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विधानसभा चुनाव 2022 : कैसे हो हेट पॉलिटिक्स की काट !

Assembly Election 2022: How Hate Politics Cut!

हेट पॉलिटिक्स के सूत्रधार डॉ हेडगेवार

2022 के पूर्वार्द्ध में चुनाव आयोग के अनुसार निष्पक्ष, प्रलोभनमुक्त व कोविड के बचाव की फुलप्रूफ तैयारियों के साथ 5 राज्यों- पंजाब, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश- में चुनाव अनुष्ठित होने जा रहा है. इन चुनावों के तिथियों की घोषणा होनी बाकी है, किन्तु भाजपा अभी ही संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के द्वारा इजाद उस ‘हेट पॉलिटिक्स’ को लगभग तुंग पर पहुंचा दी है, जिसके सहारे ही कभी वह दो सीटों पर सिमटने के बावजूद नयी सदी में अप्रतिरोध्य बन गयी. अडवाणी-अटल, मोदी-शाह की आक्रामक राजनीति से अभिभूत ढेरों लोगों को यह पता नहीं कि जिस हेट पॉलिटिक्स के सहारे आज भाजपा विश्व की सर्वाधिक शक्तिशाली पार्टी के रूप में इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज करा चुकी है, उसके सूत्रकार रहे 21 जून,1940 को इस धरा का त्याग करने वाले चित्तपावन ब्राहमण डॉ. हेडगेवार, जिन्होंने 1925 में उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी, जिसका राजनीतिक विंग आज की भाजपा है. अपने लक्ष्य को साधने के लिए उन्होंने एक भिन्न किस्म के वर्ग-संघर्ष की परिकल्पना की.

वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्तकर कार्ल मार्क्स ने कहा है कि दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसका उत्पादन के साधनों पर कब्ज़ा है और दूसरा वह है, जो इससे बहिष्कृत व वंचित है. इन उभय वर्गों में कभी समझौता नहीं हो सकता. इनके मध्य सतत संघर्ष जारी रहता है.

कोलकाता की अनुशीलन समिति, जिसमें गैर-सवर्णों का प्रवेश निषिद्ध था, के सदस्य रहे डॉ. हेडगेवार के समय पूरा भारत अंग्रेजों को वर्ग-शत्रु मानते हुए, उनसे भारत को मुक्त कराने में संघर्षरत था. किन्तु डॉ.हेडगेवार ने एकाधिक कारणों से मुसलमानों के रूप में एक नया ‘वर्ग-शत्रु’ खड़ा करने की परिकल्पना की. उन्हें अपनी परिकल्पना को रूप देने का आधार 1923 में प्रकाशित विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक ‘हिंदुत्व : हिन्दू कौन ?’ में मिला, जिसमें उन्होंने अपने सपनों के भारत निर्माण के लिए अंग्रेजों की जगह ‘मुसलमानों को प्रधान शत्रु’ चिन्हित करते हुए उनके विरुद्ध जाति-पांति का भेदभाव भुलाकर सवर्ण-अवर्ण सभी हिन्दुओ को ‘हिन्दू – वर्ग’ (संप्रदाय) में उभारने का बलिष्ठ प्रयास किया था.

मुस्लिम विद्वेष के जरिये ही भाजपा बलवती हुई

इस दूरगामी सोच के तहत ही डॉ. हेडगेवार ने ‘हिन्दू धर्म-संस्कृति के जयगान और मुख्यतः मुस्लिम विद्वेष के प्रसार की हेट पॉलिटिक्स के आधार पर आरएसएस को खड़ा करने की परिकल्पना किया. हेडगेवार से यह गुरुमंत्र पाकर संघ लम्बे समय से चुपचाप काम करता रहा. किन्तु मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जब बहुजनों के जाति चेतना के चलते सत्ता की बागडोर दलित –पिछड़ों के हाथ में जाने का आसार दिखा, तब संघ ने राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर, अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिए, जिसमें हिन्दू- धर्म- संस्कृति के जयगान और खासकर मुस्लिम विद्वेष के भरपूर तत्व थे. राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन के जरिये मुस्लिम विद्वेष का जो गेम प्लान किया गया, उसका राजनीतिक इम्पैक्ट क्या हुआ इसे बताने की जरुरत नहीं है. एक बच्चा भी बता देगा कि मुख्यतः मुस्लिम विद्वेष के प्रसार के जरिये ही भाजपा केंद्र से लेकर राज्यों तक में अप्रतिरोध्य बनी है, जिसमें संघ के अजस्र आनुषांगिक संगठनों के अतिरक्त साधु-संतों, मीडिया और पूंजीपतियों की भी जबरदस्त भूमिका रही है. आज विधानसभा चुनाव 2022 को दृष्टिगत रखते हुए एक बार फिर संघ के आनुषांगिक संगठनों, मीडिया, लेखक-पत्रकारों, साधु-संतो के सहयोग से भाजपा के रणनीतिकार (BJP Strategist) हेट पॉलिटिक्स के सहारे 5 राज्यों, खासकर यूपी और उत्तराखंड राजनीतिक सफलता का एक नया अध्याय रचने में जुट गए हैं.

नफरत की राजनीति के सहारे 2024 का लोकसभा चुनाव जीतना चाहती है भाजपा

पांच राज्यों के साथ 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने की रणनीति के तहत भाजपा आज ‘नफरत की राजनीति’ को तुंग पर पहुंचाने की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है, उसकी शुरुआत उसने कुछेक वर्ष पूर्व अनुच्छेद 370 के खात्मे, सीएए, एनपीआर और एनसीआर के जरिये कर चुकी थी. इसी मकसद से उसने 2020 के अगस्त में कोरोना के जोखिम भरे दौर में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी से राममंदिर निर्माण का भूमि पूजन कराया था. इसके पीछे मोदी को हिन्दू- धर्म- संस्कृति के सबसे बड़े उद्धारक नेता की छवि प्रदान करना था.

इस दिशा में 13 दिसंबर को प्रधानमंत्री द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण एक बहुत ही प्रभावी कदम रहा. इसके जरिये मोदी को मोदी को संभवतः शंकराचार्य से बड़े हिन्दू धर्म के उद्धारक ही छवि प्रदान करने के साथ हेट पॉलिटिक्स को एक नयी उंचाई देने का प्रयास हुआ.

इस अवसर पर मोदी ने यह कहकर एक बड़ा सन्देश दे दिया कि जब-जब औरंगजेब का उभर होता है, संग-संग शिवाजी का भी उदय होता है. इसके जरिये जहाँ उन्होंने औरंगजेब को हिन्दू धर्म संस्कृति का विनाशक चिन्हित किया वहीं, शिवाजी के उदय की याद दिलाकर खुद को सबसे बड़ा उद्धारक होने का संकेत दे दिया. इसके बाद तो भाजपा नेताओं में इस दिशा में होड़ ही मच गयी.

17 दिसंबर अमित शाह ने कॉपरेटिव बैंक की एक परियोजना का लोकार्पण करते हुए कहा, ‘देश में हिन्दू धर्म को मजबूत करने का विचार केवल प्रधान मंत्री मोदी में आया.किसी अन्य दल ने इस दिशा में सोचा ही नहीं. अन्य दल सिर्फ वोट बैंक के लिए राजनीति करते रहे’.

उसी लखनऊ के रामा बाई आंबेडकर पार्क में लाखों की भीड़ को संबोधित करते हुए शाह ने कहा,’ एक ओर अयोध्या में प्रभु रामजी का भव्य मंदिर बनने जा रहा है तो दूसरी ओर श्री काशी विश्वनाथ की भव्यता वापस दिलाने का कार्य भी प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं. हम सबने वर्षों तक प्रभु श्रीराम को तिरपाल के मंदिर में देखा है. आखिर इतने वर्षों तक मंदिर बनाने से किसने रोक रखा था?’

काशी कॉरिडोर के लोकार्पण के पहले उन्हें 11 दिसंबर को उमिया माता के मंदिर का शिलान्यास समारोह में हिन्दू धर्म के उद्धारक के रूप में मोदी की छवि चट्खार करते हुए कहा था, ’हिन्दू आस्था के केन्द्रों को वर्षो तक अपमानित किया गया , उनको महिमा और गरिमा प्रदान करने की परवाह नहीं की गयी. मोदी सरकार सत्ता में आने के बाद हिन्दू आस्था के केन्द्रों की गरिमा बहाल कर रही है.’

लेकिन सिर्फ मोदी की छवि हिन्दू धर्म के उद्धारक के रूप में स्थापित करके नफरत की राजनीति को तुंग पर नहीं पहुंचाया जा सकता. इसके लिए जरुरत थी विपक्ष को मुलिमपरस्त बताने तथा मुसलमान एवं मुस्लिम शासकों के खिलाफ हिन्दू जनगण को आक्रोशित करने की. 13 दिसंबर के बाद हेट पॉलिटिक्स को शिखर पर पहुंचाने के लिए यही काम भाजपा सहित के दूसरे संघ के आनुषांगिक संगठनों के जरिये हो रहा है. इसके तहत वे यह बात जोर-शोर से कहा जा रहा कि अखिलेश में जिन्ना का साया और ओवैसी की रूह बसती है. हेट पॉलिटिक्स को तुंग पर पहुंचाने के लिए भी धर्म संसदों से 20 करोड़ मुसलमानों के कत्ले आम का आह्वान किया जा रहा है. इस मकसद से ही शायर अकबर इलाहाबादी को प्रयागराजी किया गया है. यह तो शुरुआत है. चुनाव प्रचार के शिखर पर पहुँचने साथ साथ मोदी-योगी द्वारा शुरू की गयी नफरत की राजनीति कहाँ पहुंचेगी, इसका कयास लगाना खूब कठिन नहीं है.                

बहरहाल अतीत के अनुभव के आधार पर विपक्ष को यह मानकर चलना चाहिए कि संघ परिवार की हेट पॉलिटिक्स का हथियार हमेशा कारगर हुआ है और वह उसकी प्रभावी काट ढूँढने में अब तक व्यर्थ रहा है. किन्तु 2022 में अगर 5 राज्यों, खासकर यूपी-उत्तराखंड में भाजपा को रोकना है तो उसे हर हाल में इसकी काट ढूंढनी ही होगी. यह कैसे मुमकिन होगा इस पर गैर-भाजपाई नेता और बुद्धिजीवी विचार करें. किन्तु मेरा मानना है कि यह काम धर्म की जगह आर्थिक आधार पर वर्ग- संघर्ष को बढ़ावा देकर किया जा सकता है, ताकि वर्ग-शत्रु के रूप में मुसलमानों की जगह कोई और तबका उभरकर सामने आये. और इस किस्म के वर्ग-संघर्ष को संगठित करने लायक वर्तमान में अभूतपूर्व स्थितियां और पारिस्थितियाँ मौजूद हैं.

मार्क्स ने इतिहास की आर्थिक व्याख्या करते हुए, जिस वर्ग-संघर्ष की बात कही है, भारत में सदियों से वह वर्ग संघर्ष वर्ण-व्यवस्था रूपी आरक्षण – व्यवस्था में क्रियाशील रहा, जिसमें 7 अगस्त,1990 को मंडल की रिपर्ट प्रकाशित होते ही एक नया मोड़ आ गया. क्योंकि इससे सदियों से शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार जमाये विशेषाधिकारयुक्त तबकों का वर्चस्व टूटने की स्थिति पैदा हो गयी. मंडल ने जहां सुविधाभोगी सवर्णों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अवसरों से वंचित कर दिया, वहीँ इससे दलित,आदिवासी.

पिछड़ों की जाति चेतना का ऐसा लम्बवत् विकास हुआ कि सवर्ण राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील हो गए.

कुल मिलकर मंडल से एक ऐसी स्थिति का उद्भव हुआ जिससे वंचित वर्गों की स्थिति अभूतपूर्व रूप से बेहतर होने की सम्भावना उजागर हो गयी और ऐसा होते ही सुविधाभोगी सवर्ण वर्ग के बुद्धिजीवी, मीडिया, साधु -संत, छात्र और उनके अभिभावक तथा राजनीतिक दल अपना- अपना कर्तव्य स्थिर कर लिए. इन्हीं हालातों में अपने असल वर्ग- शत्रु बहुजनों का ध्वंस करने के लिए संघ-परिवार ने रामजन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ नफरत को तुंग पर पहुचाने के लिए ‘हेट-पॉलिटिक्स’ का आगाज किया और इसके सहारे ही उसका राजनीतिक संगठन भाजपा एकाधिक बार केंद्र की सत्ता पर कब्ज़ा जमाते हुए अप्रतिरोध्य बन गयी.

संघ के असल वर्ग शत्रु मुसलमान नहीं दलित, आदिवासी और पिछड़े हैं

अब जहां तक संघ के असल वर्ग – शत्रु का सवाल है, वह मुसलमान नहीं दलित, आदिवासी और पिछड़े हैं. इनके ही हाथ में सत्ता की बागडोर जाने से रोकने लिए हेडगेवार ने प्रायः 96 वर्ष पूर्व हेट पॉलिटिक्स का सूत्र रचा था, जिसका मंडल उत्तर काल में भाजपा ने जमकर सदव्यवहार किया. चूंकि देखने में संघ के सीधे निशाने पर मुसलमान रहे, किन्तु असल शत्रु बहुजन ही हैं, इस कारण ही उसके राजनीतिक संगठन ने ‘हेट पॉलिटिक्स’ से मिली सत्ता का इस्तेमाल मुख्यतः बहुजनों के खिलाफ किया.

हेट – पॉलिटिक्स से हाथ में आई सत्ता से मुसलमानों में असुरक्षा-बोध जरूर बढ़ा, किन्तु असल नुकसान दलित-आदिवासी और पिछड़ों का हुआ है.

आंबेडकर प्रवर्तित जिस आरक्षण के सहारे हिन्दू आरक्षण (वर्ण-व्यवस्था) के जन्मजात वंचित शक्ति के स्रोतों में शेयर पाकर राष्ट्र के मुख्यधारा से जुड़ रहे थे, उस आरक्षण के खात्मे में ही संघ प्रशिक्षित प्रधानमंत्रियों ने अपनी ऊर्जा लगाया. इस हेतु ही उन्होंने बड़ी-बड़ी सरकारी कपनियों को, जिनमें हजारों लोग जॉब पाते थे, औने-पौने दामों में बेचने जैसा देश-विरोधी काम अंजाम दिया. इस मामले में मोदी ने वाजपेयी को भी बौना बना दिया. वहीं मोदी पीएम के रूप में अपने पहले कार्यकाल में सरकारी अस्पतालों, हवाई अड्डों, रेलवे इत्यादि को निजी हाथों में देने सर्वशक्ति लगाने के बाद दुबारा सत्ता में आकर आज बड़ी-बड़ी कंपनियों को बेचने में अधिकतम उर्जा लगा रहे हैं. यह सब काम वह सिर्फ असल वर्ग-शत्रुओं, बहुजनों को फिनिश करने के लिए ही कर रहे हैं. उनकी नीतियों से पिछले साढ़े छः- सात सालों में बहुजन उन स्थितियों में पहुँच गए हैं, जिन स्थितियों में दुनिया के तमाम वंचितों ने स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई छेड़ा. मोदी –राज में एक ओर जहाँ दलित-आदिवासी और पिछड़े गुलाम बनते जा रहे हैं, वहीं हिन्दू आरक्षण के अल्पजन सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के समस्त स्रोतों पर औसतम 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा हो गया है.

शक्ति के स्रोतों पर सुविधाभोगी वर्ग के अभूतपूर्व कब्जे से वंचित बहुजन जिस पैमाने पर सापेक्षिक वंचना (रिलेटिव डिप्राइवेशन) के शिकार हुए हैं, उसका भाजपा-विरोधी यदि कायदे से अहसास करा दें तो मुस्लिम विद्वेष के जरिये भाजपा के हेट –पॉलिटिक्स की सारी चाल बिखर कर रह जाएगी. क्योंकि तब बहुसंख्य लोगों की नफरत अल्पजन सुविधाभोगी वर्ग की ओर शिफ्ट हो जाएगी.

याद रहे भाजपा की हेट पॉलिटिक्स इसलिए कामयाब हो जाती है क्योंकि इसके झांसे निरीह दलित, आदिवासी और पिछड़े आ जाते हैं. अतः हेट पॉलिटिक्स के पीछे क्रियाशील अर्थशास्त्र से बहुजनों को अवगत कराने पर शर्तिया तौर सवर्णपरस्त भाजपा के मंसूबों पर पानी फिर जायेगा .

-एच.एल. दुसाध

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)

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