राजनीतिक संघर्ष में अन्तोनियो ग्राम्शी का सुझाव

राजनीतिक संघर्ष में अन्तोनियो ग्राम्शी का सुझाव

Antonio Gramsci’s suggestion in political struggle

आज इटली के महान मार्क्सवादी विचारक और क्रांतिकारी अन्तोनियो ग्राम्शी की पुण्यतिथि है (Today is the death anniversary of the great Italian Marxist thinker and revolutionary Antonio Gramsci.)

भौतिकवाद की लहर पर ग्राम्शी का कथन (Gramsci’s statement in Hindi on the wave of materialism)

पूंजीवाद आने के साथ ही  सारी दुनिया में भौतिकवाद की लहर आई, ग्राम्शी ने लिखा “इस लहर का अर्थ है पूंजीवादी सत्ता संकट में है। शासकवर्ग ने अपनी सहमति के आधार को खो दिया है यानी अब समाज को नेतृत्व प्रदान करने में समर्थ नहीं रह गया है। बल्कि “प्रभुताशाली” भर रह गया है जो केवल बल प्रयोग करता है। इसका अर्थ यह भी है कि विशाल जनसमूहों ने अपनी परंपरागत विचारधाराओं से संबंध विच्छेद कर लिया है। अब वे उन बातों में विश्वास नहीं करते जिनमें पूर्वकाल में रखते थे। यह संकट ठीक इस तथ्य में निहित है कि जो पुरातन है वह मृत्युशय्या पर है लेकिन नूतन का जन्म नहीं हो सकता। इस अंतराल में विविध प्रकार के अस्वस्थ और वीभत्स लक्षण प्रकट हो रहे हैं।”

भारत के स्वाधीनता संग्राम का ग्राम्शी का विश्लेषण

ग्राम्शी ने राजनीतिक संघर्ष और सैनिक संग्राम के अंतर्संबंध (The Interrelationship of Political Struggle and Military Struggle), पर विचार करते हुए भारत के स्वाधीनता संग्राम का बड़ा सुंदर विश्लेषण किया है।

ग्राम्शी ने लिखा है, “सैनिक युद्ध में रणनीतिक लक्ष्य होता है शत्रु की सेना का विनाश और उसके भूभाग पर कब्जा। जब यह लक्ष्य प्राप्त हो जाता है तो शांति स्थापित हो जाती है। यह भी देखना चाहिए कि युद्ध की समाप्ति के लिए यह पर्याप्त है कि रणनीतिक लक्ष्य केवल भावी क्षमता के संदर्भ में प्राप्त हो जाएं; दूसरे शब्दों में यह काफी है कि अब इस बात में किसी तरह का संदेह नहीं कि फौज आगे संघर्ष जारी नहीं रख सकती। इसलिए विजयी सेना शत्रु के भूभाग पर कब्जा कर सकती है। राजनीतिक संघर्ष इसकी अपेक्षा बहुत अधिक जटिल है।”

इसी परिप्रेक्ष्य में ग्राम्शी ने भारत के स्वाधीनता संग्राम का विवेचन किया है। लिखा है –

“अंग्रेजों के विरूद्ध भारत के राजनीतिक संघर्ष के अंतर्गत युद्ध के तीन स्वरूप निहित हैं – गति का युद्ध, स्थिति का युद्ध और भूमिगत लड़ाई। गांधी का निष्क्रिय प्रतिरोध स्थिति का युद्ध है और जो कुछ क्षणों में गति का युद्ध और कुछ अन्य क्षणों में भूमिगत लड़ाई बन जाता है। बहिष्कार स्थिति के युद्ध का एक स्वरूप है। हड़तालें गति के युद्ध का रूप हैं। हथियारों और लड़ाकू फौज की गुप्त तैयारी भूमिगत लड़ाई के अंग हैं। कमांडो किस्म की गतिविधियां भी पाई जाती हैं। लेकिन उनका उपयोग बड़ी सावधानी से किया जाना चाहिए। अगर अंग्रेजों को यकीन हो जाए कि एक विशाल विप्लवी आंदोलन की तैयारी की जा रही है तो वे उनकी वर्तमान रणनीतिक श्रेष्ठता को जनता की दमघोंटू नीति के द्वारा नष्ट कर देंगे।”

इसी क्रम में ग्राम्शी ने लिखा- “युद्ध का अनुभव केवल प्रेरणा दे सकता है। प्रतिमान का काम नहीं कर सकता।” प्रतिमान राजनीतिक संघर्ष में बनते हैं, युद्ध में नहीं।

हमारे देश में ऐसे क्रांतिकारी है जो क्रांति को सैन्य प्रतिमानों के आधार सम्पन्न करने में लगे हैं, माओवादी, नक्सल आदि इनमें प्रमुख हैं। इस तरह के लोगों को ध्यान में रखकर ही अन्तोनियो ग्राम्शी ने लिखा है- “सैनिक प्रतिमान पर अपने मन को केन्द्रित करना मूर्खता की निशानी है।”

ग्राम्शी ने लिखा है- “राजनीतिक संघर्ष में शासकवर्ग के तरीकों की नकल नहीं करनी चाहिए। नहीं तो दुश्मन छिपकर बड़ी आसानी से आप पर वार कर सकता है। इस बात को हमेशा दिमाग में रखना चाहिए। वर्तमान संघर्षों में अक्सर ऐसा होता रहता है। एक कमजोर राजसत्ता ऐसी फौज की तरह है जिसके हौसले पस्त हो चुके हैं।”

जगदीश्वर चतुर्वेदी

(Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।)

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