क्या भारत की न्यायपालिका में वैचारिक बदलाव आया है?

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मामला अदालत के चैम्बर के ‘शुद्धिकरण’ का

वह 1990 के दशक का उत्तरार्द्ध जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक अदालत के चैम्बर के ‘शुद्धिकरण’ का मामला सुर्खियों में था। दरअसल उपरोक्त चेम्बर पहले अनुसूचित जाति से सम्बद्ध न्यायाधीश के लिए आबंटित हुआ था और उनके तबादले के बाद किन्हीं ‘उच्च जाति’ के व्यक्ति को उस चेम्बर का आबंटन हुआ। ख़बर यह बनी कि ‘उच्च जाति’ के उपरोक्त न्यायाधीश ने ‘गंगाजल’ से उसका शुद्धिकरण करवाया। अख़बार के रिपोर्टरों ने उन सम्बद्ध व्यक्तियों से भी बात की थी, जो इस कार्रवाई में शामिल थे।

ख़बरों को पढ़ कर अनुसूचित जाति से सम्बद्ध न्यायाधीश ने अदालत की शरण ली और उनके बाद वहां विराजमान हुए उच्च जाति के न्यायाधीश को दंडित करने की मांग की। मामला अंतत: अदालत द्वारा ही रफा दफा किया गया, बाद में पता चला कि अदालत ने जो जांच कमेटी बनाई थी उसने उन लोगों से बात तक नहीं की थी, जो ‘शुद्धिकरण में शामिल थे।’

अब बीते लगभग ढाई दशक में गंगा-यमुना से तमाम पानी बह चुका है, अलबत्ता ऐसी घटनाओं का कत्तई अकाल नहीं सामने आया है, जब न्यायाधीशों का लिंग, जाति या सांप्रदायिक पूर्वाग्रह (Judges’ gender, caste or sectarian bias) सामने आए हैं और फिर यह सवाल भी उठता रहा है कि ऐसी मान्यताओं के आधार पर अगर वह न्याय के सिंहासन पर बैठेंगे तो वह जो फैसला लेंगे, वह किस हद तक संविधान सम्मत होगा।

मनुस्मृति की उपासक जज साहिबा!

बहरहाल, पिछले दिनों यह बहस नए सिरे से उपस्थित हुई जब दिल्ली उच्च न्यायालय की एक न्यायाधीश ने ‘फिक्की’ द्वारा आयोजित एक समारोह में विज्ञान, टेक्नोलॉजी आदि क्षेत्रों में महिलाओं के समक्ष उपस्थित चुनौतियों (Challenges faced by women in the fields of science, technology etc.) के बारे में बात करते हुए स्त्रियों के सम्मान, उनकी मौजूदा स्थिति और धार्मिक ग्रंथों की अहमियत पर न केवल बात की बल्कि उनकी एक नयी परिभाषा भी देने की कोशिश की। गौरतलब था कि अपनी इस तकरीर में उन्होंने मनुस्मृति के कसीदे पढ़े। जज महोदया के इन विचारों की काफी आलोचना हुई।

लोगों को इस बात पर भी ताज्जुब हुआ कि मनुस्मृति का उनका महिमामंडन न केवल उसके तमाम विवादास्पद पहलुओं की भी अनदेखी कर रहा था बल्कि भारत के राजनीतिक एवं सामाजिक आज़ादी के आंदोलन के एक अहम पड़ाव के प्रति अपनी समूची अनभिज्ञता को प्रतिबिम्बित कर रहा था।

धार्मिक ग्रंथों में स्त्रियों एवं दलितों एवं अन्य वंचितों की स्थिति के संबंध में आज़ादी के आंदोलन के दौरान उठी थी आवाज

याद रहे आज़ादी के आंदोलन में धार्मिक ग्रंथों में स्त्रियों एवं दलितों एवं अन्य वंचितों की स्थिति को लेकर विभिन्न सामाजिक क्रांतिकारक एवं सुधारकों ने लगातार अपनी आवाज़ बुलंद की है, यहां तक वर्ष 1927 में डॉ. अम्बेडकर की अगुआई में छेड़े गए महाड सत्याग्रह (1927) के दूसरे चरण में (25 दिसम्बर 1927) में महाड में डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था (Dr. Ambedkar burnt Manusmriti in Mahad) और उनके इस कार्रवाई की तुलना फ्रेंच इन्कलाब (1789) से की थी, जबकि पहले चरण में (19-20 मार्च) को महाड के चवदार तालाब पर अपने हजारों सहयोगियों के साथ पानी पीकर मनुष्य होने के अपने अधिकार को रेखांकित किया था।

गौरतलब था कि महाड सत्याग्रह (Mahad Satyagraha) की इस ऐतिहासिक कार्रवाई के बाद समय-समय पर अपने लेखन और व्याख्यानों में डॉ. अम्बेडकर ने मनु के विश्व नज़रिये की लगातार मुखालिफत की थी।

मनु के शासन को संविधान ने समाप्त किया

महाड सत्याग्रह के लगभग 23 साल बाद जब भारत के संविधान का ऐलान हो रहा था तब डॉ. अम्बेडकर ने इस अवसर पर कहा था कि संविधान ने ‘मनु के शासन को समाप्त किया है।’

विडम्बना कही जाएगी कि इक्कीसवीं सदी की तीसरी दहाई में एक न्यायविद द्वारा मनुस्मृति का यह समर्थन- जिसे डॉ. अम्बेडकर ने ‘प्रतिक्रांति’ का दस्तावेज कहा था- निश्चित ही कोई अपवाद नहीं कहा जा सकता। विगत कुछ वर्षों में ऐसे मामले बार-बार आए हैं, जब परोक्ष अपरोक्ष रूप से कुछ न्यायविदों ने अपने ऐसे तमाम पूर्वाग्रहों को प्रकट किया है।

क्या भारत की कानूनी प्रणाली के भारतीयकरण की आवश्यकता है?

दिसम्बर माह में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में कहा था कि भारत के संविधान के प्राक्कथन में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द के समावेश ने भारत की आध्यात्मिक छवि को सीमित किया है।

इसके बाद जनवरी की शुरूआत में सुप्रीम कोर्ट के एक अग्रणी जज सुर्खियों में आए, जब उन्होंने इसी अधिवक्ता परिषद के सम्मेलन में शामिल होकर भारतीय कानून व्यवस्था के गैर उपनिवेशीकरण विषय पर बात रखते हुए यह दावा किया कि भारत की कानूनी प्रणाली एक तरह से औपनिवेशिक कानूनी प्रणाली की विरासत है, जो भारतीय जनता के लिए अनुकूल नहीं है तथा उसके भारतीयकरण की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि ‘प्राचीन भारत की कानूनी प्रणाली की वास्तविक स्थिति जानने के लिए हमें प्राचीन भारतीय ग्रंथों की ओर लौटना होगा और हम पाएंगे कि भारत की वह न्याय प्रणाली कानून के राज पर टिकी थी।’…उन्होंने इस बात पर भी अफसोस प्रकट किया कि किस तरह भारत की आधुनिक कानूनी प्रणाली ने ‘मनु, कौटिल्य, कात्यायन, बृहस्पति, नारद, याज्ञवल्क्य आदि प्राचीन भारत के महान कानूनविदों के योगदानों की अनदेखी की है और वह ‘औपनिवेशिक कानूनी प्रणाली चिपकी रही है।’ लाजिम था कि प्रबुद्ध दायरों में यह बहस चल पड़ी कि क्या न्यायपालिका के अंदर कोई गंभीर विचारधारात्मक शिफ्ट हो रहा है।

जातिवादी न्यायाधीश (Casteist judges)!

याद कर सकते हैं कि बमुश्किल तीन साल पहले केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश चिदंबरेश (Kerala high Court judge Justice V Chitambaresh) सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने ‘ग्लोबल ब्राह्मण मीट अर्थात वैश्विक ब्राह्मण सम्मेलन (Global Brahmin Meat) को संबोधित करते हुए ब्राह्मण जाति की कथित वरीयता को रेखांकित किया था और सम्मेलन को यह आह्वान किया था कि आरक्षण का आधार क्या जाति होना चाहिए।

न्यायमूर्ति के पूर्वाग्रह (Justice’s Prejudice) किस तरह समाज में व्याप्त विषाक्तता को मजबूती देते हैं, इसे प्रमाणित करने के लिए अंत में हम मुंबई उच्च न्यायालय के एक फैसले पर बात कर सकते हैं। मुंबई उच्च न्यायालय ने एक मुस्लिम युवक की लिंचिग के मामले में सभी अभियुक्तों को पैरोल पर रिहा किया। अदालत का तर्क था कि ‘यह मृतक की एकमात्र गलती थी कि वह दूसरे धर्म से सम्बद्ध था, यह तथ्य मैं अभियुक्तों के पक्ष में मानती हूं … ऐसा प्रतीत होता है कि धर्म के नाम पर वह भड़क गए।’

अंत में सर्वोच्च न्यायालय को इस मुददे पर हस्तक्षेप करना पड़ा और अभियुक्तों की जमानत रद्द करनी पड़ी।

कई उदाहरण, एक ही चिन्ता, भारत को पुराना गौरव कब हासिल होगा और हम विश्व गुरु कैसे बनेंगे? कई अन्य उदाहरण दिए जा सकते हैं, लेकिन फिलवक्त इतना ही कहना काफी होगा कि आज़ादी की इस पचहत्तरवीं सालगिरह पर न्यायपालिका पर भी गहराते बादलों को हम देख सकते हैं, जो यह संकेत जरूर देते हैं कि चीजें अब जबरदस्त उथल-पुथल में हैं। इसका समाधान क्या निकलेगा, इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में है।

– सुभाष गाताडे

Is there an ideological shift in India’s judiciary?

बलात्कारियों का सम्मान! कैसा समाज बना रहे हैं हम?

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गर निर्भया के दोषी कर दिए जाएं रिहा, तो कैसी होगी आपकी प्रतिक्रिया?

फर्ज़ कीजिये किसी दिन आपको यह ख़बर मिलती है कि निर्भया के दोषियों को जेल से रिहा कर दिया गया है, क्योंकि आज़ादी के मौके पर सरकार ने अच्छी चाल-चलन वाले और बीमार कैदियों को रिहा करने का फैसला किया है, तब आपकी प्रतिक्रिया क्या होती?

निर्भया, जिसके साथ छह लोगों (जिनमें एक नाबालिग) ने बलात्कार किया था, अमानुषिक तरीके से मार-पीटकर घायल किया था और जिसके बाद उसकी मौत हो गई थी। यानी बलात्कार के बाद हत्या (murder after rape)। आप कहेंगे कि उसके चार अपराधियों को तो फांसी हो गई, पांचवे ने जेल में ही ख़ुदकुशी कर ली थी और एक नाबालिक को रिहा कर दिया गया।

ऐसी ही सजा के लायक हैं सामूहिक बलात्कारी

बेशक, सामूहिक बलात्कारी ऐसी ही सजा के लायक हैं। पूरा देश उस वक्त निर्भया के लिए उद्वेलित था जो अपने परिवार के सपनों को पूरा करने के लिए फिज़ियोथेरेपी की पढ़ाई कर रही थी।

क्या बलात्कारी माफी के योग्य हैं?

निर्भया की मां और पिता का सतत संघर्ष था जो अपराधी फांसी के फंदे तक पहुंचे। दूसरी तरफ बिलकिस बानो (Bilkis Bano) हैं जो लगभग निर्भया की ही उम्र की थीं, जब मार्च 2002 के गुजरात दंगों में उनसे सामूहिक बलात्कार हुआ, उनकी तीन साल की बेटी मार दी गई, उनके गर्भस्थ शिशु की भी मौत हो गई, परिवार के सात सदस्यों को भी मार दिया गया। सीबीआई की विशेष अदालत ने मुजरिमों को सजा दी जिसे बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरक़रार रखा। ये संख्या में 11 थे जिन्हें पंद्रह अगस्त को गुजरात सरकार ने रिहा कर दिया। बेशक माफी का प्रावधान होता है लेकिन बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में नहीं।

कई सवाल खड़े करती है बिलकिस के बलात्कारियों की रिहाई

यह ब्यौरा कई सवाल खड़े करता है। निर्भया के अपराधियों को फांसी, तो बिलकिस बानो के बलात्कारियों की रिहाई क्यों (Why the release of rapists of Bilkis Bano)? मामला जब सीबीआई का था तो राज्य सरकार माफी क्यों दे रही है? आरोपी पहले तिहाड़ जेल में थे, तो गुजरात की जेल में स्थानांतरित क्योंकर किये गए? गुजरात के विधानसभा चुनाव सामने हैं। क्या सरकार को इस बात का कोई डर नहीं कि इस रिहाई से जनता में गलत संदेश जाएगा?

क्या अब मज़हब देख कर मिलेगा न्याय?

बिलकिस बानो जैसों को न्याय अब मज़हब को देखते हुए मिलेगा? जकिया जाफरी, तीस्ता सीतलवाड़ को जेल और अब बिलकिस बानो के अपराधियों की रिहाई न्याय की किस किताब का प्रतिनिधित्व करती हैं? सर्वोच्च न्यायालय पहले भी बिलकिस बानो के हक़ में खड़ा हुआ था। क्या अब भी होगा?

प्रधानमंत्री के कथनी और करनी के फर्क

यह सब तब होता है जब प्रधानमंत्री 15 अगस्त को ही लाल किले की प्राचीर से नारी सम्मान को लौटाने की बात करते हैं। कथनी और करनी के इस फर्क को क्या जनता इन दिनों नज़रअंदाज़ कर रही है?

शायद हां, तभी किसी राजनीतिक दल की सरकार ऐसी दरिंदगी करने वालों को माफी के काबिल समझने लगती है। फिर विश्व हिंदू परिषद के दफ्तर में उनके मस्तक पर तिलक लगते हैं और मिठाइयां बांटी जाती हैं। इसके वायरल हो रहे वीडियो पार्टी के कार्यकर्ताओं को इस बात का संदेश भी देंगे कि हमने जो किया उसके बाद हमें रिहाई भी दिलाई जाती है और सम्मान भी। पार्टी अकेला नहीं छोड़ती। ठीक वैसे ही जैसे भाजपा के सांसद जयंत सिन्हा ने मॉब लिंचिंग के बाद ग्यारह अपराधियों के जेल से रिहा होते ही उनका फूलों की माला से स्वागत किया था।

पीड़ित का नाम बिलकिस बानो हो जाने से क्या नज़रिये में फर्क आ जाता है? निस्संदेह पार्टी को यह यकीन तो होगा ही कि इस फैसले से उनके मतदाताओं में उनकी पैठ नहीं घटने वाली। वास्तविक चिंता वोट बैंक की होनी चाहिए या उस सरोकार की जिससे देश की आधी आबादी भी सुरक्षित रहे। उन्नाव, हाथरस की घटनाओं से बहुत पहले राजस्थान के भटेरी गांव की भंवरी देवी भी हैं जिन्हें कोई न्याय नहीं मिला।

बलात्कारियों की कवच बन गई है सियासत

भंवरी देवी के साथ तीस साल पहले सामूहिक बलात्कार हुआ था। वे साथिन (आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ) की ड्यूटी संभाल रही थीं और उन्होंने एक बाल विवाह को रुकवाया था।

भंवरी देवी का बाल विवाह रुकवाना कथित ऊंची जाति वालों को बरदाश्त नहीं हुआ। भंवरी देवी का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया और इस पर भी शांति न मिली तो पांच लोगों ने उसके पति के सामने उसका बलात्कार किया। 22 सितंबर, 1992 के बाद से भंवरी देवी ‘मन्ने न्याय चाहिए’ की पुकार लगा रही हैं और तब से ही उनकी पुकार पर प्रहार का सिलसिला जारी है। घटना के 52 घंटे बाद तक उनका मेडिकल मुआयना नहीं किया गया। वे अपने पेटीकोट को ले लेकर भटकती रहीं। फिर कोर्ट ने तो यहां तक कह दिया कि कोई ऊंची जाति वाला नीची जाति से बलात्कार कैसे कर सकता है? उन पर दबाव बनाया गया कि मुकदमा वापस ले लें लेकिन उनका कहना था कि अगर ये मेरा मान लौटा सकते हैं तो मैं भी मुकदमा वापस ले लूंगी। यही बात उन्होंने गांव के बुर्जुगों से भी कही। इस बीच खूब राजनीतिक दांव-पेंच खेले गए। सियासत बलात्कारियों की कवच बन गई। भंवरी देवी के कई रिश्तेदारों ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया। सिवाय उनके पति के।

इस व्यवस्था में स्त्री का भरोसा कैसे कायम रह सकता है?

व्यवस्था जब यूं डोल रही हो तब स्त्री का भरोसा इस व्यवस्था में कैसे कायम रह सकता है? उत्तर प्रदेश के हाथरस में 19 साल की दलित लड़की के साथ चार ऊंची जाति के लोगों ने बलात्कार किया। पंद्रह दिन बाद दिल्ली के अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने जबरदस्ती गुपचुप उसका अंतिम संस्कार कर दिया।

व्यवस्था जब-तब एक स्त्री के सम्मान को यूं आग में भस्म करती रही है। क्यों नहीं एक स्त्री के मन में यह विचार आएगा कि जो भी हो रहा है उसे बर्दाश्त करते रहो क्योंकि न्याय मांगने की राह में व्यवस्था अक्सर उसके खिलाफ देखी गई है।

बलात्कारियों को सत्ता का संरक्षण

उन्नाव मामला 2017 में सामने आया था। पीड़िता की उम्र केवल सत्रह साल थी। भाजपा के पूर्व सदस्य और विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जेल हुई। न्याय मिलने की प्रक्रिया तब शुरू हुई जब उसने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास के सामने खुद को जलाने की कोशिश की। उसके बाद उसके पिता को हिरासत में लिया गया जहां पीड़िता के पिता की मौत हो गई। बाद में पीड़िता भी नहीं रही।

ऐसे मामलों की फेहरिस्त लंबी है जहां की पीड़ा और फिर शोर सुनाई तो दे गया लेकिन न्याय का रास्ता बहुत मुश्किलों वाला रहा। ऐसे में महिलाएं अपनी आवाज घोंट देने में ही अपनी भलाई समझती हैं।

भविष्य के लिए खतरनाक है यह परिपाटी

बिलकिस बानो अब डरी हुई हैं और गहरे विषाद में आ गई हैं। वह कहती है कि मैंने अपनी बच्ची सलेहा की रूह की शांति के लिए दुआ पढ़ी। उनके पति का यह भी कहना था कि ऐसा कोई माफीनामा भी होता है, हमें बिलकुल पता नहीं था।

बिलकिस ने कई जानलेवा धमकियों के बीच इस लड़ाई को लड़ा था। सुनवाई गुजरात की बजाय महाराष्ट्र स्थानांतरित हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने 50 लाख रुपए बतौर मुआवजा और नौकरी देने के निर्देश भी दिए। नौकरी मिलना शेष है लेकिन ये पैसे वे अब अपनी बड़ी होती बेटियों की शिक्षा पर खर्च करेंगी। क्या वाकई सरकार का यह भ्रम है या यकीन कि बिलकिस बानो जैसे मामलों से उसके मतदाताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता?

हम वही समाज हैं जहां बाल विवाह, बहुविवाह, सती प्रथा के खिलाफ कानून बने जबकि समाज में इन कुप्रथाओं की जड़ें गहरी थीं। एक बेहतर समाज की रचना तभी संभव है जब हरेक के लिए लिंग भेद से परे जीने के समान अवसर हों। अगर कोई सत्ता प्रतिष्ठान यह मानने लगे कि बिलकिस बानो जैसे मामले उसके वोट बैंक को कतई प्रभावित नहीं करेंगे तो यह मान लेना चाहिए कि अब हम भी भीड़तंत्र या लोक लुभावन राजनीति के घेरे में आ चुके हैं; बिना इसकी परवाह किये कि यह भविष्य के लिए खतरनाक है।

वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित आलेख किंचित् संपादन के साथ साभार

What kind of society are we creating by respecting rapists?

नेहरूजी के आगे खड़े होने की नाकाम कोशिश

modi at red fort 15 august

आजादी का अमृत महोत्सव पर संपादकीय टिप्पणी (Editorial Comment on Amrit Mahotsav of Azadi)

देशबन्धु में संपादकीय आज (Editorial in Deshbandhu today)

देश में इस वक्त आजादी की 75वीं वर्षगांठ (75th anniversary of India’s independence) का शोर है। देशभक्ति और राष्ट्रवाद से भरे ओजपूर्ण गीत लाउड स्पीकर पर जोर-जोर से बजाए जा रहे हैं। एक तरह की होड़ है कि शहर के किस नुक्कड़, गांव की किस गली से कितने जोर से गाने बज सकते हैं।

तो तिरंगा लहरा कर होगी देशभक्ति साबित?

देशभक्ति साबित करने के लिए अब तिरंगा लहराने का काम भी दे दिया गया है। देश से प्यार, आजादी की खुशी अब मन में मनाने से काम नहीं चलेगा, नए भारत में हर चीज दिखावे की हो गई है। देशभक्ति भी इसी श्रेणी में शुमार है।

1947 में जब देश को आजादी मिली थी, उस वक्त लोगों में नए भारत की, अपने शासन की, लोकतंत्र की ढेर सारी उम्मीदें थीं। कई डर भी थे कि कैसे भारत अपने पैरों पर खड़ा होगा, नयी सरकार किस दिशा में देश को आगे लेकर जाएगी, कैसे गुटों में बंटी हुई दुनिया में भारत अपना स्थान सुरक्षित करेगा, बंटवारे के जख्म से कराहते लोगों को सरकार कैसे संभालेगी, हिंदू-मुसलमान के बीच की खाई कैसे भरी जाएगी, खेती, उद्योग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान ऐसे तमाम क्षेत्रों में देश किस नजरिए के साथ आगे बढ़ेगा, ऐसे ढेरों सवाल उस वक्त के नेताओं और लोगों के मन में थे। गनीमत थी कि नेहरू जी जैसे दूरदृष्टा नेता के हाथ में भारत की कमान गयी, जिन्होंने उदार सोच और व्यापक नजरिए के साथ देश को संभाला। उनकी बात हिंदू भी सुनते थे और मुसलमान भी। और वे इतने बेखौफ थे कि खुली जीप में घूमते थे, भीड़ के बीच अकेले घुस जाते थे, कोई विरोध करे या नाराज हो तो उसकी बात गौर से सुनते थे।

Pt. Jawahar Lal Nehru
Pt. Jawahar Lal Nehru
देश के प्रिय नेता और दुनिया के लिए शांतिदूत थे पं नेहरू

देश के भीतर वो लोगों के प्रिय नेता थे और दुनिया के लिए वो शांतिदूत थे, जो अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए देशों के लिए मिसाल थे। 1947 से नेहरूजी ने देश को इस तरह संभाला कि देश कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन गया। और उनके बाद भी आने वाली सरकारों ने उनकी नीतियों पर देश को चलाया और आगे बढ़ाया। कई सार्वजनिक निकाय स्थापित हुए, एम्स, आईआईटी, इसरो जैसी संस्थाएं बनीं, देश में स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय। इन सबके साथ लोगों में देशभक्ति की भावना भी विकसित हुई। कारखानों, उद्योगों, बांधों, सड़कों, रेल लाइनों, में लोगों को देश का विकास दिख रहा था और इसके लिए प्यार जाग रहा था। अपने प्यार को दिखाने के लिए लोग 15 अगस्त और 26 जनवरी को बड़े उत्साह के साथ तिरंगा फहराते थे, प्रभात फेरियां निकालते थे, देशभक्ति के गीत गाते थे। तब तिरंगा फहराने की कोई जबरदस्ती नहीं थी। लेकिन अब सरकार अपने ही लोगों से देशभक्ति का सबूत मांग रही है।

स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बदलने की साजिश!

जब सरकार आपसे कहे कि आपको अपनी आजादी का उत्सव इस ढंग से मनाना है, तो फिर यह सवाल ये उठता है कि क्या हम वाकई आजाद हैं (are we really free)। हमें देशभक्ति साबित करने के लिए तिरंगा फहराकर उसकी फोटो पोस्ट करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। अगर हम ईमानदारी से अपना काम करें, संविधान के खिलाफ कोई कदम न उठाएं, समय पर अपने करों का भुगतान करें, रिश्वत, धोखाधड़ी, बैंकों से कर्ज लेकर वापस न करना, ऐसे गलत काम न करें, समाज और देश को तोड़ने वाले काम न करें, सभी धर्मों की इज्जत करें और सौहार्द्र को कायम रखें तो क्या ये सब देशभक्ति नहीं कहलाएगी।

जाहिर है मौजूदा वक्त में देश से प्यार के ये पैमाने बदल गए हैं और अब इसके साथ स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बदलने की चालाकी भी सरेआम की जा रही है।

खासकर नेहरूजी का नाम किसी भी तरह से धूमिल हो, इसकी कोशिश हो रही है। जैसे कर्नाटक सरकार ने हर घर तिरंगा अभियान को लेकर एक विज्ञापन अखबारों में दिया है, जिसमें गांधीजी से लेकर वी डी सावरकर तक की तस्वीर है, साथ में प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री बोम्मई की भी तस्वीर है, लेकिन नेहरूजी की तस्वीर इस विज्ञापन में नहीं है।

कर्नाटक सरकार ने स्वाधीनता सेनानियों की तस्वीरों में नेहरूजी का चित्र शामिल करना जरूरी नहीं समझा और देश के सबसे तेज समाचार चैनल की तेज तर्रार एंकर ने आजादी के दौरान के एक वीडियो को अपने कार्यक्रम में दिखाते हुए अपने पीछे नेहरू जी को छिपाने की कोशिश की।

इस वीडियो में एंकर खुद सफेद-काली साड़ी में पुराने जमाने की नायिकाओं की तरह तैयार हुई 15 अगस्त 1947 की उन घड़ियों का वर्णन कर रही हैं, जब देश को आजादी मिली थी। इस वीडियो में तकनीकी के कमाल से एंकर ने इस तरह अपना स्थान बनाया है कि जहां नेहरू जी खड़े होकर उत्साही जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं, ठीक उनके सामने एंकर आ कर खड़ी हो जाती है। ये सरासर नेहरूजी को पार्श्व में धकेलने की नापाक साजिश दिख रही है। वीडियो बनाने वाले चाहते तो एंकर का स्थान कहीं और बना सकते थे, लेकिन नेहरूजी को किन के इशारे पर दबाया जा रहा है, यह समझना कठिन नहीं है।

आजादी के अमृत महोत्सव में निकृष्टता का प्रदर्शन

75 बरस पहले जब आजादी मिली थी, देश में तब भी वैचारिक मतभेद कायम थे और जब तक लोकतंत्र रहेगा, ये मतभेद बने रहेंगे। लेकिन उस वक्त विरोधियों को मात देने के लिए खुद इतना नीचे नहीं गिरा जाता था। अब तो नैतिकता, मर्यादा, शिष्टाचार के तमाम तकाजों को कैद कर आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। तय है कि इस अमृत पर उन्हीं लोगों का हक होगा, जिन्होंने खुद को बाकियों से ऊंचा मान लिया है। समाज के आम लोग, निचले पायदान के लोग एक बार फिर अमृत की आस में कटोरा लिए ठगे जाएंगे या अमृत पाने के लिए ऊंची जमात में शामिल होने की कोशिश में दंडित किए जाएंगे।

देशबन्धु में आज का संपादकीय का किंचित् संपादित रूप साभार

मुखर्जी, हेडगेवार और सावरकर द्वारा तिरंगे के अपमान के लिए भाजपा देश से माफी मांगे – शाहनवाज़ आलम

Failed attempt to stand before Nehru

करते हो मोदी से प्यार, तो तिरंगे से क्यों इंकार?

pushpranjan

डोनाल्ड ट्रंप से प्रेरित है मोदी का तिरंगे से प्यार

आप उस कालखंड की ख़बरें पढ़िये, जब डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में थे। डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति का ब्रह्मास्त्र था, अमेरिकी ध्वज। आर्मी वेटरन से लेकर स्कूली बच्चों तक, अमेरिकी ध्वज वाहक। अमेरिकी वैभव, राष्ट्राभिमान को कुछ ऐसी चालाकी से ट्रंप के रणनीतिकारों ने चिपकाया, उसे ना करने का मतलब देश के प्रति आपकी निष्ठा संदेहास्पद। नये-नवेले अनिवासी, जो अमेरिका में रहने के आकांक्षी थे, उनकी विवशता थी कि अधिक से अधिक अमेरिकी ध्वज के इस्तेमाल को दिखायें। टोपी में, टीशर्ट में, अपने घरों की छत-बाल्कनी में, या फिर कार में, यहां तक कि शरीर पर उकेरे टैटू में, अमेरिकी ध्वज दिखना चाहिए। रोज़गार नहीं है, कारोबार चौपट है, मगर अमेरिकी ध्वज दिखाओ। अमेरिकी राष्ट्रवाद जपो, और बोलो कि ट्रंप की नीतियां सही हैं।

ट्रंप शासन के दसेक साल पहले 17 सितंबर 2008 को यमन की राजधानी सना में अमेरिकी दूतावास पर हमले हुए। अमेरिकी ध्वज को गोलियों से हमलावरों ने छलनी कर दी। यमन में दूतावास बचाने के क्रम में अमेरिकी मरीन ने जो गोलाबारी की उसमें 18 मौतें हुईं, 16 लोग बुरी तरह से घायल हुए। कोर्ट मार्शल हुआ, मगर अमेरिकी ध्वज के अपमान (disgrace of the american flag) के हवाले से वो सैनिक कमांडर बचा लिये गये, जिन्होंने आम नागरिकों, औरतों-बच्चों पर फायरिंग का आदेश दिया था।

यह ट्रंप शासन काल से पहले और बाद की बात है जब यमन की राजधानी सना में 13 सितंबर 2012, 10 नवंबर 2021 को अमेरिकी दूतावास को घेरकर तोड़फोड़ व हिंसा हुई थी।

हजरत मोहम्मद पर फिल्म की वजह से हुआ अमेरिकी ध्वज का अपमान

तीन तारीख़ों को ग़ौर से देखें, तो हमलावरों ने जान-माल की क्षति के साथ-साथ अमेरिकी ध्वज का अपमान भी किया था। वजह, हज़रत मोहम्मद पर फ़िल्म थी। (American flag was insulted because of the film on Hazrat Mohammad)

मघ्यपूर्व में अमेरिकी ध्वज का अपमान होता, और उसकी राजनीति रिपब्लिकन पार्टी अपने देश में करती। ट्रंप से करते हो प्यार, तो झंडे से क्यों इंकार? यहां तक राजनीति का स्तर पहुंचा दिया था रिपब्लिकन पार्टी ने।

डोनाल्ड ट्रंप ने सेना से लेकर सिविलियन तक ध्वजारोहण की जो राजनीति छेड़ रखी थी, उसका सकारात्मक परिणाम दोबारा से सत्ता में वापसी के माइल हो नहीं सका।

क्या भारत में भी ट्रंप की राजनीति कारगर होगी?

मगर, ज़रूरी नहीं कि भारत में भी ट्रंप की राजनीति जैसा अवसान देखने को मिले। अमेरिकी वोटर के तेवर, वहां की चुनावी पारदर्शिता, अदालती आज़ादी से भारत की तुलना नहीं की जा सकती।

आज़ादी के अमृत काल में 20 करोड़ घरों पर तिरंगा फहराने का लक्ष्य रखा गया है। 13 से 15 अगस्त के बीच हर घर तिरंगा कार्यक्रम के तहत यह मान लिया गया है कि इससे मोदी समर्थक निर्धारित हो जाएंगे।

शहर, गांव, मलीन बस्तियों के 20 करोड़ घरों पर तिरंगे का तसव्वुर कर लीजिए, मगर उसका मतलब यह नहीं होता कि ये सारे आपके वोट बैंक हैं। कुछ भय से, तो कुछ प्रीत से झंडे लहराने वाले मिलेंगे। सभी दल-जमात के लोग भी इनमें शामिल होंगे। वो भी होंगे, जो डूबते सूरज से मुंह मोड़ते हैं, और शाहे वक़्त को सलाम करते हैं।

ध्वजारोहण के साथ-साथ ध्वज के अपमान की ख़बरें भी तेज़ी से वायरल हो रही हैं। लेकिन ये ख़बरें अलग-अलग चश्मे के साथ देखी-दिखाई जा रही हैं। बिहार के औराई में अशोक चक्र की जगह चांद-सितारे प्रिंट किये तिरंगे को फहराये जाने को लेकर नीतीश-तेजस्वी सरकार पर हमले तेज़ हो गये हैं। औराई पुलिस ने झंडे को उतरवाया, और प्राथमिकी दर्ज़ की है। कानपुर में किसी धार्मिक कार्यक्रम के दौरान तिरंगे से छेड़छाड़ कर उसमें भारत का नक्शा दिखाने के विरूद्ध बजरंग दल ने प्राथमिकी दर्ज़ कराई। इस कांड के हवाले से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धमकाया है कि जिसने भी तिरंगे का अपमान किया, उसकी ख़ैर नहीं।

इसके बरक्स यूपी कांग्रेस, उन भाजपा नेताओं की तस्वीरें ढूंढ-ढूंढ कर वायरल कर रही है, जो उल्टे-पुल्टे तरीक़े से तिरंगे फहरा रहे हैं। 11 अगस्त 2022 को यूपी कांग्रेस के ट्विटर अकाउंट से सैदपुर से भाजपा के सांसद विनोद कुमार सोनकर की तस्वीर वायरल हुई है, जिसमें उन्होंने अपने साथियों के साथ राष्ट्रध्वज उल्टा पकड़ रखा है। मगर, इसके लिए प्रदेश शासन क्या कार्रवाई करता है? यह सवाल भी महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रध्वज फहराने की तमीज़ भी होनी चाहिए?

आप बिल्कुल मनाइये तीन दिवसीय तिरंगा दिवस, मगर क्या उस वास्ते लोगों को राष्ट्रध्वज फहराने की तमीज़ नहीं होनी चाहिए? राष्ट्रध्वज के सम्मान को लेकर बने द प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट-1970′ (‘The Prevention of Insults to National Honour Act-1970) से कितने लोग वाकिफ हैं? नेहरू काल में जो हुआ सो हुआ, पिछले आठ वर्षों में मंत्री-सांसदों ने तिरंगे का कितनी बार जाने-अनजाने अपमान किया, विस्तार से बताएं, तो उसकी सूची काफी लंबी हो जाएगी। ऐसे महानुभावों में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान, सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्ज़ा, तिरंगे की प्रिंट वाली साड़ी धारण करने वाली मंदिरा बेदी तक के नाम शामिल हैं।

5 अगस्त 2022 को हिमाचल सरकार ने केंद्र से शिकायत की, कि साढ़े सत्रह लाख तिरंगे की सप्लाई होनी थी, उसके बदले 10 लाख तिरंगे आये, उनमें भी केसरिया के बदले लाल रंग और अंडाकार अशोक चक्र छपे हुए। राष्ट्रध्वज के कपड़े आड़े-तिरछे कटे हुए। कला-संस्कृति विभाग के सचिव ने केंद्र को भेजे पत्र में लिखा कि 25 रुपये के ये झंडे कोई दो रुपये में भी ख़रीदने को तैयार नहीं है। अधिकांश तिरंगे सूरत में प्रिंट हुए हैं। साउथ गुजरात प्रोसेसिंग हाउस यूनिट एसोसिएशन के अध्यक्ष जीतू वाखड़िया ने 6 जुलाई 2022 को बयान दिया था कि केंद्र सरकार 72 करोड़ तिरंगे सूरत से प्रिंट कराना चाह रही थी, जिसमें से 10 करोड़ झंडे सूरत टेक्सटाइल इंडस्ट्री वालों ने तैयार कर भेज दिये। हिमाचल में जो ख़राब प्रिंट वाले आड़े-तिरछे कटे झंडे भेजे गये, उससे आप दूसरे प्रांतों में भी तिरंगा सप्लाई में हुई गड़बड़ियों का तसव्वुर कर सकते हैं।

कब बनी राष्ट्रध्वज आचार संहिता?

आज से 20 साल पहले 2002 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘राष्ट्रध्वज आचार संहिता‘ (भारतीय झंडा संहिता, 2002) तय किया था। 25 पेज के उस दस्तावेज़ को कोई ध्यान से पढ़े, तो उसका उल्लंघन साफ़ नज़र आयेगा। विभिन्न आकार के नौ तिरंगे के बारे में विस्तार से उस दस्तावेज़ में लिखा गया है। अधिकतम 6300 ग— 4200 मिलीमीटर (पौने तीस फीट ग —पौने चौदह फीट) और सबसे छोटा तिरंगा 150 ग —100 एमएम (5.90 इंच —ग 3.93 इंच)। आठ वर्षों में क्या सचमुच इसी साइज़ के झंडे बनने लगे? अब तो जंबो साइज वाले तिरंगों में प्रतिस्पर्धा है। इसके लिए ‘राष्ट्रध्वज आचार संहिता-2002’ में संशोधन कहीं नज़र नहीं आया।

पॉलिएस्टर वाले राष्ट्रध्वज का विरोध क्यों हुआ?

‘राष्ट्रध्वज आचार संहिता-2002’ में बहुत साफ बताया गया था कि तिरंगा बुल, कॉटन, सिल्क अथवा खादी के हों, और हस्तकरघा पर बुने गये हों। मोदी सरकार ने आचार संहिता में बदलाव कर 30 दिसंबर 2021 को आदेश जारी किया कि मशीन मेड पॉलिएस्टर धागे से तिरंगे बनाये जाएंगे। 20 जुलाई 2022 को एक बार फिर केंद्र से आदेश हुआ कि तिरंगा अब दिन-रात फहराया जा सकेगा।

पॉलिएस्टर वाले राष्ट्रध्वज का विरोध (protest against the polyester national flag) सबसे पहले कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ ने किया, जिसे चुप करा दिया गया। सरकार की तरफ़ से यह भी तर्क दिया गया कि कताई वाली सूती खादी झंडे की क़ीमत 2832 रुपये है। खादी भंडार में तिरंगे की यह क़ीमत सचमुच चकित कर देने वाली थी। सूती तिरंगे की अनियंत्रित क़ीमत ने समूचे राष्ट्र को पॉलिएस्टर मेड कृत्रिम झंडे की तरफ मोड़ दिया, यह दास्तां सचमुच दुख देने वाली है।

खादी त्यागिये, पॉलिएस्टर के झंडे पोस्ट ऑफिस में बेचिए। रेल व केंद्रीय कर्मचारी झंडे की मनमानी क़ीमत वसूली से गु़स्से में हैं, मगर परवाह किसे है? कॉरपोरेट के लिए तिरंगा सप्ताह, मालामाल वीकली में बदल दिया। मस्त रहिए।

कई बार मन में सवाल उठता है कि राष्ट्रवाद को प्रज्ज्वलित करने में फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन नवीन जिंदल ने क्या सही भूमिका अदा की थी? रायगढ़ की फैक्ट्री में झंडा फहराने से रोके जाने के विरोध में नवीन जिंदल सर्वोच्च न्यायालय तक गये, और 23 जनवरी 2004 को यह आदेश हुआ कि देश का आम आदमी राष्ट्रीय झंडा फ हरा सकता है। इस घटना के 18 साल से अधिक हो चुके। एक बार इसकी समीक्षा होनी चाहिए कि इस देश में तिरंगे का सम्मान और अपमान, सदुपयोग और दुरूपयोग कितना हुआ है?

अब राज्यों में दावेदारी शुरू है कि सबसे ऊंचा राष्ट्रध्वज उसके पास है, चुनांचे टूरिस्ट यहां आयें। 23 जनवरी 2016 को रांची को 293 फीट तिरंगा फहराने का गौरव प्राप्त हुआ है। तब इसे देश का सबसे बड़ा राष्ट्रध्वज बताया गया था। 2018 में बेलगावी (बेलगांव, कर्नाटक) में 361 फीट का तिरंगा फहराकर झारखंड की लकीर छोटी कर दी गई। इन्हें कौन समझाये कि अति सर्वत्र वर्जयेत।

2 जून 2016 को हैदराबाद के हुसैन सागर तट पर 88 मीटर (291 फीट) का तिरंगा लगा। दिल्ली में 207 फीट का राष्ट्रध्वज लहरा रहा है।

आप देश को बुनियादी समस्याओं से भटकाकर, तेरा झंडा-मेरा झंडा खेल रहे हैं। मगर यही झंडा संभाले नहीं संभल रहा है। दिल्ली में 207 फीट का तिरंगा 11 बार फट चुका है। हैदराबाद के हुसैन सागर तट पर 291 फीट का राष्ट्रध्वज तेज़ हवाओं की वजह से तीन बार फट चुका है। रांची में राष्ट्रध्वज का वही हाल हुआ। बेलगाम, रायपुर, लखनऊ, पुणे, गुवाहाटी, फरीदाबाद, विशालकाय तिरंगे लगा दिये, जो तूफानी मौसम में संभाले नहीं संभल रहे। मार्च 2017 में अटारी में 80 गुणा 120 फीट का तिरंगा गिरकर फट गया, उसे अमृतसर के एक टेंट वाले से सिलवाया और दोबारा से फहरा दिया। 14 अगस्त 2017 को बडोदरा में 67 मीटर का राष्ट्रध्वज धराशायी होकर फट गया। यह ध्वज तत्कालीन सीएम विजय रूपाणी को फहराना था। सोचिये, कितनी फजीहत हुई होगी?

आप इन फटे तिरंगों की मरम्मत करते हो, फिर फहराते हो। क्या यह अपमान नहीं है?

राष्ट्रध्वज के प्रति इतना ही समर्पण भाव था, तो चेन्नई के फोर्ट सेंट जार्ज में पड़े देश के सबसे पुराने राष्ट्रध्वज की मरम्मत के बारे में फैसला लेने में बरसों क्यों लगे?

पुष्परंजन

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गुलाब के बाद बहुत प्रचलित है गुलदाउदी का फूल

chrysanthemum in hindi

Chrysanthemum in Hindi : गुलदाउदी का फूल बड़ा मनभावन होता है

गुलाब के बाद गुलदाउदी का फूल (chrysanthemum flower in Hindi) लागों  में बहुत प्रचलित है क्योंकि यह अपने अनोखे रंग एवं आकार के कारण लोगों को अपनी ओर सहज ही आकर्षित कर लेता है। प्राय: इसे बाहर क्यारियों में अथवा गमले में उगाते हैं, क्योंकि इसके समुचित वृद्धि के लिए पर्याप्त मात्रा में रोशनी एवं जल की आवश्यकता पड़ती है। यदि सूरज की रोशनी पूरे दिन नहीं आती हो तो पूर्वाह्न वाली रोशनी पर्याप्त होती है।

गुलदाउदी के फूलों का रंग (chrysanthemum flower color) बड़ा मनभावन होता है, जो कि सफेद से लेकर पीला, बैंगनी, लाल एवं अन्य मिश्रित रंग भी हो सकता है।

गुलदाउदी की खेती कहां होती है?

गुलदाउदी की खेती (Chrysanthemum Cultivation) हजारों वर्ष पूर्व एशिया के चीन वाले भू-भाग से होते हुए इंग्लैंड, जापान, अमेरिका एवं विश्व के अन्य भागों में पहुंच गई है। गुलदाउदी की खेती की खेती बहुत ही सहज एवं सरल है सिर्फ इसे तेज आंधी, गर्मी एवं बर्फवारी से बचाना चाहिए। जापान में गुलदाउदी की खेती बृहद् स्तर पर होती है एवं इसे वहां के राष्ट्रीय पुष्प का दर्जा प्राप्त है।

गुलदाउदी का वर्गीकरण (classification of chrysanthemums)

विभिन्न देशों में गुलदाउदी की खेती एवं गुलदाउदी पर शोध कर गुलदाउदी की हजारों प्रजातियां विकसित की गई हैं। नई-नई प्रजातियां चयन एवं कृत्रिम संकरण विधि से विकसित की गई है।

गुलदाउदी के फूल एवं आकार के आधार पर इसे सात वर्गों में बांटा जा सकता है। इनमें से घुमावदार गेंदनुमा, बिखरे हुए पंखुड़ी, चम्मचनुमा, मकड़ीनुमा एवं छोटा पुष्प वाले गुलदाउदी प्रचलित हैं।

गुलदाउदी के लिए आवश्यक मिट्टी और उर्वरक (Soil and fertilizer needed for chrysanthemum)

गुलदाउदी की खेती के लिए मिट्टी अच्छी उर्वरा होनी चाहिए। क्यारी की मिट्टी को कम से कम 60 सेंटीमीटर की गहराई तक गुड़ाई कर कम्पोस्ट मिलाना चाहिए। क्यारी का स्तर इस तरह सुनियोजित करें कि वर्षा एवं सिंचाई के पानी का जल भराव न हो सके। पौधे की वृद्धि के समय यूरिया का तरल घोल प्रत्येक पौधे में अल्पमात्रा में दिया जाना चाहिए। गुलदाउदी के पौधों में कली के निकलते समय भी सल्फेट ऑफ पोटाश का छिड़काव करना चाहिए।

गुलदाउदी की पौध कैसे बनती है? (How does a chrysanthemum plant form?)

गुलदाउदी का पौधा बीज एवं कटिंग के माध्यम से प्रवर्धित किया जाता है। कटिंग के माध्यम से प्रवर्धित पौधे से अच्छे किस्म के पुष्प प्राप्त होते हैं। इसके लिए पिछले वर्ष के पौधे के फूल खिलने के पश्चात मार्च माह में धरातल से एक फीट छोड़कर ऊपर से काटकर हटा देते हैं। कुछ समय पश्चात कटे हुए टुकड़े के निचले भाग से सहायक पौध (सकर) निकल आते हैं। इन्हें सावधानीपूर्वक हटाकर छोटे गमले में लगाते हैं।

गमले में उचित मात्रा में मिट्टी, रेत एवं पत्ती वाली खाद मिलाकर भराई कर नए पौधे को लगाना चाहिए।

बढ़ते हुए पौध को समय-समय पर बड़े गमले में हस्तांतरित करते रहना चाहिए।

गुलदाउदी के पौधों के बीच की कितनी दूरी हो?

गुलदाउदी के छोटे आकार वाले पौधों के बीच डेढ़ से दो फीट का अंतरण होना चाहिए, जबकि बड़े आकार वाले पौधों के बीच की दूरी ढाई से तीन फीट होनी चाहिए।

गुलदाउदी के फूल लंबे एवं बड़े आकार के होते हैं जो कि तेज आंधी-तूफान में गिर सकते हैं अत: पौधे को सहारा देने के लिए पौधे की बगल में मजबूत सी लंबी लकड़ी गाड़ देनी चाहिए।

गुलदाउदी की कटाई-छटाई (chrysanthemum harvesting)

जब गुलदाउदी के पौधे 20-25 सेंटीमीटर लंबे हो जाएं तो इससे वांछित आकार के पुष्प प्राप्त करने के लिए कटाई एवं छटाई करते हैं। पौधे के मुख्य तने के शीर्ष भाग को तोड़ देते हैं, जिससे अगल-बगल के पर्णवृन्त से शाखाएं निकलने लगती हैं। यह प्रक्रिया प्राय: मई-जून में करते हैं।

आवश्यकतानुसार इसे दुहराया भी जा सकता है। परंतु हर हाल में प्रक्रिया अगस्त तक कर लेनी चाहिए।

पौधे से निकलने वाली शाखाओं पर ध्यान देना चाहिए। यह संख्या तीन से लेकर छह तक हो सकती है। यदि प्रदर्शनी आदि के लिए फूल उगा रहे हों तो तने की संख्या एक ही हो तो अच्छा है। तदउपरांत इन शाखाओं के शीर्ष से निकलने वाली कली का चयन करना चाहिए, शीर्ष कली के अगल-बगल वाली कली को तोड़कर हटा देना चाहिए। सिर्फ शीर्ष कली को बढ़ने देना चाहिए। इस दौरान गुलदाउदी के पौधे के निचले भाग से यदि सहायक पौध निकाल रही हो तो उसे हटा देना चाहिए।

तेज गर्मी एवं नमी से बचाने के लिए गुलदाउदी के पौधे को छाया प्रदान करना उचित होता है। आपके लिए गुलदाउदी की खेती में इसके फूलों की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि इसकी शाखाओं एवं कलियों की कटाई-छटाई कैसे की जाती है और किस समय पर की जाती है। सही तरीके से और प्रयुक्त समय पर कटाई-छटाई से अच्छे, बड़े और अधिक संख्या में फूल निकलते हैं। अत: यह प्रक्रिया हर हाल में अगस्त तक पूर्ण कर लेनी चाहिए।

गुलदाउदी की सिंचाई

chrysanthemum flowers
chrysanthemum flowers

समय-समय पर गुलदाउदी की सिंचाई (chrysanthemum irrigation) करते रहें, जिससे कि क्यारियों में नमी बनी रहे। स्प्रिंकलर से सिंचाई करने से नमी समान रूप से क्यारियों में 4-6 इंच तक बनी रहती है। वर्षा के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ती है। सर्दियों में गुलदाउदी में माहू (कीट) लगने की आशंका होती है जिसकी रोकथाम के लिए मैलाथियानी कीटनाशक का छिड़काव कर सकते हैं।

गुलदाउदी के उपयोग (uses of chrysanthemum)

गुलदाउदी के फूल बाजार में कट फ्लावर (cut flower) के रूप में उपयोग होने के साथ-साथ प्रदर्शनी आदि के लिए प्रयुक्त होते हैं। चीन में इसके फूल एवं पत्तियों से हर्बल पेय भी बनाते हैं।

डॉ. राणा संजय प्रताप सिंह

नोट्स –

गुलदाउदी का वैज्ञानिक नाम : Chrysanthemum

आदेश : एस्टरलेस (Asterales)

परिवार: Asteraceae

किंगडम: प्लांटे (Plantae)

जनजाति (Tribe): एंथेमिडी (Anthemideae)

(देशबन्धु में प्रकाशित खबर का संपादित रूप साभार)

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भारत में कछुए की प्रजातियां कितनी होती हैं?

tortoise type in hindi

भारत में कछुए की प्रजातियां

कछुआ कितने प्रकार का होता है? Tortoise type in Hindi

कछुए ताजे पानी और समुद्री निवास प्रजातियां हैं और दुनिया में सरीसृपों के सबसे पुराने समूहों में से एक हैं। कछुए (tortoise in Hindi) सरीसृप परिवार का एक क्रम हैं जिसे टेस्टुडीन्स के नाम से जाना जाता है, जिनकी विशेषता मुख्य रूप से उनकी पसलियों से विकसित एक खोल है। आधुनिक कछुओं को दो प्रमुख समूहों में विभाजित किया जाता है, पार्श्व-गर्दन वाले कछुए और छिपे हुए गर्दन वाले कछुए, जो सिर के पीछे हटने के तरीके में भिन्न होते हैं। कुछ कछुओं की प्रजातियां भारत में कछुओं की लुप्तप्राय प्रजातियों (Endangered species of turtles in India) के अंतर्गत आती हैं, जैसे असम छत वाले कछुए (Assam Roofed Turtles) और भारतीय स्टार कछुए (Indian Star Tortoise) दुनिया के सबसे अधिक तस्करी वाले जानवरों में से एक हैं और विदेशी पालतू व्यापार का हिस्सा हैं।

इंडियन फ्लैप्सहेल टर्टल (लिस्मिम्स पंचटाटा)

भारतीय फ्लैप्सहेल कछुए {Indian flapshell turtle (Lissemys punctata) } आमतौर पर भारत के झीलों और नदियों में पाए जाते हैं। सर्वव्यापी ताजे पानी के कछुए भी राजस्थान के रेगिस्तान तालाबों में पाए जाते हैं और अंडमान द्वीप समूह में पेश किए जाते हैं।

भारतीय छत वाले कछुए (पंगशुरा टेक्टा)

भारतीय छत वाले कछुए (Indian roofed turtle (Pangshura tecta) भारत की प्रमुख नदियों में पाए जाते हैं और भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे आम पालतू जानवरों में से एक हैं। वे खारे तटीय पानी, मानव निर्मित पानी के टैंक, नहरों और तालाबों में भी होते हैं।

असम छत वाले कछुए (पांगशुरा सिलेथेन्सिस)

असम छत कछुए (Assam roofed turtle or Sylhet roofed turtle (Pangshura sylhetensis) कछुए की एक दुर्लभ प्रजाति (a rare species of turtle) है और भारत में लुप्तप्राय जल निकासी में पाए गए कुछ व्यक्तियों से ही जाना जाता है, जो भारत में लुप्तप्राय के रूप में सूचीबद्ध है।

इंडियन सोफ्टशेल टर्टल (निल्सनिया गैंगेटिका)

गंगा, सिंधु और महानदी की नदियों में पाए जाने वाले भारतीय सोफ्टशेल कछुए या गंगा सोफ्टशेल कछुए (Indian softshell turtle (Nilssonia gangetica), or Ganges softshell turtle)। प्रजातियों को पवित्र माना जाता है और उड़ीसा के मंदिर तालाबों में भी पाया जाता है।

लाल पंख वाले छत वाले कछुए (बटागुर कचुगा)

लाल ताज वाली छत वाली कछुआ { red-crowned roofed turtle or Bengal roof turtle (Batagur kachuga) } कछुए की ताजा पानी की प्रजाति (freshwater turtle species) है और गंभीर रूप से लुप्तप्राय के रूप में सूचीबद्ध है, केवल कुछ सौ जंगली में रहते हैं। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य लाल ताज वाले छत वाले कछुए के लिए भारत का एकमात्र संरक्षित नदी का निवास स्थान है।

भारतीय तम्बू कछुए (पंगशुरा तम्बोलिया)

भारतीय तम्बू कछुए प्रजातियां Indian tent turtle (Pangshura tentoria) भारत और बांग्लादेश में पाई जाती हैं। सर्वव्यापी कछुए पानी में ज्यादातर समय और सूरज में उछालते हैं।

काला तालाब कछुए

काला तालाब कछुए या भारतीय चित्तीदार कछुआ (black pond turtle, also known as the spotted pond turtle or the Indian spotted turtle) ताजा पानी की प्रजाति है और ज्यादातर उत्तरपूर्वी भारत के गंगा नदी के जल निकासी में पाया जाता है।

भारतीय आइड कछुए (मोरेनिया पेटर्सि)

भारतीय आंखों वाला कछुआ (Indian eyed turtle, Morenia petersi(Family Geoemydidae),) दक्षिण एशिया के लिए स्थानिक है और उत्तरपूर्वी भारत में पाया जाता है जिसे केवल भेद्यता के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

जैतून रिडले सागर कछुए (लेपिडोचेलीज ओलिविसा)

जैतून की रेडली समुद्री कछुए { olive ridley sea turtle (Lepidochelys olivacea), also known commonly as the Pacific ridley sea turtle, } दुनिया में पाए जाने वाले सभी समुद्री कछुओं में से सबसे छोटे हैं और भारतीय महासागरों के गर्म पानी में रह रहे हैं। ओडिशा के गहिरमाथा तट भारत में जैतून की रेडली समुद्री कछुओं के लिए सबसे बड़ी द्रव्यमान घोंसला साइट है।

हॉक्सबिल समुद्री कछुए (एरेमोमोचेली इम्ब्रिकाटा)

हॉक्सबिल समुद्री कछुए भारतीय महासागरों के उष्णकटिबंधीय चट्टानों में पाए जाने वाले गंभीर रूप से लुप्तप्राय समुद्री कछुए के रूप में सूचीबद्ध है।

लेदरबैक सागर कछुए (डर्मोचेलीस कोरियासी)

लेदरबैक समुद्री कछुए दुनिया के सभी जीवित कछुओं में सबसे बड़ा है और घोंसले की आबादी निकोबार द्वीपसमूह से जानी जाती है। भारतीय महासागर से अन्य समुद्री कछुए लॉगरहेड समुद्री कछुए, हॉक्सबिल समुद्री कछुए और ग्रीन समुद्र कछुए हैं।

इंडियन स्टार कछुआ (जिओसेलॉन एलिगेंस)

भारतीय पालतू कछुआ विदेशी पालतू व्यापार के हिस्से के रूप में कछुए की सबसे लोकप्रिय प्रजाति है। लुप्तप्राय कछुए भारत में अवैध वन्यजीव व्यापार में भारत के सूखे इलाकों और स्क्रब जंगल में अधिकांश तस्करी वाले जंगली जानवरों मॉनीटर छिपकली, लाल रेत बोआ और भारतीय पांगोलिन के साथ पाए जाते हैं ।

ग्रीन सागर कछुए (चेलोनीया मादास)

हरी समुद्र कछुए हिंद महासागर और पूरे पूरे प्रशांत क्षेत्र में भी एक बड़ा समुद्री कछुआ है।

एशियाई वन कछुआ

एशियाई जंगल का कछुआ (Asian forest tortoise, also known commonly as the Mountain tortoise) दक्षिणपूर्व एशिया के लिए स्थानिक है और उत्तरपूर्वी एशिया में सबसे बड़ा कछुआ है जो पूर्वोत्तर भारत में होता है।

भारतीय तालाब टेरापिन (मेलानोचेलीज त्रजुगा)

भारतीय तालाब टेरापिन जिसे भारतीय ब्लैक टर्टल भी कहा जाता है, एक ताजा पानी का कछुआ है, जो भारत में होता है और विभिन्न प्रकार के जल निकायों में रहता है। भारतीय काला कछुआ (Indian black turtle or Indian pond terrapin) भारत में सबसे आम टेरापिन है और सुबह और शाम को सूरज में बेसिंग पाया जाता है।

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(जानकारी का स्रोत : देशबन्धु में प्रकाशित खबर)

हर घर तिरंगा : प्रधानसेवक का चीन प्रेम!

Opinion, Mudda, Apki ray, आपकी राय, मुद्दा, विचार

प्रधानसेवक की हिम्मत का नतीजा देश भुगतता है

प्रधानसेवक का आदेश है : हर घर झंडा ! उनका आदेश और पूरा देश नतमस्तक ! उनकी यह अदा पुरानी है। वे आदेश पहले देते हैं, आगे-पीछे की सोचते हैं कि नहीं, पता नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि वे नतीजे की चिंता किए बिना, हिम्मत से कदम उठाते हैं। यह अलग बात है कि देश उनकी हिम्मत की कीमत अदा करता रहता है। ख़ुदा-न-खास्ते यदि आप उनके कदम के नतीजों के असर का हिसाब करने लगें तो वे आपके सामने ऐसे लोगों की कतार खड़ी कर देंगे जो उसी कदम के गुणगान करने लग जाएंगे और फिर पूरा मीडिया तो है ही जो उनके हर कदम की ऐसी वाहवाही करेगा कि आपको अपनी ही समझ पर शक होने लगेगा।

फिर भी मेरी तरह के कुछ लोग होते हैं जो हर कदम का हिसाब लगाते हैं! तो बात ऐसी है कि हर कदम के कुछ फायदे होते हैं, कुछ नुकसान। देखना सिर्फ यह होता है कि फायदा किसका हो रहा है और नुकसान की भरपाई कौन कर रहा है। इससे यह भी पता चलेगा कि आप किस पक्ष में हैं (Which side are you on)? फायदे वालों के साथ कि नुकसान वालों के साथ?

फिर कुछ ऐसे लोग भी आपको मिलेंगे जो यह गिनाते हैं कि नुकसान भले हुआ हो, लेकिन दूसरों से कम हुआ है और फिर देशहित में थोड़ा नुकसान उठाना तो बनता है न! खुद को ही तमाचा मारकर गाल लाल रखने वालों की कब कमी रही है !

अब हर घर झंडाकी बात देखिए!

हमारा राष्ट्रध्वज तिरंगा और वह भी खादी का! इसकी कीमत कैसे आंकेंगे आप?

शहीदों के बलिदान और आजादी के जज़्बे से बना है यह तिरंगा और खादी ने उसमें मूल्य भरे हैं- ‘प्राइस’ वाला मूल्य नहीं, ‘वैल्यू’ वाला मूल्य! इन दिनों इन दोनों मूल्यों में बड़ा गड़बड़झाला हो रहा है।

आजादी की लड़ाई में खादी की कैसे अहम भूमिका थी (How did Khadi play an important role in the freedom struggle?), यह तो उस लड़ाई को लड़ने वाले ही बता सकते हैं; जिन्होंने लड़ा ही नहीं, वे कैसे जान सकते हैं, लेकिन खादी के उस मूल्य की कमाई दोनों तरह के लोग आज भी खा रहे हैं। वही लोग दुनिया भर के लीडरानों को खादी और ‘साबरमती आश्रम‘ और ‘राजघाट’ घुमाते हैं, उनसे झूठमूठ का चरखा चलवाते हैं।

the national flag of india waving on a flag pole
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गांधी ने खादी से झंडा नहीं बनाया, हाथों को ऐसा काम दिया कि जिसका झंडा बन गया। उस रोजगार ने देश को स्वावलंबी बनाया। स्वावलंबन से जो आत्मविश्वास आया उसने लोगों को निडर बनाया। वे निडर लोग जेल, गोली और फांसी से भी नहीं डरे और आंखों में आंखें डालकर अंग्रेजों का मुकाबला किया। अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें इस एक छोटे से आर्थिक कार्यक्रम ने हिला कर रख दीं। उनके लंकाशायर की मिलें बंद पड़ने लगीं। इस खादी की अच्छी-खासी मार्केटिंग प्रधानसेवक ने भी अपने भारत में की और बिक्री का रिकॉर्ड बन गया! प्रधानसेवक रिकॉर्ड से कम वाली कोई बात करें, तो लानत है!

खादी के ब्रांड एंबेसडर (!) प्रधानसेवक बताएँ खादी का क्यों नहीं बन सकता था हर घर झंडा‘?

अब मेरा पहला सवाल यह है कि जब खादी का उत्पादन इतना बढ़ा कि बिक्री का रिकॉर्ड बन गया तो हर घर झंडा‘ का कपड़ा खादी का क्यों नहीं बन सकता था? अगर बनता तो कितने लोगों को रोजगार देता। बेरोजगारी के ‘बम’ के ऊपर बैठे देश में वह कितनी बड़ी राहत होती! जहां कुछ हजार नौकरियों के लिए लाखों-करोड़ों आवेदन आते हैं, वहां घर बैठे लाखों को, लाखों का काम मिल जाता, लेकिन ऐसा हो न सका क्यूंकि सरकार जानती है कि उसने खादी को जिंदा छोड़ा ही कहां है !

सरकार के संरक्षण में चल रहा है खादी का व्यापार घोटाला

खादी ब्रांड के नाम पर जो बेचा जा रहा है, वह खादी है ही नहीं। खादी का सारा व्यापार घोटाला है। सरकार के संरक्षण में यह घोटाला चल रहा है।

मेरा दूसरा सवाल यह है कि खादी का झंडा संभव नहीं था तो सूती झंडा तो संभव हो सकता था। आखिर भारत दुनिया का दूसरे नंबर का कपास और सूती धागा उत्पादक है; भारत पहले नंबर का सूती धागा निर्यातक है। सूती धागा बनाने वाली हमारी मिलें अप्रैल महीने से बंद-सी पड़ी हैं, इसलिए कि हमारे यहां कपास और धागे की कीमतें इतनी बढ़ गईं हैं कि दुनिया ने हमसे कपास, धागा और कपड़ा खरीदना बंद-सा कर दिया है। इचलकरंजी और तमिलनाड के धागे के, हाथकरघे के तथा दूसरे लघु उत्पादन के केंद्र बंद पड़ गए हैं।

चीन और अमेरिका के बीच ‘उइगर मुसलमानों’ के मानवाधिकार हनन के मामले ने ऐसा तूल पकड़ लिया है और चीन ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना कपास और अपना धागा सस्ते-से-सस्ते दामों पर डम्प करना शुरू कर दिया है। इसका भी नतीजा वही है कि ऊंचे भाव वाले भारत के कपास, धागे, कपड़े और परिधानों का निर्यात ठप्प पड़ गया है। ऐसे में अगर हमारे लोगों को झंडा बनाने का ही काम मिल जाता तो अगली फसल आने तक उनका घर-बाजार तो चल ही जाता!

हर घर झंडाकी आड़ में चीन प्रेम!

अब मेरा तीसरा सवाल- खादी का झंडा संभव नहीं था, सूती झंडा बहुत महंगा पड़ रहा था तो फिर ‘हर घर झंडा’ कार्यक्रम लेना इतना ज़रूरी क्यों था? यहां से दूसरा खेल शुरू होता है और वह है पोलियस्टर का झंडा! दुनिया का सबसे बड़ा पॉलिएस्टर उत्पादक देश कौन है? जवाब है – चीन ! सबसे बड़ा निर्यातक देश कौन है? जवाब है – चीन !

दुनिया की पोलियस्टर बनाने वाली 20 सबसे बड़ी कंपनियों में भारत की दो कंपनियां आती हैं – बांबे डाइंग और रिलायंस। अब ‘हर घर झंडा‘ होगा तो किसका झंडा गड़ेगा? जवाब मैं नहीं, आप ही दें।

पंद्रह दिन पहले जिस झंडा अभियान की घोषणा हुई है, उसका करोड़ों झंडों या झंडे का कपड़ा आएगा तो चीन से आएगा ! सरदार साहब की मूर्ति भी तो वहीं से आई थी न! दूसरा फायदा किसे होगा? भारत की उन चंद कंपनियों को होगा जिनके पास इतने कम समय में, इतना पोलियस्टर का कपड़ा बनाने की क्षमता है।

भाई, थोड़ा हिसाब आप भी तो लगाएं! और फिर प्लास्टिक और पेट्रोलियम पदार्थ से बनने वाले पॉलिएस्टर का पर्यावरण पर असर (The impact of polyester on the environment) इसके लिए एक अलग लेख ही लिखना पड़ेगा।

तिरंगा झंडा कूड़ा बन जाए क्या यह बर्दाश्त किया जा सकता है?

पिछले साल दिल्ली के खादी भंडार से जब मैंने कुछ सामान लिया तो वे सामान के साथ मुफ़्त में झंडा भी दे रहे थे। मैंने लेने से मना कर दिया। 15 अगस्त और 26 जनवरी के समारोह के बाद हमारे सारे तिरंगे, स्टीकर और प्लास्टिक के बैच कहां मिलते हैं? कचरे में! झंडा कूड़ा बन जाए यह कैसे बर्दाश्त किया जाए? यह झंडे का अपमान नहीं है? फिर यह भी तो सोचिए कि हमारे घरों पर तिरंगा झंडा हो और उसके साये में खुले आम भ्रष्टाचार और अपने ही देश के भाई-बहनों से नफ़रत हो तो यह कैसा देशप्रेम हुआ?

तब अंतिम सवाल मेरा यह है कि इस सारी क़वायद से हासिल क्या होगा? वही तो असली बात है !

चीन को और देश की कुछ कंपनियों को करोड़ों का मुनाफा देने के साथ-साथ यह बात भी तो साबित होगी न कि आज भी भारत देश के नागरिक आंख मूंदकर अपने प्रधानसेवक के पीछे-पीछे चलने के लिए तैयार खड़े हैं ! बस, तिरंगा लहराए कि नहीं, हम तो लहरा रहे हैं न!

प्रेरणा

(मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

syama prasad mukherjee श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने में अंग्रेजों की मदद की

Tricolor in every house: China love of the head servant!

अफ्रीकी मटमैला तोता : प्रथम परोपकारी पक्षी

grey parrot in hindi

परोपकारी गैरस्तनपायी प्राणी (benevolent and mammal) : अफ्रीकी मटमैला तोता Psittacus erithacus

अपने परिजनों की रक्षा करना और अजनबियों को आश्रय देना मानवता का एक ऐसा अनिवार्य भाग है जिसको हमने व्यापक रूप से विकसित किया है। मनुष्यों के अलावा ओरांगुटान और बोनोबो जैसे कुछ ही अन्य जीवों में स्वेच्छा से दूसरों की मदद करने का गुण देखा गया है। अब वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने ऐसे गैरस्तनपायी प्राणी खोज निकाले हैं जो परोपकारी होते हैं।

पहले भी मिल चुके हैं पक्षियों में बुद्धिमत्ता के प्रमाण

गौरतलब है कि पूर्व में हुए अध्ययनों से पक्षियों में बुद्धिमत्ता के प्रमाण (evidence of intelligence in birds) तो मिले हैं लेकिन अफ्रीकी मटमैला तोता Psittacus erithacus (The grey parrot in Hindi, also known as the Congo grey parrot, Congo African grey parrot or African grey parrot) एक ऐसा पक्षी है जो परोपकारी भी है।

मैक्स प्लांक इंस्टिट्यूट फॉर ओर्निथोलॉजी के पशु संज्ञान वैज्ञानिकों (Animal cognition scientists from the Max Planck Institute for Ornithology) ने असाधारण मस्तिष्क वाले अफ्रीकन मटमैले तोते और नीले सिर वाले मैकॉ Primolius couloni (The blue-headed macaw or Coulon’s macaw is a macaw native to eastern Peru, northwestern Bolivia, and far western Brazil) की कुछ जोड़ियों पर अध्ययन किया।

सबसे पहले शोधकर्ताओं ने पक्षियों को सिखाया कि वे एक टोकन के बदले पुरस्कारस्वरूप एक काजू या बादाम प्राप्त कर सकते हैं। इस परीक्षा में दोनों प्रजाति के पक्षी सफल रहे।

लेकिन अगली परीक्षा में केवल अफ्रीकी मटमैले तोते ने बाज़ी मारी। इस परीक्षा में शोधकर्ताओं ने जोड़ी के एक ही पक्षी को टोकन दिया और वह भी ऐसे पक्षी को जो किसी भी तरह से शोधकर्ता तक या पुरस्कार तक नहीं पहुंच सकता था। अलबत्ता वह एक छोटी खिड़की से टोकन अपने साथी पक्षी को दे सकता था। और वह साथी टोकन के बदले पुरस्कार प्राप्त कर सकता था। लेकिन इसमें पेंच यह था कि काजू.बादाम जो भी मिलता उसे वही दूसरा पक्षी खाने वाला था। 

दोनों प्रजातियों मेंए जिन पक्षियों को टोकन नहीं मिलाए उन्होंने हल्के से चिंचिंयाकर दूसरे साथी का ध्यान खींचने की कोशिश की। ऐसे में नीले सिर वाले मैकॉ अपने साथी को नज़रअंदाज़ करते हुए निकल गए लेकिन अफ्रीकी मटमैले तोतों ने पुरस्कार की चिंता किए बिना अपने साथी पर ध्यान दिया।

करंट बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार पहले ही परीक्षण में 8 में से 7 मटमैले तोतों ने अपने साथी को टोकन दे दिया। जब इन भूमिकाओं को पलट दिया गया तब तोतों ने अपने पूर्व सहायकों की भी उसी प्रकार मदद की। इससे लगता है कि उनमें परस्परता का कुछ भाव होता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि यदि उनका साथी कोई करीबी दोस्त या रिश्तेदार नहीं है तब भी उनमें उदारता दिखी। और यदि वह उनका करीबी रिश्तेदार है तब तो वे और अधिक टोकन दे देते थे।

मैकॉ के व्यवहार से तो लगता था कि उन्हें साथी चाहिए ही नहीं। बल्कि अपने खाने का कटोरा साझा करना भी उन्हें पसंद नहीं था।  

शोधकर्ताओं का मानना है कि इन दोनों प्रजातियों के बीच का अंतर उनके अलग-अलग सामाजिक माहौल के कारण हो सकता है। जहां अफ्रीकी मटमैले तोते अपने झुंड बदलते रहते हैं, वहीं मैकॉ छोटे समूहों में रहना पसंद करते हैं।

वैसे कुछ अन्य पक्षी वैज्ञानिकों को लगता है कि तोतों के परोपकार के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है किवे शायद आपस में भाई-बहन रहे हों, जिनके बीच आधे जीन तो एक जैसे होते हैं।

Duck and Goose video | Animals Video | Birds

(देशबन्धु में 2020-02-09 को प्रकाशित समाचार का संपादित रूप साभार)

पक्षियों का प्रणय गीत है पक्षियों का कलरव

Bird world

चिड़ियों का चहचहाना चिड़ियों का प्रेम गीत है

हमेशा एक सा अर्थ नहीं होता पक्षियों का कलरव

उत्तर भारत में जैसे जैसे अमराई की महक मादक होती जाती है, पक्षियों की कूक में दर्द, विरह और प्रणय निवेदन की कशिश बढ़ती जाती है और बरसात में अपने चरम पर होती है। वास्तव में यह समय पक्षियों के लिए घोंसले बनाने और अंडे देने का होता है, पक्षियों के कलरव का हमेशा एक सा अर्थ नहीं होता। पक्षी विशेषज्ञों (bird experts) का मानना है कि उन का सुबह का स्वर अपने होने का ऐलान होता है। साथ ही सुबह के इस कलरव से पक्षी मानो घोषणा करते हैं कि यह उन का इलाका है और वे अपने इलाके की बादशाहत संभालने के लिए मौजूद हैं। यह कलरव उन की मौजूदगी का शंखनाद भी होता है। इस का दूसरा उद्देश्य प्रणय के लिए साथी को अपनी ओर आकृष्ट करना भी होता है।

पशुपक्षियों में भी होता है प्यार, मनुहार का गुण

प्यार, मनुहार और रूठना मनाना न केवल इंसानी आदत है, बल्कि पशुपक्षियों में भी यह गुण विद्यमान है। यह अलग बात है कि सभी पशु पक्षी ऐसी भावनाएं प्रकट नहीं करते। लेकिन कुछ पक्षी और पशु भी स्पष्ट तरीके से अपने प्रेम और समर्पण का इजहार करते हैं।

इंसान ने पशु पक्षियों से ही सीखी हैं प्रेम और निवेदन की तमाम कलाएं

पशु पक्षी भले इंसान की तरह रूठने मनाने की कला में पारंगत न दिखते हों, मगर इन सब को ले कर जनून इनमें भी इंसानों जैसा ही होता है। इंसान ने प्रेम और निवेदन की तमाम कलाएं (All the arts of love and request) इन्हीं अबोलों से सीखी हैं। यह अलग बात है कि इंसान ने अपनी बुद्धि और कल्पनाशक्ति की बदौलत उन बेजबानों को भी मौलिक बना लिया है। प्रणय निवेदन की कला इंसान ने मूलत: पक्षियों से ही सीखी है।

इश्क की कला के धरती पर पुरखे माने जाते हैं पक्षी

इंसान ने इश्क का जनून इन्हीं पक्षियों से उधार लिया है। भले ही वक्त के साथ इंसान पक्षियों से आगे निकल गया हो, लेकिन समागम, समर्पण और निवेदन की कला में उन का आज भी कोई सानी नहीं।

पूरे ईको सिस्टम को ग्लोबल वार्मिंग ने तहस नहस कर दिया है। पर्यावरण विनाश के कारण पक्षियों का कुदरती आवास छिन गया है, लेकिन पक्षियों का कलरव आज भी उतना ही मधुर है। वास्तव में यह कलरव या कोरस ही पक्षियों का प्रणय गीत है।

एक समय गांवों में पक्षियों के इसी कलरव से सुबह की नींद खुलती थी। हालांकि पक्षियों के सामूहिक कलरव में यह पहचानना मुश्किल होता है कि इस में कौन-कौन से पक्षियों का स्वर शामिल है, लेकिन कानों को शब्दरहित गीत बहुत भाता है।

यों तो पक्षी हर मौसम में ही गुनगुनाते प्रतीत होते हैं, लेकिन गर्मियों में खासकर बसंत पंचमी के बाद इन के स्वरों में कुछ ज्यादा ही मिठास घुल जाती है।

पक्षियों के सुबह के कलरव की शुरुआत रात में पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर डेरा जमाने वाले पक्षियों से होती है। शायद सूरज के प्रथम दर्शन करने की वे भरपाई कर रहे होते हैं। सुबह पौ फटने से पहले ही कई बार हम मोरों की आवाज सुनते हैं। रात को मोर बड़े-बड़े पेड़ों की ऊंची डालों पर सोते हैं, इसलिए सुबह सूरज की रोशनी से सब से पहले वे ही जगते हैं।

विरह गीत गाने वाले पक्षी

अधिकतर पक्षी अपने साथी को आकृष्ट करने के लिए गाने के साथ-साथ नाचते भी हैं। मोर का आकर्षक नृत्य तो मुहावरा है। दरअसल, वह मोरनी को रिझाने के लिए ही नृत्य करता है। कई नर पक्षी मादा को रिझाने के लिए खतरनाक जोखिम उठाते हैं। ऐसा ही एक पक्षी है ‘खरमोर।’ यह पारंपरिक मोर तो नहीं पर मोर की ही जाति का एक संकर पक्षी है। यह मादा को रिझाने के लिए खेतों में ऊंचीऊंची छलांगें लगाता है और फिर धम से गिर कर खेत में छिप जाने का नाटक करता है। यह मुंह से कई किस्म की आवाजें निकालता है। कई बार तो यह अपनी इस उछल-कूद में अपने पैरों को लहूलुहान तक कर लेता है।

खरमोर की ही तरह कोयल भी विरह गीत गाती है। बरसात के शुरुआती दिनों में कोयल का कूकना तब तक बेचैन करता है जब तक वह अंडे नहीं सेने लग जाती। दरअसल, डाल पर कूकती आवाज नर कोयल की होती है और वह उस समय जोड़ा बनाने के लिए साथी की तलाश कर रहा होता है। नर कोयल काला होता है, जबकि मादा भूरी या चितकबरी दिखती है। यही फर्क मोर और मोरनी में भी होता है।

पपीहा : फिल्मी गीतों का लोकप्रिय पक्षी

बरसात के मौसम में हमें एक और पक्षी की आवाज बारबार सुनाई देती है, वह है पपीहा। फिल्मी गीतों का लोकप्रिय पपीहा। पपीहे के मुंह में शब्द भले ही हम अपनी कल्पना के डाल देते हों मगर यह अपनी प्रिय को ही देख रहा होता है।

पक्षियों की विस्तृत दुनिया (wide world of birds) में झांकने के लिए सब से पहले हमें अपने इर्दगिर्द के पक्षी जगत पर नजर दौड़ानी चाहिए। यदि हम अपनी खिड़की से बाहर झांकते हैं तो हमें जो बहुत से परिचित घरेलू पक्षी दिखाई पड़ेंगे उन में दिन दोपहरी कांवकांव करता कौआ, दहलीज पर दाना चुगती गौरैया, छज्जे पर गुटरगूं करता कबूतर और पंखों से आवाज निकालती मैना। वास्तव में समय के साथ ये सारे पक्षी हमारे आसपास जीना रहना सीख गए हैं। हजारों साल पहले शायद ये भी पूर्णतया जंगल के वासी रहे होंगे, लेकिन भोजन की तलाश इन्हें धीरेधीरे बस्तियों के करीब ले आई। अब इन्होंने शहरी भीड़भाड़ में रहने के लिए सुकून और आवास तलाश लिया है। यहीं ये अपना भोजन तलाशते हैं, घोंसले बनाते हैं और रात यहीं किसी ऊंचे सुरक्षित ठौर पर सो भी जाते हैं।

नर पक्षी ही ज्यादातर सुंदर होते हैं

यों तो इंसान के अलावा किसी अन्य प्रजाति में पारिवारिक जीवन की प्रतिबद्धता नहीं होती, न ही उन में इस की चाहत दिखती है। लेकिन लगाव और भावनात्मक आकर्षण सभी प्रजातियों में पाया जाता है। पक्षियों में प्रणय निवेदन की कला (courting of birds) इसी लगाव से निकलती है।

मजेदार बात यह है कि दिखने में सुंदर ज्यादातर नर पक्षी ही होते हैं, लेकिन पक्षियों की दुनिया में भी चलती मादाओं की ही है। इन के प्रणय निवेदन की जद्दोजेहद में भी यह साफ झलकता है। नर को ही मादा को मनाने के लिए दिन रात एक करना पड़ता है। मसलन, सब से सुंदर पक्षी मोर को ही लें। जब जोड़ा बनाने का समय आता है तो इतने खूबसूरत नर मोर को बेहद खूबसूरत मोरनी के सामने अपने सुंदर पंखों को फैलाए घंटों नाचना पड़ता है। मोरनी को खुश करने के लिए इठलाते रहना पड़ता है, तब जा कर मोरनी का दिल पसीजता है।

पक्षियों का इंजीनियर बया

यही बात बया पक्षी में भी देखने को मिलती है। इसे पक्षियों का इंजीनियर (Baya: Engineer of Birds) कहते हैं। बया के बनाए घोंसले देख कर इंसान दांतों तले उंगली दबा लेता है। वर्षा ऋतु के समय बया पक्षी घोंसला बनाता है। इस कलात्मक काम में वह पूरी तरह डूब जाता है। इतना प्यारा साफ सुथरा और सुरक्षित घर बनाने के बावजूद नखरीली मादा को घर जल्दी पसंद नहीं आता। जब तक मादा बया इसे पसंद नहीं कर लेती तब तक घर को और बेहतर बनाने के लिए नर बया जुटा रहता है। इस घोंसले में अलग-अलग कक्ष होते हैं। यहां तक कि कई बार तो रोशनी के लिए जुगनुओं को भी काम में लाया जाता है।

सुंदर और पवित्र नीलकंठ

अब नीलकंठ को ही देखिए। वह जितना सुंदर उतना ही पवित्र भी माना जाता है। हालांकि यहां नर और मादा करीब-करीब एक जैसे ही होते हैं। फिर भी नर मादा नीलकंठ को खुश करने के लिए हवा में उड़ कर तरह-तरह के करतब दिखाता है। कई बार तो वह ऊपर से पत्थर की तरह ऐसे नीचे गिरता है जैसे उस की जान ही निकल गई हो, पर जमीन के पास आते ही वह फिर ऊपर उड़ जाता है। ऐसा कब तक? जब तक नीलू मान न जाए। है न कठिन परीक्षा?

प्रेमिल पक्षी कबूतर

अब कबूतरों के बारे में भी जान लेते हैं। यह सब से प्रेमिल पक्षी (love bird pigeon) है। अपनी मादा को रिझाने के लिए यह अपने पंख फैलाए उस के चारों ओर गुटरगूं करता चक्कर लगाता रहता है। यही नहीं कबूतर के बारे में यह भी कहा जाता है कि यह एक बार जिस से जोड़ा बना लेता है उस का साथ जीवन भर नहीं छोड़ता। इसीलिए कबूतर सदा जोड़े में ही दिखाई पड़ता है, लेकिन उसे भी कबूतरनी के नखरे उठाने पड़ते हैं।

विश्व प्रसिद्ध प्रेमी पक्षी सारस

दुनिया भर में सारस जैसा कोई दूसरा प्रेमी पक्षी नहीं है। यह अपने प्रेम के लिए विश्व प्रसिद्ध (world famous lover bird stork) है। नर और मादा एक दूसरे के लिए सदा समर्पित रहते हैं। यदि इन में से किसी एक की भी मृत्यु हो जाए तो दूसरा भी अन्नजल त्याग कर अपनी जान दे देता है। मगर प्रणय निवेदन में मादा सारस भी खूब नाकों चने चबवाती है।

बहुपत्नी प्रथा को मानने वाला हंस

सारस के ठीक विपरीत जीवन शैली है हंस की। यह निडर पर नाजुक पक्षी बहुपत्नी प्रथा को मानने वाला है। अपने सौंदर्य और मनलुभावनी चाल के कारण लोकप्रिय हंस की बहुत सारी पत्नियां होती हैं। 

(देशबन्धु, में  09/04/2018 को प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

Cuckoo chirping at morning video | Indian cuckoo bird sound

The love song of birds is the tweet of birds

खतरे आधुनिक खेती के : जिस डाल पर बैठे हैं, हम उसी को काट रहे हैं

farming

प्रकृति की अपनी एक व्यवस्था है जिसमें भरपूर उत्पादन होता है, वह भी बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल किए हुए, परंतु इस उत्पादन को वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जिसके पास प्रकृति के नियम-कायदों, कानूनों को समझने का नजरिया हो। लालच और अंहकार में डूबे व्यक्तियों को यह उत्पादन दिखेगा ही नहीं क्योंकि ये लोग प्रकृति के सहायक हैं ही नहीं। इन लालची व्यक्तियों को प्रकृति के अमूल्य तत्वों का सिर्फ दोहन (Only harnessing the priceless elements of nature) करना आता है, बेहिसाब खर्च करना आता है। इसके चलते जब ये तत्व रीत जाते हैं और प्रकृति का संतुलन (balance of nature) बिगड़ने लगता तो ये लालची लोग इसका ठीकरा किसी और पर फोड़ने लगते हैं।

आधुनिक सुविधाभोगी इंसान के लिए जलवायु परिवर्तन एक बहुत बड़ी चुनौती

वर्तमान में जलवायु परिवर्तन सुविधाभोगी आधुनिक इंसान के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती (Climate change a big challenge for modern convenience man) बनकर सामने आ रहा है। दिन-ब-दिन यह समस्या बढ़ती ही जा रही है, पर मजाल है कि किसी व्यक्ति के कान पर जूं भी रेंग जाए। व्यक्ति तो छोड़िए, सरकारों के कानों पर भी जूं नहीं रेंग रही है, सिर्फ बड़ी-बड़ी घोषणाएं हो रही हैं, पर जमीनी स्तर पर सब निल बटे सन्नाटा ही पसरा हुआ है।

तो किसान होने के नाते हमें क्या करना चाहिए?

यहां हम इस पर बात नहीं करेंगे कि दुनिया भर की सरकारों को क्या करना चाहिए क्योंकि वह हमारे हाथ में नहीं है। हम तो इस पर बात करेंगे कि किसान होने के नाते (being a farmer), भू-स्वामी होने के नाते और एक धरतीवासी होने के नाते हम क्या कर सकते हैं। अव्वल तो हमको अपनी भूलने की आदत सुधारनी होगी, बारम्बार आ रहीं आपदाओं को खतरे की घंटी मानना होगा और भविष्य में इन आपदाओं की तीव्रता और न बढ़े, इसके लिए अपने लालच पर लगाम लगाना सीखना होगा। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन बंद करते हुए हमें आवश्यक और अनावश्यक में अंतर (difference between necessary and unnecessary) करना सीखना होगा। हमें अपने उपभोग की गति का प्रकृति के पुनर्चक्रण की गति से सामंजस्य बैठाना होगा।

प्रकृति के पुनर्चक्रण में हमें सहयोग करना होगा।

Farmer
Farmer File photo

दूसरे हम प्रकृति से जितना ले रहे हैं, उतना ही वापस लौटाने का संकल्प करना पड़ेगा। पहले जमाने में यदि कोई रिश्तेदार या पड़ोसी कोई वस्तु आपको देने घर आता था तो लोग उसको खाली हाथ नहीं जाने देते थे, बल्कि उसी के बर्तन में कुछ-न-कुछ भरकर वापस देते थे। प्रकृति के साथ हमें भी यही करना है। यदि हम प्रकृति से 100 प्रतिशत तत्व ले रहे हैं, तो कम-से-कम 70 प्रतिशत तो उसे लौटाएं, तब जाकर संतुलन बनेगा और तब हम भी खुश रहेंगे और प्रकृति भी खुश रहेगी।

प्रकृति से जो ले रहे हैं हम उसको वापस लौटाना होगा

कृषि उत्पादन के लिए हम प्रकृति से जो दो चीज़ें -पानी और पेड़- सबसे अधिक ले रहे हैं उन्हें प्रकृति को वापस लौटाना होगा। पानी की सबसे ज्यादा खपत खेती में होती है और खेती के लिए साल-दर-साल अधिकाधिक जंगल साफ किए जा रहे हैं। इन दो चीजों की भरपाई कैसे करेंगे? इसके लिए हमें अपने-अपने खेतों में छोटे-छोटे तालाब एवं कुएं बनवाने होंगे और खूब सारे पेड़ लगाने होंगे। किसानों को कुल जमीन के 10 प्रतिशत हिस्से में बागवानी और 10 प्रतिशत हिस्से में तालाब या कुएं की व्यवस्था करनी चाहिए।

तालाब और कुएं बनाने से जहां एक ओर सिंचाई के लिए भरपूर पानी उपलब्ध होगा, वहीं खेत की मिट्टी और हवा में नमी बढ़ने से उत्पादन में वृद्धि होगी। साथ ही भू-जल स्तर भी बढ़ेगा। बागवानी से पेड़ों की संख्या में इजाफा होगा, जिससे तापमान कम होगा, वातावरण में कार्बन का स्तर घटेगा और बारिश बढ़ेगी। मिट्टी का क्षरण रुकेगा, जमीन अधिक उपजाऊ बनेगी। किसानों के मित्र पक्षियों एवं कीटों की संख्या बढ़ने से फसलों का परागण एवं कीट-नियंत्रण अधिक प्रभावी तरीके से होगा।

तीसरे, हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के वैकल्पिक स्रोत तलाशने होंगे, ताकि प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाले काम बंद हो सकें। उदाहरण के लिए, आज बिजली हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है जितनी कि हवा। अभी अधिकांश बिजली कोयला जलाकर पैदा की जाती है, और कोयले का दहन (combustion of coal) जलवायु परिवर्तन की समस्या का सबसे बड़ा कारण है। इसका दूसरा बड़ा कारण है – जीवाश्म ईंधनों (पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस) का दहन। यदि हम अपनी बिजली और अपना ईंधन किन्हीं और स्रोतों से प्राप्त कर सकें तो हम प्रकृति को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं।

हम किसानों को घरों और खेतों में अधिक-से-अधिक सोलर-ऊर्जा का उपयोग करना चाहिए। यदि हर खेत में सोलर पंप लगा दिए जाएं तो कितनी बिजली की बचत होगी। ईंधन के लिए गोबर-गैस या बॉयो-गैस का उपयोग बहुत अच्छा विकल्प है।

तीसरी चीज है- प्राकृतिक खाद का उपयोग।

रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के उत्पादन एवं परिवहन में बड़ी मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है तथा जीवाश्म ईंधनों का उपयोग (use of fossil fuels) होता है। ये रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक मिट्टी, पानी और हवा को भी बुरी तरह प्रदूषित करते हैं। इनके स्थान पर प्राकृतिक उर्वरकों का उपयोग करें। एकल फसल खेती से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और जैव-विविधता खतरे में पड़ जाती है, इसलिए हमें चाहिए कि हम बहुफसलीय खेती करें, इससे खेती में हमारा जोखिम भी कम होगा और प्रकृति का संतुलन भी बना रहेगा।

उपरोक्त सुझावों पर ईमानदारी, दृढ़ निश्चय और संकल्पता के साथ कार्य करना अत्यावश्यक है। इसमें सरकार, जनता और किसान सभी की भागीदारी जरूरी है। इस काम में सबसे बड़ा रोड़ा हमारा लालच है, जिसने हमें अंधा कर दिया है। हम देख नहीं पा रहे हैं कि हम उसी डाल को काट रहे हैं जिस पर बैठे हैं। हमें इस लालच को तुरंत छोड़ना होगा और प्रकृति से नाता जोड़ना होगा। तभी जाकर हम पर्यावरण से संबंधित सभी समस्याओं से निजात पा सकेंगे। इससे किसानों की समस्याओं का भी निराकरण हो जाएगा।

पवन नागर

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख

amazing view of nature in India | भारत में प्रकृति का अद्भुत दृश्य | hastakshep | हस्तक्षेप

Dangers of modern farming: We are cutting the branch on which we are sitting

क्या आप जानते हैं साही के कांटों से प्रेरित हैं टांके!

porcupine in hindi

हाल के कुछ सालों में विज्ञान और तकनीक में नई एक शाखा शामिल हुई है। इसे जैव-प्रेरित तकनीक (bio-inspired technology) कहा जाता है। इसमें पौधों और जंतुओं के गुणधर्म और व्यवहार, विशेष रूप से उनके रक्षा के तौर-तरीकों से प्रेरित होकर नई तकनीकें विकसित की जाती हैं।

यह लगभग 10 साल पहले की बात थी जब वैज्ञानिक यह समझ पाए थे कि गुरुत्वाकर्षण के बावजूद छिपकली छत पर उल्टी चिपककर कैसे दौड़ पाती है, गिरती नहीं। छिपकली के हाथ-पैर की हथेलियों पर लाखों छोटे-छोटे रोम उपस्थित होते हैं। इससे सतह पर बहुत हल्का आकर्षक बल लगता है जिसे वॉण्डर वॉल्स बल कहते हैं। उंगलियों में स्थित हर रोम और दीवार के बीच लगने वाला बल तो न के बराबर होता है, लेकिन एक साथ हंजारों-लाखों की तादाद में रोम हों, तो कुल बल काफी शक्तिशाली हो जाता है। यदि इन रोमों की हजामत कर दी जाए तो छिपकली चल नहीं पाएगी। इस समझ के आधार पर वैज्ञानिक चिपकने वाली टेप तैयार करने में सक्षम हुए थे।

इसी तरह कोकलेबर (गोखरू) पौधे से प्रेरित होकर स्विस इंजीनियर जॉर्जडी मेस्ट्रल ने वेल्क्रो का अविष्कार किया। भारत में यह पौधा तमिलनांडु के मदुराई क्षेत्र (तमिल में इसे मारूलिमथाई कहा जाता है) में पाया जाता है। इस पौधे में छोटी-छोटी गेंदों जैसे बहुत-से फूल पाए जाते हैं। हर फूल के चारों ओर छोटी पिन के समान संरचना होती है। इन पिननुमा रचनाओं की मदद से ये फूल हमारे कपड़ों और मोंजों पर चिपक जाते हैं। डॉ. मेस्ट्रल ने इस पौधे की संरचना और गुणधर्म का अध्ययन करके वेल्क्रो डिंजाइन किया।

कंटीला सुअर यानी पिर्क स्पिन या मुल्लाम पनरी, येडू पान्डी या साही

इसी क्रम में नई प्रेरणा साही नामक जंतु से मिली। सेही (अंग्रेज़ी:Porcupine in Hindi) अथवा साही के शरीर की पीठ वाली सतह पर 30,000 से ज्यादा कांटे होते हैं। यह नाम शायद फ्रेंच भाषा से आया है। फ्रेंच में इसे पिर्क स्पिन यानी कंटीला सुअर कहते हैं। भारत में तमिल में इसे मुल्लाम पनरी, तेलगू में येडू पान्डी और हिन्दी में साही कहते हैं।

अपने दुश्मन या शिकारी पर हमला करने का सेही का तरीका बहुत घातक है। यह जंतु तेज गति के साथ अपने लक्ष्य पर वार करता है और हमला करते समय यह अपने आपको पीछे की ओर मोड़ लेता है। इसके कारण इसके कांटे शत्रु के शरीर में ज्यादा गहराई तक जाते हैं।

कैसी होती है साही के कांटे की संरचना ?

सेही के कांटे की संरचना (Porcupine thorn structure) बहुत अनोखी होती है, यह त्वचा को आसानी से भेदता है लेकिन वापिस निकलते समय यह बहुत दर्दनाक होता है।

हार्वर्ड के डॉ. जेफ्री कार्प और एमआईटी के राबर्ट लैंगर को साही के कांटों वाले पहलू ने आकर्षित किया था। इससे आकर्षित होकर उन्होंने 26 दिसम्बर 2012 के अंक में एक पर्चा प्रकाशित किया था। सबसे पहले उन्होंने कांटे का सूक्ष्म निरीक्षण किया। इसके लिए एमिशन इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (emission electron microscope) का इस्तेमाल किया गया।

उन्होंने पाया कि सेही के कांटों की नोक अत्यंत नुकीली, फचर के आकार की होती है। नोक की सतह पर पीछे की ओर मुंडे हुए बारीक कंटक होते हैं। ये कंटक कुछ हद तक एक-दूसरे पर चढ़े होते हैं। कांटे की नोक से जितने दूर जाएंगे ये कंटक बडे होते जाते हैं। कांटे का नुकीला सिरा आसानी से भेदने का काम करता है। मगर जब कांटे को बाहर निकालने की बात आती है, तो हर कंटक गति का प्रतिरोध करता है क्योंकि उल्टी दिशा में चलाने पर ये कंटक खुल जाते हैं और चमड़ी व अंदर के ऊतक से चिपक जाते हैं। ऐसे में जब इन्हें खींचकर बाहर निकाला जाता है तो ये काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इस संरचना की वजह से अंदर घुसने की क्रिया आसान और बाहर निकलने की क्रिया दर्दनाक हो जाती है।

एक बार इस दर्द का सामना हो जाने के बाद शत्रु किसी साही के पास फटकने की हिम्मत नहीं करेगा।

शोधकर्ताओं ने कांटे का इस्तेमाल करके मांसपेशीय ऊतकों में कांटे के भेदने और निकालने के बल को मापा। भेदने में 0.3 न्यूटन यूनिट बल की आवश्यकता थी, वहीं निकालने में 0.44 न्यूटन बल लगा था। जबकि इसकी तुलना में कंटकहीन अफ्रीकन साही के कांटों के बल को मापा गया तो पाया कि इसके भेदने में 0.71 न्यूटन बल लगता है। इससे यह पता लगता है कि कांटे का नुकीलापन आसानी से भेदने की क्षमता रखता है। लेकिन अफ्रीकन कंटकहीन साही के कांटे को निकालना ज्यादा आसान था। इसमें मात्र 0.11 न्यूटन बल लगा था बजाय 0.44 न्यूटन के। और जब इन दोनों स्थितियों में ऊतकों की क्षति को मापा, तो पता चला कि कंटकहीन कांटे की बजाय कंटकयुक्त कांटे को अंदर घुसने में कम ऊर्जा की आवश्यकता पड़ी। इसलिए यह ज्यादा अंदर तक जाता है मगर घुसते समय इसके कारण ऊतकों को क्षति कम होती है। दूसरी ओर, जब कंटकयुक्त कांटा निकलता है, तो यह ज्यादा दर्दनाक होता है और काफी क्षति पहुंचाता है।

तो मन में विचार आता है कि क्यों न पॉलीमर्स का इस्तेमाल कर संश्लेषित कांटे (Synthetic forks using polymers) बनाए जाएं (जैसे पॉलीयूरेथेन की मदद से) और इसके प्रभावों की वास्तविक कांटों से तुलना की जाए? इस विचार के साथ शोधकर्ताओं ने कंटकयुक्त औरक पॉलीयूरेथेन कांटे बनाए और एक प्रोटोटाइप हाइपोडमक सुई (Prototype Hypodamp Needle) बनाई।

वास्तविक कांटे की तरह ही, कंटकहीन पॉलीयूरेथेन की अपेक्षा कंटकयुक्त पॉलीयूरेथेन सुई ऊतकों से ज्यादा अच्छी तरह चिपकी।

शोधकर्ताओं का निष्कर्ष यह है कि इस तरह की जैव-प्रेरित पॉलीमर पट्टियां (Bio-inspired polymer bandages) ऊतकों को जोड़ने में मददगार हो सकती है।

सेही का समागम कैसे होता है? | How does the meeting of Sehi take place?

अंत में अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि साही इन कांटों के साथ जोड़ा कैसे बनाते हैं और बच्चे कैसे पैदा करते हैं।

एक स्वीकार करने योग्य जवाब यह है कि नर और मादा दोनों अपने पिछले पैरों से एक-दूसरे तक पहुंचते होंगे। फिर ये दोनों पेट आमने-सामने करके खड़े रहते हैं, इसके बाद मादा अपना पिछला हिस्सा नर की तरफ मोड़ देती है और नर अपनी पूंछ उसके पिछले हिस्से पर फैला देता है। यह समागम कुछ मिनट का ही होता है फिर मादा के गर्भ में बच्चा पलता है और जन्म लेता है।

डॉ. बी बालसुब्रमण्यम

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मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित लेख का किंचित् संपादित रूप साभार

Did you know that the stitches are inspired by porcupine thorns!

क्या बैंकों का निजीकरण से सभी समस्याएं सुलझ जाएंगी?

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सभी समस्याओं का समाधान नहीं बैंकों का निजीकरण : Ajit Ranade on Privatization of banks

जुलाई 1969 की दो महत्वपूर्ण घटनाएं

1969 में जुलाई के तीसरे सप्ताह में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं थीं। उनमें से एक राष्ट्रीय और दूसरी अंतरराष्ट्रीय घटना है। 20 जुलाई को चंद्रमा पर पहली बार मानव उतरा जो भारतीय समयानुसार रविवार की सुबह लगभग 8 बजे हुई थी। इससे बारह घंटे पहले 19 जुलाई को भारत में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम घोषणा (Prime Minister Smt. Indira Gandhi announced to the nation) की कि सरकार 14 निजी बैंकों का अधिग्रहण कर रही है जिनमें देश की 85 प्रतिशत राशि जमा है।

एक घटना एक तकनीकी सफलता थी जबकि दूसरी ने राजनीतिक दुस्साहस का प्रदर्शन किया। प्रत्येक घटना का दीर्घकालिक प्रभाव था, एक अंतरिक्ष अन्वेषण कार्यक्रम के विकास पर और दूसरा बैंकिंग और वित्त के विकास पर।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के भारतीय अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक प्रभाव

आइये, बैंक राष्ट्रीयकरण के दीर्घकालिक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करते हैं। 1969 के बाद से अर्थव्यवस्था 50 गुना बड़ी हो गई है। उस समय उन 14 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास जमा पूंजी 100 करोड़ रुपये भी नहीं थे जबकि आज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (public sector banks पीएसबी) के पास 100 लाख करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि है। वित्तीय क्षेत्र की गहरी पैठ होना इसकी औपचारिकता और देश के हर कोने में इसका प्रसार अभूतपूर्व रहा है।

53 वर्षों के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ जमा राशि का हिस्सा अभी भी 70 प्रतिशत है जो उस दिन राष्ट्रीयकरण के बाद से केवल 15 प्रतिशत की गिरावट बता रहा है। प्रधानमंत्री द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के कदम को राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई थी लेकिन जल्दबाजी में बने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट ने महज छह महीने बाद ही अस्वीकृत कर दिया था। इसलिए अदालत की बाधा को दूर करने के लिए एक संशोधित अध्यादेश पारित करना पड़ा।

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस निर्णय से अपार लोकप्रियता और राजनीतिक लाभ प्राप्त किया, क्योंकि पिछले बीस वर्षों में सैकड़ों निजी बैंक डूब गए थे। जनता ने सही या गलत तरीके से माना कि उनका पैसा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सुरक्षित था। यह भावना आज तक बनी हुई है। यहां तक कि वर्तमान सरकार ने निजी बैंकों के बजाय पीएसबी पर निर्भरता दिखाई है।

उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री जनधन योजना (जेडीवाई) के 90 प्रतिशत से अधिक, करीब 45 करोड़ खाते पीएसबी द्वारा खोले गये थे। यह दुनिया का सबसे प्रमुख वित्तीय समावेशन अभियान है और इसने जेडीवाई खातों में सरकारी सब्सिडी (Government subsidy in JDY accounts) को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से पहुंचाने में मदद की है। कोविड के दौरान भी ये खाते अमूल्य साबित हुए हैं। उनके पास एक बीमा कवर के साथ-साथ ई खातों से जुड़ी एक ओवरड्राफ्ट सुविधा भी है।

छोटे उद्यमों के लिए मुद्रा ऋण भी ज्यादातर पीएसबी का एक विशेष डोमेन है। क्रेडिट पक्ष पर भी सरकार की परियोजनाओं के लिए ऋण का बड़ा हिस्सा, चाहे वह बंदरगाहों, सड़कों या रेलवे या अन्य बुनियादी ढांचे के प्रयासों में हो, पीएसबी के माध्यम से होता है। इसका ताजा उदाहरण उत्तरप्रदेश का बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे है जिसकी अनुमानित लागत 15 हजार करोड़ है। एक्सप्रेस-वे के लिए पीएसबी के सहायक संघ से लोन उठाया गया है।

बैंक की विफलताओं के मामलों में भी पीएसबी बचाव के लिए आते हैं। यस बैंक को हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा वास्तविक रूप से (तकनीकी रूप से नहीं) लिया गया था। कुख्यात ग्लोबल ट्रस्ट बैंक (Global Trust Bank) को 2004 में ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स ने बचाया था। यदि कोई केवल पीएसबी के व्यावसायिक प्रदर्शन को देखता है तो तस्वीर कुछ साफ नहीं आती है। निजी बैंकों की तुलना में पीएसबी के खराब ऋणों की मात्रा बहुत खराब है। इन्हें गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (नॉन परफार्मिंग एसेट-एनपीए) कहा जाता है।

पिछले दस वर्षों में 10 गुना बढ़ गए विलफुल डिफॉल्टर्स

क्रेडिट इन्फॉर्मेशन कंपनी ट्रांसयूनियन सिबिल की एक हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि बैंक का कर्ज जानबूझ कर डुबोने वालों (विलफुल डिफॉल्टर्स) जिनके खिलाफ बैंकों ने कानूनी कार्रवाई शुरू की है, पिछले दस वर्षों में 10 गुना बढ़ गए हैं।

मार्च 2021 तक इन डिफाल्टरों पर 2.4 लाख करोड़ रुपये बकाया थे जिसकी 95 प्रतिशत राशि पीएसबी की थी। यह सार्वजनिक धन की लूट जैसा है। इनमें से 36 लोग ऐसे हैं जिन्होंने 1000 करोड़ से अधिक का कर्ज डुबोया है। वसूली की संभावना बहुत कम है और किसी भी मामले में कानूनी प्रक्रिया लंबी चलने वाली है।

सवाल यह है कि क्या इसका तात्पर्य उधारदाताओं की लापरवाही, ऋणों पर सतर्कता की कमी या किसी राजनीतिक दबाव में उधार देना है? लापरवाही का तर्क भरोसेमंद नहीं है, क्योंकि उदाहरण के लिए, इन ऋ णों में से 30 प्रतिशत भारतीय स्टेट बैंक या उसके सहयोगियों द्वारा दिए गए थे जो उधार देने के नियमों, प्रथाओं के उच्च मानकों के कठोर पालन के लिए जाने जाते हैं।

ऐसा क्यों है कि निजी क्षेत्र के बैंकों में गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात कम है?
Bank
Bank

क्या निजी क्षेत्र के बैंक ऋण की निगरानी में बेहतर हैं? क्या निजी क्षेत्र के बैंक सार्वजनिक जमा के बेहतर संरक्षक हैं? क्या निजी क्षेत्र के बैंक स्वाभाविक रूप से कम जोखिम लेते हैं? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सामाजिक रूप से वांछनीय लेकिन व्यावसायिक रूप से गैर-आकर्षक उधारकर्ताओं को उधार नहीं देते हैं? या ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें उधार देने के लिए राजनीतिक दबाव का सामना नहीं करना पड़ता है?

यह विचार स्पष्ट रूप से गलत है कि भारत में बैंकिंग की सभी बुराइयों के निराकरण के लिए बैंकों का निजीकरण रामबाण उपाय है। सभी विफलताएं हाई-प्रोफाइल निजी बैंकों की रही हैं। सभी बैंक विफलताओं की शुरूआत 2008 में अमेरिका और पश्चिमी देशों में लेहमैन बैंक के पतन के साथ शुरू हुई और इसके प्रभाव से वैश्विक वित्तीय संकट पैदा हुआ। निश्चित रूप से इस संकट के लिए बैंकों के सार्वजनिक क्षेत्र के स्वामित्व को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।

2008 के अंत में इंफोसिस जैसी नकदी-समृद्ध कंपनी को सार्वजनिक रूप से घोषणा करनी पड़ी कि वह अपनी नकदी जमा को निजी और विदेशी बैंकों से भारतीय स्टेट बैंक में स्थानांतरित कर रही है और इसके शेयरधारकों या ग्राहकों को घबराना नहीं चाहिए!

पीएसबी के लिए सार्वजनिक जमा का सहज स्थानांतरण जमाकर्ताओं के विश्वास को इंगित करती है। हालांकि इस आत्मविश्वास का एक और पक्ष है। यह पक्ष पीएसबी के मालिक यानी भारत सरकार द्वारा एक अंतर्निहित गारंटी के कारण है कि कोई भी बैंक विफल नहीं होगा। इस अमूल्य गारंटी का परिणाम लाभप्रदता में गिरावट हो सकती है।

क्या यह उचित है कि सार्वजनिक जमाकर्ता के पास असीमित गारंटी होनी चाहिए कि पीएसबी में उसका पैसा सुरक्षित है? क्या इस गारंटी की ऊपरी सीमा (5 लाख रुपये) नहीं होनी चाहिए जिससे ज्यादा की जमा राशि बैंक विफल होने की स्थिति में खतरे में पड़ेगी? इन और ऐसे कई सवालों के जवाब बैंकिंग सुधारों में निहित हैं जिनमें उनके चलाने में अधिक स्वायत्तता, अधिक वाणिज्यिक अनुकूलन, सामाजिक उद्देश्यों की जिम्मेदारी उठाने का कम बोझ, श्रमशक्ति उत्पादकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करना और जमाकर्ताओं के जोखिम का बेहतर मूल्य निर्धारण शामिल है।

सभी पीएसबी का एकमुश्त और थोक निजीकरण एक गलत कदम होगा जैसा कि हाल ही में नीति आयोग के पूर्व अध्यक्ष और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के वर्तमान सदस्य द्वारा लिखे गए एक पेपर में प्रस्तावित किया गया था। निश्चित रूप से एक मध्य मार्ग निकाला जा सकता है जिसमें सरकारी स्वामित्व के पीएसबी की कार्यशील स्वायत्तता बढ़ाना, जनता के विश्वास को बनाए रखते हुए जमा बीमा की उचित कीमत निर्धारित करते हुए बैंकों के वाणिज्यिक प्रदर्शन को बढ़ाया जाता है। यह 1969 में चंद्रमा-लैंडिंग के विपरीत रॉकेट विज्ञान नहीं है।

– अजीत रानाडे

(Ajit Ranade is an economist, political analyst and reporter based out of Mumbai, India. Currently he is Vice Chancellor of Gokhale Institute Of Politics & Economics Pune.)

PMC Bank failure: How safe the Indian Banks are?

देशबन्धु में प्रकाशित लेख का किंचित् संपादित रूप साभार

Privatization of banks is not the solution to all problems

खाद्य वस्तुओं पर जीएसटी भारतीय गरीबों के बीच कुपोषण को और बढ़ाएगा

goods and services tax GST

खाद्य वस्तुओं पर जीएसटी का गरीबों पर असर क्या होगा? | What will be the impact of GST on food items on the poor?

ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2021 (जीएचआई) रिपोर्ट में भारत 116 देशों में से 101वें स्थान पर (2021 Global Hunger Index, India ranks 101st out of the 116 countries) है। 27.5 के स्कोर के साथ भारत गंभीर स्तर की भूख की श्रेणी में आता है। हम भूख के गंभीर स्तर पर हैं, यह हमारे लिए चिंता का विषय है। सभी नागरिकों को पोषण सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय योजना की आवश्यकता है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में कुपोषितों की संख्या में पिछले दो साल में 15 करोड़ यानी 24.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2019 में कुपोषितों की संख्या 61.8 करोड़ थी जबकि 2021 में यह बढ़कर 76.8 करोड़ हो गई।

भूख सूचकांक के मानदंड क्या हैं? | What are the criteria for the Hunger Index?

भूख सूचकांक तीन मानदंडों पर आधारित है, अपर्याप्त खाद्य आपूर्ति, बाल मृत्यु दर और बाल कुपोषण। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया के कुल कुपोषित लोगों में से एक चौथाई भारत में रहते हैं। यह ऐसे समय में है जब हमारा देश 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के साथ आर्थिक विकास में वैश्विक नेता बनने की आकांक्षा रखता है।

कुपोषण को कम करने के लिए देश के सभी नागरिकों को संतुलित भोजन की आपूर्ति मूलभूत आवश्यकता है। संतुलित आहार का अर्थ (Meaning of balanced diet) है विटामिन और खनिजों के रूप में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट और सूक्ष्म पोषक तत्व।

एक व्यक्ति के संतुलित आहार में क्या- क्या आहार आते हैं?

nutritious food
पौष्टिक आहार

प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट ने एक व्यक्ति की पोषण संबंधी आवश्यकताओं में जाने के लिए एक समिति का गठन किया था। इसमें 232 ग्राम साबुत अनाज, 50 ग्राम कंद या स्टार्च वाली सब्जियां जैसे आलू, 300 ग्राम सब्जियां, 200 ग्राम फल, 250 ग्राम डेयरी भोजन, 250 ग्राम प्रोटीन स्रोत मांस, अंडा, मुर्गी के रूप में सेवन करने का सुझाव दिया गया है। मछली, फलियां, मेवा, 50 ग्राम संतृप्त और असंतृप्त तेल 30 ग्राम चीनी। वर्तमान बाजार मूल्य पर इन खाद्य पदार्थों की कीमत प्रति व्यक्ति लगभग 225 रुपये है। इसका मतलब है कि पांच सदस्यों के परिवार को प्रतिदिन 1125 रुपये या केवल भोजन पर 33750 रुपये प्रति माह खर्च करना चाहिए।

एक छोटी आबादी को छोड़कर हमारे लोग इस लक्ष्य से बहुत दूर हैं। 5 किलो अनाज और एक किलो दाल और थोड़ा सा तेल देने की सरकार की योजना पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती है। यह उचित भरण-पोषण के लिए भी पर्याप्त नहीं है। यह शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक विटामिन और खनिजों जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकताओं को बिल्कुल भी पूरा नहीं करता है।

उत्तर प्रदेश में 23 करोड़ की आबादी में से 15 करोड़ लोगों के लिए इतना राशन मुफ्त पाने के लिए कतार में लगना पोषण सुरक्षा के मामलों की बेहद निराशाजनक स्थिति का एक प्रक्षेपण है।

गरीबी दूर करने के उपाय

यह प्रासंगिक है कि लोगों की क्रय क्षमता गरीबी उन्मूलन, पर्याप्त मजदूरी और नागरिकों के लिए गुणवत्तापूर्ण भोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आजीविका के साधन सुनिश्चित करने के माध्यम से बढ़ाई जाती है। नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी सहित कई आर्थिक विशेषज्ञों ने गरीबी दूर करने के कई उपाय सुझाए हैं।

हाल के आर्थिक सर्वेक्षणों से पता चला है कि हमारी 90 प्रतिशत आबादी प्रति माह 10,000 दस हजार रुपये से कम कमाती है, उनके लिए संतुलित आहार केवल एक सपना है जो वर्तमान परिस्थितियों में सच होता नहीं दिख रहा है। जरूरी खाद्य पदार्थों पर टैक्स लगाने से पेट भरने का खर्चा बढ़ना तय है। दूसरी ओर मजदूरी में गिरावट का रुझान दिख रहा है क्योंकि रोजगार बिना नौकरी की सुरक्षा के और न ही भविष्य निधि या ईएसआई जैसे किसी रोजगार लाभ के ठेके पर काम कर रहा है। लघु उद्योग क्षेत्र जो बड़ी संख्या में लोगों को आजीविका प्रदान करता है, नवउदारवादी आर्थिक नीति के तहत प्राप्त होने वाले अंत में है।

एक युवा वयस्क के लिए कितनी कैलोरी जरूरी है?

एक युवा वयस्क के लिए 2300 कैलोरी और एक स्वस्थ भोजन और कपड़ों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, विभिन्न श्रमिक संगठनों ने इन कैलोरी आवश्यकताओं के सिद्धांत के आधार पर न्यूनतम मजदूरी की मांग की है। उन्होंने न्यूनतम वेतन 21000 रुपये प्रति माह की मांग की है। पूरी तरह से निराश करने के लिए, सरकार ने 178 रुपये प्रति दिन या 5340 रुपये प्रति माह के रूप में न्यूनतम वेतन की घोषणा की। यह आंतरिक श्रम मंत्रालय की समिति की 375 रुपये प्रति दिन की सिफारिश के बावजूद है। यह उच्चतम न्यायालय के 650 रुपये प्रति दिन के वेतन की मांग पर दिए गए फैसले के खिलाफ भी है। समय आधारित कार्य वेतन शुरू करने की सरकार की मंशा आर्थिक रूप से हानिकारक होने के साथ-साथ किसी व्यक्ति की चिकित्सा सलाह और स्वास्थ्य आवश्यकताओं के विरुद्ध भी होगी।

हमारे देश में बड़ी संख्या में आबादी असंगठित क्षेत्र में है जहां कानूनी फॉर्मूलेशन शायद ही लागू होते हैं। किसान और कृषि श्रमिक जो उत्पादक हैं, सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। खेतिहर मजदूरों को आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक भी दोहरे उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। किसानों ने नए कृषि कानूनों का विरोध किया, उन्हें डर था कि इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, बल्कि नागरिकों की खाद्य सुरक्षा से भी समझौता होगा।

यह आवश्यक है कि आवश्यक खाद्य पदार्थ लागत प्रभावी हों और निम्न सामाजिक-आर्थिक समूहों की पहुंच के भीतर हों। सभी वर्गों के लिए मजदूरी को वर्तमान कीमतों पर कैलोरी की जरूरत, संतुलित आहार, कपड़े, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास के अनुसार संशोधित किया जाए। इस संदर्भ में भोजन और अन्य दिन-प्रतिदिन की आवश्यकता वाली वस्तुओं पर लगाए गए जीएसटी को और कुपोषण को रोकने के लिए वापस लिया जाना चाहिए।

– डॉ अरुण मित्रा

RBI ने माना नोटबंदी और GST ने देश के व्यापारियों की हालत कर दी पतली

GST on food items will further exacerbate malnutrition among Indian poor

मोनोट्रोपा का सच : एक विलक्षण फूलधारी पौधा

Know Your Nature

परजीवी और सहजीवी का अंतर | सजीवों की कितनी श्रेणियां होती हैं?

सजीवों को विभिन्न समूहों में बांटने का एक प्रमुख आधार (A major basis for dividing living beings into different groups) उनके पोषण का तरीका भी है। इस दृष्टि से सभी सजीवों को दो श्रेणियों में रखा गया है। पहले स्वपोषी और दूसरे परपोषी (Heterotroph)। स्वपोषी जीव सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। सारे हरे पौधें एवं कुछ बैक्टीरिया इसी श्रेणी में आते हैं।

परपोषी जीव किसे कहते हैं?

जो जीव अपना भोजन दूसरे जीवों से पाप्त करते हैं वे परपोषी कह जाते हैं। सारे जन्तु इसी श्रेणी में आते हैं। इनका भोजन या तो स्वपोषी पेड़-पौधे होते हैं या अन्य जन्तु।

परपोषियों को भी परजीवी, सहजीवी और मृतजीवी (parasitic, symbiotic and saprophyte) में बांटा गया है।

परजीवी (parasitic) यानी जो जीव पचा-पचाया भोजन किसी अन्य जीव से प्रापत करे।

सहजीवी का मतलब (symbiotic) होता हे दो जीवों का इस तरह साथ-साथ रहना कि वे एक-दूसरे को मदद पहुंचाए और सामान्यत: इस मदद के बगैर उनका अस्तित्व संभव न हो।

मृतजीवी (saprophyte) यानी सड़े गले मृत जैविक पदार्थो से अपना भोजन प्रापत करने वाले पौधे ये जंगल में सड़ी-गली पत्तियों व कार्बनिक पदार्थों के ढेरों पर उगते हैं और इनमें भोजन बनाने वाला हरा पदार्थ क्लोरोफिल नहीं होता। मृतजीवी अपना भोजन मृत कार्बनिक पदार्थों से द्रव के रूप में ग्रहण करते है। इनमें ऐसे विषय एन्जाइम होते हैं, जो इनके शरीर से बाहर आकर मृत पदार्थों पर क्रिया करके उन्हें द्रव में बदल देते हैं। फिर ये पचे हुए द्रव पदार्थ विशेष चूषक अंगों द्वारा सोख लिए जाते हैं। ब्रेड, अचार, मुरब्बों और चमड़ों पर लगने वाली फफूंद ही इस मायने में मृतजीवी है।

क्या मोनोट्रोपा मृतजीवी पादप है?

Nature And Us
Nature And Us

मगर मोनोट्रोपा (Monotropa) सराकोडेस तथा नियोटिया और इपीपोगान जैसे कुछ आर्किडस को भी उच्चतर माध्यमिक और स्नातक स्तर की अधिकांश पाठ्य पुस्तकों में मृतजीवी ही कहा गया है। ये फूलधारी पौधे हैं। थोड़े गहराई में जाएं तो इनको मृतजीवी कहना उचित नहीं लगता। बल्कि इनका अध्ययन प्रकृति की खाद्य श्रृंखला के कुछ रोचक तथ्य (Some interesting facts about nature’s food chain) उजागर करता है। मोनोट्रोपा और नियोटिया के बारे में यह तो बहुत पहले से ही ज्ञात था कि इनकी जड़ों पर जड़-फफूंद (मायकोराइजा) का जाल बिछा रहता है। यह माना गया था कि ये इसी फफूंद-जाल के माध्यम से सड़ी-गली पत्तियों और मृत जन्तुओं से अपना भोजन प्रापत करते हैं।

मोनोट्रोपा इंडिका (Monotropa Indica) एक क्लोरोफिल रहित क्रीम रंग का पौधा है जो अधिकतर चीड़ (पाइन), ओक और स्प्रूस जैसे पेड़ों की छाया तले सड़ी-गली पत्तियों के बीच उगता पाया जाता है। सड़ी-गली पत्तियों के बीच उगने के कारण इसके मृतजीवी होने की पुष्टि सी हो गई।

चीड़ और स्प्रूस के पेड़ों की जडों के आसपास उगने के कारण इसे बाद में जड़ परजीवी भी कहा गया। परन्तु इन पेड़ों की जड़ों से इसका कोई भौतिक संबंध न मिलने के कारण इस मत को खारिज कर दिया गया।

मोनोट्रोपा का सच क्या है

आगे चलकर गहराई से छानबीन करने पर पता चला कि मोनोट्रोपा का सच (truth of monotropa) कुछ और ही है और इस कहानी में एक तीसरा पात्र भी है। वह तीसरा पात्र है तो वहीं फफूंद मगर उसकी वास्तविक भूमिका कापुी समय बाद स्पष्ट हो पाई।

यह भूमिका स्पष्ट होने पर पता चला कि उपरोक्त सारे मत कुछ हद तक सही हैं। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि मोनोट्रोपा ओर चीड़ व स्प्रूस के पेड़ (Spruce) एक-दूसरे से सीधे चाहे न जुउे हों मगर एक जड़ फफूंद बोलीटस के जरिए अवश्य जुड़े रहत हैं। यह फफूंद (fungus) मोनोट्रोपा की जड़ों (Roots of Monotropa) और पोषक पेड़ की जड़ों के बीच एक सेतु की तरह काम करती है।

बाजार्कमैन ने अपने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि बोलीटस फंफूद (boletes fungus) पोषक पेड़ (चीड़ व स्प्रुस) से मानोट्रोपा को पोषक पदाथ्र उपलब्ध कराती रहती है। इसे सिद्ध करने के लिए उन्हें कुछ रोचक प्रयोग किए। इनमें आइसोटोप तकनीक का उपयोग किया गया था।

मोनोट्रोपा मृतजीवी है या परजीवी?

कभी-कभी प्रकृति में एक ही तत्व के एकाधिक रूप पाए जाते हैं। जिन्हें हम आइसोटोप (Isotopes) कहते हैं। ये रासायनिक रूप से तो एक जैसे होते हैं मगर इनमें कुछ ऐसे ऊतक होते हैं कि इन्हें अलग-अलग पहचाना जा सकता है। मसलन कार्बन तीन रूपों में पाया जाता है- कार्बन-12 कार्बन-13 और कार्ब-14। तो बाजार्कमैन ने ऐसा ग्लूकोज लिया जिसमें जान-बूझकर कार्बन-14 का उपयोग किया गया था। कार्बन रेडियोसक्रिय होता है। यानी अब वे देख सकते थे कि यह कर्बन 14 युक्त ग्लूकोज कहा-कहां जाता है।

इसी प्रकार से उन्होंने चिन्हित फॉस्फोरस वाले भी कुछ पदार्थ लिए। उन्होंने देखा कि जब चीड़ के पेड़ में रेडियो सक्रिय ग्लूकोज ओर फास्फोरस को इंजेक्शन से प्रविष्ट कराया जाता है तो कुछ ही समय पश्चात ये दोनों चिन्हित पदार्थ 1-2 मीटर दूर उग रहे मोनोट्रोपा की काया में मिलते हैं।

इस प्रयोग के आधार पर बाजार्कमैन ने मोनोट्रोपा को मृतजीवी की बजाय परजीवी घोषित किया।

अत: कुल मिलाकर मोनोट्रोपा (Monotropa plant in Hindi) एक तिहरा तंग है जिसमें एक हरा भरा विशाल पेड़ (चीड़ या स्प्रूस), क्लोरोफिल रहित एक छोटा शाकीय पौधा (मोनोट्रोपा) और जड़ फफूंद (बोलीटस) एक दूसरे से जुड़े हैं। इसमें तीन विभिन्न जीव एक पोषण तंत्र बनाते हैं। अत: मानोट्रोपा को अब और मृतजीवी मानना ठीक नहीं। यह तो परजीवी फूलधरी पौधा है जो फफूंद के माध्यम से अपना पोषण किसी और पेड़ से प्राप्त करता है।

डॉ. किशोर पंवार

Monotropa plant in Hindi

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

भारत की सबसे बड़ी ताजे पानी की झील का नाम जानते हैं आप?

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उत्तरी भारत के सबसे बड़ा ताजा झील का नाम क्या है?

ताजे पानी की सबसे बड़ी झील कौन सी है?

भारत में ताजे पानी की सबसे बड़ी झील किस राज्य में स्थित है?

लोकटक झील, भारत में ताजे पानी की सबसे बड़ी झील है। यह झील मणिपुर की राजधानी इम्फाल (Imphal, capital of Manipur) से 53 किलोमीटर दूर और दीमापुर रेलवे स्टेशन के निकट स्थित है। 34.4 डिग्री सेल्सियस का तापमान, 49 से 81 प्रतिशत तक की नमी, 1,183 मिलीमीटर का वार्षिक वर्षा औसत तथा पबोट, तोया और चिंगजाओ पहाड़ मिलकर इसका फैलाव तय करते हैं। इस पर तैरते विशाल हरित घेरों की वजह से इसे तैरती हुई झील कहा जाता है।

एक से चार फीट तक मोटे ये विशाल हरित घेरे वनस्पति मिट्टी और जैविक पदार्थों के मेल से निर्मित मोटी परतें हैं। परतों की मोटाई का 20 प्रतिशत हिस्सा पानी में डूबा रहता है; शेष 80 प्रतिशत सतह पर तैरता दिखाई देता है। ये परतें इतनी मजबूत होती हैं कि स्तनपायी जानवरों को वजन आराम से झेल लेती हैं।

फूमदी (फुमड़ी) क्या है?

स्थानीय बोली में इन्हें फुमदी (Phumdis are a series of floating islands, exclusive to the Loktak Lake in Manipur state, in northeastern India) कहते हैं। फूमदी के भी मुख्यत: दो प्रकार हैं- ‘फूमदी एटाओबा’ यानी तैरती हुई फूमदी और ‘फूमदी अरुप्पा’ यानी डूबी हुई फूमदी। इनके नाते से ही लोकटक लेक को दुनिया की इकलौती तैरती झील का दर्जा प्राप्त है।

फूमदी पर संरक्षित पार्क (Protected Park on Phumdi)

नमी, जलजीव, वनस्पति और पारिस्थितिकी की दृष्टि से लोकटक (Ecologically Loktak) काफी धनी झील मानी जाती है। जहाँ तैरती हुई फूमदी पर कई तरह की घास, नरकुल तथा अन्य पौधे मौजूद हैं, वहीं डूबी हुई फूमदी पर पनपी वनस्पति उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाली साबित होती रही है।

विश्व का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय पार्क

दिलचस्प है कि फूमदी का सबसे बड़ा घेरा 40 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का है। इस घेरे के रूप में निर्मित इस भूभाग को भारत सरकार ने ‘ केयबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान(Keibul Lamjao National Park) का नाम व दर्जा दिया है।

फूमदी निर्मित इस पार्क को संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हुए भारत सरकार ने ‘रामसर साइट’ घोषित किया गया है। ‘केइबुल लामजाओ राष्ट्रीय पार्क’ दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय पार्क भी है।

पार्क में संरक्षित क्षेत्र का रकबा पहले चार हजार हेक्टेयर था। स्थानीय निवासियों के दबाव में अप्रैल, 1988 में घटाकर 2,160 हेक्टेयर कर दिया गया है। फूमदी का रकबा बढ़ने-घटने के साथ पार्क का रकबा भी घटता-बढ़ता रहता है। संरक्षित क्षेत्र, सरकार के अधिपत्य में है और शेष पर थांग, बरेल और मारिल जनजाति के स्थानीय निवासियों का मालिकाना है।

समृद्ध पारिस्थितिकी (rich ecology) : डांसिंग डियर का घर

प्राप्त जानकारी के मुताबिक एक वक्त में मान शर्मा ने इस पार्क की स्थापना की थी। कई खास वनस्पतियों, पुष्पों और जीवों से समृद्ध होने के कारण भी यह पार्क खास है। संगमरमरी व, एशियन सुनहरी बिल्ली, कई खास तरह के साँप, अजगर, काला हिमालयी व मलायन भालू, जंगली कौआ, स्काईलार्क, स्पॉटबिल, बर्मी सारस जैसे कई विविध रंग-बिरंगे पक्षी 2014 के आँकड़ों के अनुसार यह पार्क, स्थानीय बोली में संगाई के नामकरण वाले दुर्लभ प्रजाति के मौजूदा 216 हिरणों का भी घर है। खास अदा के कारण संगाई हिरणों को यहां ‘डांसिंग डियर’ भी कहते हैं।

संगाई हिरणों (Sangai in Manipur society) को मणिपुर के ‘राज्य पशु’ (state animal of Manipur) का दर्जा प्राप्त है। वन्यजीव गणना के मुताबिक, वर्ष 1975 में इनकी संख्या (Sangai deer in Manipur) मात्र 14 थी। 1995 में 155 और पिछले वर्ष 2016 का आँकड़ा 216 संगाई हिरणों का है।

संगाई हिरणों को प्रिय जिजानिया लेतीफोलिया’ नामक पौधा यहाँ काफी है।

यहाँ गर्मियों में अधिकतम तापमान 35 डिग्री और सर्दियों में न्यूनतम 01.7 डिग्री सेंटीग्रेड तक जाता है।

आर्द्रता का आँकड़ा, अगस्त में अधिकतम 81 प्रतिशत और मार्च में न्यूनतम 49 प्रतिशत का है। ये आँकड़े भी संगाई हिरणों की बढ़त में सहायक सिद्ध जरूर हुए हैं, लेकिन मानव निर्मित कई परिस्थितियाँ ऐसी हैं, जो पार्क के लिये अहितकर सिद्ध हो रही हैं।

समृद्धि पर संकट का कारण बना बैराज (Barrage caused crisis on prosperity)

आजकल यहाँ झील और पार्क के बीच में एक द्वन्द्व खड़ा हो गया है। द्वन्द्व का कारण बना है एक बैराज। गौर कीजिए कि लोकटक बहुउद्देशीय परियोजना के अन्तर्गत 1983 में यहाँ एक बैराज बनाया गया। इस ‘इथाई बैराज’ के बनने के बाद से झील का अधिकतम जलस्तर 768 से 768.5 मीटर रहने लगा। लगभग एक समान जलस्तर के कारण फूमदियों के डूबने और तैरने का प्राकृतिक चक्र टूट गया।

पहले ऋतु अनुसार फूमदियाँ डूबती-उतराती थीं; अब पार्क में अक्सर बाढ़ का ही दृश्य रहता है। पहले पार्क में नरकुल क्षेत्र ही था। परियोजना बनने के बाद से पार्क का एक-तिहाई हिस्सा पानी में डूबा रहता है और दो-तिहाई इलाका फूमदी क्षेत्र है।

माना जा रहा है कि लगातार बनी बाढ़ के कारण ही फूमदियों की मोटाई में गिरावट आई है; वनस्पतियों की वृद्धि दुष्प्रभावित हुई है। स्थानीय लोगों को भोजन देने वाली वनस्पतियों और मछलियों का संकट भी इस बैराज ने बढ़ाया है। खासकर छोटे जीवों पर तो संकट बढ़ा ही है।

वनस्पतियों की वृद्धि को स्थानीय लोकटक पनबिजली परियोजना ने एक और तरह से दुष्प्रभावित किया है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, पहले जब स्थानीय नदी – खोरदक तथा अन्य धाराओं में बाढ़ आती थी, तो उनका प्रवाह उलट जाता था। वह उलटा प्रवाह आकर लोकटक की सतह पर फैल जाता था।

नदियों से आया यह जल कई ऐसे पोषक और धातु तत्व अपने साथ लाता था, जो सूखे मौसम में नीचे जमकर उर्वरा क्षमता बढ़ाते थे। वनस्पतियों की वृद्धि अच्छी होती थी; अब कम होती है।

नगरीय प्रदूषण, रासायनिक खेती का प्रदूषण वन कटान, मिट्टी कटान, वनस्पतियों के सडऩे और फूमदियों के ऊपर तक डूबे रहने के कारण लोकटक झील के पानी की गुणवत्ता में भी कमी (Decreased water quality in Loktak lake) दर्ज की गई है। एक जाँच में लोकटक के पानी का पीएच मान 04 से 08.5 तक पाया गया। चिन्तित करता सवाल है कि इन सब कारणों से यदि फूमदी नष्ट होती रही, तो एकमात्र तैरती झील और पार्क का रुतबा कब तक बचेगा?

मूल कारण पर हो ध्यान

समाधान के तौर पर अधिक ऊँचाई वाले ऐसे स्थानों का निर्माण सुझाया गया है, जीव जहाँ निवास कर सकें। शोध, प्रशिक्षण, जन-जागृति अभियान, पारिस्थितिकी अनुकूल पर्यटन, ईंधन पर पाबन्दी जैसे उपाय भी सुझाए गए हैं। क्या गजब की बात है जो समस्या परियोजनाओं ने पैदा की है, हम उसका समाधान शोध, प्रशिक्षण, जागृति और पर्यटन में खोज रहे हैं।

भारत में आजकल यही हो रहा है। पहले समस्या पैदा करो, फिर उसका समाधान करने के लिये प्रोजेक्ट बनाओ, पैसा खपाओ; किन्तु समस्या के मूल कारण को यथावत बना रहने दो। कई अन्य की तरह इथाई बैराज भी कुदरती सम्पदाओं को बर्बादी की ओर ले जाती हमारी बेसमझी का एक नमूना है।

इस बेसमझी को और गहरे से समझना तथा समाधान की आवाज उठाना भी लोकटक भ्रमण का एक उद्देश्य हो सकता है। कभी चलिए।

अरुण तिवारी

आ गई जनता और सिंहासन खाली हो गया : श्रीलंका में दुनिया ने सच होते देखा

Sri Lankan economic crisis in Hindi

श्रीलंका के हालात से भारत को क्यों चेतना चाहिए?

वर्तमान श्रीलंकाई आर्थिक संकट पर संपादकीय हिंदी में (Editorial on present Sri Lankan economic crisis in Hindi) | देशबन्धु में संपादकीय आज (Editorial in Deshbandhu today)

रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है-

सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

इस कविता में वे आगे कहते हैं-

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,

सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,

जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?

वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

काल का मुड़ना और महलों की नींव उखड़ना, इन दो काल्पनिक स्थितियों के उदाहरण शनिवार को श्रीलंका में दुनिया ने सच होते देखे। वहां सचमुच यही लगा कि जनता सिंहासन खाली कराने आ पहुंची तो राष्ट्रपति को घर छोड़कर भागना पड़ा।

श्रीलंका में अच्छे दिन आएंगे, इंतजार कर रही थी श्रीलंका की जनता

deshbandhu editorial

पिछले कई महीनों से बदहाली में जीवन बिता रही श्रीलंका की जनता (people of sri lanka) प्रतीक्षा कर रही थी कि उसके अच्छे दिन आएंगे। लेकिन धीरे-धीरे यह संयम चुकता गया। देश में बार-बार विरोध-प्रदर्शन की नौबत आने लगी। जनता सड़कों पर उतर कर अपने गुस्से का इजहार करती और सरकार उस गुस्से पर काबू पाने के इंतजाम करती।

पहले प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे (Prime Minister Mahinda Rajapaksa) कुर्सी से हटे, लेकिन उनके भाई और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे (President Gotabaya Rajapaksa) अपने पद पर बने रहे। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विक्रम रानिलसिंघे बैठे, लेकिन हालात उनसे भी नहीं संभले। और शनिवार को जो हुआ, उसके बारे में सत्ताधारियों ने सोचा भी नहीं होगा कि कभी उन्हें इस तरह बेआबरू होकर कूचे से निकलना पड़ सकता है।

श्रीलंका में भारी आर्थिक संकट | What is the current economic situation in Sri Lanka?

गौरतलब है कि श्रीलंका में पिछले कई महीनों से भारी आर्थिक संकट चल रहा है। देश में जरूरी सामान का आयात नहीं हो पा रहा है, क्योंकि विदेशी मुद्रा लगभग खत्म हो चुकी है। पेट्रोल जनता के लिए उपलब्ध नहीं है, गैस, खाने-पीने की चीजों और दवाओं जैसे जरूरी सामान की भारी किल्लत है। लोग पिछले कई महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। आखिर लोगों के सब्र का बांध टूटा और शनिवार को राष्ट्रपति भवन पर ही उग्र प्रदर्शनकारियों ने धावा बोल दिया।

राष्ट्रपति भवन के भीतर से हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आईं। कहीं लोग राष्ट्रपति भवन की रसोई खंगालने लगे, कहीं शयनकक्षों में घुसकर इधर-उधर सामान उठाने लगे, बहुत से लोग भवन के स्वीमिंग पूल में कूद पड़े, कुछ लोगों ने कसरत करने की हसरत भी पूरी कर ली।

नजारा ऐसा था, मानो बरसों से बांध कर रखे गए कैदियों को एकदम से बेड़ियों से मुक्त कर दिया गया हो और वे इस अचानक मिली आजादी में समझ ही नहीं पा रहे कि किस तरह अपनी भावनाओं का इजहार करें।

श्रीलंका की जनता पिछले कई बरसों से तरह-तरह की बेड़ियों में ही तो जकड़ी हुई थी। शासक धर्म के नाम पर कट्टर विचारों को बढ़ावा दे रहे थे, जिसकी परिणति चर्च पर हमले या अल्पसंख्यकों के लिए नफरत के रूप में सामने आई। हलाल मीट और बुरका को प्रतिबंध कर एक धर्म पर दूसरे धर्म की सत्ता स्थापित करने की कोशिशें हुईं। निजीकरण को बढ़ावा दिया गया। तमिलों और सिंहलियों के बीच सद्भाव कायम करने की जगह तमिलों का दमन किया गया। अपने प्रचार के लिए मीडिया को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया और इस सबका असर ये हुआ कि देश में आर्थिक गिरावट आती गई, विदेशी कर्ज इतना चढ़ गया कि सरकार के लिए उसे चुकाना असंभव हो गया, और इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ा।

श्रीलंका में जिस तरह सत्ताधारियों को मनमाने आचरण पर जनता के गुस्से का शिकार होना पड़ा है, वह दुनिया के कई और देशों में तानाशाही प्रवृत्ति रखने वाले शासक पहले भुगत चुके हैं। कुछ ने खुद को मार लिया, कुछ को जनता ने मार दिया। कहीं अमेरिका जैसे गिद्धदृष्टि रखने वाले देश ने अपने पैर जमा लिए और अपने पिट्ठू शासकों को बिठा दिया। और इसमें भी नुकसान जनता का ही हुआ।

श्रीलंका के शासक भी दुनिया के राजनैतिक इतिहास और वर्तमान से परिचित होंगे ही लेकिन सच से मुंह फेरने की गलती उन्हें भारी पड़ गई।

वैसे इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सरकार से कुछ मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है, प्रधानमंत्री ने भी पद छोड़ दिया है। खुद राष्ट्रपति कहां है, ये अब तक पता नहीं चल पाया है।

इस बीच आर्मी चीफ शवेंद्र सिल्वा ने नागरिकों से अपील की कि वो देश में शांति बनाए रखने के लिए सेना और पुलिस का सहयोग करें। आईएमएफ जैसी संस्थाएं श्रीलंका के हालात पर नजर बनाए हुई हैं।

क्या होगा श्रीलंका का भविष्य?

श्रीलंका का भविष्य क्या होगा, क्या सेना के हाथ में देश की कमान चली जाएगी या गोटबाया राजपक्षे किसी और योजना के साथ वापस लौटते हैं, फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता।

अगर राजनैतिक अस्थिरता के कारण सेना ने देश संभाला तो फिर चीन क्या प्रभावशाली भूमिका में आएगा, ये भी देखना होगा।

पाकिस्तान में भी बिगड़ रहे हैं हालात

इस बीच पाकिस्तान में भी इमरान सरकार के जाने के बाद नई सरकार के लिए चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। आर्थिक बदहाली और महंगाई वहां भी लोगों का जीवन मुश्किल कर रही है।

भारत में अच्छे दिन : बढ़े हुए विदेशी कर्ज का सरकार के पास क्या उपाय है?

भारत में तो अब तक अच्छे दिन की गूंज सुनाई दे ही रही है, वैसे विदेशी कर्ज हम पर भी काफी बढ़ चुका है और सरकार के पास ऐसा कोई उपाय नजर नहीं आ रहा, जिससे दीर्घकालिक राहत मिल सके। लेकिन फिलहाल हमारे देश में धर्म की रक्षा पर जिम्मेदार लोगों का ध्यान लगा हुआ है। धर्म बच जाएगा तो हम सब भी बच ही जाएंगे, फिलहाल यही सोच काम कर रही हैं।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप साभार.

समझिए बुढ़ापे की जड़ में क्या है

secrets of life

बुढ़ापे की जड़ में है एक एंजाइम

परिवर्तन और बूढ़े होने की प्रक्रियाएं ही हैं जो हमें समय बीतने का एहसास कराती हैं। और समय बीतने का एहसास न हो तो मानव विकास, कला व सभ्यता काफी अलग होंगे।

प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (Proceedings of the National Academy of Sciences) (पीएनएएस) में ए एंड एम विश्वविद्यालय, एरिज़ोना स्टेट विश्वविद्यालय, चाइना कृषि विश्वविद्यालय और स्कोल्वो विज्ञान व टेक्नॉलॉजी संस्थान के शोधकर्ताओं के एक शोध पत्र में जीवित जीवों में उम्र बढ़ने के तंत्र की समझ (an understanding of the mechanism of aging in living organisms) एक कदम आगे बढ़ी है।

इस कदम का सम्बंध कोशिकाओं में उपस्थित डीएनए के एक अंश से है, जो कोशिकाओं के विभाजन और नवीनीकरण में भूमिका निभाता है। यह घटक सबसे पहले ठहरे हुए पानी की एक शैवाल में खोजा गया था और आगे चलकर पता चला कि यह अधिकांश सजीवों के डीएनए में पाया जाता है।

पृथ्वी पर सबसे लंबा जीवन किसके पास है? दुनिया में सबसे ज्यादा उम्र किसकी होती है? Who has the longest life on earth?

बुढ़ापे की जड़ में क्या है what is at the root of old age
बुढ़ापे की जड़ में क्या है what is at the root of old age?

पीएनएएस के शोध पत्र में टीम ने खुलासा किया है कि यह घटक पौधों में कैसे काम करता है। धरती पर सबसे लंबी उम्र पौधे ही पाते हैं, इसलिए इनमें इस घटक की समझ को आगे चलकर अन्य जीवों और मनुष्यों पर भी लागू किया जा सकेगा।

सजीवों में वृद्धि और प्रजनन (growth and reproduction in living organisms) दरअसल कोशिका विभाजन के ज़रिए होते हैं। विभाजन के दौरान कोई भी कोशिका दो कोशिकाओं में बंट जाती हैं, जो मूल कोशिका के समान होती हैं। यह प्रतिलिपिकरण कोशिका के केंद्रक में उपस्थित डीएनए (DNA present in the nucleus of the cell) की बदौलत होता है।

डीएनए क्या होता है?

डीएनए अर्थात् डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल (Deoxyribonucleic acid) एक लंबा अणु होता है जिसमें कोशिका के निर्माण का ब्लूप्रिंट भी होता है और स्वयं की प्रतिलिपि बनाने का साधन भी होता है।

डीएनए की प्रतिलिपि (DNA copy) इसलिए बन पाती है क्योंकि यह दो पूरक शृंखलाओं से मिलकर बना होता है। जब ये दोनों शृंखलाएं अलग-अलग होती हैं, तो दोनों में यह क्षमता होती है कि वे अपने परिवेश से पदार्थ लेकर दूसरी शृंखला बना सकती हैं।

लेकिन इसमें एक समस्या है। प्रतिलिपिकरण के दौरान ये शृंखलाएं लंबी हो सकती हैं या किसी अन्य डीएनए से जुड़ सकती हैं। ऐसा होने पर जो अणु बनेगा वह अकार्यक्षम होगा और इस तरह से बनने वाली कोशिकाएं नाकाम साबित होंगी। लिहाज़ा डीएनए में एक ऐसी व्यवस्था बनी है कि ऐसी गड़बड़ियों को रोका जा सके।

टेलोमेर क्या कार्य करता है? टेलोमेयर से आप क्या समझते हैं?

प्रत्येक डीएनए के सिरों पर कुछ ऐसी रासायनिक रचना होती है जो बताती है कि वह उस अणु का अंतिम हिस्सा है। और डीएनए में यह क्षमता होती है कि वह अपने सिरों पर यह व्यवस्था बना सके।

सिरे पर स्थित इस व्यवस्था को टेलोमेयर (Telomere) कहते हैं। यह वास्तव में उन्हीं इकाइयों से बना होता है जो डीएनए को भी बनाती हैं। और यह टेलोमेयर एक एंज़ाइम की मदद से बनाया जाता है जिसे टेलोमरेज़ कहते हैं। कोशिकाओं में किसी भी रासायनिक क्रिया के संपादन हेतु एंज़ाइम पाए जाते हैं।

बुढ़ाने की प्रक्रिया की प्रकृति को समझने की दिशा में शुरुआती खोज यह हुई थी कि कोई भी कोशिका कितनी बार विभाजित हो सकती है, इसकी एक सीमा होती है। आगे चलकर इसका कारण यह पता चला कि हर बार विभाजन के समय जो नई कोशिकाएं बनती हैं, उनका डीएनए मूल कोशिका के समान नहीं होता। हर विभाजन के बाद टेलोमेयर थोड़ा छोटा हो जाता है। एक संख्या में विभाजन के बाद टेलोमेयर निष्प्रभावी हो जाता है और कोशिका विभाजन रुक जाता है। लिहाज़ा, वृद्धि धीमी पड़ जाती है, सजीव का कामकाज ठप होने लगता है और तब कहा जाता है कि वह जीव बुढ़ा रहा है।

उपरोक्त खोज 1980 में एलिज़ाबेथ ब्लैकबर्न (Elizabeth H. Blackburn – Australian-American Researcher), कैरोल ग्राइडर (Carol W. Greider -American molecular biologist) और जैक ज़ोस्ताक (Jack W. Szostak – Canadian-American biologist) ने की थी और इसके लिए उन्हें 2009 में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize in 2009) से नवाज़ा गया था। अच्छी बात यह थी कि इन शोधकर्ताओं ने एक एंज़ाइम (टेलोमरेज़) की खोज भी की थी जिसमें टेलोमेयर के विघटन को रोकने या धीमा करने और यहां तक कि उसे पलटने की भी क्षमता होती है।

टेलोमेरेज़ आनुवंशिक जानकारी की रक्षा कैसे करता है?

टेलोमरेज़ में वह सांचा मौजूद होता है जो आसपास के परिवेश से पदार्थों को जोड़कर डीएनए का टेलोमरेज़ वाला खंड बना सकता है। इसके अलावा टेलोमरेज़ में यह क्षमता भी होती है कि वह पूरे डीएनए की ऐसी प्रतिलिपि बनवा सकता है, जिसमें अंतिम सिरा नदारद न हो। इस तरह से टेलोमरेज़ विभाजित होती कोशिकाओं को तंदुरुस्त रख सकता है।

टेलोमेयर और टेलोमरेज़ की क्रिया कोशिका मृत्यु और कोशिकाओं की वृद्धि में निर्णायक महत्व रखती है। वैसे किसी भी जीव की अधिकांश कोशिकाएं बहुत बार विभाजित नहीं होतीं, इसलिए अधिकांश कोशिकाओं को टेलोमेयर के घिसाव या संकुचन से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन स्टेम कोशिकाओं (stem cells) की बात अलग है।

स्टेम सेल क्या होता है – Stem Cell In Hindi!

स्टेम सेल्स वे कोशिकाएं होती हैं जो क्षति या बीमारी की वजह से नष्ट होने वाली कोशिकाओं की प्रतिपूर्ति करती हैं। उम्र बढ़ने के साथ ये स्टेम कोशिकाएं कम कारगर रह जाती हैं और जीव चोट या बीमारी से उबरने में असमर्थ होता जाता है।

दरअसल, कई सारी ऐसी बीमारियां है जो सीधे-सीधे टेलोमरेज़ की गड़बड़ी की वजह से होती हैं। जैसे एनीमिया, त्वचा व श्वसन सम्बंधी रोग।

इसके आधार पर शायद ऐसा लगेगा कि टेलोमरेज़ को प्रोत्साहित करने के तरीके खोजकर हम वृद्धावस्था से निपट सकते हैं।

लेकिन गौरतलब है कि टेलोमरेज़ का बढ़ा हुआ स्तर कैंसर कोशिकाओं को अनियंत्रित विभाजन में मदद कर नई समस्याएं पैदा कर सकता है। अत: टेलोमरेज़ की क्रियाविधि को समझना आवश्यक है ताकि हम ऐसे उपचार विकसित कर सकें जिनमें ऐसे साइड प्रभाव न हों।

What does telomerase do in humans? | मनुष्यों में टेलोमेरेज़ क्या करता है?

पीएनएएस के शोध पत्र के लेखकों ने बताया है कि वैसे तो टेलोमरेज़ की भूमिका सारे जीवों में एक-सी होती है, लेकिन यह सही नहीं है कि उसका कामकाजी हिस्सा भी सारे सजीवों में एक जैसा हो। कामकाजी हिस्से से आशय टेलोमरेज़ के उस हिस्से से है जो कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए को टेलोमेयर के संश्लेषण में मदद देता है। इस घटक को टेलोमरेज़ आरएनए (या संक्षेप में टीआर) कहते हैं।

शोध पत्र में स्पष्ट किया गया है कि टीआर की प्रकृति को समझना काफी चुनौतीपूर्ण रहा है क्योंकि विभिन्न प्रजातियों में टीआर की प्रकृति व संरचना बहुत अलग-अलग होती है।

टीम ने अपना कार्य एरेबिडॉप्सिस थैलियाना नामक पौधे के टेलोमरेज़ के साथ प्रयोग और विश्लेषण के आधार पर किया।

अरबीडोफिसिस थालीआना पादप वैज्ञानिकों के लिए पसंदीदा मॉडल पौधा रहा है।

शोध पत्र के मुताबिक अध्ययन से पता चला कि टीआर अणु में विविधता के बावजूद इस अणु के अंदर दो ऐसी विशिष्ट रचनाएं हैं जो विभिन्न प्रजातियों में एक जैसी बनी रही हैं। पिछले अध्ययनों से आगे बढ़कर वर्तमान अध्ययन में एरेबिडॉप्सिस थैलियाना में टीआर का एक प्रकार पहचाना गया है जो संभवत: टेलोमेयर के रख-रखाव में मदद करता है और टेलोमेयर की एक उप-इकाई के साथ जुड़कर टेलोमरेज़ की गतिविधि का पुनर्गठन करता है।

अध्ययन में पादप कोशिका, तालाब में पाई जाने वाली स्कम और अकशेरुकी जंतुओं के टीआर के तुलनात्मक लक्षण भी उजागर किए हैं। इनसे जैव विकास के उस मार्ग का भान होता है जिसे एक-कोशिकीय प्राणियों से लेकर वनस्पतियों और ज़्यादा जटिल जीवों तक के विकास के दौरान अपनाया गया है। इस मार्ग को समझकर हम यह समझ पाएंगे कि टेलोमेयर के काम को किस तरह बढ़ावा दिया जा सकता है या रोका जा सकता है।

टेलोमेयर घिसाव की प्रक्रिया अनियंत्रित कोशिका विभाजन को रोकने के लिए अनिवार्य है। इसी वजह से जीव बूढ़े होते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसीलिए जंतुओं की आयु चंद दशकों तक सीमित होती है।

दूसरी ओर, ब्रिसलकोन चीड़ (Bristlecone pine) और यू वृक्ष हज़ारों साल जीवित रहते हैं। यदि हम यह समझ पाएं कि पादप जगत बुढ़ाने की प्रक्रिया से कैसे निपटता है, तो शायद हमें मनुष्यों की आयु बढ़ाने या कम से कम जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने का रास्ता मिल जाए।

– एस. अनंतनारायणन

Web title : Understand what is at the root of old age

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

भारत में सबसे बड़े जल प्रवाह ब्रह्मपुत्र को जानिए

Know Your Nature

ब्रह्मपुत्र नदी का इतिहास

ब्रह्मपुत्र के बिना पूर्वोत्तर भारत की कल्पना अधूरी है

जैसे पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों के बिना भारत के बाजूदार नक्शे की कल्पना अधूरी है, वैसे ही ब्रह्मपुत्र (Brahmaputra in Hindi) के बिना पूर्वोत्तर भारत का कल्पनालोक भी अधूरा ही रहने वाला है। ब्रह्मपुत्र, पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति भी है, सभ्यता भी और अस्मिता भी।

ब्रह्मपुत्र बर्मी भी है, द्रविड़ भी, मंगोल भी, तिब्बती भी, आर्य भी, अनार्य भी, अहोम भी और मुगल भी। उसने खुद अपनी आँखों से इन तमाम संस्कृतियों को आपस में लड़ते, मिलते, बिछुड़ते और बढ़ते देखा है। तमाम बसवाटों को बसते-उजड़ते देखने का सुख व दर्द। दोनों का एहसास ब्रह्मपुत्र में आज भी जिंदा है।

ब्रह्मपुत्र, पूर्वोत्तर भारत की लोकास्थाओं में भी है, लोकगीतों में भी और लोकगाथाओं में भी।

ब्रह्मपुत्र, भूपेन दा का संगीत भी है और प्रकृति का स्वर प्रतिनिधि भी। पूर्वोत्तर की रमणियों का सौंदर्य भी ब्रह्मपुत्र में प्रतिबिम्बित होता है और आदिवासियों का प्रकृति प्रेम भी और गौरवनाद भी।

आस्थावानों के लिये ब्रह्मपुत्र, ब्रह्म का पुत्र भी है और बूढ़ा लुइत भी। लुइत यानी लोहित यानी रक्तिम।

भारत में ब्रह्म के प्रति आस्था का प्रतीक मंदिर भी एकमेव है और ब्रह्म का पुत्र कहलाने वाला प्रवाह भी एकमेव। भौतिक विकास की धारा बहाने वालों की योजना में भी ब्रह्मपुत्र एक जरूरत की तरह विद्यमान है, चूँकि एक नद के रूप में ब्रह्मपुत्र एक भौतिकी भी है, भूगोल भी, जैविकी भी, रोजग़ार भी, जीवन भी, आजीविका भी, संस्कृति और सभ्यता भी। ब्रह्मपुत्र का यात्रा मार्ग इसका जीता-जागता प्रमाण है।

कालिका पुराण के कथानक में ब्रह्मपुत्र

कालिका पुराण में कथानक है कि ब्रह्मपुत्र ने खुद रक्तिम होकर ब्रह्मर्षि परशुराम को पापमुक्त किया। पिता जमदग्नि को ब्रह्मर्षि परशुराम की माता रेणुका (Renuka, mother of Brahmarishi Parashurama) के चरित्र पर संदेह हुआ। पिता की आदेश पालना के लिये ब्रह्मर्षि परशुराम ने माँ रेणुका का वध तो कर दिया, किंतु पाप का एहसास दिलाने के लिये कठोर कुठार परशुराम के हाथ से चिपक गया।

अब पापमुक्ति कैसे हो ? इसके लिये परशुराम, ब्रह्मपुत्र की शरण में आये।

ब्रह्मपुत्र के प्रवाह में कुठार धोने से ब्रह्मपुत्र खुद रक्तिम ज़रूर हो गया, लेकिन ब्रह्मर्षि परशुराम को पापमुक्त कर गया।

यह कथानक प्रमाण है, ब्रह्मपुत्र की पापनाशिनी शक्ति का, जोकि किसी भी प्रवाह को यूँ ही हासिल नहीं होती। अरबों सूक्ष्म जीव, वनस्पतियाँ मिट्टी, पत्थर, वायु और प्रकाश की संयुक्त शक्तियाँ मिलकर किसी प्रवाह को पापनाशक बना पाती हैं। इस नाते इस कथानक को हम परशुराम काल में ब्रह्मपुत्र की समृद्ध पारिस्थितिकी का प्रमाण कह सकते हैं।

कीर्ति विजेता ब्रह्मपुत्र (Glory Winner Brahmaputra)

नद के रूप में भी ब्रह्मपुत्र के सीने पर कई कीर्तिपदक आज भी सुसज्जित हैं। चार हज़ार फीट की ऊँचाई पर बहने वाला दुनिया का एकमात्र प्रवाह है ब्रह्मपुत्र। जल की मात्रा के आधार पर देखें, तो भारत में सबसे बड़ा जल प्रवाह (largest water flow in india) ही है।

वेग की तीव्रता (19,800 क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड) के आधार पर देखें, तो ब्रह्मपुत्र दुनिया का पाँचवाँ सबसे शक्तिशाली जलप्रवाह है। बाढ़ की स्थिति में यह ब्रह्मपुत्र के वेग की तीव्रता (intensity of velocity of Brahmaputra in case of flood) एक लाख क्युबिक मीटर प्रति सेकेण्ड तक जाते देखा गया है। यह वेग की तीव्रता ही है कि ब्रह्मपुत्र एक ऐसे अनोखे प्रवाह के रूप में भी चिन्हित है, जो धारा के विपरीत ज्वार पैदा करने की शक्ति रखता है।

ब्रह्मपुत्र की औसत गहराई 124 फीट और अधिकतम गहराई 380 फीट आंकी गई है।

ब्रह्मपुत्र : दुनिया का पाँचवाँ सबसे शक्तिशाली जलप्रवाह

2906 किलोमीटर लंबी यात्रा करने के कारण ब्रह्मपुत्र, दुनिया के सबसे लंबे प्रवाहों में से एक माना गया है। ब्रह्मपुत्र, जहाँ एक ओर दुनिया के सबसे बड़े बसावटयुक्त नदद्वीप – माजुली की रचना करने का गौरव रखता है, वहीं एशिया के सबसे छोटे बसवाटयुक्त नदद्वीप उमानंद की रचना का गौरव भी ब्रह्मपुत्र के हिस्से में ही है।

सुंदरवन के निर्माण में ब्रह्मपुत्र का योगदान

सुंदरवन, दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा क्षेत्र है। सच्ची बात यह है कि इतना बड़ा डेल्टा क्षेत्र निर्मित करना अकेले गंगा के बस का भी नहीं था। ब्रह्मपुत्र ने गंगा के साथ मिलकर सुंदरवन का निर्माण किया।

इतना गौरव ! इतने सारे कीर्तिमान !! इससे यह तो स्पष्ट है कि ब्रह्मपुत्र, सिर्फ एक नद तो नहीं ही है; यह कुछ और भी है।

जिज्ञासायें कई होंगी, चूँकि इतनी सारी खूबियों के बावजूद ब्रह्मपुत्र एक ऐसा प्रवाह है, जिसके बारे में दुनिया को जानकारी आज भी काफी कम है।

भारत की सत्ता और मीडिया का केन्द्र असम, सिक्किम, नगालैण्ड, मिजोरम में न होकर सदैव दिल्ली में रहा; इस नाते पूर्वोत्तर के बारे में शेष भारतवासी यूँ भी कम जानते हैं। लिहाजा, इस श्रृंखला में हम ब्रह्मपुत्र को जानने की ज्यादा से ज्यादा कोशिश करेंगे।

आपके पास कोई जानकारी हो, तो आप भी साझा करें; हमें भेजें; हमारी कोशिश को अंजाम तक पहुँचायें। फिलहाल, हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि ब्रह्मपुत्र आता कहाँ से है और जाता कहाँ है?

समान क्षेत्र से उपजा ब्रह्मपुत्र और प्रथम मानव

परिमण्डलेर्मध्ये मेरुरुत्तम पर्वत:।

तत: सर्व: समुत्पन्ना वृत्तयो द्विजसत्तम:।।

हिमालयाधरनोऽम ख्यातो लोकेषु पावक:।

अर्धयोजन विस्तार: पंच योजन मायत:।।

चरक संहिता का उक्त सूत्र, मेरु पर्वत स्थित आधा योजन यानी चार मील चौड़े और पाँच योजन यानी चालीस मील लंबे क्षेत्र को आदिमानव की उत्पत्ति का क्षेत्र मानती है।

महर्षि दयानंद रचित सत्यार्थ प्रकाश के आठवें समुल्लास में सृष्टि की रचना त्रिविष्टप यानी तिब्बत पर्वत बताया गया है।

महाभारत कथा भी देविका नदी के पश्चिम मानसरोवर क्षेत्र को मानव जीवन की नर्सरी मानती है। इस क्षेत्र में देविका के अलावा ऐरावती, वितस्ता, विशाला आदि नदियों का उल्लेख किया गया है।

वैज्ञानिक, जिस समशीतोष्ण जलवायु को मानव उत्पत्ति का क्षेत्र मानते हैं, तिब्बत के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित मानसरोवर ऐसा ही क्षेत्र है।

अभी तक मिले साक्ष्यों के आधार पर सृष्टि में मानव उत्पत्ति का मूल स्थान तिब्बत ही है। मान्यता है कि सृष्टि की रचना ब्रह्म ने की। इस नाते मानव, ब्रह्म का पुत्र ही तो हुआ। संभवत: इसी नाते हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने मानव उत्पत्ति के मूल स्थान से निकलने वाले प्रवाह का नाम ब्रह्मपुत्र रखा।

वैसे कथानक यह भी है कि अमोघा ने जिस संतान को जन्म दिया, उसे ब्रह्मपुत्र कहा गया। दूसरे कथानक के अनुसार ऋषि शान्तनु आश्रम के निकट कुण्ड का नाम ब्रह्मकुण्ड था। उससे संबंध होने के कारण इसका नाम ब्रह्मपुत्र हुआ।

गौर कीजिए कि लंबे समय तक यही मान्यता रही कि ब्रह्मपुत्र का मूल स्रोत 100 किलोमीटर लंबा चेमयंगडंग ग्लेशियर है। चेमयंगडंग ग्लेशियर, मानसरोवर झील के उत्तर पूर्वी इलाके में स्थित है।

बाद में पता चला कि ब्रह्मपुत्र का मूल स्रोत, आंगसी ग्लेशियर है। हिंदी भाषा में इसे आप आंगसी हिमनद कह सकते हैं। आंगसी हिमनद, हिमालय के उत्तरी भू-भाग में स्थित बुरांग में स्थित है। बुरांग भी तिब्बत का ही एक हिस्सा है। इस प्रकार दोनों ही जानकारियों के आधार पर ब्रह्मपुत्र की उत्पत्ति का मूल क्षेत्र वही है, जो मानव का यानी तिब्बत। ब्रह्मपुत्र के हिस्से में दर्ज एक कीर्तिगौरव यह भी है।

क्षेत्र बदला, नाम बदला

Aerial view of cloudscape
Aerial view of cloudscape : Photo by Pixabay on Pexels.com

भारत- नेपाल सीमा का पूर्वी क्षेत्र, गंगा बेसिन के ऊपर तिब्बत का दक्षिणी-मध्य भूभाग, पटकेई-बूम की पहाडिय़ाँ, उत्तरी ढाल, असम का मैदान और फिर बांग्लादेश का उत्तरी हिस्सा ब्रह्मपुत्र का यात्रा मार्ग है।

तिब्बत में 1625 किलोमीटर, भारत में 918 किलोमीटर और बांग्ला देश में 363 किलोमीटर लंबा है ब्रह्मपुत्र का यात्रा मार्ग (itinerary of brahmaputra)

अपने मूल स्थान पर यह पूर्व में प्रवाहित होने वाला प्रवाह है। फिर थोड़ा उत्तर की ओर उठता हुआ, फिर दक्षिण की ओर गिरता हुआ। नक्शे में देखें। इसी तरह थोड़ी-थोड़ी दूरी पर दिशा बदलते हुए यह भारत में प्रवेश करता है।

भारत में प्रवेश करते ही ब्रह्मपुत्र एकदम से दक्षिण की ओर नीचे उतरता और फिर पूर्व से पश्चिमी ओर बहता प्रवाह हो जाता है। बांग्ला देश में प्रवेश करने पर यह पुन: दक्षिण की ओर सीधे उतरता दिखता है। समुद्र में मिलने से पहले एक बार फिर दिशा बदलता है; तब यह दक्षिण-पूर्वी प्रवाह हो जाता है।

दुनिया में बहुत कम प्रवाह ऐसे होंगे, क्षेत्र के साथ जिनका नाम इतनी बार बदलता हो, जितना कि ब्रह्मपुत्र का। गौर कीजिए कि ब्रह्मपुत्र नद को प्राचीन चीनी में पिनयिन और तिब्बती में ‘यारलंग सांगपो के नाम से पुकारा जाता है।

अरुणाचल प्रदेश में दिहांग और सियांग, असम घाटी में लुइत और ब्रह्मपुत्र तथा बांग्लादेश में प्रवेश के बाद इसे यमुना नाम मिलता है। बोडो लोग इसे बुरलंग-बुथुर कहकर भी पुकारते हैं।

बांग्लादेश में पद्मा नदी से मिलने के साथ ही ब्रह्मपुत्र, नये रूप-स्वरूप और नाम के साथ नया स्वांग रचता है  यह नद से नदी हो जाता है। नाम रखा जाता है – देवी पद्मा। मन नहीं मानता, तो मेघना नाम धारणकर फिर निकल पड़ता है आगे समुद्र की गहराइयों को अपना सर्वस्व सौंपने। अनुचित न होगा यदि मैं कहूँ कि नये-नये रूप और नये-नये नाम धरने वाला स्वांग कलाकार है, अपना ब्रह्मपुत्र।

-अरुण तिवारी

Know about the largest water flow in India, the Brahmaputra

क्यों हो रहा है ओजोन परत का क्षरण?

Environment, Biodiversity and Nature News

ओजोन परत का क्षरण का हमारे जीवन पर प्रभाव

पृथ्वी का सुरक्षा कवच है ओजोन परत

पृथ्वी के सुरक्षा कवच ओजोन परत की सुरक्षा एवं नियंत्रण (protection and control of the ozone layer) के अभी-भी सकारात्मक कदम उठाये जा रहे हैं। यहां फिर से इस बात पर जोर देते हुए कहना है कि बिना ओजोन परत के हम जिन्दा नहीं रह सकते, क्योंकि विकिरण के कारण कैंसर, फसलों को नुकसान और समुद्री जीवों पर खतरा पैदा हो सकता है और इन्हीं पराबैंगनी किरणों से ओजोनपरत हमारी रक्षा करती है।

आस्ट्रेलिया का उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां ओजोन परत को काफी नुकसान पहुंचा है।

ओजोन और ओजोन परत का महत्व (importance of the Ozone and the iozone layer) बहुत है, विशेषतः, धरती और उस पर आवासित जीवधारियों के लिए ओजोन-परत एक सुरक्षा-कवच के रूप में काम करती है। ओजोन के महत्व को जानने के पहले ओजोन के बारे में सामान्य जानकारी (General information about ozone in Hindi) जरूरी है।

एक निष्क्रिय गैस है ओजोन

वास्तव में सूर्य के विकिरण के प्रभाव से ऑक्सीजन का अणु नवजात ऑक्सीजन में टूट जाता है और वह दूसरे अणु से मिलकर ओजोन का निर्माण करता है। पृथ्वी की सतह से 23-30 किमी ऊपर वायुमंडल में पृथ्वी के चारों ओर ओजोन गैस की काफी मोटी परत होती है।

ओजोन परत सूर्य की पराबैंगनी किरणों (sun’s ultraviolet rays) का लगभग 90 से 94 फीसदी भाग अवशोषित कर इन्सान तथा अन्य जीवों को मोतियाबिंद, त्वचा कैंसर तथा तमाम अन्य प्रकार के त्वचा रोग जैसे दुष्प्रभावों से बचाती है।

पृथ्वी के लिए आवश्यक सूर्य के प्रकाश को आने देना तथा हानिकारक पराबैंगनी किरणों को आने से रोकने के कारण ही इसे पृथ्वी का सुरक्षा-कवच भी कहा जाता है।

संतरे के छिलके की तरह पृथ्वी के ऊपर चारों ओर 800 किमी मोटी वायुमंडल की परत है जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण वायुमंडल पृथ्वी से पृथक नहीं हो पाता।

वायुमंडल के अन्दर भी कई परतें हैं जो पृथ्वी के ऊपर क्रमश: क्षोभ मंडल, समताप मंडल, ओजोन मंडल, आयन मंडल एवं बहिर्मंडल के नाम से जाना जाता है। जलवायु की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण वायुमंडल की सबसे निचली परत है जिसमें समस्त वायुमंडलीय घटनाएं घटित होती हैं।

क्षोभमंडल की औसत मोटाई 14 किमी की होती है।

समताप मंडल की ऊंचाई क्षोभ मंडल के ऊपर 30 किमी मानी जाती है। समताप मंडल सीमा के ऊपर ओजोन मंडल का विस्तार 30 से 60 किमी की ऊंचाई तक है। उस मंडल में ओजोन गैस की प्रधानता है।

कतिपय कुछ भूगोलवेत्ताओं ने इस मंडल को समताप मंडल की ऊपरी परत स्वीकार किया है। यह परत प्रकृति का वरदान है। इसकी उपस्थिति के कारण पृथ्वी पर आवासित जीव-जन्तु और वनस्पतियों का अस्तित्व विद्यमान है।

इस ओजोन मंडल के ऊपर आयन मंडल है। इसकी ऊपरी सीमा 500 किमी तक है और इसके ऊपर यानी 500 किमी के ऊपर महिर्मंडल है जो 800 किमी के मध्य है।

ओजोन मंडल में ओजोन परत की मोटाई एक सामान नहीं है। यह ध्रुवीय क्षेत्र में अधिक मोटी है। यहां ज्यादा क्यों हैं? इसका कारण इससे स्पष्ट होगा कि ध्रुवों पर सूर्य की किरणें सीधी नहीं पड़तीं हैं। इस कारण ह्रास नहीं होता और साथ ही महाद्वीप की ऊंचाई सर्वाधिक होने के कारण यहां ठंड ज्यादा रहती है।

ध्रुवों पर छह माह तक धूप नहीं रहती। सूर्य किरणों के अभाव में नई ओजोन परत का निर्माण नहीं हो पाता है।

ओजोन के विनाश की प्रक्रिया

ध्रुवों पर पृथ्वी के चुम्बकत्व के कारण धनात्मक कण दक्षिण ध्रुव की ओर और ऋणात्मक कण उत्तरी ध्रुव की ओर चला जाता है। इसे जलवाष्प ऑक्सीकृत हो जाती है और दोनों रास्ते बंद हो जाते हैं। एक ओर हाइड्रोजन पराक्साइड के निर्माण से ओजोन का विनाश (destruction of ozone) शुरू हो जाता है तो दूसरी ओर नवजात ऑक्सीजन के परमाणु के साथ मिलकर नाइट्रस ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। यह प्रभाव दक्षिण ध्रुव पर ज्यादा होता है।

ओजोन परत का क्षरण क्यों हो रहा है? (Why is the ozone layer depleting?)

इसके जवाब में वह तथ्य संकलित है कि रेफ्रिजरेटर और एसी में इस्तेमाल होने वाली क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन गैस (Chloro-fluoro-carbon gas used in refrigerators and ACs) का क्लोरीन अणु ओजोन क्षरण का मुख्य कारण (Main cause of ozone depletion) है।

Ozone depletion (ओजोन ह्रास) | ओजोन छिद्र क्या होता है?

क्लोरीन का अणु वायुमंडल में जाकर ओजोन के अणुओं को विनाशक के रूप में तोड़ता चला जाता है। इससे उस स्थान पर ओजोन की सान्द्रता दूसरे स्थान से कम हो जाती है, जिसे ओजोन-छिद्र कहते हैं।

इसी स्थान से हानिकाकर विकिरण पृथ्वी के वायुमंडल में आने लगते हैं। ओजोन परत का मापन डाबसन यूनिट से किया जाता है। अगस्त से नवम्बर माह तक ओजोन-परत का क्षरण चरम पर रहता है। वर्ष 1985 में ब्रिटिश अंटार्कटिका सर्वे टीम ने सर्वप्रथम अंटार्कटिका तट के ऊपर ओजोन-परत क्षरण का पता लगाया था।

इस छिद्र का मीटियोरोलॉजिकल एजेंसी अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए बताया कि अंटार्कटिका के ऊपर समताप मंडल के ओजोन परत (stratospheric ozone layer over Antarctica) में अब तक का सबसे बड़ा छेद देखा गया है, जो अंटार्कटिका के आकार के दोगुना से भी ज्यादा है।

ओजोन मंडल में इतना बड़ा छेद देखकर सारा विश्व भय से आक्रांत हो उठा और ओजोन-परत के विनाशक गैस सीएफसी तथा अन्य के उत्सर्जन की रोकथाम के लिए आवश्यक कार्रवाई हेतु सतर्क हो गया। इस तरह ओजोन-परत, जो पृथ्वी का सुरक्षा कवच है, की सुरक्षा एवं नियंत्रण के अभी-भी सकारात्मक कदम उठाये जा रहे हैं।

ओजोन परत के बिना हम जिन्दा क्यों नहीं रह सकते?

यहां फिर से इस बात पर जोर देते हुए कहना है कि बिना ओजोन परत के हम जिन्दा नहीं रह सकते, क्योंकि विकिरण के कारण कैंसर, फसलों को नुकसान और समुद्री जीवों पर खतरा पैदा हो सकता है और ओजोन-परत इन्हीं पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है।

ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां ओजोन-परत को काफी नुकसान पहुंचा है।

इसी नुकसान की वजह से सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बड़ी संख्या में वहां के लोग त्वचा-कैंसर के शिकार हुए हैं। एक अन्य खतरा इसके कारण ध्रुवों की बर्फ पिघलने का है। अंटार्कटिका क्षेत्र में बड़े हिमखंड हैं यदि ये हिमखंड पिघलते हैं तो तटीय क्षेत्रों में जलस्तर के बढ़ जाने पर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसके अलावा गर्मी बढ़ेगी जो नुकसानदायी होगी।

-अमिता सिंह

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहेंगे?

sarvamitra surjan

लोग क्या कहेंगे, लोग क्या सोचेंगे, इन दोनों के बीच की कड़ी पर चलने के लिए अत्यधिक न्यायिक कौशल की आवश्यकता होती है। यह एक पहेली है जो प्रत्येक न्यायाधीश को निर्णय लिखने से पहले परेशान करती है। ये उद्गार हैं भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस जे.बी.पारदीवाला (Justice J.B.Pardiwala, Judge of the Supreme Court of India) के।

बीते रविवार एक कार्यक्रम में लोकप्रिय जनभावनाओं के ऊपर कानून के शासन की प्रधानता (The primacy of the rule of law over popular public sentiment) पर जोर देते हुए न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि एक ओर बहुसंख्यक आबादी के इरादे को संतुलित करना और उसकी मांग को पूरा करना तथा दूसरी ओर कानून के शासन की पुष्टि करना कठिन काम है।

क्या बहुसंख्यक वर्ग न्याय व्यवस्था में भी अपना दबदबा कायम रखना चाहता है?

माननीय न्यायाधीश की बातों से यही समझ आता है कि न्याय व्यवस्था में भी बहुसंख्यक वर्ग अपना दबदबा कायम रखना चाहता है और अपने मन की बात करना चाहता है, और ऐसे में न्याय की आसंदी पर बैठे लोगों के लिए निष्पक्ष फैसले देना बड़ी चुनौती है।

जस्टिस पारदीवाला की इस टिप्पणी के बाद ही कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एचपी संदेश (Karnataka High Court Judge HP Sandesh) ने सोमवार को आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजीपी) की खिंचाई करने पर उन्हें तबादला करने की धमकी दी गई।

मतलब न्यायपालिका में जिस चुनौती की बात रविवार को हो रही थी, सोमवार को उसका एक जीवंत उदाहरण पेश हो गया।

इस बीच मंगलवार को लंदन में एक कार्यक्रम में भारत के प्रधान न्यायाधीश एन वी रमन ने कहा कि भारत की न्याय व्यवस्था स्वतंत्र है, कानून के शासन को सर्वोच्च रखा जाता है और इस वजह से निवेशकों के लिए भारत एक पसंदीदा विकल्प हो सकता है।

एक सप्ताह में न्याय व्यवस्था के तीन अलग-अलग रंग

सप्ताह के तीन दिनों में ही न्याय व्यवस्था के तीन अलग-अलग रंग (Three different colors of justice system in a week) देखने मिले, सात दिनों में विविध विचारों का पूरा इंद्रधनुष तैयार हो जाएगा।

बहरहाल, लौटते हैं न्यायाधीश पारदीवाला की बातों पर, क्योंकि उससे प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर पर विचार का एक मौका मिला है। पाठक जानते हैं कि इस कहानी में दो गहरे दोस्त दो अलग-अलग परिस्थितियों में एक-दूसरे के खिलाफ बुलाई गई पंचायत में पंच की गद्दी पर बैठते हैं और वहां बैठते ही उन्हें अपनी गहन-गंभीर जिम्मेदारी का अहसास होता है। उसके बाद दोस्ती और दुश्मनी की भावनाओं से परे होकर वे तथ्यों और सबूतों के आधार पर फैसला सुनाते हैं।

न्याय व्यवस्था के इस उलझन काल में इस कहानी को फिर से पढ़ने की जरूरत है। और अगर पढ़ने में दिलचस्पी न हो तो इस के कुछ उद्धरण अदालती इलाके में चस्पा कर लेना चाहिए।

जैसे खाला अलगू चौधरी से पंचायत में आने कहती हैं तो अलगू कहते हैं कि जुम्मन मेरा पुराना मित्र है, उससे बिगाड़ नहीं कर सकता। तब खाला कहती हैं कि बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?

जब पंचायत लगती है तो अलगू चौधरी को ही पंच बनाया जाता है। अलगू फिर अपनी दोस्ती का हवाला देते हैं तो खाला कहती हैं कि बेटा, दोस्ती के लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पंच के दिल में ख़ुदा बसता है। पंचों के मुंह से जो बात निकलती है, वह ख़ुदा की तरफ़ से निकलती है।

कहानी के दूसरे हिस्से में जब अलगू चौधरी और समझू साहू के बीच बैल को लेकर विवाद होता है और जुम्मन शेख पंच बनते हैं। यहां जुम्मन अलगू से कहते हैं कि पंच के पद पर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता।

अगर देश की तमाम अदालतों में न्याय के सिवा और कुछ न सूझने वाला माहौल पैदा हो जाए, अगर न्याय की आसंदी पर बैठे लोग यह मान लें कि बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न करेंगे, तो नाइंसाफी की गुंजाइश ही कहां बचेगी?

लेकिन दुख इस बात का है कि अब माहौल ऐसा नहीं रहा है। इसलिए कभी न्यायाधीशों को प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी पीड़ा व्यक्त करनी पड़ती है, कभी प्रधान न्यायाधीश की ओर से टिप्पणी आती है कि सत्ताधारी दल मानता है कि हर सरकारी कार्रवाई न्यायिक समर्थन की हकदार है।

प्रधान न्यायाधीश ये भी कहते हैं कि हम केवल संविधान के प्रति जवाबदेह हैं। जब इस तरह की सफाई देने की नौबत आने लगे तो ये समझ आने लगता है कि न्याय व्यवस्था दबावों और उलझनों से गुजर रही है। जैसे न्यायमूर्ति पारदीवाला ने ये भी कहा कि संविधान के तहत कानून के शासन को बनाए रखने के लिए देश में डिजिटल और सोशल मीडिया को अनिवार्य रूप से व्यवस्थित करने की आवश्यकता है क्योंकि यह लक्ष्मणरेखा को पार करने और न्यायाधीशों पर व्यक्तिगत, एजेंडा संचालित हमले करने के लिए खतरनाक है।

उनकी यह टिप्पणी शायद नूपुर शर्मा विवाद के बाद सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ चली मुहिम से निकली है।

पाठकों को जानकारी होगी कि नूपुर शर्मा ने अपने खिलाफ दर्ज सभी मामलों को दिल्ली लाने की याचिका अदालत में दाखिल की थी, जिसे नामंजूर करते हुए अदालत ने उन्हें देश में बिगड़ रहे हालात के लिए जिम्मेदार ठहराया था और टीवी पर आकर माफी मांगने की नसीहत भी दी थी।

नूपुर शर्मा पर कड़ी टिप्पणी न्यायमूर्ति पारदीवाला ने की थी। जिसके बाद सोशल मीडिया पर अदालत के इस रवैये की खूब आलोचना हुई।

देश में रोजाना अन्याय होते देख कर भी चुप रहने वाले लोग अचानक न्यायाधीशों को उनका फर्ज और सीमाएं याद दिलाने लग गए। मुखालफत की ये मुहिम सोशल मीडिया तक ही नहीं रुकी, अब 15 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, 77 सेवानिवृत्त नौकरशाहों और 25 सेवानिवृत्त सशस्त्र बलों के अधिकारियों सहित कुल 117 विशिष्ट लोगों ने इस मामले में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति पारदीवाला की टिप्पणियों के खिलाफ एक खुला बयान जारी किया है, जिसमें संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देते हुए कहा गया है कि ”हम जिम्मेदार नागरिक के तौर पर यह मानते हैं कि किसी भी देश का लोकतंत्र तब तक ही बरकरार रहेगा, जब तक कि सभी संस्थाएं संविधान के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करती रहेंगी। उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों की हालिया टिप्पणियों ने लक्ष्मणरेखा पार कर दी है और हमें एक खुला बयान जारी करने के लिए मजबूर किया है।”

पता नहीं बयानवीरों को सीबीआई, ईडी, चुनाव आयोग यहां तक कि सरकार के कामकाज में कभी लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन क्यों नजर नहीं आया। और बयान देने की ऐसी मजबूरी उन्हें पहले क्यों महसूस नहीं हुई।

खैर लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का हक है, इन लोगों को अभी न्यायपालिका की निष्पक्ष भूमिका पर खतरा दिखा तो आपत्ति दर्ज करा दी। काश आपत्ति दर्ज कराने का ऐसा खुला माहौल सबके लिए बना रहे और हमेशा बना रहे तो फिर कोई भी पद का अहंकार नहीं दिखा पाएगा, हमेशा एक संतुलन कायम रहेगा।

वैसे लक्ष्मणरेखा की बात तो जस्टिस पारदीवाला ने भी की है और वे मानते हैं कि डिजिटल और सोशल मीडिया को व्यवस्थित करने की जरूरत है। लेकिन जिस तरह के शाब्दिक हमले उन पर किए गए, वैसे कई हमले तो एक अरसे से इस देश के जागरुक और संविधाननिष्ठ नागरिक झेलते आए हैं। पानी में रहकर मगर से बैर करते हुए ये लोग धारा के विपरीत तैरने का साहस करते हैं ताकि ये देश और इसकी उदार लोकतांत्रिक परंपराएं बची रहें। यही साहस अगर सारे लोग मिलकर दिखाएं तो तानाशाही प्रवृत्ति के खिलाफ लड़ाई थोड़ी आसान हो जाएगी।

क्या है हैशटैग सुप्रीम कोठा?

आखिरी बात, न्यायाधीशों की टिप्पणियों के खिलाफ सोशल मीडया पर जो मुहिम चली, उसे हैशटैग सुप्रीम कोठा के तहत चलाया गया।

इसी तरह कुछ साल पहले एक केन्द्रीय मंत्री ने मीडिया के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए प्रॉस्टिट्यूट शब्द (prostitute) का इस्तेमाल किया था।

अपशब्दों का तो सारा वास्ता महिलाओं के अपमान से ही है, अब संस्थाओं की आलोचना के लिए भी महिला विरोधी शब्दों का इस्तेमाल होने लगा है। क्या इस देश में महिलाओं की नियति अपमानित होना ही है?

सर्वमित्रा सुरजन

लेखिका देशबन्धु की संपादिका हैं।

For fear of spoilage, would you not say anything about faith?

कैसा हो राष्ट्रपति? क्या कहता है संविधान? विपक्ष के पास कोई पक्ष ही नहीं है !

what is the president like according to the constitution

अब यह खुला रहस्य और भी खुल गया है कि विपक्ष के पास कोई पक्ष ही नहीं है ! ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने राष्ट्रीय राजनीति (national politics) की सारी पहल अपने हाथ में समेटने की जो चतुराई दिल्ली आकर दिखलाई थी, वह कोई रंग पकड़ती इससे पहले ही मामला सिरे से बदरंग हो गया। उनके तीनों विकेट धड़ाधड़ गिर गए। सबसे पहले गिरे शरद पवार (Sharad Pawar ), फिर फारूख अब्दुल्ला और फिर गोपालकृष्ण गांधी (Gopalkrishna Gandhi)

राष्ट्रपति चुनाव : क्यों गिरे विपक्ष के तीन विकेट?

ये तीनों विकेट इसलिए नहीं गिरे कि सामने से कोई सधी गेंदबाजी कर रहा था। ये तीनों ही राष्ट्रपति बनने को तैयार थे, बशर्ते उनकी जीत की गारंटी हो!

सत्ता की राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं पवार और अब्दुल्ला

शरद पवारफारूख अब्दुल्ला सत्ता की राजनीति के माहिर खिलाड़ी (expert in power politics) हैं, लेकिन गोपालकृष्ण गांधी अलग धारा के आदमी हैं। वे कुशल प्रशासक ही नहीं, भारतीय चिंतन व संस्कृति के गहन अध्येता हैं। उन्होंने खुद ही कहा कि मेरे नाम पर सभी एकमत होते तो वे हार की फिक्र न कर, यह खेल खेल सकते थे।

तृणमूल कांग्रेसकी तरफ से ही आया यशवंत सिन्हा का नाम

इतनी भद पिटने के बाद विपक्ष ने आम राय से यशवंत सिन्हा का नाम जाहिर किया। यह नाम भी ‘तृणमूल कांग्रेस’ की तरफ से ही आया। तीन नामों के बदले यही एक नाम पहले से आया होता तो प्रक्रिया की शालीनता और विपक्ष की प्रतिष्ठा, दोनों ही बनी रहतीं, लेकिन जैसा मैंने शुरू में लिखा, विपक्ष का अपना कोई पक्ष है ही नहीं, तो शालीनता-प्रतिष्ठा की फिक्र किसे है!

शालीनता व संयम से किया गया द्रौपदी मुर्मू का चयन

‘भाजपा’ ने अपनी पार्टी की समर्पित कार्यकर्ता द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाना तय किया है।

मुर्मू का चयन शालीनता व संयम से किया गया तथा उनके समर्थन में प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा, वह भी बताता है कि यह निर्णय कितने करीने से लिया गया। जब आपके पास ‘भाजपा’ जैसा बहुमत हो और यह निश्चिंतता भी हो कि आप जिसे चाहेंगे उसे राष्ट्रपति बना लेंगे, तब संयम व शालीनता साधना आसान भी होता है, लेकिन ऐसा कहकर पार्टी की राजनीतिक पटुता को कम नहीं किया जा सकता।

कहने वाले कहते हैं कि मुर्मू की जीत देश के आदिवासियों को सशक्त करेगी, स्त्री की हैसियत मजबूत करेगी। क्या ऐसा होता है?

हमने अब तक सारे इंसानों को ही राष्ट्रपति बनाया है तो क्या देश में इंसानों की हैसियत मज़बूत हुई है?

हमने मुसलमान, दलित, औरत को भी राष्ट्रपति बनाया है तो क्या इन सबकी हैसियत मजबूत हुई? यह आत्मछल है जो राजनीति को पचता है, राष्ट्र को नहीं।

द्रौपदी मुर्मू या यशवंत सिन्हा में से कोई भी जीत जाए तो क्या संविधान जीतेगा?

क्या देश को कोई ठीक राष्ट्रपति मिलेगा? यशवंत सिन्हा और द्रौपदी मुर्मू उस धारा के प्रतिनिधि हैं जो दलीय राजनीति व सत्ता की ताकत ही ओढ़ते-बिछाते हैं। यशवंत सिन्हा ने तो अपनी उम्मीदवारी से पहले अपनी पार्टी ‘तृणमूल कांग्रेस’ से इस्तीफा भी दे दिया, ताकि संविधान की मंशा की थोड़ी लाज रह जाए, लेकिन ‘भाजपा’ व मुर्मू ने उसकी जरूरत भी नहीं समझी।

प्रधानमंत्री को महात्मा गांधी देशभक्त मानने को क्यों तैयार नहीं थे?

संविधान की कल्पना यह है कि संसदीय प्रणाली की राजनीतिक व्यवस्था का मुखिया एक ऐसा व्यक्ति हो जो संसद से बंधा न हो, सत्ता के खेल न खेलता हो। प्रधानमंत्री ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो दल व सत्ता के लिए सभी तरह के गर्हित खेल खेलता है और उसी बूते कुर्सी पर बैठा रहता है।

महात्मा गांधी ने इसीलिए ‘हिंद-स्वराज्य‘ में लिखा है कि वे प्रधानमंत्री को देशभक्त मानने को भी तैयार नहीं हैं, क्योंकि उसके किसी भी निर्णय का आधार देशहित नहीं होता। वह तो अपनी सत्ता को देशहित बताकर सारे धतकरम करता है।

राष्ट्रपति कैसा हो? संविधान क्या कहता है?

हमारा संविधान एकदम सीधी-सी बात कहता है कि संसदीय राजनीति में अंपायर वही हो सकता है जो खुद किसी टीम की तरफ से न खेलने लगे। संविधान कहता है कि अंपायर का काम है, खिलाड़ियों को खेलने दे और इस पर कड़ी नजर रखे कि सभी नियम से खेलें। कोई नियम से बाहर गया नहीं कि अंपायर की सीटी बजी। क्या ऐसा तटस्थ व्यक्ति खोजना व उसका मिलना संभव है? बिल्कुल संभव है, लेकिन तभी, जब आप अपने दलीय व सत्तागत स्वार्थ के दायरे के बाहर देखने-खोजने लगें; और आप ऐसा तभी कर सकेंगे जब आप संविधान को अपना मार्गदर्शक मानेंगे।

आज राष्ट्र को कैसे राष्ट्रपति की जरूरत है?

आजादी के बाद से हमने जिन 14 पूर्णकालीन राष्ट्रपतियों का चयन किया है उनमें पहले, दूसरे, दसवें तथा ग्यारहवें राष्ट्रपति ही इस पद के नाप के थे – सर्वश्री राजेंद्र प्रसाद, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, कोचेरिल रामन नारायणन तथा एपीजे अब्दुल कलाम। हमें आज ऐसा राष्ट्रपति चाहिए जिसमें इन चारों का समन्वय हो।

खास ध्यान देने की बात यह है कि ये चारों दलीय राजनीति से दूर व विशिष्ट हैसियत रखने वाले लोग थे।

राजेंद्र प्रसाद आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वालों में एक थे। उस दौर की शायद ही कोई ऐसी हस्ती हो जो आजादी की लड़ाई का सिपाही हो, लेकिन कांग्रेस से जुड़ा न हो। भारतीय गणराज्य के प्रथम अभिभावक की भूमिका में राजेंद्र प्रसाद इसलिए अनोखे हैं कि राष्ट्रपति कैसा हो, क्या करे-क्या न करे, क्या बोले-क्या न बोले, इन सबका निर्धारण उनका ही किया है। जैसे जवाहरलाल आजादी के बाद के प्रारंभिक वर्षों में इस देश के प्रधानमंत्री मात्र नहीं थे, संसदीय लोकतंत्र के मानकों के शिल्पकार थे, कुछ वैसी ही भूमिका राजेंद्र प्रसाद ने भी निभाई।

जवाहरलाल नेहरू की सरकार से वे कई मामलों में असहमत रहे। वह असहमति उन्होंने कभी दबाई-छिपाई भी नहीं। भारतीय राष्ट्रपति की संविधान-सम्मत भूमिका की पहली गंभीर बहस उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में ही खड़ी की थी और उससे काफी हलचल भी पैदा हुई थी। वे अपने प्रधानमंत्री से कहीं अधिक प्रतिष्ठित कानूनविद् थे, लेकिन वे इसके प्रति सदा सचेत भी थे कि वे राजेंद्र प्रसाद की नहीं, भारत के राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका के कील-कांटे बना रहे हैं जिस पर इस नवजात गणतंत्र को अपना ढांचा खड़ा करना है।

भारत के हर राष्ट्रपति को यह उत्तरदायित्व राजेंद्र प्रसाद से विरासत में मिला है।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन उन राष्ट्राध्यक्षों की श्रेणी में आते हैं जिसकी कल्पना दार्शनिक अरस्तू ने की थी। विद्वता में अपने उदाहरण आप राधाकृष्णन कभी मूक या ‘रबरस्टांप’ राष्ट्रपति नहीं रहे। उन्होंने राष्ट्रपति का संवैधानिक दबाव जवाहरलाल पर भी और बाद में उनकी बेटी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी बनाए रखा। 1962 के चीनी हमले के बाद जवाहरलाल की प्रधानमंत्री-पारी पूरी हुई, ऐसा मानने वालों में राधाकृष्णन भी थे और वे ही थे जिन्होंने राष्ट्रपति की विशेष रेलगाड़ी पटना जंक्शन पर रुकवा कर, जयप्रकाश नारायण को बुला भेजा था और उनसे सीधे ही कहा था कि अब देश की बागडोर संभालने में झिझकने का वक्त नहीं है।

केआर नारायणन राजनयिक, अध्येता तथा अर्थशास्त्री थे। वे देश के पहले दलित राष्ट्रपति थे, जो अत्यंत कुशल व पैनी निगाह रखते थे।

कलाम साहब अटलबिहारी वाजपेयी की पसंद थे, लेकिन उन्होंने हर चंद कोशिश की कि वे दल की नहीं, देश की पसंद बनें। उन्होंने राष्ट्रपति पद को और उसकी कार्यशैली को भी लोकतांत्रिक जामा पहनाया। जब वे विज्ञान की दुनिया से राजनीति की दुनिया में लाए गए, तब राजनीति का अपना गणित रहा ही होगा, लेकिन कलाम साहब ने कभी ‘उनका’ या ‘इनका’ खेल नहीं खेला। उन्हें ‘जनता का राष्ट्रपति’ कहा गया तो इसलिए कि वे न आतंकित करते थे, न आतंकित होते थे।

इन चारों के गुणों का समन्वय आज के राष्ट्रपति में इसलिए चाहिए कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र और राष्ट्र के रूप में भारत एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। तब आजादी को एक अर्थपूर्ण स्वरूप देने की चुनौती थी, आज 75 साल पुराने संसदीय लोकतंत्र को पटरी पर बनाए रखने तथा उसके विकास की संभावनाओं को पुख्ता करने की चुनौती है। यह धीरज, कुशलता, विद्वता, संविधान की गहरी जानकारी व उसके प्रति प्रतिबद्धता की मांग करता है।

आज राष्ट्र को ऐसे राष्ट्रपति की जरूरत है जो राष्ट्र व संविधान से आगे व उससे पीछे न देखे, न देखने दे। क्या पक्ष व विपक्ष के मौजूदा उम्मीदवारों में ऐसी संभावना दिखाई देती है?

भाजपा को अपने और विपक्ष को अपने उम्मीदवार में यह सब दिखाई देता हो, लेकिन वे राष्ट्रपति नहीं बना रहे हैं, अपने दल के आदमी को राष्ट्रपति पद पर बिठा रहे हैं, ताकि वह आगे उनके दलीय व सत्ताहित में काम करे। आप ही बताइए, इसमें राष्ट्र कहां है?

कुमार प्रशांत

Web title : How is the President according to the constitution? The opposition has no side at all!