष हैं जिसके रॉबिन वर्मा, जो विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करते हैं, की पुलिस ने काफी पिटाई भी की और फिर जेल भेजा।

कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता सदफ जफर तो गिरफ्तार होने तक आस-पास हो रही हिंसा को रोकने का प्रयास करती रहीं।

इसी तरह दीपक मिश्र एक सृजनात्मक कार्यकर्ता हैं जो सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं और डॉ. पवन राव अम्बेडकर रायबरेली में प्राध्यापक हैं।

वाराणसी में मेरे जानने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं या छात्रों में अनूप श्रमिक, धनंजय त्रिपाठी, दिवाकर सिंह, राम जनम, शिवराज यादव, एकता, रवि कुमार, सान्या खान, श्रीप्रकाश राय, प्रशांत राय, सतीश सिंह, राज अभिषेक, दीपक राजगुरु, मनीष कुमार, संजीव सिंह, अर्पित गिरी, नरेन्द्र मणि त्रिपाठी, गौरव मणि त्रिपाठी, शाहिद जमाल, छेदीलाल निराला शामिल हैं जिनके बारे में मैं दावे से कह सकता हूं कि वे शांतिपूर्ण तरीकों से ही अपना प्रदर्शन कर रहे थे।

मैंने खुद नागरिकता संशोधन कानून व राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के विरोध में 14 दिसम्बर को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर व 19 दिसम्बर को नजरबंद होते हुए लखनऊ में अपने घर के बाहर प्रदर्शन किया जो शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुए।

यदि आप अराजक लोगों को छोड़ सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल भेजेंगे तो लोकतंत्र में शांतिपूर्ण तरीकों से व संविधान का सम्मान करने वालों के लिए अपना मतभेद व्यक्त करने की जगह समाप्त हो जाएगी व अराजक लोगों का ही बोलबाला रहेगा और आम जनता उन्हीं के प्रभाव में आकर हिंसा के रास्ते चल देगी।

सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है लोगों के सामने सरकार से असहमति व्यक्त करने के रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करना। यह तो तय है कि सामाजिक कार्यकाताओं के प्रभाव में विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण होंगे और उनकी अनुपस्थिति में ऐसे प्रदर्शनों के अराजक होने का खतरा बना रहेगा।

बाकी आप समझदार हैं। यदि अपने निर्णय पर पुनर्विचार कर सकें तो समाज में शांति व व्यवस्था के हित में उपर्लिखित कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस ले लें और सभी निर्दोष लोगों को जेल से रिहा करें।

Release एक बात और कहना चाहता हूं। नागरिकता संशोधन कानून व राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के राष्ट्रव्यापी विरोध के बाद अब कई भारतीय जनता पार्टी के नेता कहने लगे हैं कि मुसलमानों को कोई चिंता करने की जरूरत नहीं हैं। लेकिन उपर्युक्त विरोध प्रदर्शनों के लिए जो मुकदमे दर्ज किए गए हैं उसमें बहुतायत मुस्लिम नामों की है, उदाहरण के लिए थाना हजरतगंज में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट सं. 600/2019 में 39 आरोपियों में 3 को छोड़ शेष मुस्लिम हैं, जबकि विरोध प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम भी शामिल रहे, और प्रदेश में गोली लगने से मारे गए सभी 16 नवजवान मुस्लिम हैं। यदि शासन-प्रशासन मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कार्यवाही करेगा तो क्या मुसलमानों से अपेक्षा की जा सकती है कि वे सरकार के प्रति आश्वस्त रहें?

उम्मीद है आप मेरे पत्र पर कुछ चिंतन-मनन करेंगे।

सप्रेम,

 

  (संदीप पाण्डेय)

उपाध्यक्ष, सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया)

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