Home » Latest » कैराना से कथित पलायन : वोट की राजनीति, समाज को बांटकर वोट कबाड़ने की कवायद
kairana

कैराना से कथित पलायन : वोट की राजनीति, समाज को बांटकर वोट कबाड़ने की कवायद

ARTICLE BY DR. RAM PUNIYANI – Manufacturing Divisive Slant

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कस्बा कैराना (Kairana, a town in western Uttar Pradesh) बार फिर सुर्खियों में है। चूँकि यूपी में चुनाव है और किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिन्दू-मुसलमान के बीच के सांप्रदायिक विभाजन (Hindu-Muslim communal divide in western Uttar Pradesh) को पाट दिया है तो भाजपा की परेशानियां बढ़ गई हैं। कैराना से पलायन का मुद्दा (The issue of migration from Kairana) पहले भी उठा था और इसे उठाने वाले कैराना लोकसभा चुनाव क्षेत्र से 2014 में निर्वाचित भाजपा सांसद हुकुम सिंह (BJP MP Hukum Singh elected in 2014 from Kairana Lok Sabha Constituency) ने इस मुद्दे पर अपनी गलती स्वीकार कर ली थी। आईआईटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ राम पुनियानी का लेख (Article by Dr Ram Puniyani, former IIT professor) “कैराना के किराने से भाजपा का चुनावी भोजन?” हस्तक्षेप पर 17 जून 2016 को प्रकाशित हुआ था। उक्त लेख में कैराना से पलायन का सच क्या है (What is the truth of migration from Kairana), बतलाने की कोशिश की गई थी। वर्तमान संदर्भों में उक्त लेख प्रासंगिक हो चुका है, इसलिए इसका किंचित् रूप में पुनर्प्रकाशन किया जा रहा है। साथ ही कैराना से डीबी लाइव की लाइव रिपोर्टिंग का एक वीडियो (A video of DB Live’s live reporting from Kairana) भी एम्बेड है। उसे भी देखें.. शेयर भी करें… 

कैराना से ‘पलायन’ (‘Exodus’ from Kairana)

-राम पुनियानी

सन 2014 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में भड़के सांप्रदायिक हिंसा के दावानल में 80 मुसलमान मारे गए थे और हज़ारों को अपने घर-गांव छोड़कर भागना पड़ा था। ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश में सन 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर, भाजपा ने अपनी दंगा भड़काऊ मशीनरी को पुनः सक्रिय कर दिया है।

कैराना लोकसभा चुनाव क्षेत्र से निर्वाचित भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने हाल में यह दावा किया कि उत्तरप्रदेश के मुस्लिम-बहुल कैराना शहर से सैंकड़ों हिंदू परिवारों को मजबूरी में पलायन करना पड़ा है।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इलाहाबाद में 12-13 जून, 2016 को आयोजित पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस मुद्दे को उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर सनसनी फैलाने की कोशिश की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी बैठक में भाषण दिया परंतु जैसी कि परंपरा सी बन गई है, उन्होंने केवल विकास की बात की और सांप्रदायिकता की आग भड़काने का काम शाह पर छोड़ दिया।

प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार पर हमला बोलते हुए शाह ने आह्वान किया कि राज्य की जनता को ऐसी पार्टी की सरकार को उखाड़ फेंकना चाहिए जो कैराना से ‘‘पलायन’’ रोकने में असफल रही है।

समाज को बांटकर वोट कबाड़ने की कवायद

बैठक में भाजपा नेताओं ने कश्मीरी पंडितों के ‘‘पलायन’’ की ओर इशारा करते हुए कहा कि कैराना, दूसरा कश्मीर बनने की राह पर है। हुकुम सिंह ने ऐसे 346 हिंदू परिवारों की सूची जारी की, जो उनके अनुसार कैराना छोड़कर चले गए थे। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी इसकी शिकायत की गई और आयोग ने तुरंत राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दिया।

बैठक के अगले दिन, हुकुम सिंह अपनी बात से कुछ पीछे हटते दिखे। उन्होंने कहा कि

‘‘मेरी टीम के किसी सदस्य ने गलती से हिंदू परिवार शब्द का उपयोग कर दिया। मैंने उसे बदलने को कहा था। मैं अपनी इस बात पर कायम हूं कि यह हिंदू-मुस्लिम मसला नहीं है। यह केवल उन लोगों की सूची है, जिन्हें मजबूरी में कैराना छोड़कर जाना पड़ा है।’’

पलटे हुकुम सिंह

दो बड़े राष्ट्रीय अखबारों ने सूची की पड़ताल की। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी मामले की जांच के आदेश दिए। समाचारपत्रों की पड़ताल से यह जाहिर हुआ कि ‘‘सूची में ऐसे लोगों के नाम हैं जो मर चुके हैं, जो दस साल या उससे भी पहले कैराना छोड़कर चले गए थे और ऐसे लोगों के भी, जिन्होंने बताया कि वे अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अच्छे स्कूल या अच्छी नौकरी की तलाश में दूसरे शहरों में जा बसे हैं’’ (द इंडियन एक्सप्रेस, 14 जून, 2016)।

ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि मुस्लिम गुंडों के गिरोह हिंदुओं को आतंकित कर रहे हैं। इनमें से एक नाम मुकीम काला नामक अपराधी के गिरोह (gang of criminals named mukim kala) का बताया जा रहा है। दिलचस्प यह है कि जब काला को पिछले साल गिरफ्तार किया गया था, तब उस पर 14 व्यक्तियों की हत्या के आरोप थे। इनमें से 11 मुसलमान और 3 हिंदू थे। स्थानीय प्रशासन ने जब सूची की जांच की तो उसने पाया कि 119 व्यक्तियों में से 66 पांच साल पहले ही अपने घर छोड़ गए थे

(हिंदुस्तान टाईम्स, 14 जून, 2016)।

भाजपा क्या करना चाह रही है, यह समझना मुश्किल तो नहीं

वह उत्तरप्रदेश के एक मुस्लिम-बहुल इलाके से हिंदुओं के कथित पलायन को मुद्दा बनाकर भावनाएं भड़काना चाहती है। आग में घी डालने के लिए उसने इसकी तुलना कश्मीर घाटी से पंडितों के पलायन से करनी शुरू कर दी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सत्ताधारी दल के ज़िम्मेदार नेता एक ऐसे व्यक्ति के दावे के समर्थन में सार्वजनिक वक्तव्य जारी कर रहे हैं, जो स्वयं अपनी बात से पीछे हट रहा है।

सच यह है कि मुंबई और अहमदाबाद जैसे शहरों में सुनियोजित ढंग से मुसलमानों को उनकी बस्तियों में कैद कर दिया गया है। सन 1992-93 की मुंबई हिंसा के बाद इस प्रक्रिया में तेज़ी आई। मुम्बरा, भिंडी बाज़ार व जोगेश्वरी ऐसे इलाकों में शामिल हैं, जहां मुसलमानों की आबादी केंद्रित हो गई है। शहर के बाकी इलाकों में बिल्डरों ने मुसलमानों को मकान बेचना और किराए पर देना बंद कर दिया है। अहमदाबाद में हालात इससे भी खराब हैं। वहां जुहापुरा जैसी कई ऐसी बस्तियां बस गई हैं जहां केवल मुसलमान रहते हैं। इन बस्तियों को सांप्रदायिक तत्व ‘मिनी पाकिस्तान’ बताते हैं और वहां नागरिक सुविधाओं का नितांत अभाव है।

कैराना के पड़ोस में स्थित मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा (communal violence in muzaffarnagar) के बाद मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था। वहां लव जिहाद के मुद्दे का इस्तेमाल सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए किया गया था। एक भाजपा विधायक ने सोशल मीडिया पर ऐसी वीडियो क्लिप अपलोड की, जिसमें मुसलमानों की एक भीड़ को दो युवकों की पीट-पीटकर हत्या करते हुए दिखाया गया था। बाद में यह सामने आया कि यह क्लिप पाकिस्तान की थी। इसके बाद कई महापंचायतें आयोजित की गईं, जिनमें ‘‘बहू-बेटी बचाओ’’ अभियान शुरू करने की बात कही गई।

मुजफ्फरनगर में हुई भयावह हिंसा में बड़ी संख्या में मुसलमानों के घर नष्ट कर दिए गए। कई गांवों को मुस्लिम-मुक्त क्षेत्र बना दिया गया।

आधारहीन दुष्प्रचार

उत्तर प्रदेश में गौमांस के मुद्दे पर भी हिंसा भड़काई गई और मोहम्मद अखलाक नाम के आदमी की खून की प्यासी भीड़ ने पीट-पीटकर जान ले ली। घटना के आठ महीने बाद, अब एक दूसरी लेबोरेटरी में की गई जांच के आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि अखलाक के घर से जो मांस मिला था, वह गाय का था। इस मुद्दे पर महापंचायतों को फिर से सक्रिय करने की कोशिश की जा रही है।

कुछ टीवी चैनल और समाचारपत्र, कैराना के मुद्दे पर आधारहीन दुष्प्रचार कर रहे हैं। इससे सांप्रदायिकता का ज़हर और फैल रहा है।

येल विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह सामने आया था कि जिन भी इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा होती है, वहां भाजपा को चुनावों में फायदा होता है।

 कैराना से कथित पलायन की बात भी वोट की राजनीति का हिस्सा है। यह देखना बाकी है कि मीडिया द्वारा हुकुम सिंह के दावे के झूठ को बेनकाब किए जाने के बाद, भाजपा इस मुद्दे पर कायम रहती है या उससे पीछे हटती है।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

कैराना से ‘पलायन’ पर डॉ राम पुनियानी का लेख

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

हमारे बारे में Guest writer

Check Also

national news

भारत में मौत की जाति 

Death caste in India! क्या मौत की जाति भी होती है? यह कहना अजीब लग …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.