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क्या धर्मांतरण निरोधक कानून मुसलमानों को आदतन अपराधी सिद्ध करने की कवायद हैं?

Are anti-conversion laws an exercise to criminalize Muslims habitually?

गत 17 जून 2021 को माया (परिवर्तित नाम) बड़ौदा के गोतरी पुलिस थाने में पहुंची. वह अपने पति समीर अब्दुल कुरैशी द्वारा उसके साथ मारपीट करने की शिकायत करने वहां गई थी. जाहिर है कि यह घरेलू हिंसा का मामला था परंतु पुलिस ने उसके पति के खिलाफ गुजरात धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) अधिनियम, 2021 (Gujarat Freedom of Religion (Amendment) Act, 2021) के तहत प्रकरण दर्ज कर लिया. उस पर यह आरोप लगाया गया कि उसने माया का जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाकर उससे विवाह किया.

भारत में जिन राज्यों में धर्मांतरण निरोधक अधिनियम लागू हैं वहां इस तरह की घटनाएं आम हैं. इन कानूनों का इस्तेमाल अन्तर्धार्मिक विवाहों पर रोक लगाने और मुस्लिम पुरूषों को लव जिहादकरने के आरोप में सलाखों के पीछे डालने के लिए किया जा रहा है. इस प्रक्रिया में मुस्लिम युवकों की छवि आदतन अपराधियों की सी बन रही है और उन्हें दूसराबताया जा रहा है. इन कानूनों के कारण अपनी पसंद के पुरूष से विवाह करने की महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकार भी प्रभावित हुआ है.

माया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. उसे गुमान ही न था कि पति द्वारा मारपीट के मामूली अपराध की शिकायत करने के इतने गंभीर नतीजे होंगे. माया के पति पर काल्पनिक आरोप लगाते हुए उसे अत्यंत सख्त धर्मांतरण निरोधक कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस ने समीर अब्दुल कुरैशी के खिलाफ जो प्रकरण दर्ज किया उसमें माया की शिकायत का कोई जिक्र ही नहीं था.

सामाजिक कार्यकर्ता होफिजा उजेनी, समीरा मलिक, खेरूनिन्सा पठान और खेरूनिन्सा सैयद के एक तथ्यानंवेषण दल ने बड़ौदा जाकर इस प्रकरण के पीछे के सच को उजागर किया. उन्होंने पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर की प्रति प्राप्त की और माया ने इस आशय का शपथपत्र उन्हें दिया कि उसने अपने पति के खिलाफ वे बातें कही ही नहीं थीं जो एफआईआर में लिखी हैं.

पुलिस द्वारा दायर एफआईआर (जी हां, पुलिस द्वारा, फरियादी द्वारा नहीं) में निम्न बातें कही गई हैं: माया से समीर अब्दुल कुरैशी ने फरवरी 2019 में सोशल मीडिया के जरिए दोस्ती की. उसने माया को अपना नाम सेम मार्टिन बताया जिससे माया को लगा कि वह ईसाई है. उसके बाद वह माया को जबरदस्ती एक होटल में ले गया जहां उसने माया के साथ ओरल व अप्राकृतिक संभोग किया. ऐसा उसने कई अलग-अलग मौकों पर किया और माया की जानकारी के बिना उसकी नग्न तस्वीरें ले लीं. इसके बाद उसने माया को धमकी दी कि वह इन तस्वीरों को वायरल कर देगा. दोनों के बीच यौन संबंधों के कारण माया तीन बार गर्भवती हुई. दो बार उसे गोलियां खाकर गर्भपात करने पर मजबूर किया गया. तीसरी बार चूंकि गर्भधारण हुए काफी दिन बीत गए थे इसलिए माया को एक अस्पताल में ले जाकर उसका गर्भपात करवाया गया. उसके बाद समीर माया को जबरदस्ती एक धर्मस्थल में ले गया जहां उसका धर्मपरिवर्तन करवाया गया और उसे एक नया नाम दिया गया – सुहाना बानू. तत्पश्चात समीर कुरैशी ने माया से जबरदस्ती निकाह कर लिया.

यह कहानी हिन्दुत्व के झंडाबरदारों द्वारा अत्यंत धूर्ततापूर्वक गढ़ी गई मुस्लिम पुरूषों की इस छवि से मेल खाती है कि वे लंपट और सेक्स के भूखे होते हैं, हिन्दू महिलाओं को अपने प्रेमजाल में फंसाकर उनके साथ बलात्कार करते हैं और फिर उन्हें मुसलमान बनाकर जबरदस्ती उनके साथ निकाह कर लेते हैं. यह एक सदियों पुराने रूपक का नया संस्करण है जिसमें महिलाओं का शरीर विजयी या शक्तिशाली पुरूष का होता है. वे युद्ध में विजय का इनाम होती हैं और उनकी स्वयं की इच्छा का कोई महत्व नहीं होता.

इस मामले में आरोप यह था कि माया के साथ पहले जोर-जबरदस्ती से शारीरिक संबंध बनाए गए और उसके बाद उसे जबरदस्ती मुसलमान बना दिया गया.

एफआईआर में आगे कहा गया कि माया अपने पति और उसके माता-पिता के साथ रहने लगी परंतु वहां भी उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया और उसे अपने मूल धर्म का आचरण नहीं करने दिया गया. उस पर यह दबाव डाला गया कि वह अपने नए धर्म का पालन करे. जब उसने समीर और उसके परिवारवालों के धर्म का पालन करने से इंकार कर दिया तो उसे शारीरिक यंत्रणा दी गई. उसके ससुराल वाले भी उसके शरीर का उपभोग करते थे. उसकी जिंदगी खतरे में थी और वह गंभीर शारीरिक व मानसिक यंत्रणा से गुजर रही है. यह आख्यान मुस्लिम पुरूषों को नीचता और अनैतिकता का पर्याय सिद्ध करता है.

इस तरह के मामले की जानकारी जिसे भी मिलेगी वह इस प्रचार में विश्वास करने लगेगा कि मुस्लिम पुरूष अपनी असली पहचान छिपाकर हिन्दू महिलाओं को सोशल मीडिया के जरिए अपने जाल में फंसाते हैं, उनके साथ बलात्कार करते हैं और फिर उन्हें मुसलमान बना लेते हैं.

माया को जब एफआईआर की प्रति मिली तो उसे पढ़कर वह भौचक्की रह गई. वह एफआईआर पूरी तरह से झूठ थी. उसने अदालत में शपथपत्र दाखिल कर अपना पक्ष रखा. चौबीस जून, 2021 को दाखिल इस शपथपत्र में माया ने जो तथ्य बताए वे एफआईआर से बिल्कुल मेल नहीं खाते.

उसने कहा कि समीर से उसकी दोस्ती फरवरी 2019 में इंस्टाग्राम के जरिए हुई थी. इंस्टाग्राम में उसका एकाउंट नेम सेम मार्टिन राईडरथा परंतु उसके नीचे साफ शब्दों में समीर कुरैशीभी लिखा हुआ था. अतः माया को यह पता था कि समीर मुसलमान है. उनकी मित्रता बढ़ती गई और वे अक्सर एक-दूसरे से मिलने लगे. बाद में वे प्रेमी-प्रेमिका बन गए. माया ने लिखा कि वे लोग अक्सर होटलों में जाया करते थे और वहां शारीरिक संबंध भी बनाते थे. परंतु ये संबंध पूरी तरह से परस्पर सहमति से हुए थे और उसने अपनी इच्छा से समीर के साथ संभोग किया था. उसके साथ कोई जबरदस्ती नहीं की गई थी.

उसने यह भी स्वीकार किया कि वह गर्भवती हो गई थी परंतु उसने अपनी मर्जी से गर्भपात करवाया था. इसका कारण यह था कि समीर उस समय अवयस्क था और उससे विवाह नहीं कर सकता था. माया को डर था कि अगर उसकी गर्भावस्था की बात लोगों को पता चलेगी तो उसकी बदनामी होगी. अतः उसने अपनी मर्जी से गर्भ गिराने के लिए गोलियां लीं. समीर ने उसे गर्भपात करने के लिए मजबूर नहीं किया. दूसरी बार गर्भवती होने के बाद वह समीर के साथ गर्भपात करवाने के लिए अस्पताल गई. उसने कहा कि वह अपनी मर्जी से अस्पताल गई थी और समीर ने उसे मजबूर नहीं किया था.

उसने एफआईआर में लगाए गए इस आरोप को पूरी तरह से गलत बताया कि समीर ने जबरदस्ती उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किए या नग्नावस्था में उसकी फोटो खींचीं या उन फोटो को वायरल करने की धमकी दी. उसने शपथपूर्वक कहा कि जो आरोप एफआईआर में लगाए गए हैं वे उसने नहीं लगाए हैं.

उसने यह भी स्पष्ट किया कि समीर के धर्म से उसके परिवार के लोग अनजान नहीं थे. समीर अक्सर उससे और उसके माता-पिता से मिलने उसके घर आया करता था. समीर को यह पता था कि माया दलित है और माया को यह पता था कि समीर मुसलमान है. समीर के वयस्क हो जाने के बाद दोनों ने विवाह किया. यह विवाह दोनों परिवारों की सहमति से और उपस्थिति में हुआ था. दोनों के बीच 16 फरवरी 2021 को निकाह हुआ. इसके बाद दोनों ने 22 मार्च को विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह किया. इस विवाह के कागजातों पर बतौर गवाह माया के माता-पिता के हस्ताक्षर हैं.

हिन्दू जागरण मंच के नीरज जैन इस मामले को हवा देने में जुटे हुए थे. उनका दावा है कि माया के परिवार वालों ने उनसे संपर्क किया था और कहा था कि उन्हें समीर के मुसलमान होने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.

यह हास्यास्पद है क्योंकि माया और समीर के विवाह के प्रमाणपत्र में समीर का धर्म स्पष्ट शब्दों में उल्लेखित है. इसके अलावा माया ने अदालत में प्रस्तुत अपने शपथपत्र में भी कहा है कि विवाह के पहले से ही माया और उसके माता-पिता दोनों को समीर के मुसलमान होने के बारे में पता था. यह आरोप हास्यास्पद तो है परंतु आश्चर्यजनक नहीं.

हिन्दुत्व के रक्षकों की ब्रिगेड लगातार शिकार की तलाश में रहती है. वह महिलाओं और उनके परिवारों को झूठी शिकायतें और एफआइआर दर्ज करवाने के लिए मजबूर करती है. हिन्दुत्व संगठनों की संख्या और उनकी ताकत इसलिए बढ़ती जा रही है क्योंकि उनके अनैतिक और गैरकानूनी कामों के लिए उन्हें कोई सजा नहीं मिलती. चाहे वह लिंचिंग हो, नैतिक पुलिस के रूप में की गई कार्यवाहियां हों या रोमिओ दल हों. उन्हें सरकार का समर्थन प्राप्त रहता है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आणंद पुलिस ने सन् 2020 में हिन्दू जागरण मंच द्वारा आयोजित एक गैरकानूनी आमसभा में दिए गए भड़काऊ भाषणों के सिलसिले में दायर प्रकरण में नीरज जैन को आरोपी बनाया है.

माया ने अपने शपथपत्र में इस आरोप का भी खंडन किया कि उसके ससुराल वाले उसे शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे. उसने कहा कि समीर के परिवारजन उसके साथ अच्छा व्यवहार करते थे परंतु चूंकि माया और उसके ससुराल वालों के धर्म अलग-अलग थे इसलिए उनके बीच कुछ सांस्कृतिक मतभेद थे जिनके कारण कब जब उनके बीच बहस और झगड़े होते थे. इनसे परेशान होकर वह अपने माता-पिता के घर चली गई थी और उसने अपने पति के खिलाफ उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी. परंतु उसने साफ शब्दों में कहा कि उसने अपनी शिकायत में कहीं भी धर्मपरिवर्तन या जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने की बात नहीं कही थी.

शपथपत्र में उसने कहा कि न तो समीर और ना ही उसके परिवारजनों ने कभी उसकी जाति को लेकर उस पर कोई टिप्पणी की. उसने यह भी कहा कि एफआईआर की प्रति पढ़ने के बाद उसे सदमा लगा क्योंकि उसमें समीर और उसके परिवारजनों पर जो आरोप लगाए गए थे उनसे उन लोगों के अलावा उसकी स्वयं की बदनामी भी हो रही थी. उसने कहा कि वह अपने पति से अब भी प्यार करती है और उसके साथ रहना चाहती है. उसने पुलिस से कहा कि समीर और उसके परिवार वालों के खिलाफ लगाए गए अनर्गल आरोप वापस लिए जाएं. माया ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर एफआईआर रद्द किए जाने की मांग भी की.

इस प्रकरण से हमें क्या पता चलता है?

इससे हमें यह पता चलता है कि एसआईटी द्वारा कानपुर में और एनआईए द्वारा कई स्थानों पर अन्तर्धार्मिक विवाहों की पड़ताल में उनके पीछे कोई आपराधिक षड़यंत्र न होने की बात सामने आने के बाद भी सत्ताधारी चाहते हैं कि साम्प्रदायिकता की हांडी में उबाल आता रहे. इससे न केवल लोगों के दिमाग में मुसलमानों की छवि कपटी और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की बनाने में मदद मिलती है बल्कि पुलिस को भी यह लगता है कि उसे मुस्लिम युवकों के खिलाफ बेबुनियाद और झूठे प्रकरण कायम करने का लाईसेंस मिल गया है. अंतर्धार्मिक विवाहों के प्रकरणों में पुलिस मनमाने ढंग से मुस्लिम युवकों को गुजरात धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) अधिनियम, 2021 जैसे भयावह कानूनों के अंतर्गत गिरफ्तार कर जेल में डाल रही है. जो आरोप पुलिस लगाती है उनमें सत्य का एक अंश भी नहीं होता. महिलाएं जो कहती हैं उसे तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता है.

इस साल 8 जुलाई तक उत्तरप्रदेश गैरकानूनी धर्मपरिवर्तन अधिनियम के अंतर्गत अब तक 63 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं. इनमें से 7 प्रकरणों को आरोपियों के खिलाफ कोई सुबूत न मिलने के कारण बंद कर दिया गया है. इन मामलों में 80 लोग जेलों में हैं.

सवाल यह है कि पुलिस इस तरह की कार्यवाहियां क्यों कर रही है?

पुलिस केवल अपने राजनैतिक आकाओं के दिखाए रास्ते पर चल रही है. पुलिस सत्ताधारी दल के विचारधारात्मक एजेंडे को लागू कर रही है. धर्मांतरण निरोधक कानून बनाकर और अंतर्धार्मिक विवाहों को इन कानूनों की परिधि में लाकर लव जिहाद के दुष्प्रचार को औचित्यपूर्ण ठहराना और मुसलमानों को परेशान करने को कानूनी जामा पहनाना आसान बना दिया गया है. पुलिस अधिकारी अपनी पदोन्नति और पदस्थापना के लिए सरकार की मेहरबानी पर निर्भर रहते हैं और इसलिए उन्हें खुश करने के लिए वे मुस्लिम युवकों को झूठे प्रकरणों में फंसाने हेतु किसी भी हद तक जाने में संकोच नहीं करते. माया के मामले में कानून को पूर्ववर्ती प्रभाव से लागू किया गया. माया और समीर का विवाह 22 मार्च 2021 को हुआ था जबकि गुजरात धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) अधिनियम, 2021 15 जून 2021 से लागू हुआ था.

धर्मांतरण निरोधक कानूनों पर चर्चा में महिलाओं से संबंधित पहलू को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. महिलाओं के अधिकार और उनकी इच्छा का कोई महत्व ही नहीं रहता. भारत जैसे देश में जहां सभी धर्मों, जातियों और वर्गों में घरेलू हिंसा आम है वहां यदि घरेलू हिंसा के मामलों को इस तरह से तोड़ा-मरोड़ा जाता रहेगा तो महिलाएं पुलिस के पास जाने में हिचकिचाने लगेंगीं क्योंकि उन्हें यह आशंका होगी कि उनकी शिकायत को आधार बनाकर पुलिस उनके पतियों को गंभीर आरोपों में फंसा देगी. वे घरेलू हिंसा का शिकार होते रहना पसंद करेंगीं बनिस्बत इसके कि उनकी शिकायत के आधार पर राजनीति से प्रेरित झूठे प्रकरण कायम कर उनके वैवाहिक संबंधों को पूरी तरह नष्ट कर दिया जाए. माया ने साफ कहा है कि वह अभी भी समीर से प्यार करती है और उसके साथ रहना चाहती है.

घरेलू हिंसा अथवा प्रताड़ना का शिकार होने वाली अधिकांश महिलाएं अपने विवाह को बचाने के विकल्प को खुला रखना चाहती हैं. धर्मांतरण से संबंधित कानून महिलाओं को उनके समुदायों और परिवारों की संपत्ति की तरह देखते हैं ना कि ऐसे स्वतंत्र व्यक्तियों के रूप में जिनके अपने अधिकार और इच्छाएं हैं.

कुल मिलाकर हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि इन कानूनों और उनके प्रभावों पर गंभीरता से पुनर्विचार किया जाएगा. जो पुलिस अधिकारी मुस्लिम युवकों का अपराधीकरण करने के लिए षड़यंत्र रचते हैं उन्हें उपयुक्त सजा दी जानी चाहिए. इस मुद्दे पर भी विस्तार से बहस और विचार-विनिमय की आवश्यकता है कि इन कानूनों से महिलाएं किस तरह का प्रभावित हो रही हैं.

– नेहा दाबाड़े

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनूदित)

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