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ramesh kuntal megh

परंपरा के अध्ययन के निर्जीव अकादमिक ढाँचे की भेंट चढ़ा रमेश कुंतल मेघ का ग्रंथ मध्ययुगीन रस-दर्शन और समकालीन सौन्दर्यबोध

Arun Maheshwari on Ramesh Kuntal Megh

(‘बनास जनपत्रिका का 52वां अंक हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ वयोवृद्ध आलोचक, सौन्दर्य चिंतक श्री रमेश कुंतल मेघ के कृतित्व पर केंद्रित एक मूल्यवान विशेषांक है जिसका संपादक जाने-माने आलोचक श्री प्रदीप सक्सेना ने किया है। इस अंक का शीर्षक रखा गया है – मेघ : सौन्दर्य चिंतन के वातायन ‘बनास जन’ के इस अंक में प्रकाशित अरुण माहेश्वरी का लेख)

परंपरा के अध्ययन के निर्जीव अकादमिक ढाँचे की भेंट चढ़ा मेघ जी का ग्रंथ — ‘मध्ययुगीन रस-दर्शन और समकालीन सौन्दर्यबोध’

  • अरुण माहेश्वरी

डा. रमेश कुंतल मेघ हिंदी के ऐसे विशिष्ट भाष्यकार-चिंतक है जिनकी विशिष्टता बिल्कुल पहली नजर में, सतह पर ही आलोचना के क्षेत्र में उनके विशिष्ट भाषाई प्रयोगों से जाहिर हो जाती है। उनकी भाषा में कहे तो वे हिंदी के एक विशिष्ट आलोचिंतक है। कुछ लोगों का तो मानना है कि उनकी भाषा ही उन्हें अलग और अनन्य बनाती है, आलोचना की मूलधारा की पाँत से कुछ इस प्रकार भिन्न बनाती है कि उनके कामों के सम्यक मूल्यांकन तक में एक बाधा उत्पन्न होती है। भाषा का स्वरूप ही उनके लेखन के अर्थों में बाधा बन कर उसकी लाक्षणिक विशिष्टता बन जाता है ; आलोचक और आलोचिंतक के बीच के फर्क पर विचार की एक नई चुनौती पेश करता है।

बहरहाल, मेघ जी के कामों की प्रकृति का विश्लेषण करने पर हमें वे मूलतः साहित्य और मनुष्य के चित्त से जुड़े साहित्य के सौन्दर्यशास्त्रीय विषयों पर शास्त्रीय चर्चाओं के एक विशिष्ट अकादमिक भाष्यकार नजर आते हैं। यह सही है कि कोई भी भाष्यकार कब खुद एक विचारक के रूप में सामने आ जाता है, इसका पूर्वानुमान करना कठिन होता है। पर मेघ जी जिन भाष्यकारों को “अपनी गहरी अनुभूति और दार्शनिक प्रतिबद्धता के चलते टीकाओं तथा भाष्यों तक में विचार के कलश छलका देने वाले कथित आधुनिक भाष्यकार” कहते हैं, हमारी नजर में उनके विचारों के कलश का तभी कोई भिन्न पहचानमूलक अर्थ हो सकता है जब वे अकादमिक लेखन के ढर्रेवर ढांचे के दायरे में विकसित होने वाले विषय के सर्वाधिक अमूर्त बिंदु से विषय के विमर्श को दूर करते हुए एक अन्य सुदीर्घ विमर्श की परंपरा का सूत्रपात करते हैं, अर्थात्, विमर्श की एक नई धारा से विषय की पारंपरिक अकादमिक आलोचना को समस्याग्रस्त बनाते हैं। यही वह बिंदु होता है जहां से भाष्यकार के विचारक रूप के संकेत मिलते हैं। चिंतन की पारंपरिक धारा को एक अर्थ में सजीव रखते हुए भी एक अन्य विमर्श की लंबी यात्रा की  ओर बढ़ना ही चिंतन के पूर्व, पारंपरिक स्वरूप को समस्याग्रस्त करता है।

इस मानदंड पर जब भी हम मेघ जी के कामों की प्रकृति पर गौर करते हैं तो उनके तमाम नए भाषाई प्रयोगों और कई नए विषयों की उद्भावना के बावजूद वह पारंपरिक अकादमिक ढांचे के लिए ऐसी कोई बड़ी समस्या उत्पन्न करता हुआ नहीं जान पड़ता है जिससे उन्हें शास्त्रीय विषयों के एक और टीकाकार से अलग किसी अन्य कोटि में रखा जा सके, अर्थात् उनके लेखन के जरिए किसी नई समस्या का साक्षात्कार किया जा सके ; अथवा ऐसा लगे कि उनके लेखन से हिंदी आलोचना के लिए कोई नई समस्या पैदा होती है। जहां तक उनके नए पारिभाषिक शाब्दिक प्रयोगों का सवाल हैं, शब्द और भाषा के स्वरूप नहीं, उनकी सांकेतिकता जो प्रतीकात्मक जगत के नए दिगंतों से संबंध और नई संभावनाओं की संवाहक होती है, वह उनकी एकांतिकता के तर्क को पैदा करती है। इसीलिए जब हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मेघ जी के ग्रंथ ‘अथातो सौन्दर्य जिज्ञासा’ पर टिप्पणी करते हुए उनकी हिंदी को हिंदी बनाने की बात कही थी तो उसका शायद यही कारण था कि वे इस अपने किस्म के भिन्न भाषाई स्वरूप के पीछे सिवाय अहम्-केंद्रित अलगाव के किसी ऐसे तर्क, सोच के किन्हीं नए दिगंतों के संकेतों को नहीं देख पा रहे थे, जो उन भाषाई प्रयोगों को जरूरी बनाते हो। मेघ जी की घोषित प्रतिबद्धताओं और जन-सरोकारों का भी इस संदर्भ में सिर्फ इसीलिये कोई विशेष अर्थ नहीं होता है क्योंकि विवेचन का ढर्रेवर, बंद, सनातन ढांचा लेखक के लिए कोई चुनौती नहीं होता है ; विषय की स्थापित ‘असंदिग्धता’, उसकी कथित सनातनता उसे परेशान नहीं करती है ; अपने तमाम घोषित सरोकारों के बावजूद विषय के प्रति एक निश्चयमूलक अंधता के चलते वह सनातन को अस्वीकारने वाले भिन्न, अन्तर्निहित, पर नए सांयोगिक संकेतकों की दिशा में नहीं बढ़ पाते हैं। यह ऐसी ढर्रेवरता है, जिसमें विषय के उस भावी स्वरूप, उसमें अन्तर्निहित ‘होने’ की क्रिया का, उसकी उसस गतिशीलता का कोई अनुमान नहीं मिलता जिसने अब तक कोई भाषाई आकार ग्रहण नहीं किया है। अर्थात् विषय किसी शव की तरह ही विचारक के सामने शवपरीक्षण की मेज पर पड़ा दिखाई देता है। उसमें महज भाषाई स्वेच्छाचार सांयोगिक संकेतकों की ओर सांकेतिकता का विकल्प नहीं बन सकता। वह पारंपरिक मीमांसा के शब्द-संसार का ही एक और रूप भर होता है। इसी अर्थ में वह लेखन अपनी तमाम घोषित निष्ठाओं के बाद भी अकादमिक रीति का ही अंग होता है।   

कैसे किसी टीकाकार के अंदर से विचारक पैदा होता है, इसे जानने के लिए जरूरी है कि हम जाने कि कैसे किसी विश्लेषण में कोई पाठ  शवपरीक्षण के बजाय एक जीवंत विमर्श का विषय बनता है। मनोविश्लेषक जॉक लकान अपने प्रसिद्ध सेमिनार XX  Encore में सेंट विक्टर के इस कथन को खारिज करते हुए कि कोई भी ऐसी प्राणीसत्ता (being) नहीं हो सकती है जो नश्वर हो पर तात्त्विक (intrinsic) भी हो, कहते है कि “कोई भी संकेतक सनातन के रूप पैदा नहीं होता है। बल्कि संकेतक को सांयोगिक या दैविक की श्रेणी में रखना ही बेहतर होगा। … संकेतक सनातन नहीं होता पर इसके बाद भी वह अजीब प्रकार से तात्त्विक होता है।” (पृष्ठ – 41)

“तत्त्वमीमांसा की भूमिका भाषा में संयोजक के प्रयोग की तरह होती हैं, जो उसे उसकी संकेतक की भूमिका से अलग करती है। संभावना की क्रिया पर विचार एक ऐसी क्रिया पर विचार है जो अब तक भाषा के पूरे वैविध्यपूर्ण क्षेत्र में प्रकट नहीं हुई है अर्थात् जिसे हम सर्वकालिक नहीं कह सकते हैं — उसे उस रूप में रखना एक बड़ा जोखिम भरा काम होता है।

“उस (संभावनापूर्ण) रूप को फूंक कर निकालने के लिए यह समझना जरूरी है कि जब भी हम किसी चीज की इस प्रकार चर्चा करते हैं कि ‘वह यह है’, तब इसमें उसकी संभावना को अलग से दिखाने का कोई संकेत नहीं बचता है। अर्थात् यह ‘ऐसा ही है’ कहा या लिखा जा सकता है, पर संयोजक के इस प्रकार के प्रयोग में हमें कुछ भी अलग से नहीं दिखाई देगा। यदि किसी विमर्श, किसी गुरु का विमर्श भी ‘भावीपन’ की ‘होने की’ क्रिया को नहीं उभारता है तो उसमें हमें कुछ भी नजर नहीं आयेगा।” (पृष्ठ – 33)

टीकाकारों के सारसंग्रहवाद में से ‘जो है’, उससे परे भावीपन के संकेतकों में ही नए विमर्श की संभावना निहित होती है, टीकाकार ‘विचारों के कलश छलकाने’ की विचारक की भूमिका को चरितार्थ करता है।      

बहरहाल, हमारे सामने अभी मेघ जी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है — ‘मध्ययुगीन रस-दर्शन और समकालीन सौन्दर्यबोध’ (2012)। इस पुस्तक का पहला संस्करण 1969 में प्रकाशित हुआ था, जिसके 43 साल बाद प्रकाशित यह दूसरा, संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण है।

गौर करने की बात है कि जिस पुस्तक के समग्र विन्यास को हम किसी अकादमिक काम के ढांचे से अलग नहीं कर पा रहे हैं, उसी पुस्तक को अकादमिक जगत में कितना अपनाया गया है, उसका एक अनुमान 43 साल बाद 2012 में इसके दूसरे संस्करण के प्रकाशन की घटना से लगाया जा सकता है। प्रकारांतर से अकादमिक कामों की कसौटी पर इसकी स्थिति का एक छोटा सा पैमाना यह भी हो ही सकता है।

‘रस सिद्धांत’ हिंदी साहित्य के पठन-पाठन के अकादमिक जगत का एक सर्वकालिक विषय है। गौर करने की बात है कि इस जगत में इस विषय पर पिछले लगभग साठ सालों से जिस एक किताब का पूर्ण वर्चस्व बना हुआ है वह है डा. नगेन्द्र की किताब — ‘रस-सिद्धांत’। इसका पहला संस्करण सन् 1964 में प्रकाशित हुआ था और तब से अब तक इसके कम से कम आठ संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।

डा. नगेन्द्र की किताब वास्तव में एक इतनी ठोस और ठस,  अकादमिक पुस्तक है जिसमें पूरे विषय को विचारों की अमूर्तनता मात्र से ही मुक्त करते हुए फलों के रस की तरह की ठोस उपभोग की जड़ वस्तु बना कर रख दिया गया है ; अर्थात् इसमें जीवंतता की किसी संभावना को नहीं छोड़ा गया है। अकादमिक दुनिया के लिए एक बिल्कुल उपयुक्त वस्तु है यह। जब किसी भी ठोस रूप को प्रतीकात्मक रूप में लिया जाता है, वह तत्क्षण अपने ठोस रूप की लाक्षणिकता के बिल्कुल विपरीत संकेत देने लगता है, ठोस और सूक्ष्म के बीच भेद का यह एक बुनियादी सिद्धांत है। इसीसे विषय के अनंत संकेतों की संभावनाएँ पैदा होती है, वह शव-परीक्षण की मेज के विषय के बजाय विचार जगत के विषय का रूप लेता है। पर विषय के ऐसे किसी अनजान जोखिम भरे विचारशील रास्ते में भटकने से बचने के लिए ही ‘छात्रोपयोगी’ सनातन लेखन की शर्त के अनुसार नगेन्द्र ने अपनी किताब के प्रारंभ में ही रस को ‘आस्वाद-प्रधान’ पदार्थ-रस के रूप में लेते हुए उसके आस्वादन के रसगुल्ले वाली मिठास के अन्तर्भाव को पूरे भारतीय काव्य सिद्धांत पर आरोपित कर दिया। और साथ ही, तुर्रा यह रहा कि “यहां रस के भौतिक और आध्यात्मिक अर्थों की सीमाएं परस्पर मिल जाती है।”(डा. नगेन्द्र, रस-सिध्दांत, पृ. -5)   

ठोस का सूक्ष्मतर प्रतीकात्मक रूपांतरण ठोस के विपरीत अर्थ को व्यक्त करने लगता है, लक्षणा के कारणभूत मुख्यार्थबाध की यह द्वांद्विकता (dialectics) उनके विचार का विषय ही नहीं बन सकती थी, क्योंकि हम फिर से दोहरायेंगे कि वे विषय को शवपरीक्षण की मेज पर फेंक कर उस पर विचार करने के शुद्ध अकादमिक काम की वस्तु के निर्माण का बीड़ा जो उठाए हुए थे। इसी वजह से वे ध्वनिकार आनन्दवर्धन के इस सूत्र के मर्म को कभी ग्रहण नहीं कर पाए कि “रसादि भी वाच्यार्थ से भिन्न ही होते हैं”। ‘ध्वन्यालोक’ के वृत्तिकार अभिनवगुप्त के शब्दों में — “वस्तुध्वनि तथा अलंकारध्वनि ये दोनों शब्द के द्वारा अभिधेय होते हैं, किंतु रस, भाव, भावाभास, रसाभास तथा भावप्रशम कभी भी शब्द के द्वारा अभिहित नहीं किये जाते हैं। …इनकी प्रतीति में ध्वनन व्यापार को छोड़ कर किसी दूसरे व्यापार की कल्पना नहीं की जा सकती है।” (ध्वन्यालोक, पृष्ठ – 73)

हमारे लिए मेघ जी की पुस्तक के संदर्भ में समस्या यह है कि डा. नगेन्द्र की पुस्तक के तकरीबन पांच साल बाद जब घोषित रूप में भिन्न सरोकारों के साथ, “रस के अद्वैतवाद (Monism) तथा निर्विकल्पवाद (Absolutism) की मध्यकालीन परिणति के आवरण को भग्न करने” की प्रेरणा से मेघ जी ने इस विषय को उठाया तब भी वे डा. नगेन्द्र के इस ‘भौतिक-आध्यात्मिक ऐक्य’ के अद्वैत से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो पाए। भट्टलोल्लट के रससूत्र के विभाव-अनुभाव-संचारी में पोष्य-पोषक-भाव संबंध से पुष्ट स्थायी भाव को ही रस मानते रहे। इसके मूल में किसी पोषण-कुपोषण के द्वैत की स्थापना के बजाय सिर्फ इतना सा भाषाई फर्क आया कि नगेन्द्र का आस्वादक मेघ जी के यहां ‘आप्रशंसक’ बन गया। काव्य में रस से आनंद का पुष्टिकारी भाव और अलंकरण की चमत्कारिता अक्षुण्ण एवं स्थायी बने रहे !

हमारे ध्वन्याकार आनंदवर्धन का कहना था कि “विभाव आदि के प्रतिपादन से रहित तथा केवल श्रृंगार आदि शब्दों से युक्त काव्य में थोड़ी सी भी रसवत्ता की प्रतीति नहीं होती है।” वे विभाव-अनुभाव के प्रतिपादक भाव में तात्पर्याशक्ति को अनिवार्य तौर पर भेदपरक और संबंध सूचक, अर्थात् संकेतक मानते थे। साफ कहते है कि “उसका पर्यावसान आस्वाद्यमानता के सारभूत रस में नहीं होता है। इस विषय में और ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है।”  (विभावानुभावप्रतिपादके हि वाक्ये तात्पर्यशक्तिर्भेदे संसर्गे वा पर्यवस्येत्; न तु रस्यमानतासारे रसे। इतिशब्दो हेत्वर्थे।)

अभिनवगुप्त की नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरतमुनि के इस सूत्र पर कि विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव के गम्यगमक भावरूप संयोग से रस की निष्पत्ति होती है, यह एक मूलभूत आपत्ति थी कि उन्होंने इस रससूत्र में स्थायिभाव को शामिल नहीं किया। अभिनवगुप्त रस के ठोस आस्वादन के बजाय ‘चर्वणा (dialectics) के अलौकिकत्व का प्रतिपादन’ करते हुए कहते हैं कि अगर उन्होंने (भरत मुनि ने) ऐसा किया होता तो ‘सारा मामला ही उलट जाता’। (तत्प्रत्युत शल्यभूतं स्यात्)

हम सभी जानते हैं कि अभिनवगुप्त के यहां यह मनुष्य का स्थायिभाव लोक में रति (वासना) का भाव है जिसमें सिर्फ प्रेम, मधुरता और श्रृंगार ही नहीं है बल्कि शोक, क्रोध, भय, जुगुप्सा, ग्लानि, घृणा सबसे प्रबल रूप में शामिल है। यह सब वे चित्त-वृत्तियां हैं जिनके अधीन ही चर्वणा होती है और रचना में इसी चर्वणा की अभिव्यक्ति होती है। “प्रमाणों के व्यापार के समान उसका ज्ञापन नहीं होता है और न तो हेतु के व्यापार के समान उसकी उत्पत्ति होती है।” संकेतक के बारे में लकान भी यही कहते है कि वह प्रकट और सनातन नहीं होने पर भी अजीब प्रकार से तात्त्विक होता है। चर्वणा ही संकेतक की सांकेतितता है।

फ्रायड जब अपने आनंद सिद्धांत को परिभाषित करते हैं तो उसे अनिवार्य तौर पर जीवन में विषाद की परिणति बताते हैं। “The course of those events is invariably set in motion by an unpleasurable tension. ” वे जिस प्रक्रिया की बात कर रहे थे यह भी  चित्तवृत्तियों की चर्वणा है जिसमें विषाद के तनावों से बचने के क्रम में अन्ततः एक आनंद की सृष्टि होती है, परिस्थिति से एक सामंजस्य कायम करके जीया जाता है। विषाद का अंत नहीं होता पर वह विक्षिप्तता में परिणत नहीं होता, जीवन में सुख-दुख की तरह का एक सामान्य विषाद बना रहता है। आनंद की स्थिति किसी परम सुख की स्थिति नहीं है, जिसे साधने के नुस्ख़ों से आध्यात्मिक अद्वैतवादियों का योगदर्शन भरा हुआ है। और भी गंभीरता से गौर करने की बात है कि फ्रायड इस सामंजस्य के ‘आनंद सिद्धांत’ को पुष्टिदायी रस के बजाय शक्ति को गंवाने, castration से व्याख्यायित करते हैं, स्वतंत्रता के हरण से, मृत्यु को टालने के एक मजबूरी के उपाय के रूप में रखते हैं। अभिनवगुप्त अपने तंत्रालोक में इसी खो रही स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए शक्तिपात के जरिए आत्म के विस्तार का पथ बताते हैं, और मोक्ष को स्वतंत्रता से भिन्न नहीं मानते। आधुनिक मनोविश्लेषण में फ्रायड और लकान मनुष्य को उसकी दमित वासना से मुक्त करके स्वतंत्रता के जरिये आत्म-विस्तार का पथ बताते हैं।         

भारत के रस सिद्धांत की चर्चा करते हुए हमें यह कहने में जरा भी हिचक नहीं है कि भरत (400 ई.पू- 100 ई.पू) से शुरू करके विश्वनाथ चक्रवर्ती (1626-1708) तक के इन लगभग दो हजार सालों में संस्कृत के अलंकार ग्रंथों में साहित्य पर विचार की जो उच्च-स्तरीय समृद्ध परंपरा मिलती है, दुनिया के किसी भी कोने में इस काल में उस स्तर का विमर्श नजर नहीं आता है। अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा के ग्रंथों में काफी साहित्य चर्चा मिलने पर भी हमारे अलंकार ग्रंथों की तरह की सूक्ष्मता और गहराई नहीं दिखाई देती है। यहां की साहित्य चर्चा में जिन विषयों को उठाया गया, यूरोपीय काव्य चिंतन में वे विषय दिखाई नहीं देते थे। साहित्य के पाठों के विवेचन का शास्त्र मनुष्य के चित्त के जगत के विवेचन से भिन्न शास्त्र नहीं है क्योंकि मनुष्य की प्राणी सत्ता कभी उसका शरीर मात्र नहीं है। यह उसके शरीर के साथ ही उससे बहुत परे उसके चित्त के विस्तार का समुच्चय है। इसमें उसके प्रत्यक्ष अनुभवों और यथार्थ जीवन के साथ ही उसके प्रतीकात्मक जगत का सबसे बड़ा स्थान है। और साहित्य या काव्य इसी जगत की अनंत संभावनापूर्ण तस्वीर पेश करता है। इसीलिए साहित्य का कोई भी शास्त्र मनुष्य के जीवन के यथार्थ और उसके प्रतीकात्मक संसार से हट कर कल्पित भी कैसे किया जा सकता है ! शास्त्र नहीं, यथार्थ के संकेतकों के साथ मनुष्य की चित्त-वृत्तियों की चर्वणा साहित्य की सृष्टि करते हैं। अभिनवगुप्त की टीकाओं और उनके दर्शनशास्त्रीय विमर्श, आनंदवर्धन के ध्वनि सिद्धांत, आत्म की पहचान के उत्पलदेव-अभिनवगुप्त के प्रत्यभिज्ञादर्शन में यह पूरा विमर्श जिस असाधारण ऊंचाई तक चला गया था, उसका परवर्ती दिनों में रीतिवादी अलंकारशास्त्र में पर्यवसन जिस प्रकार के दरबारी सहृदय आस्वादकों के स्थूल रस-सिद्धांत में हुआ, डा. नगेन्द्र ने उसी पतनशील परंपरा की लकीर पीट कर अकादमिक अध्ययन की शवपरीक्षा के उपयुक्त ग्रंथ तैयार किया था। पर सचमुच यह एक अघटन ही है कि जैसे भारतीय दर्शन के बारे में मार्क्सवादी विमर्श भी दर्शनशास्त्र के इतिहास की सार-संग्रहवादी परंपरा को अस्वीकारने के बावजूद वेदांत के कथित शिखर तक जा कर ठहर गया,  वैसे ही काव्य संबंधी अलंकारशास्त्र का रस सिद्धांत भी भरतमुनि, भामह, दण्डी, मम्मट, भट्टलोल्लट आदि से होते हुए रुद्रट, आनंदवर्धन (9वीं सदी) अभिनवगुप्त (ई.सन् 975-1025) को स्पर्श करता हुआ भोज, दरबारी पंडितराज जगन्नाथ(1590-1641) और भक्तिरस में पर्यवसित हो गया। पर्यवसन इसलिये क्योंकि पंडितराज जगन्नाथ तो घोषित रूप में अपने ‘रसगंगाधर’ की प्रतिज्ञा में कहते ही हैं कि उनका उद्देश्य तब तक के सभी “अलंकारग्रंथों को गर्वहीन-महत्वहीन” बनाना है।

“ हरन्नन्तर्ध्वान्तं हृदयमधिरूढो गुणवता-

मलंकारान्सर्वानपि गलितगर्वान् रचयतु ”।।4।।

जाहिर है कि पंडितराज का संकेत आनंदवर्धन और अभिनवगुप्त की परंपरा को खारिज करना था, और इसके लिए उन्हें दरबार के आस्वादकों का पूरा समर्थन हासिल था। अभिनवगुप्त के प्रत्यभिज्ञादर्शन, तंत्रालोक और ध्वन्यालोक के सूत्रों पर रस सिद्धांत के आगे नवीकरण का जरूरी काम वहीं से पूरी तरह से उपेक्षित होता चला गया।

हम देखते हैं कि मेघ जी को भी इस पुस्तक के लेखन के दौरान इस सच्चाई का बाकायदा अहसास हुआ था और उन्होंने जब अभिनवगुप्त के आगे भोज, वैष्णव सौंदर्यशास्त्रियों, पंडितराज जगन्नाथ आदि का विवेचन किया तो उन्हें ‘सामंतीयकरण’ और फ्रायड आदि का स्मरण हुआ, पर उनकी इस किताब का पूर्व-कल्पित पाठ्य-पुस्तकीय विन्यास ही ऐसा रहा कि उनके लिए सार-संग्रहवाद से बहुत अलग होते हुए किसी संश्लेषणात्मक विमर्श की ओर बढ़ना संभव नहीं हो सकता था। इस समीक्षा के प्रारंभ में इस प्रकार के अध्ययन की सीमाओं की ओर इंगित से हमारा यही तात्पर्य था जिसके कारण “अद्वैतवाद की मध्यकालीन परिणति के आवरण को भग्न करने” की उनकी प्रतिज्ञा इस दीर्घ उपक्रम में विस्मृत कर दी गई।

आनंदवर्धन और अभिनवगुप्त ने काव्यशास्त्र को चर्वणा (dialectics) के जिस सनातन सिद्धांत पर टिका कर लोक रति के साथ ही कवि और सहृदय के स्थायिभाव की सक्रिय भूमिका के जिस आधुनिक भारतीय काव्यशास्त्र की मजबूत जमीन तैयार की थी, उस पर नया महल तैयार करने का काम आगे नहीं बढ़ाया जा सका है। वह काम आज भी पंडितराजों के अभिशाप से एक खंडहर ही प्रतीत होता है, अकादमिक चर्वित-चर्वण की वस्तु बन गया है, जैसे आज धर्म-गुरुओं की नाना लीलाओं की वस्तु बन कर रह गया है भारतीय दर्शन। मेघ जी की पुस्तक भी उस अभाव की पुष्टि करती है। यह अभाव आधुनिक भारतीय साहित्य सिद्धांत के संधान के लिए प्रेरक बने, फ़िलहाल इसकी उम्मीद ही की जा सकती है।                    

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