कंगना रनौत प्रकरण में नारीवादियों पर हमला

Kangana Ranaut

Attack on feminists in Kangana Ranaut case

जब शिवसेना के गठबन्धन वाली महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra government with Shiv Sena alliance) ने कंगना रनौत का अवैध निर्माण तोड़ने की कार्यवाही (Proceedings to break the illegal construction of Kangana Ranaut) शुरू की तब परोक्ष में कंगना का समर्थन करने वाली भाजपा की सोशल मीडिया सेना ने एक ओर तो उसकी एकाध अच्छी फिल्मी भूमिका को उसके व्यक्तित्व से जोड़ते हुए उसके अंश पोस्ट करना प्रारम्भ कर दिये तो दूसरी ओर नारी वादियों पर हमला करना शुरू कर दिया कि वे अब क्यों नहीं बोल रहे है।

सवाल उठता है कि जब नारीवादी या मानव अधिकारवादी अपनी बात कहते हैं तब क्या ये लोग उनका समर्थन कर रहे होते हैं?

ये और ऐसे आरोप केवल उनके पक्ष को कमजोर करने के लिए उछाले जाते हैं, जिसका साफ मतलब उनकी छवि को धूमिल करके उनके पक्ष को कमजोर करना होता है। उल्लेखनीय है कि जब एक जीनियस लोकप्रिय युवा कलाकार सफदर हाशमी की हत्या (Safdar Hashmi killed) हुयी थी और पूरी दुनिया में उसकी भर्त्सना हो रही थी तब जनसत्ता के एक सम्बाददाता ने उनके साथ मारे गये एक मजदूर राम बहादुर का मामला इसलिए उछाला था ताकि सफदर की हत्या के खिलाफ उठ रहे वैचारिक आन्दोलन के समर्थकों को कमजोर किया जा सके। इसके विपरीत सच यह था कि सीटू ने मजदूर के परिवार को अपनी ओर से पचास हजार की सहायता उपलब्ध करायी थी। ये लोग जब आये दिन मजदूरों के दमन पर एक वाक्य भी नहीं बोलते वे कला जगत को असंवेदनशील सिद्ध करने के लिए मजदूर राम बहादुर पर कलम चला रहे थे।

नारीवाद क्या है | नारीवाद कमजोरों के पक्ष में उठी आवाज है | What is feminism? Feminism is a voice in favor of the weak

नारीवाद कोई जातिवादी आरक्षण जैसा नहीं है कि उसके लाभ जातिमुक्त समाज के निर्माण के मूल लक्ष्य को ही पलीता लगा दें और जातिवाद को बनाये रखने में मदद करें। यह कमजोरों के पक्ष में उठी आवाज है। जरूरी नहीं कि हर नारी कमजोर हो और उसे नारीवादियों के समर्थन की जरूरत हो।

उदाहरण के लिए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को ही लें, उनके बारे में अंग्रेज इतिहासकारों ने ही सबसे पहले लिखा कि इतने पुरुषों के बीच वह अकेली मर्द की तरह लड़ रही थी। उनके साथ जुड़ा मर्दानी का विशेषण यहीं से लिया गया है।

रजिया सुल्तान हों, मीरा बाई हों, या अहिल्या बाई से लेकर सामाजिक आन्दोलनों में सक्रिय अनेक महिलाएं नारीवादियों की समर्थन को मजबूर नहीं रहीं।

नारीवाद का आन्दोलन तो सिमोन द बुउवा के उस कथन से संगठित हुआ है जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द सेकिन्ड सेक्स’ में व्यक्त किया है। इसमें उन्होंने कहा है कि हम नारियां मानव जाति में एक भिन्न जेंडर तो हैं, किंतु दोयम दर्जे के जेन्डर नहीं हैं, और उतने ही मनुष्य हैं।

उल्लेखनीय यह भी है कि परिवार नियोजन के साधनों के विकास के बाद नारी की गुलामी की एक बड़ी जंजीर कटी है। सुप्रीम कोर्ट के एक प्रतिष्ठित वकील और नारीवाद पर खुल कर लिखने वाले अरविन्द जैन अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी का अपनी बहू मनेका गाँधी के साथ सम्पत्ति का मुकदमा चला, जो हाईकोर्ट तक गया और फैसला इन्दिरा गाँधी के पक्ष में हुआ। फैसले के बाद इन्दिराजी ने वही सम्पत्ति वरुण गाँधी के नाम कर दी। वरुण उस समय तक वयस्क नहीं हुये थे इसलिए नेचुरल गार्जियन के रूप में उनकी मां मनेका गाँधी के पास वह सम्पत्ति वापिस पहुंच गयी। जब ऐसा ही होना था तो श्रीमती इन्दिरा गाँधी अपने परिवार की प्रतिष्ठा को चौराहे पर क्यों ले गयीं?

अरविन्द जी लिखते हैं कि इन्दिरा जी अपने पूरे व्यक्तित्व में और खास तौर पर उस समय किसी नारी की तरह नहीं अपितु किसी पुरुष की तरह व्यवहार कर रही थीं।

अगर ऐसे में कोई नारीवादी उनके पक्ष में नारी और अबला के नाम पर कुछ बोलता तो वह नारीवाद का गलत इस्तेमाल कर रहा होता।

इसी तरह तस्लीमा नसरीन की पक्षधरता उनके नारी होने के नाम पर नहीं की जा सकती। वे ज्यादा और जल्दी उत्तेजित व हिंसक व्यवहार करने वालों को जानबूझ कर छेड़ती हैं और सरकारों को कटघरों में खड़ा करते हुए अपनी सुरक्षा की चुनौती पेश करती हैं। सरकार और सारे प्रगतिशील किंकर्तव्यविमूढ़ होकर रह जाते हैं और वे अपनी लोकप्रियता को व्यवसाय बना कर लाभ में रहती हैं।

अगर तस्लीमा के एक्टविस्म को छोड़ दिया जाये तो साहित्यिक मानदण्डों पर उनकी रचनाएं वह स्तर नहीं रखतीं, जिस स्तर की ख्याति उन्हें मिली हुयी है।

यह एक ऐसा हथकण्डा बन गया है जिसे लोकप्रियता का व्यापार करने वाले अनेक लोग अपना चुके हैं और अपना रहे हैं। कंगना रनौत उनसे अलग नहीं हैं। जहाँ विरोध नहीं होता है, वहाँ वे विरोध पैदा करती हैं और उसका लक्ष्य किसी महत्वपूर्ण चर्चित व्यक्ति को बनाती हैं ताकि ज्यादा चर्चा हो, ज्यादा ख्याति मिले।

The feminists did not even oppose Kangana Ranaut
Virendra Jain वीरेन्द्र जैन स्वतंत्र पत्रकार, व्यंग्य लेखक, कवि, एक्टविस्ट, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी हैं।
Virendra Jain वीरेन्द्र जैन स्वतंत्र पत्रकार, व्यंग्य लेखक, कवि, एक्टविस्ट, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी हैं।

नारीवादियों ने कंगना रनौत का विरोध भी नहीं किया या उनसे किसी गुंडे की तरह बदला लेने वाली शिवसेना का समर्थन भी नहीं किया, भले ही उनका कदम विधिसम्मत था। नारीवादी हों या मानवाधिकारवादी उनकी समझ साफ है और वे हर पीड़ित के पक्ष में खड़े होना चाहते हैं। किंतु नकली घाव बना कर हाथ पैरों पर पट्टी बाँध कर धर्मस्थलों में जाने वालों की दया से कमाई करने वालों के प्रति सजग भी हैं।

सोशल मीडिया के जो सैनिक आज कंगना रनौत के पक्ष में खड़े होकर शिवसैनिकों का विरोध कर रहे हैं, वे ही जब तक भाजपा से उनका गठबन्धन था तब तक उनका समर्थन करते थे। आज पूरे देश में न जाने कितने कानून ऐसे हैं जिनका पालन नहीं होता और वे अपने विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के दो बड़े दल सीबीआई के डर से केन्द्र सरकार का अघोषित समर्थन करते हुए अपने समर्थकों को ठग रहे हैं। यही हाल दक्षिण के कुछ प्रमुख दलों का है।

अब तो सीबीआई आदि एजेंसियों के साथ साथ न्यायपालिका के एक हिस्से पर इस्तेमाल होते जाने के आरोप लगे हैं, और वे गलत भी नहीं लगते। रिया चक्रवर्ती के मामले में कुछ कुछ ऐसा ही हो चुका है।

दुखद यह है कि बिका हुआ मीडिया ही मुख्य धारा बना हुआ है और वह खुली सौदेबाजी के आधार पर झूठ को स्थापित कर रहा है।

वीरेन्द्र जैन

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