आरएसएस की तिरंगे से नफ़रत और इस के प्रचारक प्रधानमंत्री मोदी का तिरंगे से प्यार का राज़!

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ख़ुद को हिन्दू राष्ट्रवादी बताया था पीएम मोदी ने

मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी ने, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, विश्व की एक नामी समाचार एजेंसी राइटर्स [Reuters] से 12 जुलाई 2013 को एक साक्षात्कार में ख़ुद को हिन्दू राष्ट्रवादी बताया था। उन्होंने यह सच भी साझा किया था कि उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवाद के सबक़ आरएसएस में रहकर सीखे और उनको राजनैतिक नेता के तौर पर गढ़ने में आरएसएस के महानतम दार्शनिक और दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर की सब से बड़ी भूमिका थी।  

आरएसएस ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हर उस चीज से नफ़रत की, जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध संघर्ष का प्रतीक थी। इसे समझने के लिए तिरंगा, राष्ट्रीय-ध्वज, एक सही मामला है।

तिरंगे का खुला विरोध किया हेडगेवार ने

दिसंबर 1929 में कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण-स्वराज का राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित कर दिया और जनता से अपील की कि 26 जनवरी,1930 को तिरंगा फहराकर उसका सम्मान करते हुए स्वतंत्रता दिवस मनायें और ऐसा हर साल करें। तब तक तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज मानने पर आम सहमति हो गयी थी। उस समय तिरंगे के बीच में चरखा होता था। इसकी खुली अवहेलना करते हुए सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार ने आरएसएस की सभी शाखा संचालकों के नाम 21 जनवरी 1930 को एक परिपत्र जारी किया जिस में आदेश दिया गया था कि: “आरएसएस की तमाम शाखायें सब स्वयंसेवकों की संघस्थान पर 26 जनवरी 1930 शाम को सभा करें और हमारे राष्ट्रीय-ध्वज अर्थात भगवे झंडे को सलामी दें।”  

[NH PALKAR (ed.), डॉ हेडगेवार पत्र-रूप व्यक्ति दर्शन (हेडगेवार के पत्रों का संकलन), अर्चना प्रकाशन इंदौर, 1989, प्रष्ठ 18]

गोलवलकर ने भी तिरंगे के प्रति नफ़रत का इज़हार किया

तिरंगे के प्रति इस नफ़रत की परिपाटी का गोलवलकर ने भी वफ़ादारी से परिपालन किया। 14 जुलाई,1946 को गुरु पूर्णिमा के अवसर आरएसएस के नागपुर मुख्यालय पर इकट्ठे लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि भगवा ध्वज संपूर्णता के साथ हमारी महान संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। यह ईश्वर का प्रतिरुप हैः हमें पक्का विश्वास है कि अंत में पूरा देश भगवे ध्वज को नमन करेगा। [श्री गुरुजी समग्र दर्शन, vol. 1, p. 98.]

आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र ‘आर्गेनाइज़र’ ने संविधान सभा की समिति में सभी दलों और सभी समुदायों को मंजूर तिरंगे को राष्ट्रीय-ध्वज के रुप में मान लेने के फ़ैसले की ख़बर पर ज़बर्दस्त ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हुए ‘दि नेशनल फ्लैग’ शीर्षक से 17 जुलाई,1947 के अपने संपादकीय में लिखा-

हम इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि राष्ट्रीय झंडा देश के सभी दलों और समुदायों को स्वीकारिये होना चाहिए। यह शुद्ध बेवक़ूफ़ी है। झंडा राष्ट्र का प्रतीक है और देश में केवल एक राष्ट्र है, हिन्दू राष्ट्र, जिसका लगातार चलने वाला 5000 साल का इतिहास है। हमारा झंडा इसी राष्ट्र और केवल इसी राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। हमारे लिए यह मुमकिन नहीं है कि हम एक ऐसा झंडा चुनें जो कि सभी समुदायों की इच्छाओं और आकाँक्षाओं को संतुष्ट कर सके। यह बिल्कुल ग़ैरज़रूरी, अनुचित है और पूरे मामले को और उलझा देता है।…हम अपने झंडे को उस तरह नहीं चुन सकते हैं, जैसे कि हम एक दर्ज़ी को एक क़मीज़ या कोट तैयार करने लिए कहते हैं…

अगर हिन्दुस्थान के हिन्दुओं की एक साझी सभ्यता, संस्कृति, रीति-रिवाज और शिष्टाचार, एक साझी भाषा और साझी परम्पराएं थीं तो उनका एक झंडा भी था। एक ऐसे झंडा जो सब से पुराना और महान था बिलकुल उसी तरह जैसे कि वे और उनकी सभ्यता है। हमारे राष्ट्रीय झंडे के बारे में किसी भी फ़ैसले से पहले हमें इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का ध्यान रखना चाहिए, ना की उस ग़ैर ज़िम्मेदारी से जैसे हाल ही में किया जा रहा है।

यह सच है कि विदेशी आक्रमणों के कारण जो भयावहता उन के साथ आई, अस्थायी विफलताओं ने हिन्दुओं के राष्ट्रीय ध्वज को अन्धकार में धकेल दिया। लेकिन हम सब इस बात को जानते थे कि एक दिन यह ज़रूर महानता और प्राचीन महिमा को छुएगा और लहरायेगा। इस ध्वज के अद्वितीय रंग में ऐसा कुछ है जो देश के प्राण औऱ आत्मा के लिए अत्यंत प्रिय है और यह रंग भोर का अद्भुत रंग है, जो पूर्व की दिशा में धीरे किंतु राजकीय सूर्योदय के वक्त प्रकट होता है।

इसी तरह हमारे पूर्वजों ने हमें विश्व को जीवनी शक्ति देने वाला यह ध्वज सौंपा है। वे सिर्फ अज्ञानी और दुष्ट हैं जो इस ध्वज के अद्भुत आकर्षण, उसकी महानता और भव्यता को देख नहीं सकते। यह आकर्षण, महानता और भव्यता उतना ही गौरवशाली है जैसा कि स्वयं सूर्य है। यह ध्वज हिंदुस्तान का एकमात्र सच्चा ध्वज बन सकता है। राष्ट्र को यही और एकमात्र यही स्वीकार होगा।

भारत की स्वतंत्रता से मात्र एक दिन पहले आरएसएस के अंग्रेज़ी मुखपत्र आर्गेनाइज़र (14 अगस्त,1947) में तिरंगे को शर्मनाक हद तक अपमानित करते हुए लिखा:

“वे लोग जो किस्मत के दांव से सत्ता तक पहुंचे हैं वे भले ही हमारे हाथों में तिरंगे को थमा दें, लेकिन हिंदुओं द्वारा इसे कभी सम्मानित किया जा सकेगा, अपनाया जा सकेगा। तीन का आंकड़ा अपने आप में अशुभ है और एक ऐसा झण्डा, जिसमें तीन रंग हों बेहद खराब मनोवैज्ञानिक असर डालेगा और देश के लिए नुक़सानदेय होगा

स्वतंत्रता के बाद जब तिरंगा झंडा राष्ट्रीय ध्वज बन गया, तब भी आरएसएस ने इसको स्वीकारने से मना कर दिया। गोलवालकर ने राष्ट्रीय झंडे के मुद्दे पर अपने लेख ‘पतन ही पतन’ [‘विचार नवनीत’ 1966 में आरएसएस द्वारा प्रकाशित प्रकाशित गोलवलकर के लेखों/भाषणों का संग्रह, पृष्ठ 237] में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा-

उदाहरण स्वरूप, हमारे नेताओं ने हमारे राष्ट्र के लिए एक नया ध्वज निर्धारित किया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह पतन की ओर बहने तथा नक़लचीपन का एक स्पष्ट प्रमाण है

श्री गुरूजी आगे चलकर अपने लेख में उस सोच की खिल्ली उड़ाते हैं जिसके अंतर्गत तिरंगे झंडे को भारत की एकता का प्रतीक मानकर राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकारा गया। तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में पसन्द किए जाने पर उनका कहना है-

‘‘कौन कह सकता है कि यह एक शुद्ध तथा स्वस्थ् राष्ट्रीय दृष्टिकोण है? यह तो केवल एक राजनीति की जोड़तोड़ थी, केवल राजनीतिक कामचलाऊ तत्कालिक उपाय था। यह किसी राष्ट्रीय दृष्टिकोण अथवा राष्ट्रीय इतिहास तथा परम्परा पर आधारित किसी सत्य से प्रेरित नहीं था। वही ध्वज आज कुछ छोटे से परिवर्तनों के साथ राज्य ध्वज के रूप में अपना लिया गया है।

हमारा एक प्राचीन तथा महान राष्ट्र है, जिसका गौरवशाली इतिहास है। तब, क्या हमारा अपना कोई ध्वज नहीं था? क्या सहस्त्रों वर्षों में हमारा कोई राष्ट्रीय चिह्न नहीं था? निःसन्देह, वह था। तब हमारे दिमागों में यह शून्यतापूर्ण रिक्तता क्यों?’’

आज़ादी के बाद भी यह सब लिखकर आरएसएस ने उन शहीदों का घोर अपमान किया जो वतन के लिये शहीद हो गए और जिन की लाशें तिरंगे में लपेट कर सम्मानित की गयीं।

तिरंगे के प्रति सावरकर की नफ़रत

आरएसएस की तरह सावरकर भी ब्रिटिशराज के ख़िलाफ़ भारतीय जनता के एक-जुट संघर्ष के सभी प्रतीकों से नफ़रत करते थे।उन्होंने तिरंगे को राष्ट्र-ध्वज या स्वतंत्रता संघर्ष का झण्डा मान ने से मना कर दिया था।हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं के नाम 22 सितंबर 1941 को जारी बयान में उन्होंने घोषणा की –

“जहाँ तक झंडे का सवाल है, हिंदू लोग समग्र हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले उस झंडे के सिवा और किसी झंडे को नहीं जानते, जो कुंडलिनी कृपाणांकित महासभा का झंडा है, जिस पर ओम् और स्वास्तिक अंकित हैं, जो हिंदू जाति और नीति के प्राचीनतम प्रतीक हैं और हिंदुस्थान में युगों-युगों से सम्मानित हैं। वास्तव में यह हरिद्वार से लेकर रामेश्वरम तक लाखों लाख हिंदुओं के लिएमान्य है और वे उसे फहराते हैं। यह हिंदूमहासभा की हर शाखा पर हज़ारों केन्द्रों पर फहराते हैं। इसलिए जिस स्थान या आयोजन में इस हिंदू झंडे का सम्मान नहीं किया जाता, उसका हिंदू-संगठनवादी हर क़ीमत पर बहिष्कार करें…चरख़े वाला झंडा खादी भंडार का भले प्रतिनिधित्व कर सकता है, लेकिन चरख़ा हिंदुओं की गौरव-पूर्ण भावना और प्राचीन राष्ट्र का कभी प्रतीक नहीं बन सकता। फिर भी जो लोग चाहें, वे इस के साथ खड़े हो सकते हैं, लेकिन हम हिंदू-संगठनवादी अपने प्राचीन हिंदू झंडे के अलावा किसी और झंडे के नीचेन खड़े हो सकते हैं और न उस की रक्षा कर सकते हैं।”

[Bhide, A. S. (ed.), Vinayak Damodar Savarkar’s Whirlwind Propaganda: Extracts from the President’s Diary of his Propagandist Tours Interviews from December 1937 to October 1941, na, Bombay pp. 469, 473.]

फ़िलहाल आरएसएस में सब से शक्तिशाली व्यक्ति, प्रधानमंत्री मोदी ने ज़बरदस्त पलटी खायी है। तिरंगे से जानी दुश्मनी रखने वाली संस्था आरएसएस से जुड़े होने के बावजूद वे तिरंगे पर प्यार उड़ेल रहे हैं। 13 से 15 अगस्त के बीच ‘हर घर तिरंगा’ लहराया जाएगा और उन्होंने अपने सोशल मीडिया ‘हैंडल्स’ पर भी तिरंगा लगा दिया है। अगर यह सब ईमानदारी से किया जा रहा है तो उन्होंने ख़ुद और आरएसएस के पूरे नेतृत्व को पूरे देश से तिरंगे के लगातार किए गए अपमान और भर्त्सना के लिये माफ़ी मंगनी चाहिये।

अगर ऐसा नहीं किया जाता तो आरएसएस से जुड़े लोगों का, प्रधानमंत्री समेत तिरंगे से प्यार एक धोखा और बदचलनी ही माना जाएगा। इस का साफ़ मतलब होगा कि आरएसएस-भाजपा शासक दमनकारी और लूट पर टिके राज पर पर्दा डालने के लिये तिरंगे का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस के लिये इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा!

शम्सुल इस्लाम

14-08-2022   

syama prasad mukherjee श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने में अंग्रेजों की मदद की

The secret of RSS’s hatred of the tricolor and its campaigner Prime Minister Modi’s love for the tricolor!

भारत छोड़ो आंदोलन 1942 के ख़िलाफ़ हिंदुत्व टोली-अंग्रेज़ शासक- मुस्लिम लीग हमजोली थे : जानिये हिन्दुत्व अभिलेखागार की ज़ुबानी

opinion debate

HINDUTVA GANG COLLUDED WITH BRITISH RULERS & JINNAH AGAINST QUIT INDIA MOVEMENT: A PEEP INTO HINDUTVA ARCHIVES

इस 9 अगस्त 2022 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक अहम मील के पत्थर, ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को 80 साल पूरे हो जायेंगे। 7 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने बम्बई में अपनी बैठक में एक क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किया जिसमें अंग्रेज़ शासकों से तुरंत भारत छोड़ने की मांग की गयी थी। कांग्रेस का यह मानना था कि अंग्रेज़ सरकार को भारत की जनता को विश्वास में लिए बिना किसी भी जंग में भारत को झोंकने का नैतिक और क़ानूनी  अधिकार नहीं है। अंग्रेज़ों से भारत तुरंत छोड़ने का यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा एक ऐसे नाज़ुक समय में लाया गया था जब दूसरे विश्वयुद्ध के चलते जापानी सेनाएं भारत के पूर्वी तट तक पहुंच चुकी थीं और कांग्रेस ने अंग्रेज़ शासकों द्वारा सुझाई ‘क्रिप्स योजना’ को ख़ारिज कर दिया था।

अंग्रेज़ों भारत छोड़ो प्रस्ताव के साथ-साथ कांग्रेस ने गांधी जी को इस आंदोलन का सर्वेसर्वा नियुक्त किया और देश के आम लोगों से आह्वान किया कि वे हिंदू-मुसलमान का भेद त्याग कर सिर्फ हिदुस्तानी के तौर पर अंग्रेज़ी  साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए एक हो जाएं। अंग्रेज़ शासन से लोहा लेने के लिए स्वयं गांधीजी ने ‘करो या मरो’ ब्रह्म वाक्य सुझाया और सरकार एवं सत्ता से पूर्ण असहयोग करने का आह्वान किया।

अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलनके दौरान देशभक्त हिन्दुस्तानियों की क़ुर्बानियां

भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के साथ ही पूरे देश में क्रांति की एक लहर दौड़ गयी। अगले कुछ महीनों में देश के लगभग हर भाग में अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध आम लोगों ने जिस तरह लोहा लिया उससे 1857 के भारतीय जनता के पहले मुक्ति संग्राम की यादें ताजा हो गईं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने इस सच्चाई को एक बार फिर रेखांकित किया कि भारत की आम जनता किसी भी कुर्बानी से पीछे नहीं हटती है। अंग्रेज़ शासकों ने दमन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 9 अगस्त की सुबह से ही पूरा देश एक फौजी छावनी में बदल दिया गया। गांधीजी समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं को तो गिरफ्तार किया ही गया दूरदराज के इलाकों में भी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भयानक यातनाएं दी गईं।

सरकारी दमन और हिंसा का ऐसा तांडव देश के लोगों ने झेला जिसके उदाहरण कम ही मिलते हैं। स्वयं सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस और सेना द्वारा सात सौ से भी ज़्यादा जगह गोलाबारी की गई, जिसमें ग्यारह सौ से भी अधिक लोग शहीद हो गए। पुलिस और सेना ने आतंक मचाने के लिए बलात्कार और कोड़े लगाने का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया। भारत में किसी भी सरकार द्वारा इन कथकंडों का इस तरह का संयोजित प्रयोग 1857 के बाद शायद पहली बार ही किया गया था।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को ‘अगस्त क्रांति’ भी कहा जाता है। अंग्रेज़ सरकार के भयानक बर्बर और अमानवीय दमन के बावजूद देश के आम हिंदू मुसलमानों और अन्य धर्म के लोगों ने हौसला नहीं खोया और सरकार को मुंहतोड़ जवाब दिया।

यह आंदोलन ‘अगस्त क्रांति’ क्यों कहलाता है इसका अंदाजा उन सरकारी आंकड़ों को जानकर लगाया जा सकता है जो जनता की इस आंदोलन में कार्यवाहियों का ब्योरा देते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 208 पुलिस थानों, 1275 सरकारी दफ्तरों, 382 रेलवे स्टेशनों और 945 डाकघरों को जनता द्वारा नष्ट कर दिया गया। जनता द्वारा हिंसा बेकाबू होने के पीछे मुख्य कारण यह था कि पूरे देश में कांग्रेसी नेतृत्व को जेलों में डाल दिया गया था और कांग्रेस संगठन को हर स्तर पर गैर क़ानूनी  घोषित कर दिया गया था। कांग्रेसी नेतृत्व के अभाव में अराजकता का होना बहुत गैर स्वाभाविक नहीं था। यह सच है कि नेतृत्व का एक बहुत छोटा हिस्सा गुप्त रूप से काम कर रहा था परंतु आमतौर पर इस आंदोलन का स्वरूप स्वतः स्फूर्त बना रहा।

यह जानकर किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि दमनकारी अंग्रेज़ सरकार का इस आंदोलन के दरम्यान जिन तत्वों और संगठनों ने प्यादों के तौर पर काम किया वे हिंदू और इस्लामी राष्ट्र के झंडे उठाए हुए थे।

ये सच है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी भारत छोड़ो आंदोलन से अलग रहने का निर्णय लिया था। इसके बारे में सबको जानकारी है। लेकिन आज के देशभक्तों के नेताओं ने किस तरह से न केवल इस आंदोलन से अलग रहने का फ़ैसला किया था बल्कि इसको दबाने में गोरी सरकार की सीधी सहायता की थी जिस बारे में बहुत कम जानकारी है।

मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्नाह ने कांग्रेसी घोषणा की प्रतिक्रिया में अंग्रेज़ सरकार को आश्वासन देते हुए कहा,

कांग्रेस की असहयोग की धमकी दरअसल श्री गांधी और उनकी हिंदू कांग्रेस सरकार अंग्रेज़ सरकार को ब्लैकमेल करने की है। सरकार को इन गीदड़ भभकियों में नहीं आना चाहिए।

मुस्लिम लीग और उनके नेता अंग्रेज़ी  सरकार के बर्बर दमन पर न केवल पूर्णरूप से ख़मोश रहे, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज़ सरकार का सहयोग करते रहे। मुस्लिम लीग इससे कुछ भिन्न करे इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी, क्योंकि वह सरकार और कांग्रेस के बीच इस भिड़ंत के चलते अपना उल्लू सीध करना चाहती थी। उसे उम्मीद थी कि उसकी सेवाओं के चलते अंग्रेज़ शासक उसे पाकिस्तान का तोहफ़ा ज़रूर दिला देंगे।

भारत छोड़ो आंदोलन के ख़िलाफ़ आरएसएस के चहेते सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा ने खुले-आम दमनकारी अंग्रेज़ शासकों की मदद की घोषणा की 

लेकिन सबसे शर्मनाक भूमिका हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रही जो भारत माता और हिंदू राष्ट्रवाद का बखान करते नहीं थकते थे। भारत छोड़ो आंदोलन पर अंग्रेज़ी शासकों के दमन का क़हर बरपा था और देशभक्त लोग सरकारी संस्थाओं को छोड़कर बाहर आ रहे थे; इनमें बड़ी संख्या उन नौजवान छात्र-छात्राओं की थी जो कांग्रेस के आह्वान पर सरकारी शिक्षा संस्थानों को त्याग कर यानी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर बाहर आ गये थे। लेकिन यह हिंदू महासभा ही थी जिसने अंग्रेज़ सरकार के साथ खुले सहयोग की घोषणा की। हिंदू महासभा के सर्वेसर्वा वीर सावरकर ने 1942 में कानपुर में अपनी इस नीति का

ख़ुलासा करते हुए कहा,

सरकारी प्रतिबंध के तहत जैसे ही कांग्रेस एक खुले संगठन के तौर पर राजनीतिक मैदान से हटा दी गयी है तो अब राष्ट्रीय कार्यवाहियों के संचालन के लिए केवल हिंदू महासभा ही मैदान में रह गयी हैहिंदू महासभा के मतानुसार व्यावहारिक राजनीति का मुख्य सिद्धांत अंग्रेज़ सरकार के साथ संवेदनपूर्ण सहयोग की नीति है। जिसके अंतर्गत बिना किसी शर्त के अंग्रेज़ों   के साथ सहयोग जिसमें हथियार बंद प्रतिरोध भी शामिल है।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग ने मिलकर सरकारें चलाईं

कांग्रेस का भारत छोड़ो आंदोलन दरअसल सरकार और मुस्लिम लीग के बीच देश के बंटवारे के लिए चल रही बातचीत को भी चेतावनी देना था। इस उद्देश्य से कांग्रेस ने सरकार और मुस्लिम लीग के साथ किसी भी तरह के सहयोग का बहिष्कार किया हुआ था। लेकिन इसी समय हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ सरकारें चलाने का निर्णय लिया। वीरसावरकर ने जो अंग्रेज़ सरकार की

ख़िदमत में 6-7 माफ़ीनामे लिखने के बाद दी गयी सज़ा का केवल एक तिहाई हिस्सा भोगने के बाद हिन्दू महासभा के सर्वोच्च नेता थे, इस शर्मनाक रिश्ते के बारे में सफाई देते हुए 1942 में कहा,

व्यावहारिक राजनीति में भी हिंदू महासभा जानती है कि बुद्धिसम्मत समझौतों के ज़रिए आगे बढ़ना चाहिए। यहां सिंध हिंदू महासभा ने निमंत्रण के बाद मुस्लिम लीग के साथ मिली जुली सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी ली। बंगाल का उदाहरण भी सबको पता है। उद्दंड लीगी जिन्हें कांग्रेस अपनी तमाम आत्मसमर्पणशीलता के बावजूद ख़ुश नहीं रख सकी, हिंदू महासभा के साथ संपर्क में आने के बाद काफ़ी  तर्कसंगत समझौतों और सामाजिक व्यवहार के लिए तैयार हो गये। और वहां की मिलीजुली सरकार मिस्टर फ़ज़लुल हक़ को प्रधानमंत्रित्व [अंग्रेज़ शासन में मुख्यमंत्री को प्रधान-मंत्री कहा जाता था] और महासभा के क़ाबिल मान्य नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी [जो उप-प्रधान मंत्री थे] के नेतृत्व में दोनों समुदाय के फ़ायदे के लिए एक साल तक सफलतापूर्वक चली।

यहाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि बंगाल और सिंध के अलावा NWFP में भी हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की गांठ-बंधन सरकार 1942 में सत्तासीन हुई।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली सरकार में गृह मंत्री और उपमुख्य मंत्री रहते हुएअंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलनको दबाने के लिए गोरे आक़ाओं को उपाए सुझाए

हिन्दू महासभा के नेता नंबर दो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो हद ही करदी।  आरएसएस के प्यारे इस महान हिन्दू राष्ट्रवादी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के मंत्री मंडल में गृह मंत्री और उप-मुख्यमंत्री रहते हुए अनेक पत्रों में बंगाल के ज़ालिम अँगरेज़ गवर्नर को दमन के वे तरीक़े सुझाये जिन से बंगाल में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को पूरे तौर पर दबाया जा सकता था। मुखर्जी ने अँगरेज़ शासकों को भरोसा दिलाया कि  कांग्रेस अँगरेज़ शासन को देश के लिया अभशाप मानती है लेकिन उनकी मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की मिलीजुली सरकार इसे देश के लिए वरदान मानती है।

अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रवैया 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रति जानना हो तो इसके सब से क़द्दावर दार्शनिक एम.एस. गोलवलकर के इस शर्मनाक वक्तव्य को पढ़ना काफ़ी होगा –

“सन् 1942 में भी अनेकों के मन में तीव्र आंदोलन था। उस समय भी संघ का नित्य कार्य चलता रहा। प्रत्यक्ष रूप से संघ ने कुछ करने का संकल्प किया। परन्तु संघ के स्वयं सेवकों के मन में उथलपुथल चल ही रही थी। संघ यह अकर्मण्य लोगों की संस्था है, इनकी बातों में कुछ अर्थ नहीं ऐसा केवल बाहर के लोगों ने ही नहीं, कई अपने स्वयंसेवकों ने भी कहा। वे बड़े रुष्ट भी हुए।”

इस तरह स्वयं गोलवलकर, जिन्हें गुरुजी भी कहा जाता है, से हमें यह तो पता चल जाता है कि संघ ने आंदोलन के पक्ष में परोक्ष रूप से किसी भी तरह की हिस्सेदारी नहीं की। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी भी प्रकाशन या दस्तावेज़ या स्वयं गुरुजी के किसी भाषण, लेख या कर्म से आज तक यह पता नहीं लग पाया है कि संघ ने अप्रत्यक्ष रूप से ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में किस तरह की हिस्सेदारी की थी।

गुरुजी का यह कहना कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रोज़मर्रा का काम ज्यों का त्यों चलता रहा, बहुत अर्थपूर्ण है। यह रोज़मर्रा का काम क्या था इसे समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं है। यह काम था मुस्लिम लीग के कंधे से कंधा मिलाकर हिंदू और मुसलमान के बीच खाई को गहराते जाना।

अंग्रेज़ी राज के खिलाफ संघर्ष में जो भारतीय शहीद हुए उनके बारे में गुरुजी क्या राय रखते थे वह इस वक्तव्य से बहुत स्पष्ट हो जायेगा-

हमने बलिदान को महानता का सर्वोच्च बिंदु, जिसकी मनुष्य आकांक्षा करे नहीं माना है क्योंकि अंततः वह अपना उद्देश्य प्राप्त करने में असफल हुए और असफलता का अर्थ है कि उनमें कोई गंभीर त्रुटि थी।

शायद यही कारण है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक भी कार्यकर्ता अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष करते हुए शहीद नहीं हुआ। शहीद होने की बात तो दूर रही, आरएसएस के उस समय के नेताओं जैसे की गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक। लाल कृष्ण अडवाणी, के आर मलकानी या अन्य किसी आरएसएस सदस्य ने किसी भी तरह इस  महान मुक्ति आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया कियोंकी आरएसएस सावरकर का पिछलग्गू बानी थी। 

भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल गुज़रने के बाद भी कई महत्वपूर्ण सच्चाईयों से पर्दा उठना बाक़ी है। दमनकारी अंग्रेज़ शासक और उनके मुस्लिम लीगी प्यादों के बारे में तो सच्चाईयां जगज़ाहिर है लेकिन अगस्त क्रांति के वे गुनहगार जो अंग्रेज़ी  सरकार द्वारा चलाए गए दमन चक्र में प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे अभी भी कठघरे में खड़े नहीं किए जा सके हैं। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि वे भारत पर राज कर रहे हैं। हिंदू राष्ट्रवादियों की इस भूमिका को जानना इसलिए भी ज़रूरी है ताकि आज उनके द्वारा एक प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष भारत के साथ जो खिलवाड़ किया जा रहा है उसके आने वाले गंभीर परिणामों को समझा जा सके।

शम्सुल इस्लाम

भारत छोड़ो आंदोलन कुचलने में अंग्रेज़ों का साथ देने के लिए सावरकर को भारत रत्न ! | #hastakshep

QIM also known as ‘August Kranti’ (August Revolution) was a nationwide Civil Disobedience Movement

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का पक्षपातपूर्ण भारतीय उच्च न्यायपालिका का बचाव-कुछ ज़रूरी सवाल

shamsul islam

Faizan Mustafa’s defense of the biased Indian higher judiciary – some important questions

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा जो नेशनल अकादमी ऑफ़ लीगल स्टडीज़ एंड रिसर्च (संक्षेप में नालसर, जिसकी स्थापना तेलंगाना की विधान सभा ने की है) में प्रोफ़ेसर ऑफ़ लॉ और वाइस-चांसलर हैं. अपने एक ताज़ा आलेख (‘मुस्लिम एंड ज्यूडीशियरी : वी डोंट हेव मुस्लिम ओर नॉन-मुस्लिम जजेज़ इन इंडिया,’, इंडियन एक्सप्रेस, जुलाई, 8, 2022) में बताते हैं कि 1997 में उन्होंने मुसलमान जजों की भूमिका पर केन्द्रित एक शोध परियोजना में हिस्सा लेने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि यह विषय भारतीय न्याय व्यवस्था में निहित निष्पक्षता के तत्व से मेल नहीं खाता था. लेकिन यह आलेख इस जैसे विषय पर ही केन्द्रित है कि आज सर्वोच्च न्यायालय मुसलमानों के मामलों को कैसे ले रहा है. इस लेख की मंशा भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पक्ष का बचाव करना है जो निश्चय ही भारत और विदेशों में भी भारतीय न्याय-व्यवस्था को लेकर बन रही इस धारणा के जवाब में लिखा गया है, कि भारतीय न्याय-व्यवस्था, ख़ासकर इसके उच्च स्तरों पर बहुलतावादी दबाव हावी हो गए हैं और वह आरएसएस-बीजेपी सरकार के हाथों में खेल रही है, जिनका एकमात्र वैचारिक आधार हिंदुत्व है.  

दावा : मुसलमान हितों को लेकर जज बहुत संवेदनशील रहते हैं

फ़ैज़ान का कहना है कि, “माननीय जज मुसलमान हितों को लेकर न सिर्फ़ निष्पक्ष बल्कि संवेदनशील भी रहे हैं.” इस दावे में एक बड़ी समस्या है.

मेरा सवाल यह है कि जिन मामलों को `मुसलमान हित’ कहा जा रहा है, क्या वे भारतीय हित नहीं हैं? रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद केस, आतंकवादी क़ानूनों के तहत सैकड़ों युवाओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की गिरफ़्तारियां, सीएए को लेकर विरोध-प्रदर्शन और उसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं का दमन, घरों पर बुलडोज़र चलाना और धारा 370 हटाने का विरोध—क्या ये सब सिर्फ़ मुसलमान हितों से जुड़े मामले हैं? इन मसलों को बार-बार मुसलमानों से जोड़ा गया है लेकिन वास्तव में ये सभी मामले लोकतंत्र के प्रति भारतीय राजनीति की संवैधानिक प्रतिबद्धता, सामाजिक-राजनीतिक-धार्मिक बराबरी, धर्म-निरपेक्षता, हमारे संघीय बोध, क़ानून के शासन और हमारी न्याय-प्रणाली की स्वतंत्रता की परीक्षा के अत्यंत निर्णायक मुद्दे थे और हैं. 

वास्तविकता : अंतर्निहित विद्वेष

सर्वोच्च न्यायालय की पैरवी करते हुए फ़ैज़ान शुरू करते हैं जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ से जिन्हें वे एक ‘विद्वान् जज’ कहते हैं.

फ़ैज़ान का कहना है : “जून 20 (2022) को लन्दन के किंग्स कॉलेज में जस्टिस चंद्रचूड़ से एक प्रश्न न्यायालय के मुसलमानों के प्रति रुख़ के बारे में पूछा गया. सवाल से बिलकुल भी परेशान न होते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने विनम्रतापूर्वक कहा कि न्याय देते हुए हमारे जज वादी की धार्मिक पहचान को दिमाग़ में नहीं रखते.”

सर्वोच्च न्यायालय के पक्षपातरहित चरित्र को रेखंकित करने के लिए वे रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2019 के फ़ैसले का हवाला भी देते हैं जब जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ भी फ़ैसला देने वाली बेंच में शामिल थे.

फ़ैज़ान के मुताबिक़, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में  

“1949 में मूर्तियों की स्थापना और 1992 में मस्जिद के गिराए जाने को ‘बड़ी ग़लतियाँ’ ठहराया [और कहा] कि बाबरी मस्जिद का निर्माण राम मंदिर को गिराकर नहीं किया गया था और बताया कि भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार ऐसे किसी विध्वंस का कोई प्रमाण नहीं मिला. उसने यह भी कहा था कि पूजा स्थल विधेयक, 1991 संविधान के मूलभूत मूल्यों की सुरक्षा करता है.”

लेकिन जाने किन कारणों के चलते जिनकी जानकारी शायद सिर्फ़ फ़ैज़ान साहब को ही है, उन्होंने यह नहीं बताया कि इन सब तथ्यों और सबूतों के बावजूद, जिनकी पुष्टि खुद माननीय उपरोक्त निष्पक्ष जज भी कर रहे हैं, भारत के निष्पक्ष और सबसे बड़े न्यायालय ने यह फ़ैसला कैसे दिया कि “हिन्दुओं की आस्था और उनके इस विश्वास के चलते…कि जहाँ बाबरी मस्जिद बनी है वह भगवान् राम का पूजा-स्थल है” वहाँ एक राम मंदिर का निर्माण किया जाना चाहिए. यहाँ यह उल्लेख करना भी ज़रूरी है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद कोई हिन्दू-मुसलमान मामला नहीं था जैसा कि उसे हिन्दुत्ववादी संगठनों ने बना दिया, और सर्वोच्च न्यायालय भी जिस कथा को सच मान बैठा.

बाबरी मस्जिद का ध्वंस 6 दिसम्बर, 1992 को उस उग्र हिन्दुत्ववादी भीड़ ने किया था जिसे आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने वहाँ जुटाया था. यह हिन्दुओं और मुसलमानों का नहीं हिन्दुत्ववादी संगठनों और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारतीय राजनीति के बीच का मामला था. मस्जिद का ध्वंस सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अनदेखी करते हुए और आरएसएस/भाजपा द्वारा भारतीय संसद और तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को दिए गए इस आश्वासन के बावजूद किया गया कि ऐसा कुछ नहीं होने दिया जाएगा.

प्रधानमंत्री राव ने 15 अगस्त 1993 को लाल क़िले की प्राचीर से बोलते हुए देश और संसद को यह भरोसा दिलाया था कि जो हुआ है उसको पूरी तरह ठीक कर दिया जाएगा, तोड़ी गयी मस्जिद को उसी स्थान पर वापस बनाया जाएगा.

और जैसे यही काफ़ी न हो, सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर बनाने कि इजाज़त उसी संगठन (विश्व हिन्दू परिषद्) को दे दी जो ख़ुद ही मान चुका था कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस में मुख्य भूमिका उसी की थी. इस तरह कुल मिलाकर हुआ यह कि हिंदुत्व के ठेकेदार जो 6 दिसम्बर, 92 को नहीं कर पाए थे उसकी राह सर्वोच्च न्यायालय ने हमवार कर दी.

फ़ैज़ान यह नहीं बताते कि जस्टिस चंद्रचूड़ बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि मामले में उस सर्वसम्मत फ़ैसले को अनदेखा कैसे कर गये जबकि वे स्वयं भी बेंच में शामिल थे. जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष बताते हैं कि 1991 के फ़ैसले से यह उम्मीद की गयी थी कि इससे हिन्दुत्ववादियों द्वारा अनेकों मस्जिदों का ध्वंस करने की परियोजना पर रोक लगेगी. इसके विपरीत,

“ज्ञानवापी पर याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि 1991 का अधिनियम ‘किसी स्थल के धार्मिक चरित्र-स्थापन पर’ रोक नहीं लगाता. (यानी)…अब जो भी चाहे अदालत में जाकर किसी भी मस्जिद, मंदिर, गुरूद्वारे, चर्च या मठ की प्रामाणिकता को प्रश्नांकित कर सकता है और उसकी पहचान को बदलने का अनुरोध कर सकता है….और इस तरह माननीय सर्वोच्च नयायालय ने देश के हर धार्मिक स्थल को संदेह और विवाद के दायरे में ला दिया. क्या यह कहना सही नहीं होगा कि सर्वोच्च न्यायालय की विचार-प्रक्रिया, ग़लती से ही सही, बहुलतावादी विचार-प्रकिया से प्रभावित हुई है?”

तीस्ता सीतलवाड़ और श्रीकुमार की गिरफ़्तारियाँ

फ़ैज़ान सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस सूर्य कान्त और जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की तारीफ़ करते हैं कि उन्होंने “पैग़म्बर के ख़िलाफ़ बोलने के लिए भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के विरुद्ध कड़ी टिप्पणियां कीं. जस्टिस शर्मा ने उन्हें उदयपुर के हत्याकांड के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.”

इसके लिए माननीय जज बेशक धन्यवाद के पात्र हैं, लेकिन मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्त्ता तीस्ता सीतलवाड़ और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी श्रीकुमार के साथ जस्टिस ए.एम्. खानविलकर, जस्टिस दिनेश महेश्वरी और जस्टिस सी.टी. रविकुमार की बेंच ने क्या किया, इस पर विचार करना वे भूल जाते हैं.

इस विषय पर जस्टिस मदन बी. लोकुर जो सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ट जज रह चुके हैं ने, (जो संयोग से उसी विधि विश्वविद्यालय की अकादमिक और जेनरल कौंसिल के सदस्य भी हैं जिसके प्रमुख फ़ैज़ान हैं) क्या लिखा, कम से कम वह तो उन्हें पढ़ना ही चाहिए. उन्होंने लिखा कि तीस्ता की गुजरात पुलिस के ज़रिये गिरफ़्तारी सर्वोच्च न्यायालय ने जो उनकी निंदा की उस आधार पर की गई.

“यह त्रासद है कि कौन गिरफ़्तार होगा और क्यों, यह तय करने का दायित्व सर्वोच्च न्यायालय ने अकेले अपने ही ऊपर ले लिया. जैसा कि हम जानते हैं, अदालत की अवमानना का मामला न हो तो यह सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में नहीं आता. और अदालत की अवमानना के मामले में भी फ़ैसले और गिरफ़्तारी से पहले अवमानना करने वाले को सर्वोच्च न्यायालय सुनता है.”

असहमतों के लिए कोई राहत नहीं

दुखद है कि फ़ैज़ान जो एक विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर है (जिस विवि के चांसलर तेलंगाना उच्च न्यायालय के चीफ़ जस्टिस हैं) और जिन्हें क़ानूनी और न्यायिक मामलों के माहिर के रूप में जाना जाता है, वे भी इतनी तथ्यहीन बातें कर सकते हैं! वे स्वीकार करते हैं कि “कई (यानी अनगिनत) मुसलमान युवाओं को आतंकी अभियोगों में एक के बाद एक सरकारों ने गिरफ़्तार किया” लेकिन फिर यह झूठ भी बोल देते हैं कि “ऐसे ज़्यादातर मामलों में उन्हें साफ़ बरी कर दिया गया जिससे पता चलता है कि साधारण मुसलमान वादियों को भी हमारे जजों ने इन्साफ़ दिया है.” एक प्रोफ़ेसर होने के नाते फ़ैज़ान फ़ैज़ान को जानना चाहिए कि अध्यापक को कभी भी तथ्यों के साथ तोड़-मरोड़ नहीं करनी चाहिए. गिरफ़्तार किए जाने वाले अनेक लोग सिर्फ़ मुसलमान नहीं हैं, असंख्य हिन्दू, ईसाई, सिख और दलित भी ऐसे हैं जो आतंकवाद संबंधी कानूनों के तहत बरसों से जेलों में बिना किसी न्यायिक हस्तक्षेप के पड़े हुए हैं.

भारतीय न्याय प्रणाली के विशेषज्ञ की हैसियत से फ़ैज़ान को मानवाधिकार कार्यकर्ता जेसुइट स्टेन स्वामी की वह रिपोर्ट पढ़नी चाहिए, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यक और दलित पृष्ठभूमि से आए उन क़ैदियों के हालात पर रोशनी डाली है जो जेलों में हैं.

क्या फ़ैज़ान साहब को याद दिलाना होगा कि स्टेन स्वामी आतंकवाद संबंधी क़ानूनों के तहत गिरफ़्तार होनेवाले सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति (83 वर्ष) थे जिन्हें 8 अक्टूबर 2020 को गिरफ़्तार किया गया था और जिन्हें मई 28, 2021 को तभी अंतरिम ज़मानत मिल पाई जब बिना इलाज के उनका जीवन असम्भव दिखने लगा. जुलाई 5, 2021 को उनका निधन हो गया.

आपराधिक मामलों में दो तरह के इंसाफ़

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा यह स्वीकार नहीं करते कि भारतीय उच्च न्याय-प्रणाली दो तरह से न्याय करती है जिससे सिर्फ़ मुसलामान ही नहीं अन्य अल्पसंख्यक, दलित और स्त्रियों भी प्रभावित होते हैं. जब भी देश में अल्पसंख्यकों और दलितों पर हिंसा की कोई घटना होती है तो ऐसा कभी-कभार ही होता है कि अपराधियों को दंड मिले, अक्सर उनकी तलाश ही चलती रहती है जो कभी खत्म नहीं होती.

इस सचाई का साक्षात्कार आप कई मामलों में कर सकते हैं जिनमें नेल्ली जनसंहार (1983), सिख जनसंहार (1984), हाशिमपुरा में मुसलमान युवाओं की कस्टडी में हत्या (1987), अयोध्या में मस्जिद के ध्वंस से पहले और बाद में हुई मुसलमान-विरोधी हिंसा (1990-92), गुजरात हत्याकांड (2002), और 2008 में कंधमाल में इसाइयों के सफ़ाये के मामले प्रमुख हैं.

दलितों पर हुई हिंसा की स्थिति भी भिन्न नहीं है.

दलित-उत्पीड़न के हज़ारों मामलों में ये कुछ ऐसे हैं जो हमारे कथन की गवाही देते हैं : 1968 का किल्वेनमनी जनसंहार, 1997 का मलावलायु हत्याकांड, 2013 में मरक्कनम में हुई दलित-हिंसा, 2012 में धरमपुरी की दलित-विरोधी हिंसा (तमिलनाडु), करमचेदु हत्याकाण्ड 1985, 1991 की त्सुन्दुर हिंसा (आंध्र प्रदेश) 1996 का बथानी टोला हत्याकाण्ड, 2014 में लक्ष्मनपुर बाथे हत्याकांड (बिहार), 1997 की रमाबाई हत्या, मुंबई, 2006 का खैरलांजी हत्याकांड, 2014 का जावखेड़ा हत्याकाण्ड (महाराष्ट्र), 2000 का जाति-उत्पीड़न (कर्णाटक), 2006 में एक मृत गाय की खाल उतारने पर दलितों को पीटने और जलाने की घटना, 2011 में मिर्चपुर में दलितों की हत्या (हरियाणा) और 2015 में डंगवास, राजस्थान में दलित-विरोधी हिंसा. इन तमाम मामलों में आज भी अपराधियों की पहचान नहीं हो पायी है. और अगर पहचान हो भी गयी तो सज़ा सिर्फ़ बीस प्रतिशत मामलों में हुई.

दूसरी तरफ़ देखें तो दलित और अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाले “अपराधियों” पर विशेष जांच दल बनाकर आनन-फ़ानन में मुक़दमा चलाया जाता है और फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स के मार्फ़त सज़ा भी दे दी जाती है. इन्साफ़ और देश की सुरक्षा के लिए उन्हें जेलों में डाला जाता है, फाँसी पर भी लटकाया जाता है. लेकिन अगर पीड़ित दलित या अल्पसंख्यक हों तो यह तत्परता देखने को नहीं मिलती बल्कि भारतीय प्रशासन-न्याय तंत्र को लक़वा मार जाता है. ऐसे मामलों में भारतीय राज्य कमीशन-कमीशन खेलने लगता है, और यह खेल तब तक खेला जाता है जब तक कि वह अपराध लोगों की याद से ग़ायब नहीं हो जाता. देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई सिखों की हत्याओं में न्याय-व्यवस्था का यह रुख़ आसानी से देखा जा सकता है.

संतुलन बनाए रखना इंसाफ़ करना नहीं होता

क़ानून के महाज्ञानी प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान को जानना चाहिए कि किसी भी क़ीमत पर संतुलन बनाए रखने के हुनर को इंसाफ़ नहीं कहा जा सकता. इंसाफ़ का मतलब होता है कि सच को सच कहा जाए. उच्च न्याय प्रणाली की आज़ादी अगर सर्वोच्च न्यायालय बनाम मुसलमान तक सीमित दृष्टि से बाधित होती है, तो यह न्याय का ही मज़ाक़ बनाना हुआ. सर्वोच्च न्यायालय आतंकवाद संबंधी कानूनों; पत्रकारों, कार्यकर्ताओं पर पेगासस से जासूसी; सीएए की संवैधानिकता; पोलिटिकल बांड्स और धारा 370; श्रमिक विरोधी क़ानूनों और नफ़रत फैलाने वाली गतिविधि आदि मामलों पर अपनी क़ानूनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं कर सका; और इस ढिलाई के चलते असंख्य राजनीतिक कार्यकर्त्ता, पत्रकार, वकील, मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और ट्रेड यूनियन नेता बिना किसी वजह के जेलों में पड़े हुए हैं.

एक स्वतंत्र निष्पक्ष न्याय-व्यवस्था की ज़रूरत दरअसल पूरे मुल्क को है, सिर्फ़ मुसलमान इस से दया की भीख नहीं मांग रहे हैं!

शम्सुल इस्लाम

[अंग्रेज़ी से अनुवाद: चेतन क्रांति]

FAIZAN MUSTAFA’S QUESTIONABLE DEFENCE OF PARTISAN INDIAN HIGHER JUDICIARY

आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व के पतन की दास्तान : आरएसएस प्रचारक बलराज मधोक की ज़बानी

Autobiography of Balraj Madhok

आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व के वैचारिक, नैतिक, सामाजिक और राजनैतिक पतन की दास्तान : आरएसएस के प्रचारक बलराज मधोक की ज़बानी

The story of the ideological, moral, social and political decline of the top leadership of the RSS: by Balraj Madhok, the RSS pracharak

बलराज मधोक (1920-2016) की आत्मकथा, “ज़िंदगी का सफ़र-3-दीनदयाल उपाध्याय की हत्या से इंदिरा गांधी की हत्या तक(Autobiography of Balraj Madhok), हर उस इंसान को पढ़ना ज़रूरी है जो आरएसएस के राष्ट्र-समाज-इंसानियत विरोधी चरित्र को समझना चाहता है।

आरएसएस का यह दावा रहता है कि वे हिंदु धर्म/ हिंदुओं के पुनर्जागरण और पुनरुत्थान के लिये 1925 में अस्तित्व में आया। इस के अनुसार आरएसएस हिंदुओं के लिये एक ऐसा अनोखा इकलौता आदर्श संगठन है जो उन्हें आध्यात्मिक, नैतिक और भौतिक विकास के शिखर पर ले जाना चाहता है ताकि दुनिया उन के सामने नतमस्तक हो। लेकिन सच इन दावों से कितना भिन्न और शर्मनाक है इस का भरपूर अंदाज़ा आख़री सांस तक आरएसएस से जुड़े रहे हिन्दुत्व के प्रमुख विचारकों में से एक, बलराज मधोक की आपबीती पढ़कर लगाया जा सकता है।

बलराज माधोक 1938 में आरएसएस के संपर्क में आये और 1942 में इसके प्रचारक (पूर्णकालिक कार्यकर्ता) बने और आख़री सांस लेने (मई 2, 2016) तक इस के सदस्य रहे। उन्हें आरएसएस की तरफ़ से राष्ट्रीय महत्व की ज़िम्मेदारियाँ दी गयीं। आरएसएस के प्रचारक बनते ही उन्हें जम्मू-कश्मीर रियासत का ज़िम्मा दिया गया, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर उन्होंने आरएसएस के जेबी राजनैतिक संगठन जनसंघ की 1951 में स्थापना की और उसके अध्यक्ष बने, आरएसएस के एक और जेबी छात्र संगठन, अखिल भारतीय विद्यार्थी-परिषद की 1949 में स्थापना की, 1960 में गौ-हत्या विरोधी आंदोलन को संगठित किया तथा आरएसएस की तरफ़ से पहली बार उन्होंने 1968 में बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बनाने की मांग की।

बलराज मधोक ने 1969 में देश के अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों के विवादास्पद ‘भारतीयकरण’ की अवधारणा पेश की।

आरएसएस को इतनी गहराई से जानने वाले बलराज मधोक ने जो इस के सब से महत्वपूर्ण विचारक माधव सदाशिव गोलवलकर से भी सीधे संपर्क में थे, ने ही आरएसएस के नेतृत्व के पतन के बारे में जो शर्मनाक जानकारियाँ दी हैं वे बहुत विचलित करने वाली हैं, इन्हें हमेशा छुपाया गया। बलराज मधोक की आप-बीती के अनुसार, आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व अय्याशी, आरएसएस के भीतर हत्याओं और साज़िशों में लिप्त था। मधोक प्रत्यक्ष उदाहरण देकर बताते हैं कि आरएसएस के सरसंघचालक, गोलवलकर और बाला देवरस इन सब को रोकने के बजाये आरएसएस में मुजरिमों की टोली को संरक्षण देते रहे।

मधोक पर यह इल्ज़ाम भी नहीं लगाया जा सकता कि उन्होंने यह सब इस लिए लिखा क्योंकि उन्हें आरएसएस से निकाल दिया गया था। उन की मौत पर आरएसएस के तरफ़ से जारी निम्नलिखित ख़त इस बात की गवाही देता है कि मरते-दम तक आरएसएस से जुड़े थे।

इस पत्र के अतिरिक्त बलराज मधोक की पुस्तक में ऐसे पन्ने हैं जिन्हें पढ़कर यह समझना जरा भी मुश्किल नहीं है कि आरएसएस इस देश के लोगों, ख़ासकर हिंदुओं के लिए कितना ख़तरनाक है। और अगर आरएसएस से जुड़ी इस पतित चरित्र वाली टोली इस देश पर राज कर रही है तो देश को सर्वनाश होने से कौन बच सकता है! पर क्या इस देश के लोग ऐसा होने देंगे!!

शम्सुल इस्लाम

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मोदीजी सावरकर ने शर्मनाक हद तक सुभाष चंद्र बोस के ख़िलाफ़ अंग्रेजों की मदद करने का आह्वान किया

Statue of Subhash Chandra Bose unveiled by Prime Minister Narendra Modi

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति का अनावरण (Statue of Subhash Chandra Bose unveiled by Prime Minister Narendra Modi) उनके हिंदुत्ववादी गुरुओं के नेताजी के खिलाफ़ अंजाम दिए गये जुर्मों पर पर्दा डाल पायेगा?

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती पर विशेष!

आरएसएस-भाजपाशासकआजकल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानतम नेताओं में से एक शहीद नेताजी सुभाष चंद्र बोस से बहुत नज़दीकी जता रहे हैं।इससे ज़्यादा शर्मनाक हरकत कोई और नहीं हो सकती।आइए हम हिंदुत्व टोली के शर्मनाक अपराधों के बारे में जानने के लिए स्वयं आज़ादी से पहले के हिन्दू महासभा और आरएसएस के दस्तावेज़ों में झांकें।

आरएसएस के ‘वीर’ सावरकर का अंग्रेजों की मदद का आह्वान

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब नेताजी देश की आज़ादी के लिए विदेशी समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे थे और अपनी आज़ाद हिंद फ़ौज़ को पूर्वोत्तर भारत में सैनिक अभियान के लिए लामबंद कर रहे थे, तभी सावरकर अंग्रेजों को पूर्ण सैनिक सहयोग की पेशकश कर रहे थे। 1941 में भागलपुर में हिंदू महासभा के 23वें अधिवेशन को संबोधित करते हुए सावरकर ने अंग्रेज शासकों के साथ सहयोग करने की अपनी नीति का इन शब्दों में ख़ुलासा किया – 

“देश भर के हिंदू संगठनवादियों (अर्थात् हिंदू महासभाइयों) को दूसरा सबसे महत्वपूर्ण और अति आवश्यक काम यह करना है कि हिंदुओं को हथियार बंद करने की योजना में अपनी पूरी ऊर्जा और कार्रवाइयों को लगा देना है। जो लड़ाई हमारी देश की सीमाओं तक आ पहुँची है वह एक ख़तरा भी है और एक मौक़ा भी।” 

सावरकर ने आगे कहा, इन दोनों का तकाजा है कि सैन्यीकरण आंदोलन को तेज़ किया जाए और हर गाँव-शहर में हिंदू महासभा की शाखाएँ हिंदुओं को थल सेना, वायु सेना और नौ सेना में और सैन्य सामान बनाने वाली फ़ैक्ट्रियों में भर्ती होने की प्रेरणा के काम में सक्रियता से जुड़ें।

सावरकर ने अपने इस भाषण में किस शर्मनाक हद तक सुभाष चंद्र बोस के ख़िलाफ़ अंग्रेजों की मदद करने का आह्वान किया वह आगे लिखे इन शब्दों से बखू़बी स्पष्ट हो जाएगा। सावरकर ने कहा,

“जहाँ तक भारत की सुरक्षा का सवाल है, हिंदू समाज को भारत सरकार के युद्ध संबंधी प्रयासों में सहानुभूति पूर्ण सहयोग की भावना से बेहिचक जुड़ जाना चाहिए जब तक यह हिंदू हितों के फायदे में हो। हिंदुओं को बड़ी संख्या में थल सेना, नौसेना और वायु सेना में शामिल होना चाहिए और सभी आयुध, गोला-बारूद, और जंग का सामान बनाने वाले कारखानों वग़ैरह में प्रवेश करना चाहिए।”

सावरकर ने आगे कहा,

“ग़ौरतलब है कि युद्ध में जापान के कूदने के कारण हम ब्रिटेन के शत्रुओं के हमलों के सीधे निशाने पर आ गए हैं। इसलिए हम चाहें या न चाहें, हमें युद्ध के कहर से अपने परिवार और घर को बचाना है और यह भारत की सुरक्षा के सरकारी युद्ध प्रयासों को ताकत पहुँचा कर ही किया जा सकता है। इसलिए हिंदू महासभाइयों को खासकर बंगाल और असम के प्रांतों में, जितना असरदार तरीके से संभव हो, हिंदुओं को अविलंब सेनाओं में भर्ती होने के लिए प्रेरित करना चाहिए।”

सावरकर ने हिंदुओं का आह्वान किया कि हिंदू सैनिक हिंदू संगठनवाद की भावना से लाखों की संख्या में ब्रिटिश थल सेना, नौ सेना और हवाई सेना में भर जाएँ।

सावरकर ने हिंदुओं को बताया कि वे इस फौरी कार्यक्रम पर चलें और हिंदू संगठनवादी आदर्श का पूरा ध्यान रखते हुए युद्ध की परिस्थिति का पूरा लाभ उठाएँ।

सावरकर ने कहा, “अगर हमने हिंदू नस्ल के सैन्यीकरण पर पूरा जोर दिया, तो हमारा हिंदू राष्ट्र निश्चित तौर पर ज़्यादा ताक़तवर, एकजुट और युद्ध के बाद उभरने वाले मुद्दों, चाहे वह हिंदू विरोधी गृहयुद्ध हो या संवैधानिक संकट या सशस्त्र क्रांति का सामना करना, फायदे वाली स्थिति में होगा।”

भागलपुर में अपने भाषण का समापन करते हुए सावरकर ने एक बार फिर हिंदुओं के अंग्रेज़ सरकार के युद्ध प्रयासों में शामिल होने पर जोर दिया।  

सावरकर के मुताबिक़, युद्ध के बाद (विश्व के) देशों की स्थिति और तकदीर जो भी हो, आज की मौजूदा स्थितियों में हर चीज़ को देखते हुए हिंदू संगठनवादी एकमात्र व्यावहारिक और सापेक्ष लाभप्रद रवैया यही अपना सकते हैं कि भारत की सुरक्षा के सवाल पर ब्रिटिश सरकार के साथ भारत की सुरक्षा के लिए बिना किसी आशंका के सक्रिय रूप से सहयोग करें। ध्यान केवल यह रखना है कि हम हिंदू हितों के विरुद्ध काम करने के लिए मजबूर ना होकर ऐसा कर सकें।

जब सुभाष चंद्र बोस सैन्य संघर्ष के जरिए अंग्रेज़ी राज को उखाड़ फेंकने की रणनीति बना रहे थे तब ब्रिटिश युद्ध प्रयासों को सावरकर का पूर्ण समर्थन एक अच्छी तरह सोची-समझी हिंदुत्ववादी रणनीति का परिणाम था।

सावरकर का पुख़्ता विश्वास था कि ब्रिटिश साम्राज्य कभी नहीं हारेगा और सत्ता एवं शक्ति के पुजारी के रूप में सावरकर का साफ़ मत था कि अंग्रेज़ शासकों के साथ दोस्ती करने में ही उनकी हिंदुत्ववादी राजनीति का भविष्य निहित है। 

मदुरा में उनका अध्यक्षीय भाषण ब्रिटिश साम्राज्यवादी चालों के प्रति पूर्ण समर्थन का ही जीवंत प्रमाण था। उन्होंने भारत को आज़ाद कराने के नेताजी के प्रयासों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने घोषणा की कि व्यावहारिक राजनीति के आधार पर हम हिंदू महासभा संगठन की ओर से मजबूर हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी सशस्त्र प्रतिरोध में ख़ुद को शरीक न करें। 

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण जब ब्रिटिश सरकार ने सेना की नई टुकड़ियाँ भर्ती करने का निर्णय लिया तो सावरकर के प्रत्यक्ष नेतृत्व में हिंदू महासभा ने हिंदुओं को अंग्रेजों के इस भर्ती अभियान में भारी संख्या में जोड़ने का फ़ैसला लिया। मदुरा में हिंदू महासभा के अधिवेशन में सावरकर ने उपस्थित प्रतिनिधियों को बताया – 

“स्वाभाविक है कि हिंदू महासभा ने व्यावहारिक राजनीति पर पैनी पकड़ होने की वजह से ब्रिटिश सरकार के समस्त युद्ध प्रयासों में इस ख्याल से भाग लेने का निर्णय किया है कि यह भारतीय सुरक्षा और भारत में नई सैनिक ताक़त को बनाने में सीधे तौर पर सहायक होंगे।”

ऐसा नहीं है कि सावरकर को इस बात की जानकारी नहीं थी कि अंग्रेजों के प्रति इस प्रकार के दोस्ताना रवैये के विरोध में आम भारतीयों में तेज़ आक्रोश भड़क रहा था। युद्ध प्रयासों में अंग्रेज़ों को सहयोग देने के हिंदू महासभा के फ़ैसले की आलोचनाओं को उन्होंने यह कहकर खारिज कर दिया कि इस मामले में अंग्रेजों का विरोध करना एक ऐसी राजनैतिक गलती है जो भारतीय लोग अकसर करते हैं। 

सावरकर के मुताबिक़, भारतीय सोचते हैं कि सामान्य तौर पर चूँकि भारतीय हित ब्रिटिश हितों के ख़िलाफ़ हैं, इसलिए ब्रिटिश सरकार से हाथ मिलाने वाला कोई भी कदम अनिवार्यतः हथियार डालना, राष्ट्रद्रोह का काम होगा और अंग्रेज़ों के हाथ में खेलना जैसा होगा।

सावरकर के अनुसार, भारतीय यह भी मानते हैं कि ब्रिटिश सरकार से किसी भी मामले और हर तरह की परिस्थितियों में सहयोग करना देशद्रोह और निंदनीय है। 

एक ओर सुभाष चन्द्र बोस देश को आज़ाद कराने के लिए जर्मन व जापानी फ़ौजों की सहायता लेने की रणनीति पर काम कर रहे थे तो दूसरी ओर सावरकर अंग्रेज़ शासकों को उनके ख़िलाफ़ प्रत्यक्ष सैनिक समर्थन देने में व्यस्त थे।

हिंदुत्ववादी टोली का ब्रिटिश सरकार को था खुला समर्थन

सावरकर और हिंदू महासभा ब्रिटिश सरकार के समर्थन में खुलकर मैदान में खड़े थे। यह वही सरकार थी जो आज़ाद हिंद फौज के बहादुर सैनिकों को मारने और उनका विनाश करने में जुटी थी। अंग्रेज़ शासकों की भारी प्रशंसा करते हुए सावरकर ने मदुरा में अपने अनुयायियों से कहा कि चूँकि जापान एशिया को यूरोपीय प्रभाव से मुक्त करने के लिए सेना के साथ आगे बढ़ रहा है, ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार को अपनी सेना में बड़ी संख्या में भारतीयों की जरूरत है और हिंदू महासभा को उसकी मदद करनी चाहिए। 

सावरकर ने अंग्रेजों की जमकर प्रशंसा करते हुए कहा कि

“हमेशा की तरह दूरदर्शितापूर्ण ब्रिटिश राजनीति ने पहले हो समझ लिया था कि जब भी जापान के साथ युद्ध छिड़ेगा, भारत ही युद्ध की तैयारियों का केंद्र बिंदु होगा…। संभावना यह है कि जापानी सेनाएँ जितनी तेज़ी से हमारी सीमाओं की ओर बढ़ेंगी, उतनी ही तेज़ी से (अंग्रेज़ों को) 20 लाख की सेना भारतीयों को ले कर, भारतीयों अधिकारियों के नेतृत्व में खड़ी करनी होगी।” 

लाखों हिंदुओं को सेना में कराया भर्ती

अगले कुछ वर्षों तक सावरकर ब्रिटिश सेनाओं के लिए भर्ती अभियान चलाने, शिविर लगाने में जुटे रहे, जो बाद में उत्तर-पूर्व में आज़ाद हिंद फ़ौज़ के बहादुर सिपाहियों को मौत की नींद सुलाने और क़ैद करने वाली थी। हिंदू महासभा के मदुरा अधिवेशन में सावरकर ने प्रतिनिधियों को बताया कि पिछले एक साल में हिंदू महासभा की कोशिशों से लगभग एक लाख हिंदुओं को अंग्रेजों की सशस्त्र सेनाओं में भर्ती कराने में वे सफ़ल हुए हैं। इस अधिवेशन का समापन एक ‘फौरी  कार्यक्रम’ को अपनाने के प्रस्ताव के साथ हुआ जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि ब्रिटिश “थल सेना, नौ सेना और वायु सेना में ज़्यादा से ज़्यादा हिंदू सैनिकों की भर्ती सुनिश्चित की जाए। 

सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के युद्ध प्रयासों में शरीक होने पर जोर देते हुए अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि

“आज की हमारी स्थितियों में जितना संभव हो अंग्रेजों के साथ इस अपरिहार्य सहयोग को अपने देश के हित में लाभ उठाने की कोशिश में बदलें। इसको कभी नहीं भूला जाना चाहिए कि जो लोग सशस्त्र हमले के बावजूद पाखंडी और दिखावटी पूर्ण अहिंसा और असहयोग के लिए अपनी कायरतापूर्ण सनक या केवल नीतिगत कारणों से सरकार से सहयोग न करने और उसके युद्ध प्रयासों में सहायता न करने के दावे करते हैं वे सिर्फ़ अपने आपको धोखा दे रहे हैं और आत्म-तुष्टि से ग्रस्त हैं”। 

अंग्रेज़ सेना भर्ती अभियान में आरएसएस सावरकर के साथ थी

आरएसएस के समकालीन दस्तावेज़ इस शर्मनाक सच के गवाह हैं कि आरएसएस के बौद्धिक शिविरों में लगातार सवारकर को आरएसएस से जुड़े नौजवानों को अंग्रेज़  सेना में भर्ती होने की परेरण देने के लिये वक्ता के तौर पर बुलाया जाता रहा।  

ब्रिटिश सशस्त्र सेनाओं में भर्ती होने वाले हिंदुओं को सावरकर ने जो निम्नलिखित निर्देश दिया, उसे पढ़कर उन लोगों को निश्चित ही शर्म से सिर झुका लेना चाहिए जो सावरकर को महान देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी बताते हैं। 

सावरकर ने कहा,

“इस सिलसिले में अपने हित में एक बिंदु जितनी गहराई से संभव हो समझ लेना चाहिए कि जो हिंदू भारतीय (ब्रिटिश) सेनाओं में शामिल हैं, उन्हें पूर्ण रूप से आज्ञाकारी होना चाहिए और वहाँ के सैनिक अनुशासन और व्यवस्था का पालन करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए बशर्ते वह हिंदू अस्मिता को जान-बूझ कर चोट न पहुँचाती हों।” 

आश्चर्य की बात यह है कि सावरकर को कभी यह महसूस नहीं हुआ कि ब्रिटिश सेना में भर्ती होना ही अपने आप में स्वाभिमानी और देशभक्त हिंदू ही नहीं किसी के लिए भी घोर शर्म की बात थी।

‘महासभा और महान युद्ध’ का प्रस्ताव 

दमनकारी अंग्रेज़ सरकार के साथ हिंदू महासभा द्वारा सैनिक सहयोग की खुलेआम वकालत करने वाला एक ‘महासभा और महान युद्ध’ नामक प्रस्ताव सावरकर ने स्वयं तैयार किया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि चूँकि,

“भारत को सैनिक हमले से बचाना ब्रिटिश सरकार और हमारी साझा चिंता है और चूँकि दुर्भाग्य से हम इस स्थिति में नहीं हैं कि यह काम बिना सहायता के कर सकें, इसलिए भारत और इंग्लैंड के बीच खुले दिल से सहयोग की बहुत ज़्यादा गुंजाइश है।” 

सावरकर ने अपने 59वें जन्मदिन के आयोजनों को हिंदू महासभा के इस आह्वान को प्रचारित करने का माध्यम बनाया कि हिंदू बड़ी संख्या में ब्रिटिश सेनाओं में भर्ती हों।

युद्ध के संचालन के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय युद्ध समितियों की बात करें तो यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं थी कि वे सब सावरकर के संपर्क में थीं। इन समितियों में सावरकर द्वारा प्रस्तावित लोगों को भी शामिल किया गया था। यह ब्रिटिश सरकार के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के लिए सावरकर द्वारा भेजे गए एक तार (टेलीग्राम) से भी स्पष्ट है। सावरकर के निजी सचिव भिडे की पुस्तक के अनुसार,

“बैरिस्टर वी. डी. सावरकर, अध्यक्ष हिंदू महासभा ने (1) कमांडर इन चीफ़ जनरल बावेल (2) भारत के वायसराय को, 18 जुलाई 1941 को यह तार भेजा: महामहिम द्वारा अपने कारिंदों की सदस्यता वाली रक्षा समिति की घोषणा का स्वागत है। इसमें सर्वश्री कालिकर और जमनादास मेहता की नियुक्ति पर हिंदू महासभा विशेष प्रसन्नता व्यक्त करती है।” 

दिलचस्प बात यह है कि इस राष्ट्रीय स्तर की रक्षा समिति में मुस्लिम लीग द्वारा स्वीकृत नाम भी शामिल थे। यहाँ इस सच्चाई को भी जानना ज़रूरी है कि जब हिंदू महासभा और मुसलिम लीग मिलकर अंग्रेजों को युद्ध में विजयी बनाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे, उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन का नारा था कि साम्राज्यवादी युद्ध के लिए ‘न एक भाई, न एक पाई’ (नॉट ए मैन, नॉट ए पाई फ़ॉर दि वॉर)। और इस नारे को बुलंद करते हुए हजारों हिंदुस्तानियों ने ब्रिटिश सरकार का भयंकर उत्पीड़न सहा था। 

आरएसएस या इसके वरिष्ठ स्वयंसेवक, प्रधान मंत्री मोदी को कोई अधिकार नहीं है कि वे नेताजी और आज़ाद हिन्द फ़ौज के महान आज़ादी के लड़ाकुओं पर कोई बात करें।  उनको तो सब से पहले सिर्फ एक काम करना चाहिए और वह यह है की हिन्दुत्वादी टोली ने नेताजी और आज़ाद हिन्द फ़ौज के खिलाफ जो अपराध किये थे उनके बारे में पूरे देश से माफ़ी मांगें।

शम्सुल इस्लाम

January 23, 2022 .

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

मोदी सरकार के ‘भारत रत्न’ नानाजी देशमुख ने 1984 के जनसंहार को उचित ठहराया था, दस्तावेज

nanaji deshmukh justified the 1984 genocide

Modi government’s ‘Bharat Ratna’ Nanaji Deshmukh justified the 1984 genocide, document

1984 के सिख क़त्लेआम के मुजरिमों की तलाश का 37 साल लम्बा पाखंड!

37-YEAR-LONG MOCKERY OF SEARCHING FOR THE KILLERS OF 1984 SIKH MASSACRE

इंसान अभी तक ज़िंदा है,

ज़िंदा होने पर शर्मिंदा है। 

[सांप्रदायिक हिंसा पर नागरिक समाज की शर्मनाक चुप्पी (Shameful silence of civil society on communal violence) पर पाकिस्तानी कवि, नाटककार और नागरिक अधिकारों के योद्धा, शाहीद नदीम की पंक्तियाँ। जिस नज़्म की यह पंक्तियाँ हैं उसे लिखने और गाने के लिए फ़ौजी तानाशाह ज़िया के राज में उन्हें 40 कोड़े लगाए गए थे।]

लगभग पिछले 30 साल से मैं हर नवम्बर महीने के आरम्भ में देश को 1984 में संयोजित ढंग से किये गए सिखों के क़त्लेआम के बारे में इस सच्चाई (The truth about the massacre of Sikhs) से अवगत करता रहा हूँ कि इस शर्मनाक जनसंहार के मुजरिमों को सजा देना तो दूर की बात रही, क़ातिलों की पहचान तक नहीं हो पाई है। देश के दूसरे सब से बड़े धार्मिक अल्पसंखयक सम्प्रदाय के जनसंहार पर प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणतंत्र और न्यायपालिकाएं सभी मूक दर्शक बने रहे हैं या मुजरिमों की तलाश का पाखंड किया है। इस क़त्ले-आम की हर बरसी पर मैं उम्मीद करता था कि आने वाले साल में ज़रूर इन्साफ मिल जाएगा और मुझे अगली बार इस दर्दनाक और शर्मनाक कहानी को दोहराना नहीं पड़ेगा। लेकिन पिछले बीते साल भी भारतीय राज्य ने वही आपराधिक रवैये का अनुसरण किया। और मैं एक बार फिर अंधी, गूंगी और बहरी राजसत्ता को शर्म दिलाने का प्रयास कर रहा हूँ।

हाँ इस क़त्ले-आम की हर बरसी के नज़दीक आते भारतीय राज्य कुछ इस तरह का शोर ज़रूर मचाता है जैसे कि वह क़ातिलों को सजा दिलाने के काम में ज़ोर-शोर से लगा है।

37वीं बरसी से पहले सरकार की तरफ़ से दो सूचनायें दी गयीं। राष्ट्रीय अल्पसंखयक आयोग ने अक्टूबर 30, 2021 को बताया कि उस ने दिल्ली, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, हरयाणा, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से इस बात का ब्यौरा माँगा है कि पीड़ित सिख परिवारों के कितना हर्जाना दिया गया है और क़ातिलों को खोजने और सजा दिलाने के लिए किया क़दम उठाए गए हैं।

इस से पहले जनवरी 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार से यह जानकारी मिली थी कि कानपुर में जिस एक घर में 1984 में सिखों को क़त्ल किया गया था उसे खोलकर सबूत इकट्ठा किए गए हैं। यह सब करने में केवल 37 साल लग गए!    

2014 तक राजसत्ता के पाखंड का ब्यौरा (Details of the hypocrisy of the monarchy till 2014)

1984 नवम्बर के आरम्भ में हत्यारी टोलियों को खुली छूट देने के बाद, देश में राज कर रही राजीव गाँधी की कांग्रेसी सरकार को, विश्वभर में मिल रही धीत्कार के बाद इस क़त्लेआम के ज़िम्मेदार आतंकियों के ख़िलाफ़ क़दम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। ‘दंगों’ की जाँच के लिए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, वेद मरवाह के रूप में जाँच आयोग 1984 के अंत में नियुक्त किया गया। जब मरवाह आयोग (Marwah Commission) अपनी विस्फोटक रपट लगभग तैयार कर चुका था, इसे 1985 के मध्य बर्ख़ास्त कर दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायधीश, रंगनाथ मिश्र के अध्यक्षता में ‘1984 दंगों’ पर एक नया आयोग बनाया गया।

रंगनाथ मिश्र आयोग ने अपनी रपट कब पेश की ?

मिश्र आयोग (Rangnath Mishra Commission) ने 1987 में अपनी रपट पेश करदी। इस का सब से शर्मनाक पहलू यह था की सरकारी समझ के अनुकूल, मिश्र आयोग ने जिस सच्चाई (या सच्चाई को दबाने ) की खोज की उस के अनुसार, “यह दंगे सहज रूप से शुरू हुए लेकिन बाद में इस का नेतृत्व ग़ुंडों के हाथों में आ गया।”

न्याय की देवी के इस संरक्षक, न्यायधीश मिश्र ने इस क़त्लेआम को सहज घोषित कर दिया। हुक्मरानों ने इस सेवा के लिए उन्हें नवाज़ा भी। कांग्रेसी सरकार ने उन्हें 6 साल के लिए राज्य सभा की ज़ीनत बनने का अवसर दिया।    

अब तक 11 जाँच आयोग बिठाए जा चुके हैं और यह सिलसिला ख़त्म होने की कोई उम्मीद नहीं है।

भारतीय राज्य के लिए यह एक रिवाज बन गया है कि पंजाब और दिल्ली (जहाँ सिख मतदाताओं की बड़ी तादाद है) में जब भी चुनाव होने वाले हों तो एक नए आयोग की घोषणा कर दी जाये या क़त्लेआम में मारे गए लोगों के परिवारों को कुछ और मुआवज़ा देने की घोषणा कर दी जाए।

मशहूर वकील, एच एस फुलका जिन्होंने 1984 के जनसंहार के ज़िम्मेदार तत्वों को सजा दिलाने के लिए बेमिसाल काम किया है, बहुत दुःख के साथ बताते हैं कि इस क़त्लेआम में शामिल बहुत सारे नेता किसी सज़ा के भागी होने के बजाए शासक बन बैठे और वह भी इस वजह से कि उन्होंने इस जनसंहार में हिस्सा लिया था। 

यह शर्मनाक खेल किस तरह लगातार खेला जा रहा है इस का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगस्त 16, 2017 सुप्रीम कोर्ट ने अपने दो भूतपूर्व न्यायधीशों वाली समिति गठित की थी जिस ने 1984 की हिंसा के 241 मामलों के बंद किये जाने की 3 महीने के भीतर जाँच करके रपट देनी थी। जाँच-पड़ताल अभी जारी है!

मौजूदा भाजपा/आरएसएस शासकों द्वारा धोखा

भाजपा/आरएसएस का दावा है कि वे हिन्दू-सिख एकता के झंडाबरदार हैं। हालांकि वे यह बताने से भी नहीं थकते कि सिख धर्म स्वतंत्र धर्म ना होकर हिन्दू धर्म का ही हिस्सा है। जब कांग्रेस का राज था तब वे 1984 के क़त्लेआम के ज़िम्मेदार अपराधियों को सजा नहीं दिला पाने के लिए कांग्रेस को दोषी मानते रहे हैं। 2014 के संसदीय चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान मोदी ने झाँसी की एक सभा में (अक्तूबर 25, 2013) कांग्रेस से सवाल पूछे कि वह यह बताए की वे कौन लोग थे जिन्हों ने “1984 में हज़ारों सिखों का क़त्ल किया” और “क्या किसी एक को भी सिखों के जनसंहार के लिए सजा मिली है?”

भाजपा/आरएसएस के प्रधान मंत्रीपद के प्रत्याशी मोदी ने 2014 के चुनावों के दौरान पंजाब और इस के बाहर लगातार 1984 में “सिखों के क़त्लेआम” का मुद्दा उठाया, जो बहुत जाएज़ था।

मोदी ने प्रधान मंत्री बनने के बाद भी (अक्तूबर 31 2014) इस सच्चाई को माना कि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद घटी सिख विरोधी हिंसा (Anti-Sikh violence erupts after Indira Gandhi’s assassination) एक तरह का “एक खंजर था जो भारत देश के सीने में घोंप दिया गया। हमारे अपने लोगों के क़त्ल हुए, यह हमला किसी एक सम्प्रदाय पर नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र पर था।”

हिंदुत्व की प्रतिमा और आरएसएस के विचारक, प्रधान मंत्री मोदी इस बात पर दुःख जताते रहे हैं कि 1984 के जनसंहार के मुजरिमों की तलाश और उनको सजा देने का काम कांग्रेस के सरकारों ने नहीं किया। लेकिन मोदी इस शर्मनाक सच्चाई को छुपा गए कि 1984 के बाद सत्तासीन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार, जिस ने 1998 से 2004 तक देश पर राज किया, ने भी हत्यारों को पहचानने और उन्हें सजा दिलाने के लिए चुप्पी ही साधे रखी।

मोदी इस सच को भी छुपा गए कि उन के राजनैतिक गुरु, एल के अडवाणी ने अपनी आत्मकथा में (पृष्ठ 430) इस बात का गुणगान किया है कि कैसे भाजपा ने इंदिरा गाँधी को ‘ऑपरेशन ब्लु स्टार’ (1 से 8 जून 1984) करने प्रेरित किया। याद रहे कि इस सैनिक अभियान में सैंकड़ो सिख स्वर्ण मंदिर, अमृतसर में मारे गए और इसी का एक दुखद परिणाम प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या थी। प्रसिद्ध पत्रकार, मनोज मित्ता जिन्हों ने 1984 के क़त्लेआम से सम्बंधित शासकों के काले कारनामों को सार्वजानिक करने में हिरावल भूमिका निभायी है, ने इस त्रासदी पर लिखी अपनी दिल-दहला देने वाली पुस्तक (When a Tree Shook Delhi: The 1984 Carnage and Its Aftermath) में साफ़ लिखा कि, “भाजपा की हकूमत के बावजूद ऐसी कोई भी इच्छा-शक्ति देखने को नहीं मिलती जिस से यह ज़ाहिर हो की जो क़त्लेआम कांग्रेस के राज में हुआ था उस के ज़िम्मेदार लोगों को सजा दिलानी है। ऐसा लगता है मानो 1984 और 2002 (गुजरात में मुसलमानों का क़त्लेआम) के आयोजकों के बीच एक मौन सहमति हो”। 

आरएसएस के बड़े चिंतक नाना देशमुख ने 1984 में सिखों के क़त्ले-आम को जायज़ ठराया था

ऐसा मत केवल आरएसएस के आलोचकों का ही नहीं है बल्कि आरएसएस के अभिलेखागार में उस काल के दस्तावेज़ों के अध्ययन से यह सच उभरकर सामने आता है कि आरएसएस ने इस क़त्लेआम को एक स्वाभाविक घटना के रूप में लिया, इंदिरा गाँधी की महानता के गुणगान किए और नए प्रधान मंत्री के तौर पर राजीव गाँधी को पूरा समर्थन देने का वायदा किया। 

इस संबंध में 1984 में सिखों के कत्लेआम के संबंध में एक स्तब्धकारी दस्तावेज का, जिसे आरएसएस ने बहुत सारे शर्मनाक दस्तावेज़ों की तरह छुपाकर रखा हुआ है, के बारे में जानना ज़रूरी है। इसे आरएसएस के सुप्रसिद्ध विचारक और नेता नाना देशमुख (अब नहीं रहे) ने लिखा और वितरित किया था।

31 अक्तूबर 1984 को अपने ही दो सुरक्षा गार्डों द्वारा, जो सिख थे, श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद भारत भर में हजारों निर्दोष सिख पुरूषों, महलाओं एवं बच्चों को जिन्दा जला दिया गया, हत्या कर दी गयी और अपंग बना दिया गया। सिखों के सैकड़ों धार्मिक स्थलों को नष्ट कर दिया गया, तथा सिखों के अनगिनत वाणिज्यिक एवं आवासीय संपत्ति लूटी गयी और तबाह कर दी गयी। यह सामान्य विश्वास रहा है कि इस जनसंहार के पीछे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हाथ था, यह सही हो सकता है, लेकिन दूसरी फासिस्ट एवं सांप्रदायिक ताकतों भी थीं, जिन्होंने इस जनसंहार में सक्रिय हिस्सा लिया, जिनकी भूमिका की कभी भी जांच नहीं की गयी। यह दस्तावेज उन सभी अपराधियों को बेपर्दा करने में मदद कर सकता है जिन्होंने निर्दोष सिखों के साथ होली खेली जिनका इंदिरा गांधी की हत्या से कुछ भी लेना-देना नहीं था।

यह दस्तावेज इस बात पर रौशनी डाल सकता है कि इतने कैडर आये कहां से और जिसने पूरी सावधानी से सिखों के नरंसहार को संगठित किया। जो लोग 1984 के जनसंहार तथा अंगभंग के प्रत्यक्षदर्षी थे वे हत्यारे, लुटेरे गिरोहों की तेजी एवं सैनिक-फूर्ति से भौंचक थे जिन्होंने निर्दोष सिखों को मौत के घाट उतारा (बाद में बाबरी मस्जिद के ध्वंस, डा. ग्राहम स्टेन्स एवं दो पुत्रों को जिन्दा जला देने और 2002 में गुजरात में मुसलमानों के जनसंहार के दौरान देखा गया)। यह कांग्रेस ठगों की क्षमता के बाहर था। देशमुख का दस्तावेज 1984 के हत्यारों की पहचान में ज़बरदस्त मदद कर सकता है जिन्होंने इस जनसंहार में कांग्रेसी गुंडों की मदद की।

यह दस्तावेज भारत के सभी अल्पसंख्यकों के प्रति आरएसएस के पतित एवं फासिस्ट दृष्टिकोण को दर्शाता है।

आरएसएस यह दलील देता रहा है कि वे मुसलमानों एवं ईसाइयों के खिलाफ हैं क्योंकि वे विदेशी धर्मों के अनुयायी हैं। यहां हम पाते हैं कि वे सिखों के जनसंहार को भी उचित ठहराते हैं जो स्वयं उनकी अपनी श्रेणीबद्धता की दृष्टि से भी अपने ही देश के एक धर्म के अनुयायी थे।

आरएसएस अक्सर अपने को, हिन्दू-सिख एकता में दृढ़ विश्वास करने वाले के रूप में पेश करता है। लेकिन इस दस्तावेज में हम आरएसएस के श्रेष्ठ नेता के मुँह से ही सुनेंगे कि आरएसएस तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की तरह यह विश्वास करता था कि निर्दोष सिखों का जनसंहार उचित था। इस दस्तावेज में नानाजी देशमुख ने बड़ी धूर्तता से सिख समुदाय के जनसंहार को उचित ठहराने का प्रयास किया है जैसा कि हम नीचे देखेंगेः

1. सिखों का जनसंहार किसी ग्रुप या समाज-विरोधी तत्वों का काम नहीं था बल्कि वह क्रोध एवं रोष की सच्ची भावना का परिणाम था।

2. नानाजी श्रीमती इंदिरा गांधी के दो सुरक्षा कर्मियों जो सिख थे, की कार्रवाई को पूरे सिख समुदाय से अलग नहीं करते हैं। उनके दस्तावेज से यह बात उभरकर सामने आती है कि इंदिरा गांधी के हत्यारे अपने समुदाय के किसी निर्देश के तहत काम कर रहे थे। इसलिए सिखों पर हमला उचित था।

3. सिखों ने स्वयं इन हमलों को न्यौता दिया, इस तरह सिखों के जनसंहार को उचित ठहराने के कांग्रेस सिद्धांत को आगे बढ़ाया।

4. उन्होंने ‘आपरेशन ब्लू स्टार’ को महिमामंडित किया और किसी तरह के उसके विरोध को राष्ट्र-विरोधी बताया है। जब हजारों की संख्या में सिख मारे’ जा रहे हैं, जो वे सिख उग्रवाद के बारे में देश को चेतावनी दे रहे हैं, इस तरह इन हत्याओं का सैद्धांतिक रूप से बचाव करते हैं।

5. समग्र रूप से वह सिख समुदाय है जो पंजाब में हिस्सा के लिए जिम्मेवार हैं।

6. सिखों काो आत्म-रक्षा में कुछ भी नहीं करना चाहिए बल्कि हत्यारी भीड़ के खिलाफ धैर्य एवं सहिष्णुता दिखानी चाहिए।

7. भीड़ नहीं, बल्कि सिख बुद्धिजीवी जनसंहार के लिए जिम्मेवार हैं। उन्होंने सिखों को खाड़कू समुदाय बना दिया है और हिन्दू मूल से अलग कर दिया है, इस तरह राष्ट्रवादी और हिन्दू मूल से अलग कर दिया है, इस तरह राष्ट्रवादी भारतीयों से हमले को न्यौता दिया है। यहां फिर वे सभी सिखों को एक ही गिरोह का हिस्सा मानते हैं और हमले को राष्ट्रवादी हिन्दुओं की एक प्रतिक्रिया।

8. वे श्रीमती इन्दिरा गांधी को एकमात्र ऐसा नेता मानते हैं जो देश को एकताबद्ध रख सकीं और एक ऐसी महान नेता की हत्या पर ऐसे कत्लेआम को टाला नहीं जा सकता था।

9. राजीव गांधी, जो श्रीमती इंदिरा गांधी के उत्तराधिकारी एवं भारत के प्रधानमंत्री बने और यह कहकर सिखों की राष्ट्रव्यापी हत्याओं को उचित ठहराया कि ‘‘जब एक विशाल वृक्ष गिरता है जो हमेश कम्पन महसूस किया जाता है।’’ नानाजी दस्तावेज के अंत में इस बयान की सराहना करते हैं और उसे अपना आषीर्वाद देते हैं।

10. यह दुखद है कि सिखों के जनसंहार की तुलना गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर हुए हमले से (Compare the genocide of Sikhs with the attack on RSS after Gandhi’s assassination) की जाती है और हम यह पाते हैं कि नानाजी सिखों को चुपचाप सब कुछ सहने की सलाह देते हैं। हर कोई जानता है कि गांधीजी की हत्या आरएसएस की प्रेरणा से हुई जबकि आम सिखों को श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से कुछ भी लेनादेना नहीं था।

11. केन्द्र में कांग्रेस सरकार से अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हिंसा के नियंत्रित करने के उपायों की मांग करते हुए एक भी वाक्य नहीं लिखा गया है। ध्यान दें, नानाजी ने 8 नवंबर 1984 को यह दस्तावेज प्रसारित किया और 31 अक्तूबर से उपर्युक्त तारीख तक सिखों को हत्यारे गिरोहों का सामना करने के लिए अकेले छोड़ दिया गया। वास्तव में 5 से 10 नवंबर वह अवधि है जब सिखों की अधिकतम हत्याएं हुईं। नानाजी को इस सबके लिए कोई भी चिन्ता नहीं है।

12. आरएसएस को सामाजिक काम करते हुए खासकर अपने खाकी निककर धारी कार्यकर्ताओं को फोटो समेत प्रचार-सामग्री प्रसारित करने का बड़ा शौक़े है। 1984 की हिंसा के दौरान ऐसा कुछ भी नहीं है। वास्तव में, नानाजी के लेख में घिरे हुए सिखों को आरएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा बचाने का कोई जिक्र नहीं किया गया है। इस जनसंहार के दौरान आरएसएस के वास्तविक इरादों का पता चलता है।

नाना देशमुख दुवारा प्रसारित मूल दस्तावेज़ यहाँ प्रस्तुत है। यह दस्तावेज़ जॉर्ज फर्नांडेस को मिला था और उन्हों ने इसे अपनी हिंदी पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ में तभी ‘इंका-आरएसएस गठजोड़’ शीर्षक से छापा था।

आत्मदर्शन के क्षण

अंततः इन्दिरा गांधी ने इतिहास के प्रवेश द्वार पर एक महान शहीद के रूप में स्थायी स्थान पा ही लिया है। उन्होंने अपनी निर्भीकता और व्यवहार कौशलता में संयोजित गतिकता के साथ कोलोसस की भांति देश को एक दशक से भी अधिक समय तक आगे बढ़ाया और यह राय बनाने में समर्थ रही कि केवल वही देश की वास्तविकता को समझती थीं, कि मात्र उन्हीं के पास हमारे भ्रष्ट और टुकड़ों में बंटे समाज की सड़ी-गली राजनैतिक प्रणाली को चला सकने की क्षमता थी, और, शायद केवल वही देश को एकता के सूत्र में बांधे रख सकती थीं। वह एक महान महिला थीं और वीरों की मौत ने उन्हें और भी महान बना दिया है। वह ऐसे व्यक्ति के हाथों मारी गई जिसमें, उन्होंने कई बार शिकायत किए जाने बावजूद, विश्वास बनाये रखा। ऐसे प्रभावशाली और व्यस्त व्यक्तित्व का अंत एक ऐसे व्यक्ति के हाथों हुआ जिसे उन्होंने अपने शरीर की हिफाजत के लिए रखा। यह कार्रवाई देश और दुनिया भर में उनके प्रशंसकों को ही नहीं बल्कि आलोचकों को भी एक आघात के रूप में मिली। हत्या की इस कायर और विश्वासघाती कार्रवाई में न केवल एक महान नेता को मौत के घाट उतारा गया बल्कि पंथ के नाम पर मानव के आपसी विश्वास की भी हत्या की गई। देशभर में अचानक आगजनी और हिंसक उन्माद का विस्फोट शायद उनके भक्तों के आघात, गुस्से और किंकर्तव्यविमूढ़ता की एक दिशाहीन और अनुचित अभिव्यक्ति थी। उनके लाखों भक्त उन्हें एक मात्र रक्षक, शक्तिवान एवं अखंड भारत के प्रतीक के रूप में देखते थे। इस बात का गलत या सही होना दूसरी बात है।

इस निरीह और अनभिज्ञ अनुयायियों के लिए इंदिरा गांधी की विश्वासघाती हत्या, तीन साल पहले शुरू हुई अलगाववादी, द्वेष और हिंसा के विषाक्त अभियान, जिसमें सैकड़ों निर्दोष व्यक्तियों को अपनी कीमती जानों से हाथ धोना पड़ा और धार्मिक स्थलों की पवित्रता नष्ट की गई, की ही त्रासदीपूर्ण परिणति थी। इस अभियान ने जून में हुई पीड़ाजनक सैनिक कार्रवाई जो कि देश के अधिकांश लोगों की दृष्टि में धार्मिक स्थानों की पवित्रता की रक्षा के लिए आवश्यक ही थी, के पश्चात भयंकर गति ली। कुछ अपवादों को छोड़कर नृशंस हत्याकांड और निर्दोष लोगों की जघन्य हत्याओं को लेकर सिख समुदाय में आमतौर पर दीर्घकालीन मौन रहा, किन्तु लम्बे समय से लम्बित सैनिक कार्यवाई की निन्दा गुस्से और भयंकर विस्फोट के रूप में की। इनके इस रवैये से देश स्तब्ध हो गया। सैनिक कार्यवाई की तुलना 1762 में अहमद शाह अब्दाली द्वारा घल्लू घड़ा नामक कार्यवाई में हर मंदिर साहब को अपवित्र करने की घटना से की गई। दोनों घटनाओं के उद्ेश्यों में गए बगैर इन्दिरा गांधी को अब्दुल शाह अब्दाली की श्रेणी में धकेल दिया गया। उन्हें सिख पंथ का दुश्मन मान लिया गया और उनके सिर पर बड़़े-बड़े इनाम रख दिए गए थे। दूसरी ओर, धर्म के नाम पर मानवता के विरूद्व जघन्य हत्याओं का अपराधकर्ता भिण्डारावाले को शहीद होने का खिताब दिया गया। देश के विभिन्न हिस्सों में और विदेशों में ऐसी भावनाओं के आम प्रदर्शनों ने भी सिख और शेष भारतीयों के बीच अविश्वास और विमुखता को बढ़ाने में विशेष कार्य किया। इस अविश्वास और विमुखता की पृष्ठभूमि में सैनिक कार्रवाई के बदले में की गई इन्दिरा गांधी की, अपने ही सिख अंगरक्षकों द्वारा, जघन्य हत्या पर, गलत या सही, सिखों द्वारा मनाई जाने वाली खुशी की अफवाहों को स्तब्ध और किंकर्तव्यविमूढ़ जनता ने सही मान लिया। इसमें सबसे अधिक आघात पहुंचाने वाला स्पष्टीकरण ज्ञानी कृपाल सिंह का था जो कि प्रमुख ग्रन्थी होने के नाते स्वयं को सिख समुदाय का एकमात्र प्रवक्ता समझते हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने इन्दिरा गांधी की मृत्यु पर किसी भी प्रकार का दुख जाहिर नहीं किया। उबल रहे क्रोध की भावना में इस वक्तव्य ने आग में घी डालने का काम किया। महत्वपूर्ण नेता द्वारा दिये गए ऐसे घृणित वक्तव्य के विरोध में जिम्मेदार सिख नेताओं, बुद्धिजीवियों या संगठनों द्वारा कोई तत्काल और सहज निन्दाजनक प्रतिक्रिया नहीं की गयी अस्तु पहले से ही गुस्सा हुए साधारण और अकल्पनाशील लागों ने यह सही समझा कि सिखों ने इन्दिरा गांधी की मौत पर खुशियां मनाईं। इसी विश्वास के कारण स्वार्थी तत्वों को आम लोगों को निरीह सिख भाईयों के खिलाफ हिंसक बनाने में सफलता मिली।

यह सबसे अधिक विस्फोटक स्थिति थी जिसमें कि हमारे सिख भाईयों द्वारा चरम धैर्य और स्थिति का कौशलतापूर्ण संचालन किये जाने की आवश्यकता थी। राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का आजीवन सदस्य होने के नाते मैं यह कह रहा हूं क्योंकि 30 जनवरी 1948 को एक हिन्दू धर्मान्ध, जो कि मराठी था, लेकिन जिसका राष्ट्रीय स्वयं सवेक संघ से कोई भी रिश्ता नहीं था बल्कि संघ का कटु आलोचक था, ने महात्मा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या की। इस अवसर पर हमने भी दिग्भ्रर्मित लोगों के अचानक भड़के उन्माद, लूटपाट और यंत्रणाओं को भोगा। हमने स्वंय देखा था कि कैसे स्वार्थी तत्वों, जो कि इसी घटना से वाकिफ थे, ने पूर्व नियोजित ढंग से एक खूनी को राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का सदस्य बताया और यह अफवाह भी फैलाई कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के लोग महात्मा गांधी की मृत्यु पर देश भर में खुशियां मना रहे थे

और इस प्रकार गांधी के लिए लोगों के दिलों में उपजे प्यार और लोगों के किंकर्तव्यविमूढ़ और आघात हुई भावना को गलत रास्ते की ओर उन्मुख करने में सफल रहे। स्वयं सेवकों और उनके परिवारों, विशेषकर महाराष्ट्र में, के विरूद्ध ऐसी भावनाएं फैलाई गई।

स्वयं इन अनुभवों से गुजर चुकने के कारण मैं इन मासूम सिख भाईयों, जो जनता के अकस्मात भड़के हिंसक उन्माद के शिकार हुए, की सख्त प्रतिक्रिया और भावनाओं को समझ सकता हूं। वस्तुतः मैं तो सबसे अधिक कटु शब्दों में सिख भाईयों पर दिल्ली में और कहीं भी की गई अमानवीय और बर्बरता और क्रूरता की निन्दा करना चाहूंगा। मैं उन सभी हिन्दू पड़ोसियों पर गर्व महसूस करता हूं कि जिन्होंने अपनी जान की परवाह किये बगैर मुसीबत में फंसे सिख भाईयों की जान-माल की हिफाजत की। पूरी दिल्ली से प्राप्त होने वाली ऐसी बातें सुनने में आ रही हैं। इन बातों ने व्यावहारिक तौर पर मानवीय व्यवहार की सहज अच्छाई में विश्वास बढ़ाया है तथा खासतौर पर हिन्दू प्रकृति में विश्वास बढ़ाया है।

ऐसी नाजुक और विस्फोटक स्थिति में सिख प्रतिक्रिया को लेकर भी मैं चिंतित हूं। आधी शताब्दी से देश के पुनर्निर्माण और एकता में लगे एक कार्यकर्ता के रूप में और सिख समुदाय का हितैषी होने के नाते मैं यह कहने में हिचकिचाहट महसूस कर रहा हूं कि यदि सिखों द्वारा जवाबी हथियारबन्द कार्रवाई आंशिक रूप से भी सही है तो वे स्थिति का सही और पूर्णरूपेण जायजा नहीं ले पाए और फलस्वरूप अपनी प्रतिक्रिया स्थिति के अनुरूप नहीं कर पाए। मैं यहां सिखों समेत अपने सभी देशवासियों का ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि महात्मा गांधी की हत्या से उपजी ऐसी विषम परिस्थिति में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवकों के विरुद्ध फैले उन्माद में उनकी सम्पत्तियों को नष्ट किये जाने, जघन्य बच्चों के जिन्दा जलाए जाने, जघन्य हत्याओं, अमानवीय क्रूरता इत्यादि के अपराध हो रहे थे और देश भर से लगातार समाचार नागपुर पहुंच रहे थे तो तथाकथित ‘बड़ी व्यक्तिगत सेना’ के नाम से जाने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ‘तानाशाह’, संघ के तत्कालीन प्रधान स्व. एम. एस. गोवालकर ने नागपुर में एक फरवरी 1948 को देश भर के लाखों अस्त्रों से लैस नौजवान अनुयायियों के नाम एक अपील निम्न अविस्मरणीय शब्दों में कीः

”मैं अपने सभी स्वयं सेवक भाईयों को निर्देश देता हूं कि भले ही नासमझी से उत्तेजना क्यों न फैले लेकिन सबके साथ सौहार्दपूर्ण रवैया अपनायें और यह याद रखें कि यह आपसी नासमझ और अनुचित उन्माद उस प्यार और श्रद्धा का प्रतिफल है जो देश को दुनियां की नजर में महान बनाने वाले महान महात्मा के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र के हदय में है। ऐसे महान श्रद्धेय दिवंगत को हमारा नमस्कार।“

यह आशाहीन समय में डरपोकपने और असहाय स्थिति को छुपाने के लिए खाली शब्द नहीं थे। ऐसे गम्भीर क्षणों में अपनी जान पर बन जाने पर भी उन्होंने यह साबित किया कि उनकी अपील के हर शब्द का अर्थ हैं। फरवरी की शाम को नागपुर के सैकड़ों स्वयं सेवकों ने सशस्त्र प्रतिरोध और खून की अंतिम बूंद रहने तक अपने नेता पर होने वाले उसी रात के संभावित हमले को रोकने के लिए आग्रह किया। और श्री गुरूजी को उनके कुछ साथियों ने उनकी जिन्दगी को लेकर षड्यंत्र की बात बताई और हमला होने से पहले निवास सुरक्षित स्थान में बदलने का अनुरोध किया तो श्री गुरुजी ने ऐसी काली घड़ी में भी उनसे कहा कि जब वही लोग, जिनकी सेवा उन्होंने सम्पूर्ण जीवन सच्चाई और पूरी योग्यता से की, उनका प्राण लेना चाहते है तो उन्हें क्यों और किसके लिए अपनी जान बचानी चाहिए। इसके बाद उन्होंने बड़ी सख्त आवाज में उन्हें सचेत किया था कि यदि उन्हें बचाने में उनके देशवासियों के खून की एक भी बूंद जाएगी तो उनके लिए ऐसा जीवन व्यर्थ होगा। इतिहास साक्षी है कि देश भर में फैले लाखों स्वयं सेवकों ने इस निर्देश का अक्षरणः पालन किया। यघपि उन्हें अपने इस धैर्य, सहनशीलता के बदले में उन पर उठाली गई अभद्रता को पचाना पड़ा था लेकिन उनका स्वयं का धीरज बांधने के लिए एक विश्वास था कि चाहे वर्तमान परिस्थिति में उनकी नियति कुछ भी हो, इतिहास अवश्य ही उन्हें निर्दोष साबित करेगा।

मैं आशा करता हूं कि ऐसी विषम वर्तमान स्थिति में मेरे सिख भाई भी उपरोक्त रूप से ही सहनशीलता और धैर्य का प्रदर्शन करेंगे। लेकिन मुझे बहुत दुख होता है यह जानते हुए कि ऐसी सहनशीलता और धैर्य का प्रदर्शन करने के बजाय उन्होंने कुछ स्थानों पर कुछ भीड़ के साथ सशस्त्र तरीकों से बदले की कार्रवाई की और ऐसे स्वार्थी तत्वों के हाथों में खेले जो कि झगड़े फैलाने को उत्सुक थे। मुझे आश्चर्य होता है कि सबसे अधिक अनुशासित, संगठित और धर्मपरायण समझे जाने वाले हमारे समाज के अंग ने कैसे ऐसा नकारात्मक और स्व-पराजयी दृष्टिकोण अपनाया। हो सकता है कि वे ऐसे संकट के मौके पर सही नेतृत्व पाने से वंचित रह गए हों। मेरे सिख इतिहास के क्षुद्र अध्ययन और समझ के अनुसार मैं मानता हूं कि ऐसे संकट के क्षणों में सिखों का अराजनैतिक प्रत्युत्तर उनके पूर्णरूपेण सिख प्रकृति के प्रेम, सहनशीलता और कुर्बानी की शिक्षा में लिप्त होने से हुआ। सिख धर्म की युद्धमान प्रकृति तो विदेशी मुगलों की बर्बरता के खिलाफ अल्पकालीन प्रावधान था जो कि दसवें गुरु ने सिखाया था। उनके लिए खालसा अपेक्षाकृत विस्तृत सिख व हिन्दू भाई-चारे का एक छोटा सा हिस्सा था और हिन्दू समुदाय और उसकी परम्पराओं की रक्षा के लिए सशस्त्र हाथ के रूप में रचा गया था। पांच ‘क’ (केश, कृपाण, कंघा, कड़ा और कच्छा) और खालसा नामों में सिंह’ शब्द की उपाधि गुरु गोविन्द सिंह द्वारा खालसा अनुयायियों के लिए ही निर्धारित की गई थी। यह उनके सैनिक होने के प्रतीक के रूप में था लेकिन दुर्भाग्यवस, आज यही सिख धर्म के आधारिक और आवश्यक रूपों की तौर पर प्रक्षिप्त हो रहे है।

मुझे यह कहने का दुःख है कि सिख बुद्धिजीवी भी यह समझने में असफल रहे हैं कि सिख धर्म के खालसावाद में हुआ परिवर्तन बाद की घटना थी और यह ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के विभक्त कर पंजाब में शासन, करने के पूर्व नियोजित तरीकों की घृणित योजना को लागू करना था। इसका उद्देश्य सिखों को अपने ही हिन्दुओं के परिवेश से अलग करना था। दुर्भाग्यवश, आजादी के बाद सत्ता के भूखे राजनीतिज्ञों ने भी इन अप्राकृतिक रूप से उत्पन्न हुई अलग-थलग और बराबर के अस्तित्व जैसी समस्याओें को अपने स्वार्थों के लिए बनाए रखा और अपनी हिस्सों में बांटने वाली वोट की राजनीति के द्वारा साम्राज्यवादियों से विभाजन और शासन के खेल को और आगे बढ़ाया। सिखवाद का जुझारू खालसावाद से यह अनुचित एकात्मीकरण ही सिख समुदाय के कुछ हिस्सों में, न केवल अलगाववादी प्रवृतियों की मूल जड़ है, बल्कि इसने लड़ाकूपन और हथियारों की शक्ति पर विश्वसनीयता को ही धार्मिक भक्ति तक पहुंचा दिया।

इसी धार्मिक भक्ति ने बब्बर खालसा जैसे आतंकवादी आन्दोलन को दूसरे दशक में जन्म दिया और हाल ही के भिंडरांवाले के नेतृत्व में आतंकवाद की लहर के प्रतिफल के रूप में इंदिरा गांधी की हत्या हुई और एक लम्बी ‘हिट लिस्ट’ को अभी अंजाम दिया जाना बाकी है।

मैं कल्पना करता था कि सिख समुदाय ने स्वयं को अशिक्षा, अज्ञान, कुण्ठा और पराजयवाद से पूर्णस्पेण मुक्त कर लिया है, जिसमें कि यह 19वीं शताब्दी के पांचवे दशक में अपनी आजादी खोने के बाद था और जिसका फायदा चालाक ब्रिटिश साम्राज्यवादियों व स्वार्थी सिख अभिजात वर्ग ने अपने स्वार्थों के लिए उसका शोषण करके उठाया। यह स्पष्ट है कि आठवें दशक में सिख श्रेष्ठ जिम्मेदारी के पद सुशोभित करते हुए जीवन के हर क्षेत्र में तथा उच्च शिक्षित, मेहनती, सतर्क, अपेक्षाकृत धनाड्य, प्रबुद्ध और सक्रिय भारतीय समाज के हिस्से के रूप में प्रतिनिधित्व करते है। उन्नीसवीं शताब्दी में उनके अनुभव और दृष्टि तत्कालीन पंजाब की सीमाओं तक ही सीमित थी लेकिन आज वे पूरे भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैले पड़े हैं और इस स्थिति में हैं कि वे बड़ी ताकतों की उन साजिशों को सीधे-सीधे जान सकते हैं जो, विश्व में मजबूती के साथ उभरते हुए आजाद और अखण्ड भारत के विरुद्ध की जा रही है। ऐसी लाभकारी स्थिति से उन्हें ठीक से अपने ऐतिहासिक विकास को भारत के अभिन्न हिस्से के रूप में जानना चाहिए।

इतिहास का ऐसा पुनर्मुल्यांकन करने से ही उन्हें उन्हीं के धर्म और भूत के अनेकानेक समस्त अवबोधनों को देखने का मौका मिलेगा जोकि उनके मस्तिष्क में सुनियोजित ढंग से ब्रिटिश प्रशंसकों, विद्वानों द्वारा धर्म की प्रवृत्ति और विकास के बारे में गलत आौर कुचक्रपूर्ण ऐतिहासिक लेखन द्वारा भरा गया था। ऐसी कोशिश उन्हें उनके वास्तविक मूल तक भी ले जाएगी।

यह सही समय है कि हमारे सिख भाई थोड़ा हृदय को टटोलें ताकि अपनी आधारिक धर्म प्रवृत्ति में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और सत्ता के लिए लालची अवसरवादी लोगों द्वारा ठूंसे मिथ्यावर्णन से मुक्ति पा सकें। ऐसे मिथ्यावर्णनों को हटाया जाना वर्तमान अविश्वास की खाई और दो एक जैसी नियति प्रवृत्ति और एक जैसी परम्पराओं के समुदायों के बीच पैदा हो गई भिन्नता को बांटने के लिए आवश्यक है। मुझे डर है कि बिना ऐसे स्व-अंतर्दर्शन और इतिहास के पुर्नमूल्यांकन के वे अपने आपस में और अन्य देशवासियों के साथ चैन से नहीं रह पांएगे। उनके अपने प्रबृद्ध हितों का एक विरक्त विश्लेषण ही उन्हें यह समझाने को काफी होगा कि उनका भाग्य अभिन्न रूप से भारत की नियति के साथ जुड़ा है। एक ऐसी समझ उन्हें विदेशी ताकतों के विघटन और विनाशकारी स्वार्थों के चक्कर में आने से स्वयं को बचा पाएंगी।

मेरा विश्वास है कि मेरे सिख भाई एक शुभचितंक की आत्मिक अभिव्यक्ति के सतर्कतापूर्ण शब्दों को स्वीकार करेंगे।

अन्त में, यह उस सच की अस्वीकारोक्ति नहीं है कि इन्दिरा गांधी के भारतीय राजनैतिक क्षेत्र से अकस्मात निराकरण ने एक खतरनाक रिक्तता भारतीय आम जिन्दगी में पैदा कर दी है। लेकिन भारत में ऐसे संकट और अनिश्चितता के क्षणों में सदैव ही एक विशिष्ट अंतर्शक्ति का प्रदर्शन किया। अपनी परम्पराओं के अनुसार एक सरल और शांतिमय तरीके से शक्ति और जिम्मेदारी को एक अपेक्षाकृत जवान व्यक्ति के अनुभवहीन कंधों पर डाला गया है। अभी से उसके नेतृत्व की सम्भावनाओं को लेकर कोई निर्णय करना हड़बड़ी का काम होगा। हमें उन्हें अपनी योग्यता दिखाने का कुछ समय तो देना ही चाहिए।

देश के ऐसे चुनौती भरे मोड़ पर, इस बीच वे देशवासियों से पूर्ण सहयोग और सहानुभूति प्राप्त करने के हकदार है, भले ही वे किसी भी भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र या राजनीतिक विश्वास के हों।

एक अराजनैतिक रचनात्मक कार्यकर्ता की हैसियत से मैं मात्र यही आशा और प्रार्थना करता हूं, भगवान उन्हें अधिक परिपक्व, संयत और जनता को एक पक्षपातहीन सरकार देने की अंर्तशक्ति और क्षमता का आशीर्वाद दे ताकि देश को वे वास्तविक सम्पन्न एकता और यशोलाभ की ओर ले जायें।

नाना देशमुख

गुरुनानक दिवस

नवम्बर 8, ,1984

यहां यह जानना ज़रूरी है कि नाना देशमुख को मोदी सरकार ने 2019 के गणतंत्र दिवस पर देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्नसे सम्मानित किया!

शम्सुल इस्लाम

02-11-2021

राजनाथ सिंह का गाँधी जी को अपमानित करने का एक शर्मनाक प्रयास

Mahatma Gandhi महात्मा गांधी

वरिष्ठ आरएसएस नेता/रक्षा-मंत्री राजनाथ सिंह का गाँधी जी को अपमानित करने का एक शर्मनाक प्रयास

A shameful attempt by senior RSS leader/Defence-Minister Rajnath Singh to humiliate Gandhiji

हिन्दुत्वादी विशेषकर आरएसएस से जुड़े लोग गाँधी जी को अपमानित और ज़लील करने के लिए कोई भी अवसर नहीं गंवाते हैं। आरएसएस का जितना क़द्दावर नेता होता है उतनी ही ज़्यादा बदतमीज़ी से वह उन पर कीचड़ उछालता है। गाँधी जी को अपमानित करने की श्रंखला में नवीनतम बढ़-चढ़कर भागीदार बनकर आरएसएस के एक श्रेष्ठ स्वयंसेवक जो देश के रक्षा मंत्री भीहैं, राजनाथ सिंह सामने आये हैं। उन्होंने सावरकर पर एक पुस्तक के विमोचन के एक आयोजन में जहाँ आरएसएस के सर्वसर्वा मोहन भगवत भी मौजूद थे यह ज्ञान साझा किया कि वीरसावरकर ने जो माफ़ीनामे लिखे वे गांधीजी की सलाह पर लिखे गए थे।

मज़े की बात यह है कि सावरकर पर जिस किताब का विमोचन हो रहा था उस के लेखकों [उदय माहूरकर व चिरायु पंडित] ने इसी आयोजन में बताया कि उनकी किताब में ऐसा कोई ज़िक्र नहीं है!

बेहद चौंकाने वाली यह सूचना आरएसएस या हिन्दुत्वादी ख़ेमे द्वारा देश से पहली बार साझा की जा रही थी। आरएसएस और हिन्दू महासभा से जुड़े लोगों ने सावरकर के जीवन पर लगभग 7 प्राधिकृत जीवनियां लिखी हैं, सावरकर जो ख़ुद एक सफल लेखक थे और जिन्हों ने अपने जीवन के पल-पल का ब्यौरा अपनी लेखनी में पेश किया है और उनके सचिव ए एस भिड़े ने उनके हर रोज़ के कार्यकलापों का संग्रह संयोजित किया है, इन में से किसी में भी सावरकर के मफ़ीनामों में गांधीजी की भूमिका का कहीं भी ज़िक्र नहीं है।    

गाँधी जी को सावरकर के मफ़ीनामों का प्रेरक बताने वाले सफ़ेद झूठ की ग़ैर-ऐतिहासिकता।

सावरकर को 50 साल की क़ैद भुगतने के लिये 4 जुलाई 1911 को काला पानी लाया गया[वे केवल 10 साल वहां रहेऔर फिर महाराष्ट्र की जेलों में हस्तांतरित किये गये।कुल मिलाकर 13 साल जेल में रहे अर्थात उन्हें लगभग 37 साल की क़ैद से छूट मिली], चंद महीनों में ही उन्हों ने अपना पहला माफ़ीनामा अँगरेज़ हकूमत को पेश कर दिया। उनका सब से विस्तृत और शर्मनाक माफ़ीनामा 14 नवंबर 1913 को सीधे उस समय के अँगरेज़ ग्रह मंत्री रेजिनाल्ड क्रेडॉक को सौंपा गया। 1914 में वे एक और माफ़ीनामा पेश कर चुके थे। जब कि गाँधी जी 2015 में ही भारत आये। गाँधीजी किस माध्यम से दक्षिण अफ़्रीका से सावरकर तक पहुंचे इस का कोई सबूत देना राजनाथ सिंह ने ज़रूरी नहीं समझा।

गाँधी जी ने 1920 में ज़रूर सावरकर और उनके भाई की रिहाई की मांग उठाई, लेकिन उन्हें माफ़ी मांगने की सलाह दी, इस का कोई सबूत नहीं है।

सच तो यह हे कि गाँधी जी ने सावरकर और उनके भाई के बारे में जो लिखा वह सावरकर के राष्ट्रविरोधी चरित्र को ही रेखांकित करता है।

गाँधी जी ने लिखा : “वे स्पष्ट रूप से यह जताते हैं कि अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से देश को आज़ाद करने की उनकी कोई ख़्वाहिश नहीं है। उस के बरक्स उन का मानना है कि भारत का भविष्य अँगरेज़ राज में ही उज्जवल हो सकता है।”

सावरकर के माफ़ीनामे भारत की जंग-ए-आज़ादी से ग़द्दारी के ऐलान-नामे थे।

  सावरकर के 6 मफ़ीनामों के सन्दर्भ में इस पहलू से अवगत होना ज़रूरी है कि क़ैदियों को यह अधिकार अँगरेज़ सरकार ने दिया हुआ था कि वे उनके साथ ख़राब बर्ताव, ज़ुल्म या नाइंसाफ़ी को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करायें। इसे क़ानूनी भाषा में मेर्सी पेटिशन‘ [रेहम की गुहार] कहा जाता था।

काला पानी जेल में सावरकर के समकालीन 2 क्रांतिकारी क़ैदियों ने जिन के नाम हृषिकेश कांजी और नन्द गोपाल ने अँगरेज़ शासकों के समस्त मेर्सी पेटिशनपेश की थीं। इन में उन्हों ने राजनैतिक क़ैदियों पर ढाये जा रहे ज़ुल्मों की तरफ़ ध्यान दिलाया था जिस की वजह से कई इंक़लाबी दिमाग़ी संतुलन खो बैठे थे या आत्म-हत्या करने पर मजबूर हुए थे। अँगरेज़ शासकों के याद दिलाया गया था कि अगर वह सोचते हैं की ज़ुल्म ढाकर क़ैदियों में इन्क़िलाब के विचार नष्ट किये जा सकते हैं तो यह उन की बड़ी भूल थी। 

इस के विपरीत हिन्दुत्वादी वीरसावरकर ने जो माफ़ीनामे लिखे वे शर्मनाक होने से भी बढ़कर थे। अपने क्रांतिकारी इतिहास को एक बड़ी ग़लती मानने से लेकर अंग्रेज़ों के सामने घुटने टेकने के साथ-साथ देश को ग़ुलाम बनाये रखने में उनको पूरा सहयोग देने का आश्वासन भी सावरकर ने दिया। सावरकर देश से किस हद तक ग़द्दारी करने के लिए रज़ामंद थे उसकी जानकारी उनके इन शब्दों से लगायी जा सकती है। 14 नवंबर 1913 के माफ़ीनामे का अंत उन्हों ने इन शब्दों से किया:

सरकार अगर अपने विविध उपकारों और दया दिखाते हुए मुझे रिहा करती है तो मैं और कुछ नहीं हो सकता बल्कि मैं संवैधानिक प्रगति और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादारी का, जो कि उस प्रगति के लिए पहली शर्त है, सबसे प्रबल पैरोकार बनूँगा। जब तक हम जेलों में बंद हैं तब तक महामहिम की वफ़ादार भारतीय प्रजा के हज़ारों घरों में उल्लास नहीं आ सकता क्योंकि खून पानी से गाढ़ा होता है। लेकिन हमें अगर रिहा किया जाता है तो लोग उस सरकार के प्रति सहज ज्ञान से खुशी और उल्लास में चिल्लाने लगेंगे, जो दंड देने और बदला लेने से ज़्यादा माफ़ करना और सुधारना जानती है।

इसके अलावा, मेरे संवैधानिक रास्ते के पक्ष में मन परिवर्तन से भारत और यूरोप के वो सभी भटके हुए नौजवान जो मुझे अपना पथ प्रदर्शक मानते थे वापिस आ जाएंगे। सरकार, जिस हैसियत में चाहे मैं उसकी सेवा करने को तैयार हूँ, क्योंकि मेरा मत परिवर्तन अंतःकरण से है और मैं आशा करता हूँ कि आगे भी मेरा आचरण वैसा ही होगा।

मुझे जेल में रखकर कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि रिहा करने में उससे कहीं ज़्यादा हासिल होगा। ताक़तवर ही क्षमाशील होने का सामर्थ्य रखते हैं और इसलिए एक बिगड़ा हुआ बेटा सरकार के अभिभावकीय दरवाज़े के सिवा और कहाँ लौट सकता है? आशा करता हूँ कि मान्यवर इन बिन्दुओं पर कृपा करके विचार करेंगे।

सावरकर का 30 मार्च 1920 का माफ़ीनामा

मुझे विश्वास है कि सरकार गौर करगी कि मैं तयशुदा उचित प्रतिबंधों को मानने के लिए तैयार हूं, सरकार द्वारा घोषित वर्तमान और भावी सुधारों से सहमत व प्रतिबद्घ हूं, उत्तर की ओर से तुर्क-अफगान कट्टरपंथियों का खतरा दोनों देशों के समक्ष समान रूप से उपस्थित है, इन परिस्थितयों ने मुझे ब्रिटिश सरकार का इर्मानदार सहयोगी, वफादार और पक्षधर बना दिया है। इसलिए सरकार मुझे रिहा करती है तो मैं व्यक्तिगत रूप से कृतज्ञ रहूंगा। मेरा प्रारंभिक जीवन शानदार संभावनाओं से परिपूर्ण था, लेकिन मैंने अत्यधिक आवेश में आकर सब बरबाद कर दिया, मेरी जिंदगी का यह बेहद खेदजनक और पीड़ादायक दौर रहा है। मेरी रिहार्इ मेरे लिए नया जन्म होगा। सरकार की यह संवेदनशीलता दयालुता, मेरे दिल और भावनाओं को गहरार्इ तक प्रभावित करेगी, मैं निजी तौर पर सदा के लिए आपका हो जाऊंगा, भविष्य में राजनीतिक तौर पर उपयोगी रहूंगा। अक्सर जहां ताकत नाकामयाब रहती है उदारता कामयाब हो जाती है।

गाँधी जी ने सावरकर को रिहाई का रास्ता सुझाया और सावरकर ने उनकी हत्या कराई!

एक क्षण के लिए हम मान लेते हैं कि गाँधी जी के सुझाव पर सावरकर ने माफ़ीनामे लिखे थे। इस का साफ़ मतलब हुआ कि गांधी जी सावरकर से हमदर्दी रखते थे, उनके प्रति कोई द्वेष नहीं रखते थे और उनकी रिहाई चाहते थे। इस का सिला या इनाम सावरकर और उनके गुर्गों ने गाँधी जी को क्या दिया; उनकी निर्मम हत्या कराई गयी।

सावरकर सीधे गाँधी जी की हत्या की साज़िश में शामिल थे इस सच्चाई को किसी और ने नहीं बल्कि आरएसएस के प्रिय, देश के पहले गृह-मंत्री सरदार पटेल ने उजागर किया था। उन्होंने प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू को फ़रवरी 27, 1948 के पत्र और हिन्दू महासभा के वरिष्ठ नेता श्यामा प्रसाद मुकर्जी को जुलाई 18, 1948 के पत्र में साफ़ तौर पर बताया कि आरएसएस और हिन्दू महासभा ने सावरकर के नेतृत्व में गाँधी जी की हत्या की साज़िश रची और कार्यान्वित किया।

इस से पता लग जाता है कि सावरकर और उनके इशारों पर काम कर रहा हिन्दुत्वादी गिरोह कितना पतनशील, आपराधिक मानसिकता वाला और अहसान फरामोश था।

गाँधी जी के प्रति नफ़रत हिन्दुत्वादी गिरोह की रगों में दौड़ती है।

यह पूरा देश जानता है कि किस तरह आरएसएस से जुड़े ओहदेदार, नेता; राज्यपाल, मंत्री, देश की संसद तथा राज्यों की विधान सभाओं के सदस्य लगातार चिल्ला-चिल्ला कर यह मांग करते रहते हैं कि गाँधी जी के हत्यारों को स्वतंत्रता सेनानी घोषित किया जाये और उन्हें राष्ट्रीय सम्मान दिये जाएं। हिन्दुत्वादी संगठनों से जुड़े लोग देश के विभिन्न हिस्सों में गाँधी जी के मुख्य हत्यारे नाथूराम गोडसे की पूजा करने के उद्देश्य से मूर्तियां स्थापित करके मंदिर खड़े करते रहे हैं।

बहुत समय नहीं बीता है जब गाँधी जी की जयंती के अवसर पर भाजपा आईटी-प्रकोष्ठ इंदौर के प्रभारी विक्कि मित्तल [जिन्हें प्रधान मंत्री मोदी फ़ेसबुक पर फ़ॉलोकरते हैं ] ने मांग की थी कि अगर यह जानना हो की गांधी और गोड्से में से कौन अधिक लोकप्रिय है “गोड्से की पिस्तौल की नीलामी की जाए। पता चल जाएगा कि के गोड्से आतंकवादी था या देशभक्त? यह लफ़ंगा मुतमइन था कि गांधी का हत्यारा ही जीतेगा।

आप यदि समझते हैं कि यह सब आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की जानकारी के बिना हो रहा है, तो भारी भूल में है। आरएसएस से संबद्ध एक प्रमुख हिंदूत्ववादी संगठन 'हिंदू जनजागृति समिति' है। भारत में 'हिंदू राष्ट्र की स्थापना' के लिए यह नियमित रूप से अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करती है। इससे सम्बंधित 'सनातन संस्था' के सदस्य अनेक आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं। मुस्लमान बहुल क्षेत्रों और उन के धार्मिक स्थलों में बम विस्फोट की घटनाओं के अलावा गोविंद पानसरे, नारायण दाभोलकर, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों की हत्या के आरोपों में भी यह जांच के दायरे में है। 'हिंदू जनजागृति मंच' का गोवा सम्मेलन (जून 6-10, 2013) गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्रभाई मोदी के शुभकामना संदेश के साथशुरू हुआ था। इसमें भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने की अपनी परियोजना की सफलता की कामना की गई थी। 

इंसानियत की तमाम हदें पर करते हुए, इसी मंच से जून 10 को हिंदुत्व वादी संगठनों, विशेष कर आरएसएस के क़रीबी लेखक केवी सीतारमैया का भाषण हुवा। उन्हों ने आरम्भ में ही घोषणा की कि, गाँधी भयानक दुष्कर्मी और सर्वाधिक पापी था”। उन्हों ने अपने भाषण का अंत, गाँधीजी के क़ातिल गोडसे का महामण्डन करते हुए, इन शर्मनाक शब्दों से किया: “जैसा कि भगवन श्री कृष्ण ने कहा है- दुष्टों के विनाश के लिए, अच्छों की रक्षा के लिए और धर्म की स्थापना के लिए, में हर युग में पैदा होता हूँ‘ 30 जनवरी की शाम, श्री राम, नाथूराम गोडसे के रूप में आए और गाँधी का जीवन समाप्त कर दिया।”

आरएसएस से जुड़े दिमाग़ी तौर पर बीमार इस व्यक्ति ने गाँधी जी की हत्या को वधबताते हुए अंग्रेज़ी में एक किताब भी लिखी है जिस का शीर्षक गाँधी मर्डरर ऑफ़ गाँधी‘ (गाँधी का हत्यारा गाँधी) है।

राजनाथ सिंह के बयान के पीछे का असली मकसद।

सवाल यह उठता है कि राजनाथ सिंह को अचानक सावरकर के थू-थू किये जाने वाले मफ़ीनामों से गाँधी जी को जोड़ने की कियों ज़रुरत पड़ी है। उनका बयान किसी बेवक़ूफ़ी या जल्द बाज़ी का नतीजा नहीं है। हिन्दुत्वादी शासक टोली को गाँधी जी से डर लग रहा है। भारतीय प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र और समावेशी भारतीय समाज पर ताबड़तोड़ हमलों के बावजूद लोग हिंदुत्वादी शासकों की कॉर्पोरटे-परस्त, हिन्दू धर्म की ब्राह्मणवादी व्याख्या को देश पर थोपने और खुल्लमखुल्ला म जान विरोधी नीतियों के प्रतिरोध में एकजुट हो रहे हैं। गाँधी जी जिन की विरासत को भुला दिया गया था लोगों ने उसे पुनर्जीवित किया है। गाँधी जी इन संघर्षों के प्रेरणा सरोत्र बन रहै हैं। 

आरएसएस-भाजपा शासक परेशान हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि गाँधी जिन की हत्या हिन्दुत्वादी शासक टोली के हिन्दुत्वादी वालिदैन ने बहुत पहले करदी थी, का भारत का विचार [Idea of India] पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है और उनके हिन्दुत्वादी राष्ट्र के विचार को मूंह-तोड़ जवाब दे रहा है। अब एक ही रास्ता बचा है की गांधी को सावरकर और गोडसे के बराबर ला खड़ा किया जाये। गाँधी को उतना ही बौना बना दिया जाये जितना सावरकर और गोडसे थे।

राजनाथ सिंह जैसे आरएसएस के विचारक ऊल-जलूल बयान देकर गाँधी जी की असली पहचान को मलियामेट करना चाहते हैं। फ़िलहाल वे सब यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जब गाँधी की हत्या करके उनके विचारों को नहीं मारा जसका तो उनके विचार कैसे मर सकते हैं!

शम्सुल इस्लाम

गोलवलकर की परोक्ष धमकी के छह सप्ताह बाद हो गई थी गांधी जी की हत्या !

गाँधी जी और हिंदुत्व टोली : गाँधी जयंती (2 अक्टूबर 2021) पर विशेष | Special on Gandhi Jayanti (2 October 2021)

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधी जी की हत्या (Gandhi’s assassination) पर, आरएसएस के लोगों ने जो जहर फैलाया हुआ था, उसकी वजह से हुई। देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने 11 नवंबर, 1948 को एमएस गोलवलकर (जो उस समय आरएसएस के मुखिया थे) को एक खत लिखा था। इस खत में विभाजन के दौरान हिंसा में आरएसएस के शामिल होने की चर्चा करने के बाद सरदार बहुत स्पष्ट शब्दों में गोलवलकर को बताते हैं कि आरएसएस ने कांग्रेस का विरोध

इस कठोरता से कि न व्यक्तित्व का खयाल, न सभ्यता व विशिष्टता का ध्यान रखा, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी थी। इनकी सारी तकरीरें सांप्रदायिक विष से भरी थीं। हिंदुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबंध करने के लिए यह आवश्यक न था कि यह जहर फैले। उस जहर का फल अंत में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहनी पड़ी और सरकार व जनता की सहानुभूति जरा भी आरएसएस के साथ न रही बल्कि उनके खिलाफ हो गई। उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया था और मिठाई बांटी उससे यह विरोध और भी बढ़ गया और सरकार को इस हालत में आरएसएस के खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी ही था।

उससे पहले 18 जुलाई, 1948 को हिंदू महासभा के एक प्रमुख नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे एक पत्र में भी हिंदू महासभा के साथ-साथ आरएसएस को भी महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए सरदार पटेल ने लिखा था

जहां तक आरएसएस और हिंदू महासभा की बात है, गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है और मुझे इसमें इन दोनों संगठनों की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए लेकिन हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं का खासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर कांड सभव हो सका।“ 

गांधी जी के खिलाफ आरएसएस का घृणा अभियान उतना ही पुराना है जितना आरएसएस का गठन। आरएसएस के संस्थापक डॉ. केबी हेडगेवार कांग्रेस के नेता थे लेकिन 1925 में कांग्रेस से अलग हो गए। हिंदुत्ववादी वीडी सावरकर से मुलाकात के बाद उन्होंने महसूस किया कि हिंदुओं को संगठित करने के हिंदुत्ववादी प्रोजेक्ट में गांधी जी सबसे बड़ी बाधा हैं। हेडगेवार ने कांग्रेस इसलिए छोड़ा क्योंकि गांधी जी हिंदुओं और मुसलमानों को साझे राष्ट्र का हिस्सा मानते थे।

दरअसल, हेडगेवार को गांधी जी से इसी मुद्दे को लेकर बेइंतहा नफरत थी। इसी नफरत की वजह से हेडगेवार ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ आरएसएस शुरू की थी।

आरएसएस के एक प्रकाशन के मुताबिक, गांधी के हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अभियान से डॉक्टर हेडगेवार खतरा महसूस करते थे।

आरएसएस का एक अन्य प्रकाशन कहता है कि हेडगेवार के कांग्रेस से अलग होने और आरएसएस के गठन का प्रमुख कारण था कि कांग्रेस हिंदू-मुस्लिम एकता में विश्वास करती है।

आरएसएस ने अपना अंग्रेजी मुखपत्र आर्गनाइजर जुलाई, 1947 में शुरू किया और 30 जनवरी1948 को गांधी जी की हत्या तक उसमें गांधी जी के खिलाफ बड़े पैमाने पर घृणास्पद सामग्री प्रकाशित की जाती रही।   [गाँधी जी के खिलाफ ज़हर उगलते दो कार्टून इस लेख के आख़िर में दर्शाए गए हैं।]

6 दिसंबर, 1947 को गोलवलकर ने आरएसएस कार्यकर्ताओं की एक बैठक गोवर्धन (मथुरा) में बुलाई। इस बैठक की ख़ुफ़िया विभाग की रिपोर्ट राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद है। इस बैठक में इस पर विचार-विमर्श किया गया कि किस तरह कांग्रेस के नेतृत्वकारी लोगों की हत्याएं की जाएं ताकि लोग आतंकित होकर हमारे नियंत्रण में आ जाएं। इसके दो दिन बाद दिल्ली के रोहतक रोड कैंप में हजारों की तादाद में उपस्थित स्वयंसेवकों की भीड़ को संबोधित किया।

पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक आरएसएस नेता ने कहा कि अगर कोई हमारे रास्ते में आएगा, तो उसे समाप्त कर दिया जाएगा चाहे वह नेहरू सरकार हो या कोई अन्य सरकार। मुसलमानों के बारे में कहा कि धरती पर कोई ताकत नहीं जो उन्हें हिंदुस्तान में रख सके। उन्हें इस देश को छोड़ देना चाहिए। अगर मुसलमानों को इस देश में रखा जाता है, जो गांधी जी और नेहरू जी कह रहे हैं, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी भारत सरकार की होगी और अगर कुछ भी होगा, तो उसकी जिम्मेदारी हिंदू कम्युनिटी की नहीं होगी। महात्मा गांधी को हिंदुओं को भ्रमित करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। 

गोलवलकर ने बहुत साफ़ शब्दों में कहा वी हैव द मीन्स ह्वेयरबाई (आवर) अपोनेन्ट्स कुड बी इमेडिएट्ली साइलेन्स्ड।यानी हमारे पास ऐसे साधन उपलब्ध हैं जिन के द्वारा हमारे विरोधियों को तुरंत खामोश किया जा सकता है इसके छह सप्ताह बाद गांधी जी की हत्या कर दी गई। इसे अच्छी तरह से समझ लिया जाना चाहिए।  

आरएसएस के गांधी जी के ख़िलाफ़ भीषण घृणा अभियान ने गांधी जी की हत्या तो कराई ही, आरएसएस अभी भी लगातार घृणा अभियान चलाता रहता है। गांधी जी के हत्यारों को देशभक्त बताया जाता है, कहा जाता है कि इनको देश के सबसे बड़े सम्मान दिए जाएं, उनकी मूर्ति लगाई जाए। छत्तीसगढ़ में 2018 में अपने भाषण में अमित शाह ने गांधी जी को चतुर बनिया कहा था।

शाह ने गांधी जी को देश का नेता नहीं मानकर, हिंदुओं का भी नेता नहीं मानकर उनके लिए जिन्ना के शब्दों का इस्तेमाल किया।

इसके अलावाआरएसएस से संबद्ध एक प्रमुख हिंदूत्ववादी संगठन हिंदू जनजागृति समिति’ भारत में हिंदू राष्ट्र की स्थापना’ के लिए नियमित रूप से राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करती है। इससे संबंधित सनातन संस्था’ के सदस्य अनेक आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं। मुसलमान बहुल क्षेत्रों और उनके धार्मिक स्थलों में बम विस्फोट की घटनाओं के अलावा गोविंद पानसरे, नारायण दाभोलकर, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों की हत्या के आरोपों में भी यह जांच के दायरे में है। 

हिंदू जनजागृति समिति’ का गोवा सम्मेलन (7 जून2013) गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्रभाई मोदी के शुभकामना संदेश के साथ शुरू हुआ था। इसमें भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने की अपनी परियोजना की सफलता की कामना की गर्इ थी। इंसानियत की तमाम हदें पार करते हुए  इसी मंच से 10 जून को हिंदुत्ववादी संगठनों, विशेष कर आरएसएस के करीबी लेखक केवी सीतारमैया का भाषण हुआ। उन्होंने आरंभ में ही घोषणा की, गांधी भयानक दुष्कर्मी और सर्वाधिक पापी था। उन्होंने अपने भाषण का अंत गांधी जी के कातिल गोड्से का महिमामंडन करते हुए इन शर्मनाक शब्दों से किया : 

जैसा कि भगवान श्री कृष्ण ने कहा है, दुष्टों के विनाश के लिए, अच्छों की रक्षा के लिए और धर्म की स्थापना के लिए  मैं हर युग में पैदा होता हूं। 30 जनवरी की शाम  श्री राम नाथूराम गोड्से के रूप में आए और गांधी का जीवन समाप्त कर दिया।

इस भाषण की रिपोर्ट हिंदू जनजागृति समिति की वेबसाइट से हटा दी गर्इ है लेकिन यह अमेरिका आधारित एक वेबसाइट ‘’फ़ोरम फ़ॉर हिन्दू अवेकनिंग‘’ (हिंदू जागृति के लिए एक मंच) पर उपलब्ध है। दूसरे हिन्दुत्वादियों की तरह गाँधी जी की हत्या पर जश्न मनाने वाले इस दिमाग़ी तौर पर बीमार व्यक्ति ने उनके ख़िलाफ़ अंग्रेज़ी में दो पुस्तकें गाँधी वास् धर्म दिरोहि एंड देस दिरोही‘ [गाँधी धर्म द्रोही और देश द्रोही था] और गाँधी ए मर्डरर ऑफ़ गाँधी‘ [गाँधी का एक क़ातिल गाँधी] भी लिखीं जो नरेंद्रभाई मोदी द्वारा उद्घाटन किये गए इस राष्ट्र-विरोधी आयोजन में खुले-आम बेची जा रही थीं।  [इन दोनों किताबों के कवर इस लेख के आख़िर में दर्शये गए हैं।] 

इसी तरह, भाजपा आईटी प्रकोष्ठ इंदौर के प्रभारी विक्की मित्तल ने मांग की है कि यह तय करने के लिए कि गांधी और गोड्से में से कौन अधिक लोकप्रिय है, गोड्से की पिस्तौल की नीलामी की जाए। पता चल जाएगा कि गोड्से आतंकवादी था या देशभक्त? प्रधान मंत्री मोदी तक इस व्यक्ति को फ़ेसबुक पर फॉलो करते हैं। इस सबके बाद भी अगर कोई यह समझता है कि यह सब कुछ आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की जानकारी के बिना हो रहा है, तो वह भारी भूल में है। 

शम्सुल इस्लाम 

2 October, 2021

 

‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ मनाने की योजना सादवाद और आपराधिक प्रवृत्ति से पीड़ित दिमाग़ की उपज है!

shamsul islam

अमृतसर में सिखों ने मुसलमानों को और लाहौर में मुसलमानों ने हिंदुओं को बचाया। मालेर कोटला को सिखों ने बचाया। हांसी (हरियाणा) में इंज़माम-उल-हक़ [पाकिस्तान का मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी] के परिवार को एक गोयल परिवार ने बचाया था। ऐसे हजारों किस्से हैं।

The plan to celebrate ‘partition horror memorial day’ is a brainchild of sadism and criminal inclination!

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ मनाने से पहले कुछ खास बातों को जरूर जान लेना चाहिए। एक यह कि भारत पांच हजार साल पुरानी सभ्यता है। दूसरा कि यह कोई पहली विभीषिका नहीं है। महाभारत की विभीषिका हुई। हमारी पुरानी कथाओं के मुताबिक 120 करोड़ लोग इसमें मारे गए। द्रोपदी के कपड़े उतारे गए। सीता का अपहरण हुआ। द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा कटवाया। गांधी जी की हत्या की गई। दलितों और अल्पसंखयकों के हज़ारों जनसंहार हुए जिन के मुजरिमों की पहचान और सज़ा का अभी भी इंतज़ार है। आशा है प्रधान-मंत्री मोदी इन विभीषिकाओं की स्मृति के दिवसों की भी जल्द ही घोषणा करेंगे। 

मोदी द्वारा हर 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ मनाने की घोषणा का जिस हर्षोउल्लास के साथ हिन्दुत्ववादी टोली ने स्वागत किया है, उस से साफ़ पता लगता है कि उनके हाथ उत्तर प्रदेश के चुनाव से पहले मुसलमानों को हड़काने और ज़लील करने का एक नया अस्त्र उनके हृदय-सम्राट ने उनको उपलब्ध करा दिया है। सब मुसलमानों ने मिलकर विभाजन कराया था और हिंसा एक-तरफ़ा थी इस कथानक के झूठ को जानना ज़रूरी है।

इस शर्मनाक सच के दस्तावेज़ी सबूत मौजूद हैं कि सन 1906 में हिंदू महासभा और आर्य समाज ने घोषणा कर दी थी कि हिंदुस्तान सिर्फ़ हिन्दुओं के लिए है, उन को यहाँ रहना है तो हिन्दू बनकर रहना होगा नहीं तो मुसलमानों को अफगानिस्तान भेज दिया जाए।

सन 1924 में लाला लाजपत राय ने लिख दिया था कि मुसलमानों को जहां-जहां वे बहुसंख्यक हैं, एक नहीं, दो नहीं, तीन-चार पाकिस्तान दे दिए जाएं। लेकिन उन से छुटकारा पा लिया जाए।

सन् 1937 में सावरकर ने अहमदाबाद में जब पहली बार हिंदू महासभा की कमान संभाली, तो कह दिया कि हिंदू मुसलमान दोनों प्रतिद्वंद्वी हैं और दोनों साथ नहीं रह सकते।

“फ़िलहाल हिंदुस्तान में दो प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र पास-पास रह रहे हैं। कई अपरिपक्व राजनीतिज्ञ यह मानकर गंभीर ग़लती कर बैठते हैं कि हिंदुस्तान पहले से ही एक सद्भावपूर्ण राष्ट्र के रूप में ढल गया है या सिर्फ हमारी इच्छा होने से ही इस रूप में ढल जायेगा। इस प्रकार के हमारे नेक नीयत वाले पर लापरवाह दोस्त मात्र सपनों को सच्चाईयों में बदलना चाहते हैं। दृढ़ सच्चाई यह है कि तथाकथित सांप्रदायिक सवाल और कुछ नहीं बल्कि सैकड़ों सालों से हिन्दू और मुसलमान के बीच सांस्कृति, धार्मिक और राष्ट्रीय प्रतिद्वंदिता के नतीजे में हम तक पहुंचे हैं। आज यह क़तई नहीं माना जा सकता कि हिंदुस्तान एक एकता में पिरोया हुआ और मिलाजुला राष्ट्र है। बल्कि इसके विपरीत हिंदुस्तान में मुख्यतौर पर दो राष्ट्र हैं-हिन्दू और मुसलमान।”

सच्ची बात यह है कि जिन्ना ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को 1940 में अपनाया।

मशहूर समाजवादी चिंतक और आज़ादी की जंग के एक स्तंभ डॉ. राम मनोहर लोहिया ने साफ लिखा कि हिंदुत्व इसके लिए जिम्मेदार था क्योंकि उसने इस तरह के हालात पैदा कर दिए कि हिंदू मुसलमानों के बीच कोई भी समझौता नहीं हो सके। डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनुसार –

“हिंदुत्ववादी संगठन मुस्लिम विरोधी प्रचार के चलते मुस्लिम लीग के लिए अच्छा-खासा आधार तैयार चुके थे, जिसके आसरे लीग मुस्लिमों के बीच संरक्षक के तौर पर लोकप्रियता हासिल कर सके। इससे ब्रिटेन एवं मुस्लिम लीग को देश का विभाजन करने में मदद मिली…उन्होंने एक ही देश में हिंदू व मुस्लिमों को आपस में करीब लाने के लिए कुछ भी नहीं किया। इसके उलट, उन्होंने इनमें परस्पर एक दूसरे के बीच मनमुटाव पैदा करने की हर संभव कोशिश की। इस तरह की हरकतें ही देश के विभाजन की जड़ों में थीं।”

द्विराष्ट्र का सिद्धांत था कि हिंदू मुसलमान साथ नहीं रह सकते। जिन्ना ने तो यह 1940 में कहा। आर्य समाज, लाला लाजपत राय, भाई परमानंद और लाला हरदयाल यह कब से कह रहे थे कि मुसलमानों की शुद्धि करो, नहीं तो इनको अफगानिस्तान की तरफ भेज दो।

सावरकर ने सन् 1923 में अपनी किताब ‘हिंदुत्व’ में यह सब लिखा। 1939 में गोलवरकर ने ‘वी ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइंड’ में कहा कि हिंदू मुसलमान साथ नहीं रह सकते।

इतना ही नहीं, 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ। 14 अगस्त को आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने दो संपादकीय लिखे। इनमें लिखा कि तिरंगा झंडा (जो सारे हिंदू, मुसलमान, सिख और इसाई की एकता का झंडा है) को हम नहीं मानते। यह तीनों रंग मनहूस हैं। फिर लिखा कि इस आजादी को हम नहीं मानते क्योंकि इसमें यह माना जा रहा है कि हिंदुओं के अलावा बाकी दूसरे धर्मों के लोग भी भारत राष्ट्र में शामिल होंगे।

इस सबके बीच बहुत महत्वपूर्ण बात है कि 1947 में हिंदू मुसलमान और सिखों ने एक-दूसरे को बचाने की जो कोशिशें कीं, वह अद्भुत हैं। अगर इंसानी समाज में विश्वास करते हैं, तो उनको महिमामंडित करना चाहिए। जैसे, महशहूर अभिनेता सुनील दत्त के पूरे परिवार की एक मुसलमान मां ने (जिसके छह बेटे सेना में थे) कैसे हिफाजत की। उस मां ने अपने बेटों से कहा कि अगर तुमने मेरा दूध पिया है, तो तुम लोगों को हिंदुओं को बचाना होगा और उन्होंने बचाया।

  • अमृतसर में सिखों ने मुसलमानों को और लाहौर में मुसलमानों ने हिंदुओं को बचाया।
  • मलेर कोटला को सिखों ने बचाया।
  • हांसी (हरियाणा) में इंज़माम-उल-हक़ [पाकिस्तान का मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी] के परिवार को एक गोयल परिवार ने बचाया था।

ऐसे हजारों किस्से हैं। 

यह जानना कम दिलचस्प नहीं होगा कि आखिर अब अचानक इसकी याद क्यों आई। इसलिए कि हिंदू मुसलमान करने के इनके सारे फार्मूले नाकाम हो चुके हैं। बंगाल चुनाव ने क्या तय किया। बंगाल चुनाव में सन 1947 के बाद सबसे ज्यादा हिंदू मुसलमान झगड़ा कराने का प्रयास किया गया। ममता बनर्जी को बेगम तक कहा गया। इसके बावजूद यह चला नहीं। लव जिहाद नहीं चला। मुसलमानों की आबादी बढ़ती जा रही है, नहीं चला। तो अब यह नया शिगूफा। यह भी नहीं चलेगा क्योंकि लोग बहुत झेल चुके हैं। 

यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जिन्ना की तारीफ तो आडवाणी ने वहां जाकर की थी जहां पाकिस्तान का प्रस्ताव पास हुआ था। पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह जिन्ना को सेक्युलर बता चुके हैं।

संघ टोली के प्यारे और पूजनीय वीर” सावरकर ने सात बार अंग्रेजों से माफी मांगी। आजादी की लड़ाई में इनका कोई आदमी वंदे मातरम गाते हुए या गौहत्या पर पाबंदी लगवाने के लिए एक मिनट के लिए भी कभी जेल नहीं गया।

सन् 1932 से लेकर 1939 तक दीनदयाल उपाध्याय, एल के आडवाणी, नानाजी देशमुख और गोलवरकर आरएसएस में आ गए। 14 अगस्त, 1947 को कहा कि राष्ट्रीय झंडा मनहूस झंडा है। हिंदू इसको कभी नहीं मानेंगे।

आजादी के बाद जब देश लड़खड़ा रहा था, अर्थव्यवस्था खराब थी और दंगे हो रहे थे, तब इन्होंने गांधी जी की हत्या की और उसके बाद गाय के नाम पर इन्होंने पार्लियामेंट को घेरा। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के घर को आग लगाई। यह देश को अस्थिर करने में लगे थे। यानी यह वह सब कर रहे थे जो पाकिस्तान चाह रहा था। यह इनका राष्ट्रविरोधी चरित्र रहा है। अभी भी वही कर रहे हैं।

पाकिस्तान का इंटरेस्ट यह है कि यहां के हिंदू मुसलमान लड़ें। यह पाकिस्तान का रणनीतिक लक्ष्य है और इसे पूरा कर रहा है आरएसएस।

सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में जब कांग्रेस पार्टी प्रतिबंधित थी, उस वक्त हिंदू महासभा और आरएसएस दोनों साथ थे। इन्होंने मिलकर तीन प्रांतों में मिलीजुली सरकारें चलाईं। बंगाल में डिप्टी प्राइम मिनिस्टर (उस समय डिप्टी चीफ मिनिस्टर को डिप्टी प्रधानमंत्री कहते थे) श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। उनके पास गृह मंत्रालय था जिसका जिम्मा क्विट इंडिया मूवमेंट को दबाने का था। उन्होंने वहां के लेफ्टिनेंट गवर्नर को जो खत लिखे उसमें कहा गया था कि कैसे इस आंदोलन को दबाया जाए। वह किसी को भी शर्म दिलाने वाली चिट्ठियां हैं। इन्होंने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चलाई।

जब नेता जी सुभाषचंद्र बोस सेना बनाकर बाहर से देश को आजाद करने की कोशिश कर रहे थे, तब उनकी सेना को हराने के लिए आरएसएस की सहयोगी हिंदू महासभा ने एक लाख हिंदू अंग्रेज सेना में भर्ती कराए।

यह सब कुछ उनके दस्तावेजों में है।

यह भी देखने की बात है कि हिंदुओं से जुड़े संगठनों ने किन लोगों को मरवाया है। नरेंद्र दाभोलकर, एमएम कलबुर्गी, गोविंद पनसारे और गौरी लंकेश आदि को मरवाया। उसके बाद भीमा कोरेगांव मामले में जिन लोगों को जेलों में बंद कर रखा है, सब हिंदू और इसाई हैं। लोगों की गलतफहमी है कि ये मुसलमानों के खिलाफ और हिंदुओं के पक्ष में हैं। ये गांधी जैसे सच्चे हिंदू को बर्दाश्त नहीं कर सके। सत्ता में आने के सात साल बाद इसलिए याद आ रहा है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव आ रहा है, तो कुछ नया ढूढ़ना है। क्योंकि इस देश की 80% आबादी जो हिन्दू है उस की भुखमरी, ग़रीबी, बेरोज़गारी, बीमारी के लिए कुछ भी नहीं किया, सब को भिखारी बना दिया। लोग इनकी जुमलेबाजी से वाकिफ हैं। इनका जो 15 से 20 परसेंट का वोटर है, उसमें भी अब काफी कमी आई है।  

कोई भी देश या समाज तब चलता है जब उसमें एकता होती है और एक-दूसरे के साथ मिलना-जुलना होता है। ये लगातार साजिशें कर रहे हैं।

अगर देश में मुसलमान नहीं होते, तो यह मुसलमान पैदा कर लेते।

जिन्ना के साथ सरकारें चलाईं। आरएसएस और हिंदू महासभा दोनों ने कहा कि जिन्ना मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं और हिंदुओं के प्रतिनिधि हम हैं। बाबा साहब ने कहा कि जिस दिन हिंदुत्व का राज आ जाएगा, उस दिन इस देश की मौत हो जाएगी। किसी भी कीमत पर देश को हिंदू राष्ट्र बनने से रोका जाना चाहिए।

शम्सुल इस्लाम 

05-09-2021

syama prasad mukherjee श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने में अंग्रेजों की मदद की

70 साल का सबसे बड़ा झूठ : 1975 में आरएसएस ने इमरजेंसी के खिलाफ लड़ी थी बड़ी लड़ाई

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इमरजेंसी 1975 में आरएसएस ने लड़ी थी बड़ी लड़ाई, इससे बड़ा सफेद झूठ नहीं हो सकता कोई

(आरएसएस के मुखिया, देवरस द्वारा इंदिरा गाँधी को आपातकाल के समर्थन में लिखे गए पत्रों के मूल पाठ के साथ)

विश्व में झूठ बोलने और इतिहास को तोड़मोड़ने का प्रशिक्षण देने वाले सब से बड़े गुरुकुल, आरएसएस ने भारत में 1975 में आपातकाल राज की 46वीं बरसी पर यह दावा किया है कि देश में प्रजातंत्र बचा हुआ है क्योंकिसरकार चला रहे नेता [आरएसएसभाजपा से जुड़े] उनमें से हैं जिन्होंने [आपातकाल के ख़िलाफ़] आज़ादी की लड़ाई लड़ी। वे उदारवादी प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित हैं, किसी मजबूरी की वजह से नहीं बल्कि एक धर्मसिद्धान्त के तौर पर।

ये दावे सफ़ेद झूठ हैं क्योंकि आरएसएसभाजपा राज में एक तरह से अघोषित आपातकाल लागू है जिसका शिकार, आम लोग, राजनैतिक/सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, मज़दूर/छात्र/महिला/शिक्षक/किसान संगठन, दलित, अल्पसंख्यक समुदाय, यहाँ तक कि अदालतें भी हो रही हैं।

विश्व में प्रजातंत्र को मापने के जो मापदंड हैं उन के अनुसार मोदी राज में भारत की गिनती तानाशाही वाले देशों के साथ की जा रही है। 

यह बिला वजह नहीं है। आरएसएस से जुड़े मौजूदा भारत के शासकों की रगों में तानाशाहों वाला खून दौड़ता है और इस का श्रेय आरएसएस के सब से अहम दार्शनिक गोलवलकर को जाता है।

यह वही गुरु गोलवलकर हैं जिन्हें नफ़रत का गुरुभी कहा जाता है।

यही वह गुरु भी हैं जिन्हें मोदी जी अपने आप को एक कुशल राजनैतिक नेता में ढलने का श्रेय भी देते हैं।

गोलवलकर ने 1940 में ही आरएसएस के 1350 उच्चस्तरीय कार्यकर्ताओं के सामने भाषण करते हुए घोषणा कर दी थी कि –

 “एक ध्वज के नीचे, एक नेता के मार्गदर्शन में, एक ही विचार से प्रेरित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व की प्रखर ज्योति इस विशाल भूमि के कोनेकोने में प्रज्जवलित कर रहा है।

याद रहे कि एक झण्डा, एक नेता और एक विचारधारा का यह नारा सीधे यूरोप की नाजी एवं फ़ासिस्ट पार्टियों, जिनके नेता क्रमशः हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाह थे, के कार्यक्रमों से लिया गया था।

भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25-26 जून, 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल घोषित किया था। यह 19 महीने तक लागू रहा। इस दौर को भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में काले दिनों के रूप में याद किया जाता है।

इंदिरा गांधी का दावा था कि जयप्रकाश नारायण ने सशस्त्र बलों से कहा था कि कांग्रेस शासकों के अवैधआदेशों को नहीं मानें। इसने देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर दी और भारतीय गणतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह गया था।

    आरएसएस का दावा है कि उसने इंदिरा गंधी द्वारा घोषित आपातकाल  का बहादुरी के साथ मुकाबला किया और भारी दमन का सामना किया। बहरहाल, उस दौर के अनेक कथानक हैं, जो आरएसएस के इन दावों को झुठलाते हैं। यहां हम ऐसे दो दृष्टांतों का उल्लेख कर रहे हैं। इनमें से एक वरिष्ठ भारतीय पत्रकार और विचारक प्रभाष जोशी हैं और दूसरे, पूर्व खुफिया ब्यूरो (आईबी) प्रमुख टीवी राजेश्वर हैं, जिनके द्वारा बताई घटनाओं का जिक्र हम यहां करेंगे।

आपातकाल जिस समय घोषित किया गया था राजेश्वर आईबी के उप प्रमुख थे। राजेश्वर ने आपातकाल काल (जिसे राज्य का नंगा आतंकवाद कहना सही होगा) के उस दौर के बारे में बताया है किस तरह से आरएसएस ने इंदिरा गांधी के दमनकारी शासन के सम्मुख घुटने टेक दिए थे और इंदिरा गांधी एवं उनके पुत्र संजय गांधी को 20-सूत्रीय कार्यक्रम पूरी वफ़ादारी के साथ लागू करने का आश्वासन था। आएसएस के अनेकस्वयंसेवक20-सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने के रूप में माफिनामें पर दस्तख़त कर जेल से छूटे थे।

    इन तमाम गद्दारियों के बावजूद, ये आरएसएस वाले आपातकाल के दौरान उत्पीड़न के एवज में आज मासिक पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। भाजपा शासित राज्यों, जैसे किगुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में उन लोगों को 10,000 रुपये मासिक पेंशन देने का फैसला लिया गया है जिन्हें आपातकालीन अवधि के दौरान एक महीने से कम समय तक जेल में रखा गया था। और आरएसएस से जुड़े जो लोग इस दौरान 2 माह से कम अवधि के जेल गए थे उन्हें बतौर 20000 रुपये पेंशन देना तय किया गया है। इस नियम में उनस्वयंसेवकोंका ख्याल रखा गया है, जिन्होंने केवल एक या दो महीने जेल में रहने के बाद घबरा कर दया याचिका पेश करते हुए माफीनामे पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस पेंशन के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है कि लाभार्थी आपातकाल के पूरे दौर में जेल में रहा हो।

खास बात यह है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ़ देश की आज़ादी के आंदोलन में जेल में रहने वालों को मिलने वाली स्वतंत्रता सेनानी पेंशन पाने वालों में से एक भी आरएसएस कास्वयंसेवकनहीं है।

यहां एक तथ्य गौरतलब है कि उन सैकड़ों कम्युनिस्ट युवकों का किसी को ख्याल तक नहीं है जिन्हें आपातकाल के इस दौर में नक्सलपंथी कह कर फर्जी मुठभेड़ों मे मार दिया गया था।

यहां एक और रोचक तथ्य है कि आरएसएस के हिंदुत्व सहयात्री शिवसेना ने खुले आम आपातकाल का समर्थन किया था।

    प्रभाष जोशी का लेख अंग्रेजी साप्ताहिक तहलकामें आपातकाल की 25 वीं वर्षगांठ पर छपा थाiउनके अनुसार आरएसएस के आपातकाल विरोधी संघर्ष में सहभागिता को लेकर उस दौर में भी “मन ही मन हमेशा एक किस्म का संदेह, उसके साथ कुछ दूरी, विश्वास के कमी” का भाव था। उन्होंने आगे बताया,

“उस समय के आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस ने संजय गांधी के कुख्यात 20-सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने में सहयोग करने हेतु इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा था। यह है आरएसएस का असली चरित्रआप उनके काम करने के अंदाज़ और तौर तरीकों को देख सकते हैं। यहां तक कि आपातकाल के दौरान, आरएसएस और जनसंघ के अनेक लोग माफीनामा देकर जेलों से छूटे थे। माफी मांगने में वे सबसे आगे थे। उनके नेता ही जेलों में रह गए थे: अटल बिहारी वाजपेयी, एल के आडवाणी, यहां तक कि अरुण जेटली। आरएसएस ने आपातकाल लागू होने के बाद उसके खिलाफ किसी प्रकार का कोर्इ संघर्ष नहीं किया। तब, भाजपा आपात काल के खिलाफ संघर्ष की याद को अपनाने की कोशिश क्यों कर रही है?”

प्रभाष जोशी के निष्कर्ष के अनुसार,

“वे कभी संघर्षशील शक्ति न तो रहे हैं न ही वे कभी संघर्ष के प्रति उत्सुक रहनों वालों में से हैं। वे बुनियादी तौर पर समझौता परस्त रहे हैं। वे कभी भी सही मायने में सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वालों में नहीं रहे है।”
टी
.वी. राजेश्वर सेवानिवृत्ति के बाद उत्तर प्रदेश और सिक्किम के राज्यपाल रहे हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘इंडिया: द क्रूशियल यिर्ज़’ (हार्पर कॉलिन्स) में, इस तथ्य की पुष्टि की है कि “वह (आरएसएस) न केवल इसका (आपातकाल) का समर्थन कर रहा था, वह श्रीमती गांधी के अलावा संजय गांधी के साथ संपर्क स्थापित करना चाहता था।”ii

राजेश्वर ने मशहूर पत्रकार, करन थापर के साथ एक मुलाकात में खुलासा किया कि देवरस ने “गोपनीय तरीके से प्रधानमंत्री आवास के साथ संपर्क बनाया और देश में अनुशासन लागू करने के लिए सरकार ने जो सख़्त कदम उठाए थे उनमें से कर्इ का मजबूती के साथ समर्थन किया था। देवरस श्रीमती गांधी और संजय से मिलने के इच्छुक थे। लेकिन श्रीमती गांधी ने इनकार कर दिया।”

राजेश्वर की पुस्तक के अनुसार, “आरएसएस, एक दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, आपातकाल के समय इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन इसके प्रमुख बाला साहेब देवरसने लागू आदेशों और देश में अनुशासन को लागू करने के लिए सरकार के अनेक आदेशों का मजबूती के साथ समर्थन किया था। संजय गांधी के परिवार नियोजन अभियान और इसे विशेष रूप से मुसलमानों के बीच लागू करने के प्रयासों का देवरस का भरपूर समर्थन हासिल था।”

राजेश्वर ने यह तथ्य भी साझा किया है कि आपातकाल के बाद भी संघ (आरएसएस) ने आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को अपना समर्थन विशेष रूप से व्यक्त किया था।

यह खास तौर पर गौरतलब है, कि सुब्रमण्यम स्वामी जो अब आरएसएस के प्यादे हैं, के अनुसार भी आपातकाल की अवधि में, आरएसएस के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं ने आपातकाल के खिलाफ संघर्ष के साथ गद्दारी की थी।

आरएसएस अभिलेखागार में समकालीन दस्तावेज प्रभाष जोशी और राजेश्वर के कथन की सत्यता प्रमाणित करते हैं।

आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक, मधुकर दत्तात्रय देवरस ने आपातकाल लगने के दो महीने के भीतर इंदिरा गांधी को पहला पत्र लिखा था। यह वह समय था जब राजकीय आतंक चरम पर था। देवरस ने अपने पत्र दिनांक 22 अगस्त, 1975 की शुरुआत ही इंदिरा की प्रशंसा के साथ इस तरह की :

मैंने 15 अगस्त, 1975 को रेडियो पर लाल किले से देश के नाम आपके संबोधन को जेल (यारवदा जेल) में सुना था। आपका यह संबोधन संतुलित और समय के अनुकूल था। इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखने का फैसला किया।
इंदिरा गांधी ने देवरस के इस पत्र को जवाब नहीं दिया। देवरस ने 10 नवंबर, 1975 को इंदिरा को एक और पत्र लिखा। इस पत्र की शुरुआत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दिए गए निर्णय के लिए बधार्इ के साथ की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनको चुनाव में भ्रष्ट साधनों के उपयोग का दोषी मानते हुए पद के अयोग्य करार दिया था। देवरस ने इस पत्र में लिखा,

सुप्रीम कोर्ट के सभी पांच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव को संवैधानिक घोषित कर दिया है, इसके लिए हार्दिक बधाई।

गौरतलब है कि विपक्ष का दृढ़ मत था कि यह निर्णय कांग्रेस के द्वारा ‘मैनेज्ड’ था। देवरस ने अपने इस पत्र में यहां तक कह दिया कि

आरएसएस का नाम जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ अन्यथा जोड़ दिया गया है। सरकार ने अकारण ही गुजरात आंदोलन और बिहार आंदोलन के साथ भी आरएसएस को जोड़ दिया हैसंघ का इन आंदोलनों से कोई संबंध नहीं है …”

इंदिरा गांधी ने क्योंकि देवरस के इस पत्र का भी जवाब नहीं दिया, आरएसएस प्रमुख ने विनोबा भावे के साथ संपर्क साधा, जिन्होंने आपातकाल का आध्यात्मिक समर्थन और इंदिरा गांधी का पक्ष लिया था।

देवरस ने अपने पत्र दिनांक 12 जनवरी, 1976 में, आचार्य विनोबा भावे से गिड़गिड़ाते हुए आग्रह किया कि आरएसएस पर प्रतिबंध हटाए जाने के लिए वे इंदिरा गांधी को सुझाव दें।ix 

आचार्य विनोबा भावे ने भी पत्र का जवाब नहीं दिया, हताश देवरस ने तो उन्हों ने एक और पत्र लिखा जिस पर तिथि भी अंकित नहीं है उन्होंने लिखा:

“अखबारों में छपी सूचनाओं के अनुसार प्रधान मंत्री (इंदिरा गांधी) 24 जनवरी को वर्धा पवनार आश्रम में आपसे मिलने आ रही हैं। उस समय देश की वर्तमान परिस्थिति के बारे में उनकी आपके साथ चर्चा होगी। मेरी आपसे याचना है कि प्रधानमंत्री के मन में आरएसएस के बारे में जो गलत धारणा घर कर गर्इ है आप कृपया उसे हटाने की कोशिश करें ताकि आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाया जा सके और जेलों में बंद आरएसएस के लोग रिहा होकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रगति और विकास में सभी क्षेत्रों में अपना योगदान कर सकें।”                                   

आरएसएस को आपातकाल के मुजरिमों को गले लगाने में भी कोई एतराज़ नहीं रहा है।  भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 2018 में स्वयंसेवकों के दीक्षा समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था।[i] प्रणब मुखर्जी की गिनती आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों के लिए जिम्मदार सर्वोच्च कांग्रेसी नेताओं में होती है और शाह आयोग ने भी आपातकाल की  ज़्यादतियों के लिए उन्हें प्रमुख रूप से ज़िम्मेदार  माना था। आरएसएस के प्रधान कार्यालय पर प्रणब का सत्कार करते हुवे ज़ाहिर है आरएसएस को किसी भी तरह की लज्जा नहीं आयी। आरएसएस की त्रासदी यह है कि भारत में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अभी तक क़ायम है। यही उसकी विवशता है। हालांकि वह नग्न तानाशाही का कट्टर हिमायती है परंतु उसे अपनी इस असलियत को छुपाने के लिए मुखौटे लगाने पड़ते हैं।

शम्सुल इस्लाम
25 जून, 2021

देवरस के सभी पत्र आरएसएस के एक प्रकाशन से लिए गए हैं। 

70 साल का सबसे बड़ा झूठ,1975 में आरएसएस ने इमरजेंसी के खिलाफ लड़ी थी बड़ी लड़ाई

[i]

क्या आपने ‘माँ भारती के अमर सपूत’ सावरकर के माफीनामा पत्र पढ़े ?

savarkar

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वीडी सावरकर की जयंती पर ट्वीट कर इन शब्दों में सावरकर को श्रद्धांजलि दी,

“माँ भारती के अमर सपूत, प्रखर राष्ट्रवादी नेता, महान क्रांतिकारी, ओजस्वी वक्ता, स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर जी को उनकी जयंती पर कोटिशः नमन।”

इस अवसर पर अचानक द्विराष्ट्र सिद्धांत के प्रवर्तक विनायक दामोदर सावरकर के माफीनामे सर्च किए जाने लगे। सावरकर स्वातंत्र्यवीर थे या माफीवीर थे, यह तय करना हमारा काम नहीं है। प्रो. शम्सुल इस्लाम ने “आरएसएस के महापुरुष, हिन्दुत्व के जनक ‘वीर’ सावरकर के 1913 और 1920 के माफ़ीनामों का मूल-पाठ” जून 2019 में हमें उपलब्ध कराया था, जिसे प्रकाशित किया गया था। पाठकों की सुविधा के लिए पुनर्प्रकाशन

आरएसएस के महापुरुष, हिन्दुत्व के जनक ‘वीर‘ सावरकर के 1913 और 1920 के माफ़ीनामों (सावरकर माफीनामा पत्र – Savarkar letter of apology) का मूल-पाठ

वी. डी. सावरकर (अभियुक्त नं. 32778) की अर्ज़ी में (जिसे गवर्नर जनरल की काउंसिल के होम मेम्बर, सर रेगिनाल्ड क्रैडॉक को 14 नवंबर 1913 को सावरकर ने व्यक्तिगत तौर पर उस समय सौंपा था जब क्रैडॉक अक्टूबर-नवंबर 1913 में अंडमान के दौरे पर आया था) लिखा था –

आपके सहानुभूतिपूर्ण विचार के लिए मैं निम्नलिखित मुद्दे प्रस्तुत करना चाहता हूँ : जून 1911 में जब मैं यहाँ आया तो मुझे अपने दल के बाकी अभियुक्तों के साथ चीफ कमिश्नर के दफ्तर में ले जाया गया। वहाँ मुझे ‘डी’ क्लास या ख़तरनाक क़ैदी का दर्जा दिया गया; बाकी अभियुक्तों को यह ‘डी’ का दर्जा नहीं दिया गया। इसके बाद मुझे छह महीने तक अकेले कोठरी में क़ैद रखा रखा गया, बाकी अभियुक्तों को नहीं। उस दौरान मुझे नारियल के रेशे की कुटाई करने में लगाया गया जबकि मेरे हाथों में खून बह रहा था। फिर मुझे जेल की सबसे कड़ी मेहनत का काम- तेल मिल में लगा दिया गया। हालांकि इस पूरे काल में मेरा चाल-चलन असाधारणतः बहुत ही अच्छा रहा फिर भी छह महीने बाद भी मुझे जेल से बाहर नहीं भेजा गया हालाँकि मेरे साथ के जो अन्य अभियुक्त आये थे उन्हें भेजा गया। तब से आज तक मैंने यथासंभव, अच्छा चाल चलन रखने की कोशिश की है।

जब मैंने अपनी तरक़्क़ी की अर्ज़ी पेश की थी तो मुझे बताया गया ता कि मैं एक विशिष्ट श्रेणी का क़ैदी हूँ इसलिए मेरी पदोन्नति नहीं हो सकती। हममे से जब भी कोई बेहतर खाने और किसी विसेष बरताव की माँग करता तो उसे कहा जाता कि ‘तुम लोग साधारण क़ैदी हो और तुम्हें वही खाना मिलेगा जो दूसरों को मिलता है।’

इस प्रकार जनाब, मान्यवर, देखेंगे कि हमें केवल विशेष असुविधाएं पहुंचाने के लिए विशेष क़ैदियों की श्रेणी में रखा गया।

जब मेरे सह-अभियुक्तों में से अधिकतर को बाहर भेजा गया तो मैंने अपनी रिहाई के लिए अनुरोध किया। लेकिन यद्यपि मुझे दो या तीन बार ही बैंत लगाए गए थे, उन्हें छोड़ दिया गया जिन्हें दर्दन या उससे भी ज़्यादा बार सज़ा मिली थी। मुझे नहीं छोड़ा गया, क्योंकि मैं उनका सह-अभियुक्त था। लेकिन अंततः जब मेरी रिहाई का आदेश दिया गया और तब बिल्कुल उसी समय जब बाहर के कुछ राजनैतिक कैदियों के साथ कुछ गड़बड़ी हुई तो मुझे उनके साथ तालाबंद कर दिया गया क्योंकि मैं उनका सहअभियुक्त था।

अगर मैं भारतीय जेल में होता तो अब तक काफ़ी सज़ा माफ़ हो गई होती, अपने घर कई पत्र भेज चुका होता, लोग मुझसे मिलने आते। अगर मुझे केवल और साधारणतः देश निकाला मिला होता तो अब तक इस जेल से रिहा किया जा तुका होता। लेकिन स्थिति यह है कि ना ही तो मुझे भारतीय जेल वाली सुविधा उपलब्ध है और ना ही इस कालापानी जेल के नियमों का लाभ मिल रहा है इस तरह मुझे दोनों तरह से घाटे में रखा गया है।

इसलिए क्या मान्यवर इस विसंगतिपूर्ण स्थिति को, जिसमें मैं अपने आप को पाता हूँ, समाप्त करने की कृपा करते हुए या तो मुझे भारतीय जेल में भेजें या किसी दूसरे बंदी की तरह मुझे भी निर्वासित क़ैदी का दर्ज़ा दें। मैं किसी विशेष व्यवहार की माँग नहीं कर रहा, यद्यपि मेरा मानना है कि दुनिया के स्वतंत्र देशों के सभ्य प्रशासन के तहत एक राजनैतिक क़ैदी के रूप में इसकी अपेक्षा रखी जा सकती है, लेकिन केवल उन्हीं रियायतों की माँग कर रहा हूँ जो सबसे वंचित अभियुक्तों और पुराने अपराधियों तक को दी जाती हैं। इस जेल में सदा के लिए मुझे बंद कर देने की मौजूदा योजना मुझे जीवन को क़ायम रखने और तमाम उम्मीदों के प्रति नाउम्मीद करती है। वो सब जो सीमित अवधि के लिए क़ैदी हैं उनके लिए तो मामला अलग है।

लेकिन जनाब, मेरे चेहरे के सामने तो 50 वर्ष घूर रहे हैं। मैं एकांत क़ैदी के रूप में उन्हें काटने की नैतिक ऊर्जा कैसे जुटा पाऊँगा जबकि मुझे रियायतें भी नहीं दी जा रहीं जो दुष्ट से दुष्ट अपराधी को अपने जीवन को आसान बनाने के लिए दी जाती है ? या तो मुझे भारतीय जेल में भेज दिया जाए जहाँ मैं हासिल कर सकता हूँ (क) सज़ा से कटौती; (ख) मुझसे हर चार महीने पर मेरे लोग मिलने आ सकेंगे, और बदकिस्मती से जो लोग जेल में हैं वे ही जानते हैं कि अपने सगे-संबंधियों को कभी कभार देखना कितनी बड़ी कृपा होती है; (ग) सबसे ऊपर, 14 साल में रिहा होने का क़ानूनी नहीं तो नैतिक अधिकार ; (घ) ज्यादा पत्र व्यवहार हो सकेंगे और दूसरी छोटी सुविधाएं मिल सकेंगी। या यदि मुझे भारत नहीं भेजा जा सकता तो मुझे इस उम्मीद के साथ रिहा करके बाहर भेजा जाए कि बाक़ी क़ैदियों की तरह पाँच साल बाद टिकट अवकाश लेकर अपने परिवार वालों को यहाँ बुला सकूँ। अगर यह मंजूर कर लिया जाता है तो केवल एक शिकायत रह जाएगी कि मुझे मेरी ग़लतियों के लिए ही ज़िम्मेदार ठहराया जाए, ना कि दूसरों की ग़लतियों के लिए।

अफसोस की बात है कि मुझे इसके बारे में निवेदन करना पड़ रहा है जबकि हरेक मनुष्य का मौलिक अधिकार है ! एक ओर युवा, सक्रिय और अधीर 20 राजनैतिक क़ैदी हैं तो दूसरी ओर बंदियों के इस उपनिवेश के नियम क़ायदे हैं जो चिंतन और अभिव्यक्ति की स्वाधीनता को न्यूनतम स्तर तक पहुँचाने के लिए ही बनाए गए हैं। ऐसे में अपरिहार्य है कि यदा-कदा उनमें से कोई एकाध नियम को तोड़ बैठे और जब उसके लिए सबको ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा, जैसा कि वास्तविकता में हो रहा है – मेरे लिए इससे बाहर रहने की संभावना बहुत कम ही रहती है।

अंत में क्या मैं मान्यवर को याद दिला सकता हूँ कि वे दया की मेरी अर्ज़ी पढ़ने की कृपा करें, जिसे मैंने 1911 में भेजा था, और उसे मंजूर करके भारत सरकार को भेजें।

भारतीय राजनीति की ताज़ा घटनाओं और सरकार की समझौतावादी नीति ने संवैधानिक रास्ते को एक बार फिर खोल दिया है। भारत की और मानवता की भलाई चाहने वाला कोई भी व्यक्ति अब उस कांटों भरे रास्ते पर आँख मूँद कर नहीं चलेगा, जिसने 1906-1907 में भारत की उत्तेजना और नाउम्मीदी की स्थिति ने हमें शांति और प्रगति के रास्ते से भटका दिया था।

इसलिए, सरकार अगर अपने विविध उपकारों और दया दिखाते हुए मुझे रिहा करती है तो मैं और कुछ नहीं हो सकता बल्कि मैं संवैधानिक प्रगति और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादारी का, जो कि उस प्रगति के लिए पहली शर्त है, सबसे प्रबल पैरोकार बनूँगा। जब तक हम जेलों में बंद हैं तब तक महामहिम की वफ़ादार भारतीय प्रजा के हज़ारों घरों में उल्लास नहीं आ सकता क्योंकि खून पानी से गाढ़ा होता है। लेकिन हमें अगर रिहा किया जाता है तो लोग उस सरकार के प्रति सहज ज्ञान से खुशी और उल्लास में चिल्लाने लगेंगे, जो दंड देने और बदला लेने से ज़्यादा माफ़ करना और सुधारना जानती है।

इसके अलावा, मेरे संवैधानिक रास्ते के पक्ष में मन परिवर्तन से भारत और यूरोप के वो सभी भटके हुए नौजवान जो मुझे अपना पथ प्रदर्शक मानते थे वापिस आ जाएंगे। सरकार, जिस हैसियत में चाहे मैं उसकी सेवा करने को तैयार हूँ, क्योंकि मेरा मत परिवर्तन अंतःकरण से है और मैं आशा करता हूँ कि आगे भी मेरा आचरण वैसा ही होगा।

मुझे जेल में रखकर कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि रिहा करने में उससे कहीं ज़्यादा हासिल होगा। ताक़तवर ही क्षमाशील होने का सामर्थ्य रखते हैं और इसलिए एक बिगड़ा हुआ बेटा सरकार के अभिभावकीय दरवाज़े के सिवा और कहाँ लौट सकता है? आशा करता हूँ कि मान्यवर इन बिन्दुओं पर कृपा करके विचार करेंगे।

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सावरकर कौन थे | Who was Savarkar.

विनायक दामोदर सावरकर ने 14 नवंबर, 1913 को सेलुलर जेल में व्यक्तिगत रूप से भारत में अंग्रेजी सरकार के गृह विभाग के सदस्य वायसराय के प्रतिनिधि रेजिनाल्‍ड क्रेडॉक (Reginald Henry Craddock) के समक्ष दया याचिका प्रस्तुत की थी। स्मरण रहे कि सावरकर की यह एकमात्र दया याचिका नहीं थी।

अंडमान सेलुलर जेल से पहला, अंडमान सेल्युलर जेल आने के मात्र छह माह के भीतर 30 अगस्त 1911 का माफीनामा है।

इसके बाद सावरकर ने 1913, 1914, 1918 और 1920 में कुल मिलाकर पांच दया याचिकाएं दी थीं।

‘वीर’ सावरकर के 1911, 1914 और 1918 के माफ़ीनामे अभिलेखागारों में उपलब्ध नहीं हैं, हालांकि, खुद सावरकर ने अपने 1913 और 1920 के मफ़ीनामों में इनका ज़िक्र किया है।

अंत में 2 मई 1921 को, सावरकर को अंडमान जेल से महाराष्ट्र में रत्नागिरी की जेल फिर यरवदा सेंट्रल जेल स्थानांतारित किया गया।

अंत में 6 जनवरी 1924 को सावरकर को रत्नागिरी जिले से बाहर नहीं जाने और पांच साल तक किसी राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लेने की शर्त पर मुक्त कर दिया गया था।

इन पांच दया याचिकाओं में 1920 की दया याचिका अधिक विस्तृत थी और अन्य याचिकाओं की तरह इसमें भी बरतानिया सरकार के प्रति पूरी वफादारी और समर्पण की पेशकश की गई थी। इस याचिका का हूबहू अनुवाद प्रस्तुत है :

सेल्युलर जेल, पोर्ट ब्लेयर,

30 मार्च 1920.

सेवा में

चीफ कमिशनर, अंडमान

भारत सरकार के गृह विभाग के लिए माननीय सदस्य ने हाल ही में एक बयान (कालेपानी के बंदियों के संदर्भ में) दिया है जिसका आशय है “सरकार उसके समक्ष प्रस्तुत किसी भी व्यक्ति के कागजातों पर विचार और हर तरह की रियायत प्रदान करने की इच्छुक है”; और “यह स्पष्ट होने पर कि संबंधित व्यक्ति को रिहा करने से राज्य को किसी किस्म का कोई खतरा नहीं है, सरकार उसे शाही क्षमादान प्रदान कर देगी।”

अधोहस्ताक्षर कर्ता अत्यंत विनम्रतापूर्वक यह निवेदन करता है कि अत्यधिक विलम्ब हो जाए, इससे पहले उसे अपने मामले को प्रस्तुत करने का एक अंतिम अवसर प्रदान किया जाए।

श्रीमान मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि महामहिम भारत के वायसराय को मेरी क्षमा याचना अग्रेषित किए जाने पर आपको कभी किसी किस्म का अफसोस नहीं होगा। मुझे यह संतोष रहेगा कि मेरी फरियाद को सुनी गई है, फिर भले ही सरकार जो भी फैसला करे।

‘शाही उद्घोषणा’ में अत्यंत उदारतापूर्वक कहा गया है कि शाही क्षमादान उन सभी को दिया जाना चाहिए “राजनीतिक प्रगति की आतुरता” में जो कानून तोड़ने के दोषी पाए गए हैं। मेरा और मेरे भाई (गणेश बाबाराव सावरकर) दोनों के मामले पूरी तरह से इसी दायरे में आते हैं।

न तो मैं न ही मेरे परिवार के किसी सदस्य को सरकार से कोई रंजिश थी, न ही हमारे साथ किसी किस्म का कुछ गलत या भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया गया था, जिसकी हमें कोई शिकायत रही हो। मेरे सम्मुख एक शानदार भविष्य था। इस खतरनाक रास्ते में मुझे व्यक्तिगत रूप से कुछ भी हासिल नहीं था बल्कि सब कुछ गवां देना ही था। इतना कहना पर्याप्त होगा है, कि गृह विभाग से संबंधित एक माननीय सदस्य ने 1913 में, मुझे व्यक्तिगत रूप से कहा था, ‘… आपकी जैसी शैक्षिक योग्यता और अध्ययन है… आप हमारी सरकार में सबसे ऊंचे पदों तक पहुंच सकते थे।’

अगर इस सबूत के बाद भी, मेरे उद्देश्य को लेकर किसी भी प्रकार के संशय की कोई गुंजायश रह जाती है तो मैं निवेदन करना चाहता हूं कि 1909 तक मेरे परिवार के किसी भी सदस्य के खिलाफ कोई आरोप नहीं था; जबकि मेरी वे सभी गतिविधियां जो कि मेरे खिलाफ मुकदमे का आधार हैं, 1909 के पहले के समय से संबंधित हैं।

अभियोजन, न्यायाधीशगण और रौलट रिपोर्ट सभी ने स्वीकार किया है कि 1899 से लेकर 1909 में माज़िनी (Giuseppe Mazzini) की जीवनी और अन्य पुस्तकों के प्रकाशन, विभिन्न समितियों और संगठनों का गठन और यहां तक कि हथियारों के पार्सल भेजे गए थे। (रौलट रिपोर्ट, पृष्ठ 6 आदि) यह सब मेरे भाइयों की गिरफ्तारी या उससे भी पहले की बात है, जिसे लेकर मुझे किसी प्रकार की व्यक्तिगत पीड़ा या शिकायत की बात कही जा सकती है। लेकिन क्या कोई और हमसे संबंधित मामलों के संदर्भ में इस तरह से सोचता है?

खैर, भारतीय जनता द्वारा महामहिम को भेजी गई व्यापक याचिका में, जिसपर 5,000 से अधिक लोगों के हस्ताक्षर थे, मेरा विशेष उल्लेख किया गया है। मेरे मुकदमे के विचारण के दौरान न्यायपीठ (जूरी) मामले पर विचार करे इससे मुझे वंचित रखा गया था। अब देश की जूरी की राय है कि केवल राजनीतिक प्रगति की आतुरता मेरे सभी कार्यों का मकसद थी और इसने ही मुझे कानूनों को तोडऩे के प्रेरित किया, जिसका मुझे पछतावा है।

मेरे खिलाफ दूसरा मुकदमा हत्या के लिए उकसाने से संबंधित है परंतु मुझे शाही क्षमादान की पात्रता से यह आरोप भी वंचित नहीं करता है, क्योंकि-

(क) पहली बात, शाही उद्घोषणा में अपराध का उद्देश्य ही प्रमुख माना गया है। इससे इतर अपराध की प्रकृति या उसकी कोई धारा अथवा न्यायालय को लेकर किसी प्रकार का फर्क नहीं किया गया है। यहां पूरी तरह से अपराध के उद्देश्य पर ही केंद्रित किया गया है कि उद्देश्य राजनीतिक होना चाहिए, व्यक्तिगत नहीं।

(ख) दूसरी बात, सरकार पहले भी यह स्पष्ट कर चुकी है और इसी के आधार पर बारिन (बारिंद्र कुमार घोष) और हेम (हेमचंद्र दास ) व अन्य लोगों को रिहा कर चुकी है, जबकि इन लोगों ने कबूल किया था कि उनकी योजनाओं का लक्ष्य “प्रमुख सरकारी अधिकारियों की हत्या”करना था। उनकी स्वयं की स्वीकारोक्ति के अनुसार वे मजिस्ट्रेटों आदि अधिकारियों की हत्या के लिए लड़कों को भेजने के लिए दोषी ठहराए गए थे।

इसी मजिस्ट्रेट ने, जिसकी हत्या की साजिश रची गई थी, बारिन (बरिन्द्रनाथ घोष) के भाई अरबिंदो पर “वंदे मातरम” अखबार से संबंधित पहला मुकदमे में सजा दी थी। तब भी, बारिन के जुर्म को गैर राजनीतिक हत्या नहीं समझा गया और ऐसा करना सही था। मेरे मामले में आपत्ति बहुत कमजोर है।

अभियोजन पक्ष द्वारा भी यह स्वीकारा जा चुका है कि घटना के समय मैं इंग्लैंड में था, विशेष रूप से श्री जैक्सन की हत्या की योजना या इस प्रकार के किसी विचार तक की जानकारी मुझे नहीं थी। हथियारों के पार्सल भी मेरे भाई की गिरफ्तारी से पहले भिजवाए गए थे। इसलिए किसी भी खास अधिकारी के खिलाफ मेरी कोई निजी रंजिश रही हो यह मुमकिन नहीं था। लेकिन हेम ने तो वास्तव में वह बम बनाया था जिस बम से किेग्ज़फोर्ड मारे गए और उन्हें इस मकसद की पूरी जानकारी थी। (रौलट रिपोर्ट, पृष्ठ 33)। फिर भी, हेम को इस आधार पर क्षमादान के दायरे से बाहर नहीं किया गया।

यदि बारिन और अन्य पर अपराध के लिए प्रेरित करने के लिए अलग से आरोप निर्मित नहीं किया गया था तो इसकी वजह केवल यह थी कि क्योंकि उन्हें पहले से ही षड्यंत्र के मामले में मृत्युदंड की सजा सुनाई जा चुकी थी; और मुझे विशेष रूप से इसलिए आरोपित किया गया क्योंकि मैं भारत में नहीं था।

अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मुझे फ्रांस से प्रत्यार्पित करने के लिए, आरोपित किया जाना जरूरी था।

इसलिए मेरा विनम्र निवेदन है कि सरकार मुझे क्षमादान प्रदान करने की कृपा करेगी जैसा कि बारिन और हेम के मामले में किया जा चुका है, जबकि उनका अपराध अधिक गंभीर था, वे हत्या के लिए प्रेरित करने आदि अपराधों में संलिप्त थे और अपने अपराध कबूल कर चुके थे। निश्चित रूप से एक धारा (साजिश में सम्मिलित होने की धारा) किए गए अपराध से ज्यादा मायने नहीं रखती है। मेरे भाई के मामले में तो यह सवाल नहीं है क्योंकि उसका किसी हत्या आदि से कोई लेना-देना नहीं है।

शाही उद्घोषणा की यह व्याख्या बारिन और हेम आदि के मामलों में सरकार पहले ही कर चुकी है। इसलिए मैं और मेरे भाई शाही क्षमादान के ‘पूरी तरह उपयुक्त पात्र हैं।’ तब सवाल रह जाता है कि क्या हमें रिहा किया जाना सार्वजनिक सुरक्षा की दृष्टि से उपयुक्त होगा? मेरा निवेदन है कि यह पूरी तरह से उपयुक्त है। क्योंकि-

(क) मैं खासतौर पर जोर देकर कहना चाहता हूं कि जैसा कि गृह सचिव ने “अराजकतावाद से प्रेरित प्रहारकों (“the microlestes of anarchism”)”का जिक्र किया है हम उनमें से नहीं हैं, जो इस प्रकार के उग्रवादी विचार पद्घति में यकीन करते हैं। मैं क्रॉपोटकिन या टॉलस्टॉय के शांतिपूर्ण और दार्शनिक अराजकतावाद का समर्थन करने वालों में से भी नहीं हूं।

जहां तक मेरी अतीत की क्रांतिकारी प्रवृत्तियों की बात है – मैं क्षमादान के खातिर आज ही यह नहीं कह रहा हूं बल्कि कई साल पहले, जब श्रीमान मांटेगू ने संविधान बनाने की शुरुआत की थी, मैंने सरकार को इस बारे में सूचित कर दिया था।

मैंने अपनी याचिकाओं (1918, 1914) में भी लिखा था कि मैं संविधान के प्रति प्रतिबद्ध और पूरी तरह से उसका समर्थन करता हूं। इसके बाद सुधारों (मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधार) और फिर शाही उद्घोषणा ने मुझे मेरे इन विचारों पर और दृढ़ किया हैं। हाल ही में मैंने अपनी निष्ठा का सार्वजनिक रूप से ऐलान किया है और व्यवस्थित रूप से संवैधानिक विकास के पक्ष में अपनी वफादारी और तत्परता जाहिर की है।

उत्तर दिशा से हमारे देश पर एशिया के कट्टरपंथियों के रूप से जो खतरा मंडरा रहा है, अतीत में भी यह भारत के लिए अभिशाप रहा है। वे उस समय आक्रमणकारी दुश्मनों के रूप में आए थे, अब फिर यह खतरा सामने है। इस बार वे मित्र का बाना पहन कर आना चाहते हैं। मुझे विश्वास है कि इस स्थिति में हर समझदार भारत प्रेमी हृदय से और पूरी वफादारी के साथ अंग्रेजों का साथ देगा। भारत का हित इसमें ही है।

इसीलिए 1914 में जब युद्ध (प्रथम विश्वयुद्ध) शुरू हुआ और भारत पर जर्मन-तुर्क-अफगान आक्रमण की स्थिति थी, मैंने सरकार के सम्मुख एक स्वयंसेवक के रूप में अपनी सेवाएं प्रस्तुत की थीं। आप इस पर यकीन करें या न करें, मैं संवैधानिक रास्ते का पूरी तरह से कायल हूं और अपने इस इरादे और सत्यनिष्ठा को व्यक्त कर चुका हूं; प्रेम और परस्पर सम्मान से अनुबंधित हूं; ब्रिटिश प्रभुत्व को मजबूत करने में अपनी सेवा समर्पित करने के लिए पूर तरह से ईमानदार हूं। ब्रिटिश साम्राज्य ने, ‘शाही उद्घोषणा’ के जरिए, मेरा दिल जीत लिया है।

दरअसल, मैं किसी जाति या पंथ या लोगों से सिर्फ इस आधार पर नफरत करना उचित नहीं समझता कि वे भारतीय नहीं हैं!

(ख) लेकिन अगर सरकार मुझसे इसके अलावा जमानत के तौर पर और कुछ चाहती है तो मैं और मेरा भाई एक निश्चित अवधि के लिए, जैसा कि सरकार उचित समझे, राजनीति में भाग नहीं लेने का वचन देने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा मेरा स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा है, मैं अपने परिजनों के मधुर शुभाशीष से वंचित हूं, अब मैं शांति से एक सेवानिवृत्त व्यक्ति की तरह अपने जीवन के बचे-खुचे हुए दिन गुजारना चाहता हूं। अब मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं है जो मुझे सक्रिय गतिविधियों के लिए प्रेरित करे।

(ग) यह या अन्य कोई वचन, उदाहरण के लिए, किसी विशेष प्रांत में रहने या हमारी रिहाई के बाद एक निश्चित अवधि के तक पुलिस के सामने हाजिरी बजाकर अपनी गतिविधियों के बारे में सूचित करते रहना अथवा अन्य कोई उचित शर्त जो कि राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी समझी जाए, मैं और मेरे भाई सहर्ष स्वीकार करने के लिए प्रस्तुत हैं।

अंत में निवेदन है कि श्रीमान सुरेंद्र नाथ बनर्जी जैसे अनुभवी और उदारवादी लोकप्रिय नेता, प्रेस और आम जनगण और पंजाब से मद्रास तक के हिंदू और मुस्लिम (चच्च!) विभिन्न सामाजिक मंचों से हमारी तत्काल और पूर्ण रिहाई की मांग लगातार मुखर हो रही है। रिहाई की घोषणा से राज्य की सुरक्षा पूरी तरह से महफूज है। इसके अलावा रिहाई की घोषणा “कड़वाहट की भावना” को दूर करने में सहायक होगी। शाही उद्घोषणा का भी यही लक्ष्य है।

इसलिए मैं जनता की भावनाओं के प्रति सचेत करना चाहता हूं,’शाही उद्घोषणा’ का मूल मकसद और निहित कटुता की भावना को समाप्त करने का लक्ष्य तब तक पूरा नहीं होगा, जब तक कि हम दोनों भाई और वे सभी लोग जो अब तक यहां बंदी हैं, को इस महान क्षमादान में सम्मिलित नहीं किया जाता है।

(5) इसके अलावा, हमारे मामले में सजा के सभी लक्ष्य पूरे हो चुके हैं। जैसे कि-

(क) हम 10 से 11 साल की जेल में गुजार चुके हैं, जबकि श्री सान्याल (शचीन्द्र नाथ सान्याल), को भी आजीवन करावास का दंड दिया गया था, उन्हें चार साल के बाद और दंगों वाले मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए अन्य बंदियों को एक साल के भीतर रिहा किया जा चुका है;

(ख) हमने कारवास के दौरान कड़ी मशक्कत की है, भारत में और यहां जेल के भीतर कारखानों, तेल निकालने के कोल्हू चलाने और अन्य जो भी काम हमें सौंपे गए, उन्हें पूरा किया है;

(ग) जेल में हमारा व्यवहार उन लोगों की तुलना में किसी भी तरह से आपत्तिजनक नहीं है, जिन्हें रिहा किया जा चुका है; जबकि उन पर यहां पोर्ट ब्लेयर में साजिश रचने के लिए गंभीर संदेह किया गया था और पुनः जेल में बंद किया गया था। इसके विपरीत हम दोनों ने आज तक कठोर अनुशासन का पालन किया है। हमारे लिए खासतौर से सख्त अनुशासन की अलग से व्यवस्था थी। फिर भी, संयम के साथ हम अनुशासन का पालन करते रहे हैं। विगत पिछले छह वर्षों से अब तक हमारे खिलाफ सामान्य अनुशासनात्मक कार्रवाई का एक भी मामला नहीं है।

अंत में, मैं उन सैकड़ों राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए, जिनमें अंडमान से रिहा किए गए बंदी भी हैं, सरकार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। इस तरह 1914 और 1918 की मेरी याचिकाओं को आंशिक रूप से मंजूर किया गया है। इसलिए अब यह उम्मीद बेजा नहीं है कि महामहिम शेष बंदियों को भी रिहा करेंगे, क्योंकि उनके मामले भी रिहा हो चुके बंदियों के ही समकक्ष हैं। मैं और मेरे भाई का मामला भी इनमें सम्मिलित है। विशेष यह भी है कि महाराष्ट्र विगत अनेक वर्षों से किसी प्रकार के उपद्रव या ऐसी किसी प्रकार की अव्यवस्था से पूरी तरह से मुक्त रहा हैं। तदापि, मैं निवेदन करना चाहता हूं कि हमारी रिहाई को अन्य रिहा किए गए व्यक्तियों या अन्य लोागों के कार्यों से जोड़ा जाना उचित नहीं है; क्योंकि यह असंगत होगा और इस आधार पर क्षमादान से हमें वंचित करना, किसी अन्य के दोष के लिए हमें पूर्वधारणा बनाकर हमें दंडित करना होगा, यह उचित होगा।

इन सभी आधारों पर, मुझे विश्वास है कि सरकार गौर करगी कि मैं तयशुदा उचित प्रतिबंधों को मानने के लिए तैयार हूं, सरकार द्वारा घोषित वर्तमान और भावी सुधारों से सहमत व प्रतिबद्घ हूं, उत्तर की ओर से तुर्क-अफगान कट्टरपंथियों का खतरा दोनों देशों के समक्ष समान रूप से उपस्थित है, इन परिस्थितयों ने मुझे ब्रिटिश सरकार का इर्मानदार सहयोगी, वफादार और पक्षधर बना दिया है। इसलिए सरकार मुझे रिहा करती है तो मैं व्यक्तिगत रूप से कृतज्ञ रहूंगा। मेरा प्रारंभिक जीवन शानदार संभावनाओं से परिपूर्ण था, लेकिन मैंने अत्यधिक आवेश में आकर सब बरबाद कर दिया, मेरी जिंदगी का यह बेहद खेदजनक और पीड़ादायक दौर रहा है। मेरी रिहाई मेरे लिए नया जन्म होगा। सरकार की यह संवेदनशीलता दयालुता, मेरे दिल और भावनाओं को गहराई तक प्रभावित करेगी, मैं निजी तौर पर सदा के लिए आपका हो जाऊंगा, भविष्य में राजनीतिक तौर पर उपयोगी रहूंगा। अक्सर जहां ताकत नाकामयाब रहती है उदारता कामयाब हो जाती है।

आशा है कि मुख्य आयुक्त को स्मरण होगा, उनके पूरे कायर्काल के दौरान मैंने व्यक्तिगत रूप से उनके प्रति सदा ही सम्मान प्रदर्शित किया है, इस दौरान मुझे कितनी बार निराशा का सामना करना पड़ा था। यकीनन आपके मन में मेरे प्रति किसी प्रकार का विद्वेष नहीं होगा। आप मुझे निराशा की इस अवस्था से बाहर निकलने का यह हानिरहित अवसर प्रदान करने और इस याचिका को अग्रेषित करने की कृपा करेंगे-महामहिम वायसराय, भारत सरकार से मेरे पक्ष में संस्तुति करेंगे क्या मैं यह उम्मीद कर सकता हूं?

सदा आभारी रहूंगा।

श्रीमान,

आपका परम आज्ञाकारी सेवक,

(हस्ताक्षर)

वी.डी. सावरकर

सज़ा-याफ़्ता बंदी

संख्या 32778. 24

(प्रस्तुति – शम्सुल इस्लाम)

1857-भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के प्रति स्वतंत्र भारत के कर्णधारों का शर्मनाक और आपराधिक रवैया

1857 first freedom struggle of india

Criminal betrayal of the martyrs of India’s First War of Independence 1857 by the Indian rulers.

1857 के महान स्वतंत्रता संग्राम को 164 वर्ष बीत चुके हैं। दुर्भाग्य से वर्तमान पीढ़ी इस महान संग्राम की घटनाओं, सच्चाइयों और क़ुरबानियों से लगभग अपरिचित है। इसमें इस पीढ़ी का कोई दोष नहीं है, क्योंकि हमारे देश के कर्णधारों ने इसकी महान विरासत को सरकारी दफ़्तरों में बस्तों में बन्द कर रखा है। आज़ादी की इस लड़ाई की 100 वीं और 150 वीं वर्षगाँठ पर करोड़ों  रुपये ख़र्च करके, कुछ प्रोग्राम करके रस्म निभाई गई। जबकि इन अवसरों पर इस महान संग्राम की साझी शहादत और साझी विरासत से लोगों को अवगत कराना चाहिए था।

दरअसल इस महान संग्राम की विरासत के साथ धोखा देश की आज़ादी के साथ ही शुरू हो गया था, जबकि इस संग्राम को बीते केवल 90 वर्ष हुए थे।

आज़ादी मिलने के तुरंत बाद देश के शासकों को सबसे पहले 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने, क़ुरबानियाँ देने और अपने प्राणों की आहुति देने वाले लोगों की पहचान करनी चाहिए थी और अंग्रेज़ों के उन भारतीय  दलालों की शिनाख़्त करनी चाहिए थी जिन्होंने गोरे  शासकों का साथ दिया था। 

बदक़िस्मती से इस महान संग्राम से जुड़े दो बुनियादी मुद्दे एैसे है जिनके बारे में एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र के तौर पर हमने भयानक लिजलिजेपन का सबूत दिया है और चाहे जो भी कारण रहा हो लगातार उनसे कन्नी काटने की कोशिश करते रहे हैं।

पहला संगीन मामला फ़िरंगीयों से संबंधित है।

1857 से 1859 तक चले इस स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने के लिए औपनिवेशिक शासकों ने जिस तरह के दिल दहलाने वाले अत्याचार ढाए, भारतवासियों के जगह-जगह जनसंहार किए, तबाही और लूट मचाई उसकी मिसालें इतिहास के समस्त साम्राज्यवादी काल में शायद ही मिलें। समकालीन अंग्रेज़ों के सरकारी दस्तावेज़ (गॅज़ट, आदेश-पत्र, चिट्ठियां, रपट इत्यादि), अंग्रेज़ प्रत्यक्षदर्शियों के संस्मरण, फ़िरंगी इतिहासकारों और पत्रकारों के लेख, जिनके विशाल भंडार भारत समेत विश्वभर के अभिलेखागारों और पुस्तकालयों में आज भी मौजूद हैं, लगातार 1857-59 में फ़िरंगियों की बरबरता और पाशविकता की ख़ौफ़़नाक दास्ताने बयान करते हैं।

विलियम रसल [William Russell] ने, जो लंदन से छपने वाले ‘द टाइम्स’ के युद्ध संवाददाता के रूप में भारत आया था, 26 फ़रवरी 1858 को भेजी एक रपट में लिखा कि जब अंग्रेज़ी सेना का कमांडर, नील इलाहाबाद से लखनऊ सेना के साथ कूच कर रहा था तो

“उन्होंने रास्ते में इतने हिंदुस्तानियों को फाँसी दी या गोली मारी कि अंग्रेज़ी सेना के एक अन्य अफ़सर को नील से यह कहना पड़ा कि अगर इसी तरह से आबादी का ख़ात्मा किया गया तो आगे चलकर अंग्रेज़ी सेना को भरती के लिए कोई इंसान ही नहीं मिलेगा।”

रसल जो 1858-59 में अंग्रेज़ी सेना के साथ विभिन्न मोर्चों पर तैनात रहा, उसकी एक और रपट से यही पता लगता है कि अंग्रेज़ी सैनिक कमांडरों का बहुत स्पष्ट आदेश था कि जिस हिंदुस्तानी को भी सफ़ेद कपड़ों में देखो उसको मौत के घाट उतार दो। 14 मार्च, 1858 को लखनऊ में दाख़िल हुई अंग्रेज़ सेना ने जो जनसंहार किया और तबाही मचाई उसके बारे में रसल ने लिखा-

“यह सब दहला देनेवाला अमानवीय और शर्मनाक था, लेकिन इसको रोकने की किसको परवाह थी।”

रसल की रपटें लगातार यह बताती हैं कि अंग्रेज़ सैनिकों ने अपने कमांडरों की मौजूदगी में सिर्फ़ लखनऊ शहर में हज़ारों निहत्थे बच्चें, बूढ़ों और महिलाओं को मौत के घाट उतारा। रसल से ही यह जानकारी भी मिलती है कि बीसियों जगह विद्रोहियों को लकड़ी के अलाव पर रखकर सार्वजनिक रूप से जलाया गया। पूर्वी भारत में कितने गाँवों को चारों तरफ़ से घेरकर आग के हवाले कर दिया गया, उसकी गिनती करना मुश्किल है” ।

विलियम केए  [John William Kaye], एक अंग्रेज़ समकालीन इतिहासकार था, जिसने 1864 में ‘बग़ावत’ के अपने संस्मरणों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। उसने 20 सितंबर सन 1857, जब अंग्रेज़ी सेना दिल्ली में दाखिल हुई और उसने कैसे दिल्ली के आम नागरिकों का क़त्लेआम किया, उसका हाल बयान करते हुए लिखा कि

“वे लोग जिन्होंने हमारे ख़िलाफ़ कभी आवाज़ नहीं उठाई थी और जो स्वयं विद्रोहियों के अत्याचारों का शिकार हुए थे, हमारी बंदूक़ों और तलवारों का शिकार हुए। काले व्यक्‍ति को देखते ही हमारा राष्ट्रीय जोश पागलपन की हद को छूने लगता था। सब काले रंग के लोग हमारे नस्ल के दुश्मन मान लिए गए थे। दिल्ली पर क़ब्ज़े के पहले कई दिनों तक अंग्रेज़ सेना ने दिल्ली के लोगों का जनसंहार जारी रखा”।

दिल्ली पर नियंत्रण होने के बाद विलियम केए  ने शहर में जो देखा उसके बारे में लिखा कि

“बड़े पैमाने पर किया गया क़त्लेआम अंग्रेज़ी कैम्प में हर व्यक्‍ति की ज़ुबान पर था।”

22 सितंबर 1857 को हॅडसन [Hodson] ने बहादुरशाह ज़फ़र के बेटों को हुमायूँ के मक़बरे से गिरफ़्तार किया और दिल्ली गेट के पास उनके कपड़े उतारकर गोली मार दी और उनकी लाशों को चाँदनी चौक में कोतवाली के बाहर सार्वजनिक नुमाइश के लिए एक चबूतरे पर डाल दिया। यह लाशें एक हफ़्ते से भी अधिक समय तक वहाँ पड़ी सड़ती रहीं। अंग्रेज़ी सेना के अफ़सरों के बीच बाग़ी सैनिकों को सज़ा देने के लिए सबसे पसंदीदा सज़ा थी तोप के मुँह पर बाँधकर उड़ा देना। हज़ारों हिंदुस्तानियों को इस बरबरता से मौत के घाट उतारा गया। अंग्रेज़ों के सरकारी दस्तावेज़ो में, केवल पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश में 200 से ज़्यादा गाँवों को जलाकर राख करने का ब्यौरा मिलता है।

फ़िरंगी सेनाओं ने किस तरह से दिल्ली और लखनऊ पर क़ब्ज़ा करने के बाद, इन दोनों शहरों को लूटा, उसका विस्तृत ब्यौरा भी स्वयं अंग्रेज़ों द्वारा लिखे समकालीन दस्तावेज़ों में उपलब्ध है।

20 सितंबर (1857) से 25 सितंबर तक अंग्रेज़ी सेना के गोरे और काले अफ़सरों और आम सैनिकों ने जिसतरह दिल्ली में लूट मचाई उसका क़िस्सा स्वयं दिल्ली के मोर्चे पर तैनात एक अंग्रेज़ कमांडर चार्ल्स जॉन ग्रिफ़िथस ने अपनी एक पुस्तक में बयान किया है। यह ब्यौरा रोंगटे खड़े करने वाला है। उन्होंने लिखा,

 “दिल्ली में घर-घर को खोद  दिया। इस लूट में गोरे, हिंदुस्तानी, अफ़सर सैनिक सभी शामिल थे…इस लूट का अच्छा ख़ासा हिस्सा इंग्लैंड मे जौहरियों की दुकानों की शाभा बना। लखनऊ पर भी अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े के बाद किस तरह की लूट हुई उसका ब्यौरा रसल की भेजी गई रपटों में आज भी देखा जा सकता है। रसल के अनुसार “इस लूट के हाल को बयान करना मुश्किल है।”

आज़ादी के समय और न ही 1857 के महान संग्राम की 100 वीं एवं 150 वीं वर्षगाँठ पर हमने अंग्रेज़ों से इस बरबरता और लूट के लिए न तो माफ़ी की माँग की, न ही मुआवज़ा भरने को कहा और न ही लूट के सामान को लौटाने को कहा। इस संग्राम की 150 वीं वर्षगाँठ पर तो कम-से-कम हमें इन माँगों को उठाना चाहिए। साम्राज्यवाद में इतिहास ने जो कुकर्म किए हैं, उसके लिए विश्‍व के कई देश गुनहगार देशों को माफ़ी माँगने पर मजबूर कर चुके हैं। अफ़्रीकी देशों के लोगों को गुलाम बनाने के लिए इंग्लैंड अफ़्रीकी देशों से माफी माँग चुका है। इसी तरह अमेरिका ने दूसरे विश्‍वयुद्व के दौरान जापान एवं कोरिया की महिलाओं के शारीरिक शोषण को लेकर सार्वजनिक माफ़ी माँगी है। यही समय है जब हमें अंग्रेज़ों को माफ़ी माँगने के लिए बाध्य करना चाहिए।

1857 के संग्राम का एक और शर्मनाक पहलू यह है कि इस लड़ाई में अंग्रेज़ों ने जो जीत हासिल की थी उसकी वजह अंग्रेज़ों की महानता नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी ग़द्दारों का योगदान था जो कुछ चाँदी के टुकड़ों के लिए अंग्रेज़ों के पिट्‍ठू बन गए थे। विलियम केए  ने अंग्रेज़ों की जीत के कारणों को गिनवाते हुए लिखा था-

“सच तो यह है कि हिंदुस्तान में हमारी जीत का सेहरा हमारे हिंदुस्तानी हमदर्दों के सिर पर जाता है जिनकी हिम्मत और बहादुरी ने हिंदुस्तान को अपने हम-वतनों से छीनकर हमारे हवाले कर दिया।”

सैकड़ों समकालीन सरकारी दस्तावेज़ इस बात के गवाह हैं कि किस तरह पटियाला, नाभा, जींद, कपूरथला, पटौदी, कश्मीर, हैदराबाद, ग्वालियर, जयपुर, जोधपुर, कोटा इत्यादि के राजघरानों ने दिल्ली लखनऊ ही नहीं, बल्कि पूरे देश को अंग्रेज़ों के हत्थे चढ़वाने में पूरी मदद की। इन राजघरानों की ग़द्दारियों की कहानी कहते समकालीन दस्तावेज़ों का पूरा भंडार मौजूद है।

इन ग़द्दारों के कुकर्मों से संबंधित सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि वे इंक़िलाबी राजघराने जिन्होंने अंग्रेज़ों से लोहा लिया और जो भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक थे वे अंग्रेज़ों से लड़ते हुए फाँसी के फंदों पर झूल गए।

उनकी हार के बाद उनकी रियासतें और संपत्ति अंग्रेज़ो ने ग़द्दार हिंदुस्तानी राजाओं और नवाबों को सौंप दीं। उदाहरण के लिए पटियाला, जींद, कश्मीर, नाभा, कपूरथला के महाराजाओं को अवध, गुड़गांव, रुहेलखंड और फ़ारूक़ नगर के इलाक़े मिले, पटौदी के नवाब को झज्जर की रियासत मिली, सिंधिया को झाँसी मिली।

ऐसे सैकड़ों मामले हैं, जिनमें 1857 के संग्राम में हिस्सा लेनेवालों की जान ही नहीं गई, बल्कि उनका सब कुछ छीनकर अंग्रेज़ों द्वारा ग़द्दार शासकों को उनकी सेवाओं से ख़ुश होकर सौंप दिया गया।

1857 के संग्राम से संबंधित सबसे शर्मनाक बात यह है कि न ही आजा़दी के समय, हमने यह जानने की कोशिश नहीं की कि जिन लोगों ने संग्राम का बीड़ा उठाया था उनके परिवारों का क्या हुआ। हम सब इस बात को लेकर भी उदासीन रहे कि इस संग्राम में जिन ग़द्दारों ने विद्रोहियों की संपत्ति हड़प ली थी उसका भी हिसाब-किताब हो।

इससे शर्मनाक और क्या हो सकता है कि स्वतंत्रता के बाद जो देश का संवैधानिक शासन विकसित हुआ उसमें ग़द्दार राजघरानों से जुड़े लोगों का बोलबाला रहा और उन्होंने वाह-वाही लूटी। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 164 वीं वर्षगाँठ का कोई भी आयोजन तभी सार्थक हो सकता है जब इस देश के सामने यह ब्यौरा भी रखा जाए कि इस संग्राम में जो लोग और परिवार लड़े थे उनकी बाद की पीढ़ियों का क्या हुआ।

इसके साथ-ही-साथ देश को यह भी पता लगना चाहिए कि जिन लोगों और परिवारों ने इस संग्राम से ग़द्दारी की थी क्या उन्हें स्वतंत्रता के बाद कोई सज़ा दी गई या किसी तरह का जवाब तलब किया गया। देश पर मर-मिटनेवाले लोगों को सही श्रद्धांजलि यही होगी कि कम-से-कम इस सब पर राष्ट्रीय पैमाने पर एक वाइट-पेपर पेश किया जाए।

शम्सुल इस्लाम

11-05-2012

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

साथी रमेश उपाध्याय! क्षमा करना मैं आपकी हत्या का मूक-दर्शक बना रहा!

ramesh upadhyaya

मेरे हमज़ुल्फ़ (साढ़ू) और प्यारे साथी रमेश उपाध्याय!

क्षमा करना कि मैं आपकी हत्या का मूक-दर्शक बना रहा!

डॉ. रमेश उपाध्याय, महानतम जनवादी लेखकों में से एक, विचारक, हरदिल-अज़ीज उस्ताद, संपादक, जनसंघर्षों में पहली पंक्ति में शामिल होने वाले बुद्धिजीवी, सुधा उपाध्याय के 52 साल से हमसफ़र, प्रज्ञा, संज्ञा, अंकित के वालिद-दोस्त और राकेश कुमार के ससुर-दोस्त का 23-24 अप्रैल को रात लगभग 1. 30 बजे देहांत होगया। 

सब मरते हैं, बुद्ध ने चुनौती दी थी कि कोई ऐसा घर दिखाओ जहाँ मौत न हुई हो, इस चुनौती को किसी ने आज तक स्वीकार नहीं किया है। लेकिन रमेश उपाध्याय अपनी मौत नहीं मरे हैं।  उनकी हत्या हुई है, यह मैं बहुत ज़िम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ। 

उनके पूरे परिवार ने 3 अप्रेल से 5 अप्रेल के बीच टीके लगवाए थे। लगभग 10 दिनों बाद जब कोविड होने के लक्षण ज़ाहिर हुए तो कोविड टेस्ट कराने का संघर्ष शुरू हुआ, 4 दिन बाद यह हो सके, 3 दिन बाद पॉज़िटिव रिपोर्ट आईं और फिर एक और लम्बी जद्दोजहद किसी अस्पताल में बिस्तरों की तलाश की शरू हुयी।

दिल्ली NCR छान मारा, ज़िम्मेदार लोगों (जिन से संपर्क हो सका, ज़्यादातर के फ़ोन तो 24 घंटे बजते ही रहते थे) के सामने गिड़गिड़ाए।  मजबूर क्या करते; सब ने घर में ही खुद को अलग-थलग कर लिया। जैसे-तैसे कर के चारों के लिए तीसरी मंज़िल पर ऑक्सीजन के सिलेंडरों का इंतज़ाम राकेश और प्रज्ञा ने किया।

कौन किस की तीमारदारी करेगा कोई नहीं जानता था, उनकी बड़ी बिटिया प्रज्ञा और उनके पति राकेश ने बाहर रहकर वह सब कुछ किया जो इंसान कर सकता था (क़िस्म-क़िस्म के ऊपर वाले तो कब से गहरी ऐसी नींद में मगन थे जिस से कुम्भकरण भी शर्मिंदा हो जाए)।

जब हालात बिगड़ने लगे तो कम-से-कम 2 बिस्तर, किसी अस्पताल में रमेश भाई और सुधाजी के लिए तो तत्काल चाहिए थे।

इस बीच दोनों बच्चों की हालत भी बिगड़ने लगी थी। ज़मीन आसमान छानने के बाद राकेश की एक हमदर्द परिचित ने 21 अप्रेल को चारों का ESI अस्पताल ओखला कोविड वार्ड में दाखलों का इंतज़ाम करा दिया।

जब चारों सरकारी एम्बुलेंस में वहां पहुंचे तो बताया गया कि सिर्फ़ रमेश भाई और सुधाजी को ही बुज़ुर्ग होने की वजह से बिस्तर मिलेंगे। और यह भी बताया गया कि अंदर किसी भी तरह की नर्सिंग सुविधा उपलब्ध नहीं होगी।  

एक हमदर्द डॉक्टर ने इस बात की इजाज़त दे दी कि सुधाजी की जगह कोविड की शिकार बिटिया को दाख़िल कर दीजिये जो रमेश जी की तीमारदारी भी कर लेंगीं।

रमेश जी शारीरिक तौर खस्ता हालत में कोविड के साथ ही, 20 तारिख को घर में फिसल जाने की वजह से भी थे।

इसी बीच जब अंकित सुधाजी के साथ वापसी के लिए अस्पताल में ही एम्बुलेंस का इंतज़ार कर रहे थे तो पुलिस की मार का शिकार हुए।

22-23 की रात को रमेश जी की हालत बहुत-बहुत नाज़ुक हो गयी तो उनके दामाद राकेश ने एक SOS अपील जारी की जिसे पढ़कर मैत्रेयी पुष्पा जी ने कहीं बात करके सूचना दी कि रमेश जी के लिए ICU में एक बिस्तर का प्रबंध करदिया गया है। यह इत्तेला कुमार विश्वास जी ने भी साझा की कि यह करा दिया गया है जिस पर उन्हें खूब वाह-वाही मिली जिस के वे मुस्तहिक़ भी थे।

ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने भी  23 तारीख़ को बताया कि जल्द ही मरीज़ को ICU में ‘शिफ़्ट’ किया जा रहा है।

रमेश जी तड़पते रहे, बिटिया गुहार लगाती रही, राकेश डॉक्टर से बात करके चिंता जताते रहे कि रमेश जी को ICU में क्यों नहीं ले जाया जा रहा।

मेरे हम-ज़ुल्फ़ की की मौत से डेढ़ घंटा पहले भी राकेश ने सीनियर डॉक्टर से गुहार लगाई कि उन्हें ICU में शिफ्ट कर दिया जाए जिस का फ़ैसला दिन में ही किया जा चुका था, जवाब मिला वे देखेंगे। 

वे देखते रह गए और जो नतीजा निकला वह हमारे सामने है। 

रमेश जी संज्ञा बिटिया से लगातार यह कहते हुएमुझे घर ले चलो, यहां अच्छा नहीं लग रहा‘, विश्वगुरु  भारत की राजधानी  के एक सरकारी अस्पताल  के कुकर्मों के परिणाम स्वरुप हम सब को शर्मसार करते हुए 23-24 अप्रैल को रात लगभग 1. 30 अलविदा कह गए। उन्हों ने अच्छा ही किया, लेकिन याद रहे यही हम सब के साथ होना है!

जिन डॉक्टरों ने रमेश जी को ICU में भेजने से यह तर्क देकर रोका  कि उनकी हालत नाज़ुक नहीं है उनको बेचारे रमेश जी कैसे ग़लत साबित करते? उनके पास एक ही तरीक़ा था कि मर कर बताएं, जो हुआ भी!

यहाँ मैं यह भी बताना चाहूंगा कि हिंदी के एक मशहूर पत्रकार ने देश के स्वास्थ्य मंत्री  से बीसियों बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे।  इस पर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और 23 तारीख़ की शाम तक नोएडा के एक निजी अस्पताल में ICU बिस्तर का इंतेज़ाम करा दिया।  उनका बहुत शुक्रिया अदा किया गया क्यों कि जिस अस्पताल में दाख़िल थे वहीं ICU बिस्तर का इंतेज़ाम हो गया था।

अगर हम किसी रत्ती भर भी इंसानियत वाले निज़ाम में रह रहे होते तो इस की गहरायी से जाँच की जाती की ICU का वह बिस्तर जो रमेश जी को आवंटित हुआ था वह किस को बेचा गया या किस की सिफ़रिश पर किसी और को पेश कर दिया गया।

रमेश जी को मारकर एक और बोनस मिला, एक NON-ICU बिस्तर खाली हो गया।    

जब पूरा देश शमशान-क़ब्रिस्तान बन गया हो, हर घर पर मौत दावत दे रही हो, आरएसएस-भाजपा शासक जिन्होंने कोविड को पूरे देश में फैलने देकर अपने  नारे ‘एक देश-एक विधान’ को सार्थक कर दिया हो, आरएसएस-भाजपा सरकार-भक्त कह सकते हैं कि एक शख़्स,  हमारे रमेश जी की मौत क्या अहमियत रखती है! आरएसएस का एक मुखिया पहले ही बक चुका है कि राष्ट्रविरोधी लोग हल्ला कर रहे हैं। 

सब कुछ ख़तम होनेसे पहले  एक बात ज़रूर साझा करना चाहूंगा।

कोविड महामारी को लेकर शासकों, अफ़सरों, भारतीय स्वस्थ-सेवाओं (जिस का  हम गुणगान करते नहीं थकते के हमारा देश विश्वभर में ‘हेल्थ टूरिज़्म’ का destination  बन गया है, दुनिया के अमीर अमरीका-यूरोप नहीं जा कर हमारे 5-8  सितारा अस्पतालों में आते हैं और देसी अमीर मरीज़ों को एयर-एम्बुलेंस से सीधे अस्पतालों में उतारा जा सकता है), सर्वोच्च न्यायालय  और गिने-चुने अख़बार-चैनलों को छोड़ कर मीडिया ने जो आपराधिक भूमिका निभाई है उस सब को देखकर-जानकार-भोगकर कुछ भी असामान्य नहीं लगता, कलेजा हलक़ में नहीं आता।

लेकिन देश की सब से बड़ी भाषा के साहित्यकारों और सैंकड़ों  संगठनों ने जो बेहिसी और बेमुरव्वती दिखाई है उस से ज़रूर कलेजा मुँह में आता है।

हिंदी साहित्य के जिन लोगों ने और संगठनों ने रमेश जी और उनके परिवार के मौजूदा दुःख के दिनों में संवेदना ज़ाहिर की या किसी काम के लिए पूछा उनकी तादाद दोनों हाथों की उँगलियों से भी कम थी।

देश की साहित्य अकादमी और दिल्ली की हिंदी अकादमी के अफ़सर अब शायद शोक सभाएं करेंगे।  मानो वे रमेश जी के मरने का इंतज़ार कर रहे थे। ऐसी साहित्यिक और सांस्कृतिक तंज़ीमों पर ताला लगा देना चाहिए जो अपने जीवित मनीषियों को बेमौत से न बचा सकें लेकिन इस बात का ढंढोरा पीटें कि वे साहित्य और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने के काम में लगे हैं। सच तो यह है कि अगर देश के नेताओं ने देश के लोगों के कोविड से जनसंहार के तमाम इंतज़ाम किए हैं तो यह संस्थाएं भी उनके साथ शामिल हैं ।

रचनाकारों को बचाने के लिए किसी भी प्रयास का मतलब होगा कि ये सरकार  के जनसंहार के मंसूबों में रूकावट डाल रही हैं। इसी को दल्लागीरी कहते हैं।  

रमेश जी से मेरी आख़री बार बात 20 अप्रैल को हुयी  थी, मैं ने फ़राज़ की यह दो पंक्तियाँ उन्हें गाकर सुनायी थीं:

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो,

नशा बढ़ता है, शराबैं जो शराबों में मिलें। 

मेरे हमज़ुल्फ़ ने शोषण से मुक्त एक समानता और न्याय वाला समाज बनाने के लिए ज़िंदगी भर अपने निजी दुखों को बड़ी लड़ाई; समाज बदलने के संघर्ष का हिस्सा माना।

मैं फ़राज़ की पंक्तियाँ सुनाकर उनके ही जीवन के मन्त्र की याद उन्हें दिलाकर उनकी हिम्मत बढ़ाने की कोशिश कर रहा था । वे बहुत दिलेर और बहादुर थे लेकिन क्या पता था कि उनकी ज़िंदा रहने की तमाम खुवाहिशों और कोशिशों के बावजूद उन्हें ICU  बिस्तर से महरूम कर दिया जाएगा ।  

जब सेवा का दम भरने वाली राजकीय संस्थाएं अमानुषिकता की तमाम न्यूनतम सीमाएं भी लाँघ रही थीं तो सुधाजी और रमेश जी के बच्चों ने जिस तरह सेवा की उस पर रमेश जी होते तो गर्व करते के बच्चों ने त्याग के कम्युनिस्ट तौर-तरीक़ों को चार चाँद लगा दिए हैं। मैं यक़ीनन बता सकता हूँ कि  21 अप्रैल से लेकर 24 तक प्रज्ञा, संज्ञा, राकेश और अंकित शायद ही कभी सोए हों।

संज्ञा ख़ुद कोविड की ज़बरदस्त मार झेल रही थीं लेकिन डैडी की तीमारदारी के लिए मर्दों के वार्ड में ही रहीं, अंतिम सांसों तक साथ खड़ी रहीं और अपनी तक़लीफ़ेों का डैडी को ज़रा भी अहसास न होने दिया। मैं ही नहीं कोई भी मनुष्य उस मंज़र को जानकर लरज़ उठेगा जब डैडी ने दम तोड़ने से पहले संज्ञा से विनती की थी की उन्हें घर ले चलो और उनकी लाडली बिटिया कुछ नहीं कर सकी थी । संज्ञा ने कितनी हिम्मत से अपने आपार दुःख को बर्दाश्त करते हुए डैडी के देहांत की सूचना बहन और जीजा को दी वह संज्ञा ही कर सकती थीं। संज्ञा इस त्रासदी के फ़ौरन बाद मम्मी और अंकित की तीमारदारी के लिए कोविड के बावजूद घर पहुंचीं जहाँ अभी भी तीनों की कोविड की महामारी और स्वास्थ्य सेवाओं की जनसंहारी करतूतों से जंग जारी है।

राकेश के बड़े भाई साहब राजबीर जी जिन्हें खुद भी कॉविड हो चुका था ने भी किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए दिन रात की परवाह नहीं की। 

यह लोग तो घर के लोग थे उनका तो फ़र्ज़ था।  चारों ओर संवेदनहीनता के माहौल में भी परिवार के बाहर महरबान सामने आए जिस से लगता है कि इंसानियत इतनी आसानी से हारेगी नहीं।

दाख़ले वाली रात को रमेश जी और संज्ञा के लिए ज़रूरी दवाईयों और अन्य चीज़ों की ज़रुरत पड़ी।  ओखला में ‘चैरिटी अलायन्स’ के माज़िन ख़ान जी से संपर्क हुआ, उसी शाम उनके दादाजान (जनाब मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान) का देहांत हुआ था और वे उनकी क़बर को बनवाने के काम में लगे थे। उन्हों ने दुकानें खुलवाईं और रात 12 बजे बिना किसी बात के परवाह किए ख़ुद सामान पहुंचाया। इसी तरह कुछ ज़रूरी सामान उन्हों ने रमेश जी के दम तोड़ने से डेढ़ घंटा पहले भी पहुँचाया। 

इसी तरह चितरंजन पार्क, कालकाजी की इफ़टू बैटरी-रिक्शा यूनियन के साथियों ने किसी भी वक़्त शहर में क़ानूनी ताला बंदी के बावजूद दुकानें खुलवा कर ज़रूरी वस्तुएं अस्पताल पहुंचाईं।

सब से हैरतअंगेज़ और दिल को राहत देने वाला वाक़ेया उस वक़्त हुआ जब  माज़िन ख़ान जी ने रमेश जी और संज्ञा के लिए बहुत ज़रूरी एक oximeter के लिए मुहम्मद ख़ावर ख़ान नाम के एक दवाई दुकान के मालिक से किसी भी क़ीमत पर लाने के लिए कहा  (जो 500-800 वाला 3000 हज़ार में बिक रहा था)। उन्हों ने साफ़ मना कर दिया और बताया कि वे कोई भी कालाबाज़ारी वाला सामान नहीं बेचते हैं, क्यों कि वे मरीज़ों की बद्दुआ नहीं लेना चाहते।

बहरहाल एक और दुकान से यह आला 2000 में ख़रीदा गया।

यह हैरत में डालने वाली बात थी क्योंकि दवाई की दुकानों के मालिक कोविड के इलाज में काम आने वाली दवाईयों और oximeter जैसी वस्तुएं बेचकर रोज़ लाखों का मुनाफा कमा रहे थे, उनके लिए कोविड महामारी संकट को अवसर में बदलने जैसी थी जिस की सलाह देश के प्रधान मंत्री लगातार देते रहे

थे । 

शहीद नदीम की यह दो पंक्तियाँ बहुत याद आ रही हैं जो मेरे हमज़ुल्फ़ को भी बहुत पसंद थीं :

इंसान अभी तक ज़िंदा है,

ज़िंदा होने पर शर्मिंदा है।

शम्सुल इस्लाम

अप्रैल 25, 2021

लोकप्रिय सिनेमा सिर्फ़ हिंसा और सैक्स पर ही निर्भर है : सागर सरहदी

sagar sarhadi

Veteran Film Maker Writer Sagar Sarhadi Passes Away

सागर सरहदी का असली नाम क्या था

अलविदा मेरे भाई साहब सागर सरहदी!

भाई साहब (सागर सरहदी जी को मैं आम तौर पर इसी नाम से संबोधित करता था, कई बार कॉमरेड भी) का मार्च 22-23, 2021 को मुंबई में देहांत हो गया। मई 11, 1933 के दिन सूबा सरहद के ज़िले एबटाबाद [अब पाकिस्तान में] में जन्मे गंगा सागर तलवार ने अपना प्रगतिशील राजनैतिक और साहित्यिक जीवन सागर सरहदी के नामकरण से शुरू किया। वे जहाँ जन्मे थे उस धरती को अपने नाम में सरहदी जोड़कर अपनी जड़ों से खुद को जोड़े रखा। वे एक प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट थे। बंटवारे के बाद लुट-पिट कर दिल्ली पहुंचे। फिर काम की तलाश में बंबई जाकर बस गए। वहां बलराज साहनी और एके हंगल जैसी हस्तियों का साथ मिला और जनपक्षीय नाट्यकर्म से पूरे तौर पर जुड़ गए। पहले अपना नाट्य संगठन ‘द कर्टेन’[पर्दा] बनाया और बाद में ‘इप्टा’के साथ जुड़ गए। बंटवारे की त्रासदी को झेलने के बावजूद प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े रहे। हिंदी, उर्दू, पंजाबी नाटक के लिए ख़ूब काम किया और चर्चित हुए।

सागर सरहदी मूलतः उर्दू के लेखक थे। नाटक से फ़िल्मी दुनिया तक पहुंचे और ‘बाज़ार’जैसी फ़िल्म बनाकर अपना अलग स्थान बनाया। वे फ़िल्म जगत की एक ऐसी हस्ती हैं जो निर्माता, निर्देशक एवं लेखक तीनों के रूप में ख़ासे चर्चित रहे हैं।

अनुभव, चांदनी, ‘दिवाना, ‘कभी-कभी’और ‘सिलसिला’जैसी फ़िल्में उनकी की क़लम का ही कमाल रही हैं। फ़िल्म जगत में सफलता के बावजूद नाटक के प्रति उनका जुड़ाव कभी कम नहीं हुआ है। उन्होंने ‘तन्हाई, ‘भूखे भजन न होए गोपाला, भगतसिंह की वापसी’और ‘दूसरा आदमी’जैसे नाटकों को न केवल रचा बल्कि उनकी सैकड़ों सफल प्रस्तुतियों की हैं। फ़िलहाल उनका कहना था कि वे फ़िल्म जगत के मोह से मुक्त हो, केवल नाटक की दुनिया में ही सक्रिय होना चाहते थे।

उन के साथ निम्नलिखित बात-चीत (Sagar Sarhadi interview in Hindi) दिल्ली में मई 1993 में हुई थी। मेरे सवालों के जो जवाब, हिंदी फ़िल्मों, फ़िल्मी दुनिया, उर्दू-हिंदी साहित्य, नाटक के बारे में उन्होंने दिए वे आज भी प्रसंगकिक हैं बल्कि ज़्यादा शिद्दत से हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।

सागर सरहदी उस पीढ़ी से आते थे जिस ने धर्म के नाम पर देश के बॅटवारे के नतीजे में भयानक ज़ुल्म, हिंसा, और तबाही झेलने के बावजूद इंसानियत, समाजवाद और शोषण से मुक्त सेकुलर समाज बनाने का सपना नहीं ओझल होने दिया और जीवन भर इन सपनों को साकार करने के लिए लामबंद रहे। इस में कोई शुबह नहीं कि अगर भाई साहब की सेहत इजाज़त देती तो वे दिल्ली की सरहदों पर धरना दे रहे बहादुर किसानों के बीच रह रहे होते। 

सवाल: बाज़ार, ‘तेरे शहर में, ‘लोरी, ‘अगला मौसमजैसी फ़िल्में बनाने के बावजूद बहुत ज़माने से आपने कोई नई फ़िल्म नहीं बनायी। ऐसे क्यों?

जवाब: यह सच है कि मैंने कई वर्षों से कोई फ़िल्म नहीं बनाई है, इसके बहुत से कारण हैं। एक सृजनकार की तमाम ख़्वाहिशों के बावजूद फ़िल्म बनाने की प्रक्रिया बहुत जटिल और ढेढ़ी खीर की तरह हो गयी है। पैसा लगाने वाले लोग जल्दी से बहुत पैसा बनाना चाहते हैं। इसलिए किसी भी प्रयोग में पैसा लगाने से कतराते हैं। एक वजह कलाकारों का बहुत ज़्यादा मंहगा होना भी है। सबसे महत्वपूर्ण कारण मेरी अंतिम फ़िल्म ‘लोरी का नाकाम हो जाना था। एक दिवसीय क्रिकेट मैच उन दिनों छाए हुए थे। दर्शक हाल में जा ही नहीं रहे थे। इस फ़िल्म की नाकामी ने मेरा घर-बार बिकवा दिया। नई फ़िल्म बनाने का विचार कई बार दिल दिमाग़ में जोश मारता है लेकिन परिस्थितियां उसकी इजाज़त नहीं देतीं।

सवाल: आम अपनी फ़िल्मों में किस फ़िल्म को सबसे बढ़िया मानते हैं?

जवाब: हर लिहाज़ से ‘बाज़ार’मेरी सबसे बेहतरीन फ़िल्म है। मैं अपनी बाक़ी सब फ़िल्मों को दिखावटी मानता हूं। ‘बाज़ार’फ़िल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है जिसका मुझे हैदराबाद में पता लगा था। इस फ़िल्म को प्रतिबद्धता के साथ हम सबने बनया था, सब कलाकार और तकनीशियन बहुत कम मेहनताने और सुविधाओं पर इस फ़िल्म को करने पर सहमत हो गए थे, क्योंकि उन्हें इस बात का एहसास था कि मैं इस फ़िल्म को इंसानी एहसासात को उजागर करने के लिए एक जज़्बे के तह बना रहा हूं। उस दौर का अब लौट पाना बहुत मुश्किल है।

सवाल: आख़िर ऐसा क्यों हुआ है कि बंबई की फ़िल्मी दुनिया में ख़्वाजा अहमद अब्बास, गुरूदत्त, बलराज साहनी, पृथ्वीराज कपूर जैसे प्रतिबद्ध और कम बजट की फ़िल्म बनाने वालो की पीढ़ी लुप्त हो गई है?

जवाब: उसकी वजहें बहुत साफ़ हैं। वे लोग सामाजिक और राष्ट्रीय चितांओ के चलते फ़िल्मों का सृजन करते थे। उनकी फ़िल्मी का सृजन उनके जीवन दर्शन का ही एक हिस्सा था। हर कोई उनकी ललक और प्रतिबद्धता को महसूस करके उनके साथ सहयोग करता था। हर फ़िल्म एक सामूहिक कर्म में बदल जाता था। आजकल लोग फ़िल्म नहीं बनाते हैं बल्कि वो तो एक तरह का उद्योग लगा रहे हैं। फ़िल्म निर्माताओं का एक मात्र उद्देश्य पैसा कमाना है तो अभिनेता और तकनीशियन भी कोई क़ुर्बानी क्यों करें। लोकप्रिय सिनेमा के क्षय का एक कारण फ़िल्मी दुनिया पर तस्करों और अपराधियों के पैसे का बढ़ता नियंत्रण भी है। इस तरह के पैसे के दख़ल ने भारतीय फ़िल्म के साथ दो खिलवाड़ किये हैं। एक तो यह कि इन्होंने फ़िल्मी जगत में इतना धन बहाया है कि कलाकारों की क़ीमतें आसमान छूने लगीं हैं दूसरे यह कि अब लोकप्रिय सिनेमा सिर्फ़ हिंसा और सैक्स पर ही निर्भर है। स्मगलर, फाइनेंसर अपनी जीवन शैली की फ़िल्में पर्दे पर चाहते हैं। ज़ाहिर है जिनका खायेंगे, उनका राग अलापना भी पड़ेगा।

सवाल: फ़िल्मी दुनिया में एक लेखक के तौर पर आपने बहुत काम किया है, आपने कई यादगार फ़िल्में लिखी। क्या आप फ़िल्मी जगत में लेखक की हैसियत से संतुष्ट हैं?

जवाब: फ़िल्मी जगत में पटकथा लेखकों को लेकर बहुत से लतीफ़े मशहूर हैं। एक बार शूटिंग के दौरान एक अभिनेत्री ने लेखक से कहा कि फ़लां डायलाग बदल दीजिए। लेखक तैयार नहीं हुआ, जब अभिनेत्री ने ज़िद्द की तो लेखक ने रुहांसा होकर कहा यही तो एक उनका डायलाग है। पटकथा में बचा है बाक़ी तो सब का सब निर्माता और निर्देशक बदल चुके हैं। लेकिन हिंदी फ़िल्मों में अपवाद भी रहे हैं। सआदत हसन मंटों ने भारतीय फ़िल्मों के लिए यादगार पटकथाएं लिखीं। राजेंद्र सिंह बेदी ने विमल दा और ऋषिकेष के लिए ज़बरदस्त पटकथायें लिखीं। इस सच को भी नहीं झुठलाया जा सकता कि सलीम-जावेद ने हिंदी फ़िल्म के पटकथा लेखन को एक महत्वपूर्ण दर्जा दिलवाया। इन दोनों ने लेखक को फ़िल्मी सितारों के रूप में उभरने का मौक़ा दिया, कसकर पैसे वसूले। आज हिंदी फ़िल्म में पटकथा, लेखक जो खा कमा रहे हैं उसकी वजह भी सलीम-जावेद ही हैं।  

सवाल: फ़िल्म के पटकथा लेखन के क्षेत्र में आप अपनी भूमिका को लेकर संतुष्ट हैं?

जवाब: नहीं, पटकथा लेखन बहुत चीजों से तय होता है। मैंने यह ईमानदार प्रयास ज़रूर किया है कि अपनी पसन्द की फ़िल्में लूं, मेरे थैले में हर तरह का माल नहीं है। मैं किसी भी ऐसी फ़िल्म के लिए काम नहीं करता जो औरत के खिलाफ़ हो। मेहनतकशों के खिलाफ़ हो, या जातिवादी और साम्प्रदायिक घृणा का शिकार हो। मैं अपने लेखन में अश्लील लटकों का प्रयोग नहीं करता। यह सचेतन प्रयास होता है कि मैं अपनी फ़िल्मों में इंसानी मान्यताओं को उभारुं। आप देखेंगे कि मेरी फ़िल्मों में महिला पात्र बहुत सशक्त होते हैं।

सवाल: फ़िल्म और रंगकर्म में आपको ज़्यादा क्या पसंद है?

जवाब: मैं दरअसल थियेटर का ही आदमी हूं, हमेशा नाटक ही करना चाहता था। मैंने अपना ग्रुप ‘द कर्टेन’और बलराज साहनी ने अपना ड्रामा संगठन ‘जुहू थियेटर’बंद करके बंम्बई में ‘इप्टा’शुरू किया था। हम लोग बस्तियों में जाते, छोटे-मोटे हॉलों में जाकर नाटक करते। जब पैसे की बहुत तंगी होने लगी तो मैने थियेटर को नहीं त्यागने का फ़ैसला किया और ख़र्चा निकालने के लिए टैक्सी ड्राइवर बनना तय किया। उसके लिए लाईसेंस भी बनवाया। दोस्तों के मजबूर करने पर मैंने बसु भट्टाचार्य की पहली फ़िल्म ‘अनुभव’के डायलाग लिखना मंजूर किया। फ़िल्मी दुनिया में मैं इसलिए आया कि मैं सार्थक रंगमंच करना चाहता था। अपने उसी लगाव के चलते मैंने यह भी फ़ैसला कर लिया था कि मैं शादी नहीं करूंगा।

सवाल: प्रगतिशील नाट्यकर्मियों के सामने आज क्या चुनौतियां हैं?

जवाब: मुझे लगता है कि प्रगतिशील नाट्य आंदोलन की समस्याएं संगठन सम्बंधी उतनी नहीं है जितनी कि बौद्धिक और वैचारिक हैं। हम में से ज्यादातर लोग भूतकाल में ही जी रहे हैं। हम सच्चाई की आंखों मे ऑंखें डालने से कतराते हैं। पढ़ना-लिखना तो हम लोगों ने बंद ही कर दिया है। ज़्यादातर

नाट्यकर्मियों की समस्या यह है कि वे यूरोपीय नमूनों की नक़ल करते हैं। इब्सन से शुरू करते हैं और अलगाववाद से होते हुए एब्सर्ड थियेटर तक पहुंचते हैं और अंत सनसनी फैलाने वाले नाटकों पर होता है। हमें इन सबसे बचना है। हमारे देश के नाट्य कर्मियों की इस देश की सच्चाई के सबक खड़े करना होगा। हमें अपने देश की परिस्थितियों के संदर्भ में ही एक वैकल्पिक थियेटर विकसित करना होगा। मैं अपना बाकी समय इसी काम में लगाना चाहता हूं।

शम्सुल इस्लाम

[इस का एक संक्षिप्त रूप दिल्ली के जनसत्ता में मई 14, 1993 छपा था।]

हम ने किस बेशर्मी से सरहदी गाँधी की क़ुर्बानियों और विरासत को भुला दिया!

खान अब्दुल गफ्फार खां, Frontier Gandhi Khan Abdul Ghaffar Khan,

सरहदी गाँधी ने देश-विभाजन से पहले और बाद में दो-क़ौमी नज़रिए को नहीं माना

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान की 131वीं जयंती पर

On the 131st birth anniversary of Khan Abdul Ghaffar Khan

फ़रवरी 6 ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, जिन्हें सरहदी गाँधी और बादशाह ख़ान के नाम से भी याद किया जाता है, की 131वीं जयंती थी। वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक अग्रणी नेता, दो क़ौमी सिद्धांत (जिस के अनुसार हर धार्मिक समुदाय अलग राष्ट्र होता है, इस लिए हिन्दू और मुसलमान भी दो अलग राष्ट्र हैं) और पाकिस्तान के विचार के प्रबल विरोधी थे। वे गांधीजी के एक सच्चे अनुयायी के तौर पर अहिंसा-सिद्धांत में पूरी तरह से विश्वास करते थे। उन्हें उत्तर-पश्चिमी-सरहदी प्रांत में वही सम्मान प्राप्त था जो पूरे देश में गांधीजी को था, इसी लिए वे सरहदी गांधी भी कहलाते थे।

सरहदी गाँधी पर पाकिस्तान में रोंगटे खड़ा कर देने वाला ज़ुल्म

देश के विभाजन के फ़ैसले के बाद उन्होंने सरहदी प्रान्त को पाकिस्तान में शामिल किए जाने का ज़बरदस्त विरोध किया लेकिन कामयाब नहीं हुए। इस का परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान बनने के बाद वहां जो भी सरकारें सत्ता में आईं (जिन्नाह के नेतृत्व वाली पहली सरकार समेत) उन्होंने ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान और उनके आंदोलन का भीषण दमन किया, उनके एक भाई की हत्या कर दी गयी और उनके साथियों में से अनेक मौत के घाट उतार दिए गए। उन्हें और उनके साथियों को हिन्दू हिन्दोस्तान का दलाल बताया गया। उन्होंने एक दशक से भी ज़्यादा समय पाकिस्तान की जेलों में गुज़ारा और जान बचाने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में पनाह लेनी पड़ी।

जिस वक़्त पाकिस्तान का जन्म हुआ उस समय सरहदी सूबे में सरहदी गाँधी के बड़े भाई, डॉ. ख़ान साहब के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी जिसे जिन्नाह ने अगस्त 22, 1947 को, पाकिस्तान के अस्तित्व में आए केवल 8 दिनों बाद, तमाम प्रजातान्त्रिक मर्यादाओं को ताक़ पर रखते है बर्ख़ास्त कर दिया। उस के बाद सरहदी गाँधी के अनुयायियों के जनसंहार ने इस्लामी राज्य पाकिस्तान में नया ख़ूनी इतिहास रचा, जिस को लगभग भुला दिया गया है।

पाकिस्तान में इस्लामी सरकारों ने सरहदी गांधी और उनके साथियों पर जो अत्याचार किए और उनकी विरासत को मलियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी उस के वजह साफ़ है। वे द्विराष्ट्र के सिद्धांत जिस का नारा बुलंद करके पाकिस्तान की मांग की गयी थी और इसे हासिल किया गया था के ज़बरदस्त विरोधी थे। वे देश के बंटवारे से पहले और बाद में मुस्लिम लीग के रास्ते में एक मज़बूत चट्टान के तरह डटे रहे और बेमिसाल क़ुर्बानियां दीं। लेकिन हम ने उनके साथ जो किया वह पाकिस्तान से कहीं ज़्यादा शर्मनाक है। 

भारत में आरएसएस-भाजपा शासकों द्वारा सरहदी गाँधी की विरासत से खिलवाड़

हमारे देश में हुक्मरानों द्वारा सरहदी गांधी और उनकी विरासत की अनदेखी और अपमान की लम्बी सूची है और आरएसएस-भाजपा सरकारोँ के सत्तासीन होने के बाद तो हदें पार करती जा रही है। सरहदी गांधी को अपमानित करने की ताज़ातरीन घटना दिसम्बर 2020 अमल में लाई गयी जब दिल्ली से सटे हरयाणा के सब से बड़े नगर फ़रीदाबाद में बादशाह ख़ान अस्पताल का नाम बदल कर अटल बिहारी वाजपेयी अस्पताल कर दिया गया।

यह कुकर्म हरयाणा के मुख्य-मंत्री और आरएसएस के एक नामी सदस्य मोहन लाल खट्टर के आदेश पर किया गया।

यह अस्पताल आज़ादी के बाद बादशाह ख़ान के नाम पर इस लिए रखा गया था ताकि स्वतंत्रता संग्राम में उनके महान योगदान और क़ुर्बानियों को सम्मानित किया जा सके और बादशाह ख़ान को बताया जा सके कि आज़ाद भारत उनको भूला नहीं है। इस के निर्माण में उन हिन्दुओं और सिखों ने जो सरहदी सूबे से पलायन करके आए थे (देश में इन की सब से बड़ी तादाद फरीदाबाद में ही बसाई गयी थी) बड़े पैमाने पर आर्थिक और शारीरिक योगदान किया था। इस सहयोग के ज़रिए इन शरणार्थियों ने सरहदी गांधी का शुक्रिया अदा करना चाहा था कि किस तरह सरहदी गांधी और उन के संगठन ख़ुदाई ख़िदमतगार (ख़ुदा के सेवक) ने उनको विभाजन के दौरान मुसलमान हिंसक तत्वों से बचाया था। इस अस्पताल का उद्घाटन जून 5, 1951 को पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था और उस समय लगाई गयी तख़्ती के अनुसार:

बादशाह ख़ान अस्पताल जो फरीदाबाद के लोगों ने अपने हाथों से बनाया अपने चहीते नेता ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के नाम पर रखा है”।

95% मुसलमान बहुल प्रान्त में धर्मनिरपेक्ष आज़ादी आंदोलन

सरहदी गाँधी इस सच्चाई से भलीभांति परिचित थे कि सरहदी प्रान्त के आम लोगों (जो 95% से भी ज़्यादा मुसलमान थे) को साथ लिए बिना आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। इस उद्देश्य से उन्होंने एक व्यापक जन संगठन, ख़ुदाई ख़िदमतगार खड़ा किया।

समकालीन दस्तावेज़ इस सच्चाई को रेखांकित करते हैं की देश प्रेमी और सामाजिक रूप से प्रगतिशील आंदोलनों में ख़ुदाई ख़िदमतगार सबसे आगे थे, जिसका नेतृत्व करिश्माई शख्सियत ख़ान अब्दुल गफ्फार ख़ान कर रहे थे। इस के सदस्य कियोंकी लाल रंग के यूनिफॉर्म का इस्तेमाल करते थे इस लिए इस आंदोलन का उपनाम द रेड शर्ट्सयानी लाल कमीज लोकप्रिय हो गया था। लाल रंग को चुनना इस तहरीक की वैचारिक पृष्ठभूमि को भी झलकाता था।

इनको पहली बार 1929 में लाहौर कांग्रेस में देखा गया और अँगरेज़ ख़ुफ़िया तंत्र के आंकड़ों के अनुसार इसके गठन के दो वर्षों के अंदर ही ख़ुदाई ख़िदमतगार के 2 लाख सदस्य बन चुके थे। ग़ुलामी के विरोध में क़ुरान से लिए गए उद्धरण राष्ट्रवादी स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्थन हासिल करने वाले नारे बनाकर प्रस्तुत किए गए थे और विदेशी शासन से देश को मुक्त करने का संघर्ष इस तरह ख़ुदाई ख़िदमतगारों के लिए पवित्र युद्ध बन गया।

डब्ल्यूसी स्मिथ जो समकालीन मुसलमान राजनीति के सब से अहम विशेषज्ञ माने जाते हैं ने 1943 में कहा था कि भारत का अन्य कोई वर्ग ख़ुदाई ख़िदमतगारों से अधिक समर्पित राष्ट्रवादी नहीं था।

कांग्रेस से जुड़ना

ख़ुदाई ख़िदमतगारों ने सरहदी प्रान्त में हिन्दू-मुसलमान बंटवारे को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया। एक साझी आज़ादी के लड़ाई के उद्देश्य से खुद को हमेशा कांग्रेस के एक हिस्से के रूप में देखा और अपने क्षेत्र के मुसलमान अलगाववादियों की आलोचनाओं को रद्द करते हुए इस जुड़ाव को सही ठहराते हुए सरहदी गाँधी ने कहा,

“लोग मेरे खिलाफ अपने राष्ट्र को बेचकर कांग्रेस में शामिल होने की शिकायत करते हैं। कांग्रेस एक राष्ट्रीय ढांचा है और कोई हिंदू ढांचा नहीं है। कांग्रेस ब्रिटिश के खिलाफ काम करने वाली निकाय है। ब्रिटिश राष्ट्र, कांग्रेस और पठानों का दुश्मन है। इसीलिए मैं इसमें शामिल हुआ और ब्रिटिश से छुटकारे के लिए कांग्रेस के साथ साझा लक्ष्य तय किया।”

एक सर्व-समावेशी संयुक्त भारत और समाजवादी समाज की कल्पना

ख़ुदाई ख़िदमतगार जिस में हिन्दू और सिख भी अच्छी-ख़ासी तादाद में थे, ने जागीरदारी को ख़त्म करके भूमि-हीन किसानों के लिए भूमि वितरण की मांग के साथ एक समतामूलक समाज बनाने की ज़ोरदार मांग की और इस से कभी भी किनारा नहीं किया। सरहदी गाँधी एक समाजवादी समाज बनाना चाहते थे। इसके अलावा वे एक कटिबद्ध धर्मनिरपेक्षतावादी भी थे। वे एक सर्व-समावेशी संयुक्त भारत के लिए खड़े थे। सबके लिए स्वतंत्र भारत में उनका विश्वास केवल सैद्धांतिक स्तर पर ही नहीं था, बल्कि यह एक साझा स्वतंत्रता संघर्ष का परिणाम था।

“पंजाब जेल में उन्होंने हिंदुओं और सिखों के साथ दोस्ती की और उनके पवित्र ग्रंथों क्रमश: गीता और ग्रंथ साहेब का विशेष तौर पर अध्ययन किया।”

सरहदी गाँधी एक पठान बहुल प्रान्त के नेता होने के साथ-साथ समूचे देश के बारे में भी उतना ही सोचते थे, उनके अनुसार,

“सरहदी भारत की कई कहानियां दोहरे तथ्यों वाली कहानियां रही हैं–एक पठान की मुकम्मल वैयक्तिकता वाली और फिर भी एक समान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शेष भारत से एकरूपता वाली। इसका पर्याप्त प्रमाण ख़ुदाई ख़िदमतगार आंदोलन में मिलता है, जो फ्रंटियर प्रॉविंस की मिट्टी से निकलता है और एक बड़े उप-महाद्वीप के बड़े स्वतंत्रता आंदोलन में जगह बना लेता है। इस संदर्भ में यह देखना महत्वपूर्ण है कि जहां पठान प्रचंड रूप से स्वतंत्रता प्रेमी है और किसी तरह की आधीनता को पसंद नहीं करते हैं, उनमें से अधिकांश लोग यह समझना शुरू कर रहे हैं कि उनकी स्वतंत्रता भारतीय स्वतंत्रता की अवधारणा के साथ अच्छी तरह समरस हो सकती है, और इसीलिए उन लोगों ने भारत को कई राज्यों में तोड़ने की योजना का समर्थन करने के बजाय, एक समान संघर्ष में अपने देशवासियों से हाथ मिलाया। उन्होंने यह जान लिया है कि भारत के विभाजन से आधुनिक विश्व में हर तरह से कमजोरी आएगी, जहां इसके किसी भी भाग के पास अपनी आजादी को संरक्षित रख पाने के लिए पर्याप्त संसाधन और शक्ति नहीं होगी।”

सरहदी गाँधी ने विभाजन को नहीं स्वीकारा

1947 के जून में जब कांग्रेस देश विभाजन के लिए सहमत हो गई, तब सरहदी गाँधी ने उसका प्रबल विरोध किया था।

“विभाजन और फ्रंटियर प्रॉविंस में जनमत संग्रह का निर्णय हाई कमान द्वारा बिना हमसे परामर्श किए लिया गया… सरदार पटेल और राजगोपालाचारी विभाजन के पक्ष में थे और हमारे प्रॉविंस में जनमत-संग्रह करा रहे थे। सरदार ने कहा कि बिना वजह परेशान हो रहा हूं। मौलाना आजाद मेरे पास बैठे थे। मेरी खिन्नता को देखते हुए उन्होंने मुझसे कहा कि, ‘आपको अब मुस्लिम लीग में शामिल हो जाना चाहिए।’ इससे मुझे काफी दुख पहुंचा कि इतने वर्षों तक हम जिसके लिए खड़े रहे और हमने जो संघर्ष किया, उसे हमारे इन सहयात्रियों ने कितना कम समझा है।

1947 के जून में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में सरहदी गाँधी ने गांधी जी को याद दिलाया,

“हम पख़्तून आपके साथ खड़े रहे और स्वतंत्रता पाने के लिए बड़े बलिदान भी दिए, लेकिन अब आपने हमें छोड़ दिया और भेड़ियों के हवाले कर दिया है।”

मुस्लिम लीगी गुंडों का सीधा निशाना

सरहदी गाँधी, उन का अनुयायी ख़ुदाई ख़िदमतगार और उनके परिवार मुस्लिम लीग के गुंडों और आतंकवादियों के हाथों जो ज़ुल्म सहे उन का ब्यौरा देते हुए स्वयं सरहदी गांधी ने जुलाई 1947 में लिखा कि,

मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता रोजाना जुलूस निकालते हैं और अत्यंत आपत्तिजनक नारे लगाते हैं। वे हमें का़फिर कहते हैं और हमारे लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं। हूटिंग का मैं खुद भी एक बार शिकार हो चुका हूं…। इसके अलावा हमारे लिए एक और गंभीर मसला है, वो ये कि हमारे प्रांत में पंजाबियों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो खुलेआम लोगों को हिंसा के लिए उकसाते हैं। इतना ही नहीं, वे सार्वजनिक बैठकों तक में जाने लगे हैं और कहने लगे हैं कि लाल शर्टधारी शीर्ष नेताओं को अब हटा दिया जाना चाहिए। वे खुले तौर पर ये भी कहते फिर रहे हैं कि पाकिस्तान की स्थापना के बाद जितने भी विश्वासघाती हैं, सभी को फांसी पर लटका दिया जाएगा।

सरहदी गाँधी की बीवी के भतीजे अताउल्लाह खान, उनके सेवक और दोस्तों की मुस्लिम लीग वालों ने तब हत्या कर दी, जब इन्होंने NWF प्रांत के गांव की मस्जिद में हुई मुस्लिम लीग की बैठक में अतिवाद पर आपत्ति उठाई थी। लीग के एक बड़े नेता किरमान ख़ान को फायरिंग करने पर गिरफ्तार कर लिया गया।

सरहदी गाँधी की विरासत को भूलने का मतलब है पेशावर के क़िस्सा ख्वानी बाजार के जनसंहार और वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की क़ुर्बानी को भी भूल जाना

सरहदी गाँधी, उनके संघर्ष, क़ुरबानियों और धर्म-निरपेक्ष विरासत को एक प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत द्वारा भुला दिया जान एक और वजह से बहुत दुखद ही नहीं शर्मनाक भी है। ऐसा करके हम देश की आज़ादी की जंग के एक बड़े जनसंहार को भी भुला देना चाहते हैं जो अप्रेल 23, 1930 को अंग्रेज़ी सेना द्वारा अमल में लाया गया था। यह था क़िस्सा ख्वानी बाज़ार क़त्ल-ए-आम (पेशावर का मशहूर क़िस्सा ख्वानी बज़ार जिसका शाब्दिक मतलब हे बाजार जहाँ क़िस्से सुनाए जाते हैं; दस्तना गोई का बाज़ार) और 1919 के जलियांवाला बाग़ के बाद अंग्रेज़ों द्वारा किया गया सब से बड़ा जनसंहार था। इस में 400 से भी ज़्यादा ख़ुदाई ख़िदमतगार जो एक शांतिपूर्वक धरने पर बैठे थे को बंदूकों और मशीनगन से मार दिया गया था।

सरहदी गाँधी और ख़ुदाई ख़िदमतगारों को भुला दिए जाने का अर्थ देश की आज़ादी की लड़ाई में किए गए एक और हिन्दूओं-मुस्लमानों की साझी क़ुर्बानी पर भी परदा डालना होगा। इस जनसंहार को गोरे फौजियों ने अंजाम दिया था लेकिन इस से पहले एक अभूतपूर्व घटना घट चुकी थी।

गढ़वाल रियासत की सेना की एक टुकड़ी जो अँगरेज़ सेना के साथ (ट्रेनिंग के लिए आयी हुयी थी) घटना स्थल पर पहुँची थी। गढ़वाली टुकड़ी की कमान चन्द्र सिंह गढ़वाली के हाथ में थी। जब उन्हें गोली चलाने का हुक्म हुआ तो चन्द्र सिंह गढ़वाली ने अपनी टुकड़ी को यह हुक्म देने से मना कर दिया। इन्हें साथी फौजियों के साथ फ़ौरन हिरासत में ले लिया गया और फ़ौजी अदालत ने मौत की सज़ा सुनायी जिसे जनता के आक्रोश के चलते 14 वर्ष की क़ैद में बदल दिया गया।

हिन्दुत्ववादी टोली लगातार यह ज़हर उगलती रहती है कि आज़ादी से पहले के तमाम मुसलमानों ने मुस्लिम लीग का साथ दिया था। यह झूठ उपरोक्त ब्यान की गयीं सच्चाईयों के बावजूद बोला जाता है।

मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों को सरहदी गाँधी और ख़ुदाई ख़िदमतगार के देश की आज़ादी के लिए अंजाम दिए गए कारनामों, दमन और क़ुर्बानियों को जानना बहुत ज़रूरी है। इस सब को जानकर ही वे समझ पाएंगे की हमने बेदर्दी से जो इस प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक विरासत की अनदेखी की है उसी कारण हिन्दुत्ववादी शासक, जो पाकिस्तान के इस्लामी शासकों का ही एक प्रतिरूप हैं आज एक प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत पर राज करने लायक़ हुए हैं। अगर इसको चुनौती देनी है तो हमें लगन के साथ सरहदी गाँधी और ख़ुदाई ख़िदमतगारों की महान विरासत को फिर से जीना होगा।  

शम्सुल इस्लाम

15-02-2021

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

गांधीजी की शहादत : हत्यारों की पहचान जो स्वयं सरदार पटेल ने की थी

Prof. Shamsul Islam on Gandhiji's 72nd Martyrdom Day

THE IDENTITY OF THE ASSASSINS OF GANDHIJI AS DISCLOSED BY SARDAR PATEL

गांधीजी की शहादत की 73वीं बरसी पर | 73rd anniversary of Gandhi‘s martyrdom

गांधीजी के हत्यारों की पहचान जो स्वयं सरदार पटेल ने की थी

विश्व भर में 30 जनवरी, 2021 के दिन गांधीजी को उनकी शहादत की 73वीं बरसी पर याद किया जाएगा जिन्हें हिन्दुत्ववादी आतंकियों ने 30 जनवरी, 2021 को दिल्ली में एक प्रार्थना के दौरान गोली मारकर शहीद कर दिया था। हिन्दुत्ववादी राजनीती का सब से प्रमुख झंडाबरदार संगठन, आरएसएस, जिस के सदस्य आज देश पर राज कर रहे हैं, जब भी गांधीजी के क़ातिलों की हिन्दुत्ववादी पहचान और उनके आरएसएस तथा वीडी सावरकर के नेतृत्व वाली हिन्दू महासभा के रिश्तों की चर्चा की जाती है तो आपे से बाहर हो जाता है। इस की बजाए कि वह शर्मसार हो और हत्या में ज़िम्मेदारी के लिए प्रायश्चित करे; उल्टा चोर कोतवाल को डांटने लगता है। जो लोग इस सच को रेखांकित करते हैं उन्हें अदालतों में घसीटा जाता है ताकि वे इस की चर्चा करना छोड़ दें।

गांधीजी के हत्यारों का आरएसएस जैसे संगठनों से सम्बन्ध कोई ऐसा राज़ नहीं है, जो छुपा रहा हो। इस को जानने के लिए बस हमें देश के पहले ग़ृह-मंत्री और उप-प्रधान मंत्री वल्लभ भाई पटेल के सरकारी काग़ज़ात का अध्ययन करना होगा और उन्हों ने गांधीजी की हत्या के बाद आरएसएस के ख़िलाफ़ जो क़दम उठाया था उस को याद रखना होगा।

याद रहे कि आरएसएस सरदार पटेल पर दुश्मन होने का इलज़ाम नहीं लगा सकता है क्योंकि वे और उसके सब से शक्तिशाली ‘स्वयंसेवक’ प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस के इस बड़े नेता को पूजते हैं। इन की शान में मोदी ने दुनिया की सब से बड़ी-ऊंची मूर्ति गुजरात में लगवाई है। यह और बात है की ‘आत्मनिर्भर भारत‘ और ‘मेक इन इंडिया‘ का ढिंढोरा पीटने वाले हमारे प्रधान मंत्री ने इस सरदार की मूर्ति को चीन के एक कारखाने में ढलवाया है।

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निम्नलिखित में सरदार पटेल ने जिस तरह कालक्रम में गाँधीजी की हत्या करने वाले हिन्दुत्ववादी आतंकियों की पहचान की उसे पेश किया जा रहा है जो अपने आप में क़ातिलों की वैचारिक और सांगठनिक पहचान को उजागर करता है।      

(1) आरएसएस पर प्रतिबन्ध! गांधीजी की हत्या के बाद?

गांधीजी की हत्या के बाद, 4 फ़रवरी 1948 को आरएसएस पर सरदार के मंत्रालय प्रतिबंध लगा दिया गया था। यह प्रतिबंध लगाए जाने के पीछे जो कारण थे उनमें कई राष्ट्र विरोधी कार्य भी शामिल थे। सरकार द्वारा आरएसएस पर प्रतिबंध लगा देने वाला आदेश भी अपने आप में बहुत स्पष्ट थाः

“भारत सरकार ने 2 फ़रवरी को अपनी घोषणा में कहा है कि उसने उन सभी विद्वेषकारी तथा हिंसक शक्तियों को जड़ मूल से नष्ट कर देने का निश्चय किया है, जो राष्ट्र की स्वतंत्रता को ख़तरे में डालकर उसके उज्जवल नाम पर कलंक लगा रहीं हैं। उसी नीति के अनुसार चीफ़ कमिश्नरों के अधीनस्थ सब प्रदेशों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को अवैध घोषित करने का निश्चय भारत सरकार ने कर लिया है। गवर्नरों के अधीन राज्यों में भी इसी ढंग की योजना जारी की जा रही है।”

सरकारी विज्ञप्ति में आगे चलकर कहा गया –

“संघ के स्वयंसेवक अनुचित कार्य भी करते रहे हैं। देश के विभिन्न भागों में उसके सदस्य व्यक्तिगत रूप से आगज़नी, लूटमार, डाके, हत्याएं तथा लुकछिप कर शस्त्र, गोला और बारूद संग्रह करने जैसी हिंसक कार्यवाईयां कर रहे हैं। यह भी देखा गया है कि ये लोग पर्चे भी बांटते हैं, जिनसे जनता को आतंकवादी मार्गों का अवलंबन करने, बंदूकें एकत्र करने तथा सरकार के बारे में असंतोष फैलाकर सेना और पुलिस में उपद्रव कराने की प्रेरणा दी जाती है।”

[Cited in Justice on Trial, RSS, Bangalore, 1962, pp. 65-66.]

(2) सरदार पटेल का जवाहरलाल नेहरू के नाम दिनांक फ़रवरी 27, 1948 का पत्र

गाँधी जी की हत्या के 28 दिन बाद लिखे गए इस पत्र जब की हिन्दुत्ववादी हत्यारों के सांगठनिक और वैचारिक रिश्तों के बारे में अभी पूरी जानकारियां नहीं मिली थीं, सरदार ने प्रधान-मंत्री नेहरू को जाँच की प्रगति से अवगत करते हुए लिखा :

“तमाम अभियुक्तों ने अपनी हरकतों के लम्बे और विस्तृत ब्यान दिए हैं…इन से पता लगता है कि साज़िश डिल में नहीं रची गयी। यह भी साफ़ ज़ाहिर होता है की आरएसएस इस में क़तई शामिल नहीं था। इस षड्यंत्र के रचेता और तामील करने वाला हिन्दू महासभा का एक कट्टरवादी गुट था जिस की रहनुमाई सीधे सावरकर ने की थी।”  

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आरएसएस और उस के पिछलग्गू सरदार के इस पत्र को एक सर्टिफ़िकेट के तौर पर यह साबित करने के लिए इस्तेमाल करते हैं कि आरएसएस इस हत्या में शामिल नहीं था। लेकिन वे सरदार पत्र के बाद वाले हिस्से को पी जाते हैं जिस में सरदार ने साफ़ लिखा की,

“आरएसएस जैसे ख़ुफ़िया संगठन, जिन के कोई रिकॉर्ड, पंजिकाएँ इत्यादि नहीं होते हैं, के बारे में पुख्ता तौर पर यह पता करना कि कोई व्यक्ति विशेष इस का सक्रिए सदस्य है या नहीं एक बहुत मुश्किल काम होता है।”

[Shankar, V., Sardar Patel: Select Correspondence 1945-50, Navjivan Publishing House, Ahmedabad, 1977, p. 283-85.]

(3) सरदार पटेल ने हिन्दुत्ववादी खेमे के एक बड़े नेता, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, जो उस समय हिन्दू महासभा के अधियक्ष भी थे को साफ़ लिखा कि आरएसएस और हिन्दू महासभा दोनों इस जघन्य अपराध के लिए ज़िम्मेदार थे, उन्हों ने आरएसएस को नंबर एक का ज़िम्मेदार ठहराया। सरदार पटेल ने 18 जुलाई सन् 1948 को एक लिखा – 
"जहां तक आरएसएस और हिंदू महासभा की बात है, गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है और मुझे इसमें इन दोनों संगठनों की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए। लेकिन हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं का, ख़ासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर काण्ड संभव हो सका। मेरे दिमाग़ में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का अतिवादी भाग षणयंत्र में शामिल था। आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य-व्यवस्था के अस्तित्व के लिए ख़तरा थीं। हमें मिली रिपोर्टें बताती हैं कि प्रतिबंध के बावजूद वे गतिविधियां समाप्त नहीं हुई हैं। दरअसल, समय बीतने के साथ आरएसएस की टोली अधिक उग्र हो रही है और विनाशकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है।" 

[Letter 64 in Sardar Patel: Select Correspondence1945-1950, volume 2, Navjivan Publishing House, Ahmedabad, 1977, pp. 276-77.]

(4) गांधीजी की हत्या के 214 दिन बाद जब सरदार के सामने हिन्दुत्ववादी हत्यारों के बारे में तस्वीर बहुत साफ़ हो चुकी थी, तो उन्हों ने आरएसएस के उस समय के आक़ा, गोलवलकर को उनके हिन्दुत्ववादी संगठन की गांधीजी के हत्या में हिस्सेदारी पर बिना किसी संकोच के दिनांक सितंबर 19, 1948 के पत्र में लिखा:

“हिन्दुओं का संगठन करना, उनकी सहायता करना एक प्रश्न है पर उनकी मुसीबतों का बदला, निहत्थे व लाचार औरतों, बच्चों व आदमियों से लेना दूसरा प्रश्न है।

“उनके अतिरिक्त यह भी था कि उन्होंने कांग्रेस का विरोध करके और इस कठोरता से कि न व्यक्तित्व का ख़याल, न सभ्यता व विशिष्टता का ध्यान रखा, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी थी, इनकी सारी तक़रीरें सांप्रदायिक विष से भरी थीं। हिन्दुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबन्ध करने के लिए यह आवश्यक न था कि वह ज़हर फैले। उस ज़हर का फल अन्त में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कु़र्बानी देश को सहनी पड़ी और सरकार व जनता की सहानुभूति ज़रा भी आरएसएस के साथ न रही, बल्कि उनके खि़लाफ़ हो गयी। उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया था और मिठाई बांटी उस से यह विरोध और भी बढ़ गया और सरकार को इस हालत में आरएसएस के ख़िलाफ़ कार्यवाही करना ज़रूरी ही था।

“तब से अब 6 महीने से ज़्यादा हो गए। हम लोगों को आशा थी कि इतने वक़्त के बाद सोच विचार कर के आरएसएस वाले सीधे रास्ते पर आ जाएंगे। परन्तु मेरे पास जो रिपोर्ट आती हैं उनसे यही विदित होता है कि पुरानी कार्यवाहियों को नई जान देने का प्रयत्न किया जा रहा है।”

[Cited in Justice on Trial, RSS, Bangalore, 1962, pp. 26-28.]

यह सच है कि गाँधी की हत्या के प्रमुख साज़िशकर्ता सावरकर बरी कर दिए गए। हालांकि यह बात आज तक समझ से बाहर है कि निचली अदालत जिस ने सावरकर को दोषमुक्त किया था, उसके फ़ैसले के खिलाफ सरकार ने हाई कोर्ट में अपील क्यों नहीं की।

सावरकर के गाँधी हत्या में शामिल होने के बारे में न्यायधीश कपूर आयोग ने1969 रिपोर्ट में साफ़ लिखा कि वे इस में शामिल थे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सावरकर का फ़रवरी 26,1966 को देहांत हो चुका था।

यह अलग बात है कि इस सब के बावजूद सावरकर की तस्वीरें महाराष्ट्र विधान सभा और भारतीय संसद की दीवारों पर सजाई गयीं और देश के हुक्मरान पंक्तिबद्ध हो कर इन तस्वीरों पर पुष्पांजलि करते हैं। इन्हीं गलियारों में सावरकर के चित्रों के साथ लटकी शहीद गाँधी की तस्वीरों पर क्या गुज़रती होगी, यह किसी ने जानने की कोशिश नहीं की है।

इस ख़ौफ़नाक यथार्थ को झुठलाना मुश्किल है कि देश में हिंदुत्व राजनीति के उभार के साथ गांधीजी की हत्या पर ख़ुशी मनाना और हत्यारों का महामंडन, उन्हें भगवान का दर्जा देने का भी एक संयोजित अभियान चलाया जा रहा है।

गांधीजी की शहादत दिवस (जनवरी 30) पर गोडसे की याद में सभाएं की जाती हैं, उसके मंदिर जहाँ उसकी मूर्तियां स्थापित हैं में पूजा की जाती है। गांधीजी की हत्या को ‘वध’ (जिसका मतलब राक्षसों की हत्या है) बताया जाता है।

यह सब कुछ लम्पट हिन्दुत्ववादी संगठनों या लोगों द्वारा ही नहीं किया जा रहा है। मोदी के प्रधान मंत्री बनने के कुछ ही महीनों में रएसएस/भाजपा के एक वरिष्ठ विचारक, साक्षी जो संसद सदस्य भी हैं ने गोडसे को ‘देश-भक्त’ घोषित करने की मांग की। हालांकि उनको यह मांग विश्वव्यापी भर्त्सना के बाद वापिस लेनी पड़ी लेकिन इस तरह का वीभत्स प्रस्ताव हिन्दुत्ववादी शासकों की गोडसे के प्रति प्यार को ही दर्शाती है।

इस सिलसिले में गांधीजी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के महामण्डन की सब से शर्मनाक घटना जून 2013 में गोवा में घाटी। यहाँ पर भाजपा कार्यकारिणी की बैठक थी जिस में गुजरात के मुखयमंत्री मोदी को 2014 के संसदीय चनाव के लिए प्रधान मंत्री पद का प्रत्याशी चुना गया। इसी दौरान वहां  हिन्दुत्ववादी संगठन ‘हिन्दू जनजागृति समिति’ जिस पर आतंकवादी कामों में लिप्त होने के गंभीर आरोप हैं, का देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए अखिल भारत सम्मलेन भी हो रहा था। इस सम्मलेन का श्रीगणेश मोदी के शुभकामना सन्देश से जून 7, 2013 अपने सन्देश में इस संगठन को “हिन्दू धर्म के ध्वज, राष्ट्रीयता, देशभक्ति एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण” के लिए बधाई दी।

इसी मंच से जून 10 को हिंदुत्व संगठनों, विशेषकर आरएसएस के क़रीबी लेखक के. वी. सीतारमैया का भाषण हुआ। उन्हों ने आरम्भ में ही घोषणा की कि “गाँधी भयानक दुष्कर्मी और सर्वाधिक पापी था”। उन्हों ने अपने भाषण का अंत इन शर्मनाक शब्दों से किया: “जैसा कि भगवन श्री कृष्ण ने कहा है- ‘दुष्टों के विनाश के लिए, अच्छों की रक्षा के लिए और धर्म की स्थापना के लिए, में हर युग में पैदा होता हूँ’ 30 जनवरी की शाम, श्री राम, नाथूराम गोडसेके रूप में आए और गाँधी का जीवन समाप्त कर दिया”।

याद रहे आरएसएस की विचारधारा का वाहक यह वही व्यक्ति है जिस ने अंग्रेजी में Gandhi was Dharma Drohi & Desa Drohi(गाँधी धर्मद्रोही और देशद्रोही था) शीर्षक से पुस्तक भी लिखी है जो गोडसे को भेंट की गयी है।

गांधीजी जिन्हों ने एक आज़ाद प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष देश की कल्पना की थी और उस प्रतिबद्धता के लिए उन्हें जान भी गंवानी पड़ी थी, हिन्दुत्ववादी संगठनों के राजनीतिक उभार के साथ एक राक्षसी चरित्र के तौर पर पेश किए जा रहे हैं। नाथूराम गोडसे और उसके साथी अन्य मुजरिमों ने गांधीजी की हत्या जनवरी 30, 2018 को की थी लेकिन 73 साल के बाद भी उनके ‘वध’ का जश्न जरी है।

जिन लोगों ने गांधीजी की हत्या की थी उनकी वैचारिक संतानें आज देश पर राज कर रहे हैं, इस से बड़ी देश के लिए क्या त्रासदी हो सकती है!

शम्सुल इस्लाम

जनवरी 30, 2021

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

भारतीय किसानों के महान संघर्ष के ख़िलाफ़ हिन्दुत्ववादी साज़िश विफल! डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1948 में ही पहचान लिया था संघियों का षड़यंत्रकारी चरित्र

Dep Siddhu

Hindutva conspiracy against the great struggle of Indian farmers failed!

महान किसान आंदोलन (Peasant movement) को नुक़सान पहुँचाने वाला हिंदुत्व साज़िश का मुख्य चेहरा, दीप सिद्धू अपने असली आक़ाओं के साथ! यह वही मुजरिम है जिस ने ऐतिहासिक ट्रेक्टर रैली और किसानों के एकता को विफल करने के उद्देश्य से लाल क़िले पर एक धर्म का झंडा टांगा और देश के गृह मंत्री, अमित शाह, जो आरएसएस के एक वरिष्ठ स्वयंसेवक हैं और जिन्हें आरएसएस ‘लोह-पुरुष’ बताती है, के अधीन दिल्ली पुलिस तमाशा देखती रही।  

दीप सिद्धू ने यह करतूत इसलिए की ताकि किसानों की बीच धार्मिक एकता को छिन-भिन्न कर दिया जाए जिस की कोशिश आरएसएस-भाजपा शासक लगातार कर रहे थे। 

आरएसएस के दर्शन और इस की षड्यंत्रकारी कार्यपद्धती के एक शोध-कर्ता के तौर पर इस लेखक को लगा की महान किसान आंदोलन की ट्रक्टर रैली के ख़िलाफ़ भी साज़िश रची जा सकती है। ऐसी सम्भावना के बारे में किसान आंदोलन के नेतृत्व को सचेत करते हुए लेखक ने निम्नलिखित नोट सोशल मीडिया पर 26 तारीख को सुबह लगाया : 

“किसान आंदोलन का देश के 72वें गणतंत्र दिवस पर बेमिसाल ट्रेक्टर रैली द्वारा जश्न ज़िंदाबाद!

आरएसएस और उस के गुर्गों की हर साज़िश को नाकाम करने के लिए 200% सजग रहें!!

आज 26 जनवरी 2021 का दिन केवल हमारे देश का 72वां गणतंत्र दिवस ही नहीं है बल्कि एक ऐसा दिन भी है जो हमारी प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष वव्यवस्था का भविष्य भी सुनिश्चित करेगा। अगर यह ऐतिहासिक जश्न सफलतापूर्वक होने दिया जाता है तो यह तय हो जायगा कि आरएसएस-भाजपा शासकों का राष्ट्र-समाज विरोधी हिंदुत्व मंसूबा जिस के तहत वे भारत की जनता का पूरी तरह निर्धनीकरण करके अमीरों में से भी अमीर अम्बानी और अडानी जैसे घरानों (मोदी सरकार के हिन्दुत्वादी मंसूबे के सब से बड़े फाइनेंसरों में से दो) को और अमीर बनाना है, पर अंकुश लग सकेगा । 

लेकिन एक बहुत बड़ा और संगीन सवाल यह है कि क्या देश के शासक जो सब ही आरएसएस से जुड़े हैं, इस जश्न को सफल होने देंगे, जबकि इनका पूरा हिंदुत्व मंसूबा ही दाँव पर लगा हो?

यह टोली जिस संगठन से जुड़ी है वह साज़िशें रचने में अव्वल नंबर है, यह अपने स्वयंसेवकों को षड्यंत्र रचने में निपुण बनाती है और उन की रगों में यह परवर्ती दौड़ती रहती है। इन की इन शर्मनाक साज़िशों को हम सब ने गाँधी जी की हत्या 1948, बाबरी मस्जिद के विद्धवंस 1992, गुजरात क़त्ल–ए-आम 2002, दिल्ली हिंसा 2020, (सैंकड़ों मिसालों में से कुछ) में कामयाब होते देखा है।   

आरएसएस से जुड़े लोगों के इस अति-पापी चरित्र की जानकारी किसी और से नहीं बल्कि डा. राजेन्द्र प्रसाद (जो बाद में भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने) के निम्नलिखित पत्र से मिल सकती है, जो उन्होंने देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल को 14 मार्च सन् 1948 को लिखा थाः

“मुझे बताया गया है कि आरएसएस के लोगों ने झगड़ा पैदा करने के लिए मंसूबा बनाया है, उन्होंने बहुत सारे लोगों को मुसलमान पहनावा पहनाकर, मुसलमान जैसा दिखने वालों के रूप में हिन्दुओं पर आक्रमण करेंगे ताकि झगड़ा पैदा हो और हिन्दू भड़क जायं। इसी के साथ इनके साथ कुछ हिन्दू होंगे जो मुसलमानों पर हमला करेंगे ताकि मुसलमान भड़क जाएं। इस सबका परिणाम यह होगा कि हिन्दू-मुसलमान भिडेंगे और एक बड़ा झगड़ा पैदा हो जायेगा।”

इस महान किसान आंदोलन के रहनुमाओं और संघर्ष में जुटे किसानों से यह निवेदन है कि उन्हें गणतंत्र को बचाने के इस जश्न को हिन्दुत्ववादी टोली द्वारा किसी भी तरह की साज़िश जो सरकार और उस के बाहर इस के गुर्गो रच सकते हैं, उस के बारे 200% सजग रहना होगा!”

इस देश के लूट के शिकार आम किसान और उनका नेतृत्व जो दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले हैं, सच-मुच में बधाई के पात्र हैं जिन्होंने हिन्दुत्ववादी शासकों के इस खौफ़नाक हमले का अपनी एकता क़ायम रखते हुए मुँह-तोड़ जवाब दिया और मोदी सरकार के गुर्गों की साज़िश को विफल कर दिखाया।

देश के खेतों और उपज को अम्बानी-अडानी जैसे खरब-पतियों के हवाले करने के ख़िलाफ़ चल रहा महान किसान आंदोलन ज़िंदाबाद!

हिंदुत्व फ़ासीवादी गुर्गों का नाश हो!!

इंक़लाब ज़िंदाबाद!!

शम्सुल इस्लाम

January 27, 2021

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

हिन्दुत्ववादी टोली ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पीठ में छुरा घोंपा था अब उनकी बहादुरी को भुनाने का कुटिल प्रयास कर रही है!

Subhas Chandra Bose

हिन्दुत्ववादी टोली जिस ने नेताजी की पीठ में छुरा घोंपा था अब उनकी बहादुरी को भुनाने का कुटिल प्रयास कर रही है!

23 जनवरी, 2021 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं वर्षगांठ (125th Anniversary of Netaji Subhash Chandra Bose on 23 January 2021) है। देश के प्रधान मंत्री मोदी जो आरएसएस के एक वरिष्ठ सदस्य हैं, खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी बताते हैं और सावरकर को पूजनीय हस्ती मानते हैं, इस दिन कोलकाता में नेताजी के शौर्य का गुणगान करने के लिए आयोजित किए जा रहे ‘पराक्रम दिवस’ के कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे।

मोदी सरकार की एक विज्ञप्ति के अनुसार भविष्य में इस दिन को ‘पराक्रम दिवस’ के तौर पर देश भर में मनाया जाएगा।

इस विज्ञप्ति के अनुसार यह फैसला इस लिए लिया गया है ताकि “नेताजी की देश की आज़ादी के लिए की गयी अदम्य और नि:स्वार्थ योगदान को सम्मानित किया जा सके और देश के लोग, विशेषकर, नौजवान उनकी ख़राब से ख़राब हालात में भी लड़ने के जज़्बे की विरासत को आत्मसात कर लें। इस तरह देश के नौजवान देशभक्ति की भावना से सराबोर हो सकेंगे।”

मोदी और उनकी सरकार का नेताजी के बारे में इस प्यार का बखान और और उनकी महान क़ुर्बानी की विरासत को आगे बढ़ाने का यह आह्वान कितना फ़र्ज़ी है इस सच्चाई का अंदाज़ा सावरकर के नेतृत्व वाली हिन्दू महासभा और आरएसएस के समकालीन दस्तावेज़ों को पढ़ कर लगाया जा सकता है।

आईए हम हिंदुत्व टोली के शर्मनाक अपराधों के बारे में जानने के लिए स्वयं आज़ादी से पहले के हिन्दू महासभा और आरएसएस के दस्तावेज़ों में झांकें।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब नेताजी देश की आज़ादी के लिए विदेशी समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे थे और अपनी आज़ाद हिंद फ़ौज़ को पूर्वोत्तर भारत में सैनिक अभियान के लिए लामबंद कर रहे थे, तभी सावरकर अंग्रेजों को पूर्ण- सैनिक सहयोग की पेशकश कर रहे थे।

1941 में भागलपुर में हिंदू महासभा के 23वें अधिवेशन को संबोधित करते हुए सावरकर ने अंग्रेज शासकों के साथ सहयोग करने की अपनी नीति का इन शब्दों में ख़ुलासा किया – 

“देश भर के हिंदू संगठनवादियों (अर्थात हिंदू महासभाइयों) को दूसरा सबसे महत्वपूर्ण और अति आवश्यक काम यह करना है कि हिंदुओं को हथियार बंद करने की योजना में अपनी पूरी ऊर्जा और कार्रवाइयों को लगा देना है। जो लड़ाई हमारी देश की सीमाओं तक आ पहुँची है वह एक ख़तरा भी है और एक मौक़ा भी।” 

सावरकर का अंग्रेजों की मदद का आह्वान

सावरकर ने आगे कहा, इन दोनों का तकाजा है कि सैन्यीकरण आंदोलन को तेज़ किया जाए और हर गाँव-शहर में हिंदू महासभा की शाखाएँ हिंदुओं को थल सेना, वायु सेना और नौ सेना में और सैन्य सामान बनाने वाली फ़ैक्ट्रियों में भर्ती होने की प्रेरणा के काम में सक्रियता से जुड़ें।

सावरकर ने अपने इस भाषण में किस शर्मनाक हद तक सुभाष चंद्र बोस के ख़िलाफ़ अंग्रेजों की मदद करने का आह्वान किया वह आगे लिखे इन शब्दों से बखू़बी स्पष्ट हो जाएगा। सावरकर ने कहा,

“जहाँ तक भारत की सुरक्षा का सवाल है, हिंदू समाज को भारत सरकार के युद्ध संबंधी प्रयासों में सहानुभूति पूर्ण सहयोग की भावना से बेहिचक जुड़ जाना चाहिए जब तक यह हिंदू हितों के फायदे में हो। हिंदुओं को बड़ी संख्या में थल सेना, नौसेना और वायुसेना में शामिल होना चाहिए और सभी आयुध, गोला-बारूद, और जंग का सामान बनाने वाले कारखानों वग़ैरह में प्रवेश करना चाहिए।”

सावरकर ने कहा,

“ग़ौरतलब है कि युद्ध में जापान के कूदने के कारण हम ब्रिटेन के शत्रुओं के हमलों के सीधे निशाने पर आ गए हैं। इसलिए हम चाहें या न चाहें, हमें युद्ध के कहर से अपने परिवार और घर को बचाना है और यह भारत की सुरक्षा के सरकारी युद्ध प्रयासों को ताकत पहुँचा कर ही किया जा सकता है। इसलिए हिंदू महासभाइयों को खासकर बंगाल और असम के प्रांतों में, जितना असरदार तरीके से संभव हो, हिंदुओं को अविलंब सेनाओं में भर्ती होने के लिए प्रेरित करना चाहिए।”

सावरकर ने हिंदुओं का आह्वान किया कि हिंदू सैनिक हिंदू संगठनवाद की भावना से लाखों की संख्या में ब्रिटिश थल सेना, नौ सेना और हवाई सेना में भर जाएँ।

सावरकर ने हिंदुओं को बताया कि वे इस फौरी कार्यक्रम पर चलें और हिंदू संगठनवादी आदर्श का पूरा ध्यान रखते हुए युद्ध की परिस्थिति का पूरा लाभ उठाएँ। सावरकर ने कहा,

“अगर हमने हिंदू नस्ल के सैन्यीकरण पर पूरा जोर दिया, तो हमारा हिंदू राष्ट्र निश्चित तौर पर ज़्यादा ताक़तवर, एकजुट और युद्ध के बाद उभरने वाले मुद्दों, चाहे वह हिंदू विरोधी गृहयुद्ध हो या संवैधानिक संकट या सशस्त्र क्रांति का सामना करना, फायदे वाली स्थिति में होगा।”

जब सुभाष चंद्र बोस सैन्य संघर्ष के जरिए अंग्रेज़ी राज को उखाड़ फेंकने की रणनीति बना रहे थे तब ब्रिटिश युद्ध प्रयासों को सावरकर का पूर्ण समर्थन एक अच्छी तरह सोची-समझी हिंदुत्ववादी रणनीति का परिणाम था।

सावरकर का पुख़्ता विश्वास था कि ब्रिटिश साम्राज्य कभी नहीं हारेगा और सत्ता एवं शक्ति के पुजारी के रूप में सावरकर का साफ़ मत था कि अंग्रेज़ शासकों के साथ दोस्ती करने में ही उनकी हिंदुत्ववादी राजनीति का भविष्य निहित है। 

मदुरा में उनका अध्यक्षीय भाषण ब्रिटिश साम्राज्यवादी चालों के प्रति पूर्ण समर्थन का ही जीवंत प्रमाण था। उन्होंने भारत को आज़ाद कराने के नेताजी के प्रयासों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने घोषणा की कि व्यावहारिक राजनीति के आधार पर हम हिंदू महासभा संगठन की ओर से मजबूर हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी सशस्त्र प्रतिरोध में ख़ुद को शरीक न करें। 

द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण जब ब्रिटिश सरकार ने सेना की नई टुकड़ियाँ भर्ती करने का निर्णय लिया तो सावरकर के प्रत्यक्ष नेतृत्व में हिंदू महासभा ने हिंदुओं को अंग्रेजों के इस भर्ती अभियान में भारी संख्या में जोड़ने का फ़ैसला लिया। मदुरा में हिंदू महासभा के अधिवेशन में सावरकर ने उपस्थित प्रतिनिधियों को बताया – 

“स्वाभाविक है कि हिंदू महासभा ने व्यावहारिक राजनीति पर पैनी पकड़ होने की वजह से ब्रिटिश सरकार के समस्त युद्ध प्रयासों में इस ख्याल से भाग लेने का निर्णय किया है कि यह भारतीय सुरक्षा और भारत में नई सैनिक ताक़त को बनाने में सीधे तौर पर सहायक होंगे।”

ऐसा नहीं है कि सावरकर को इस बात की जानकारी नहीं थी कि अंग्रेजों के प्रति इस प्रकार के दोस्ताना रवैये के विरोध में आम भारतीयों में तेज़ आक्रोश भड़क रहा था। युद्ध प्रयासों में अंग्रेज़ों को सहयोग देने के हिंदू महासभा के फ़ैसले की आलोचनाओं को उन्होंने यह कहकर खारिज कर दिया कि इस मामले में अंग्रेजों का विरोध करना एक ऐसी राजनैतिक गलती है जो भारतीय लोग अकसर करते हैं। 

एक ओर सुभाष चन्द्र बोस देश को आज़ाद कराने के लिए जर्मन व जापानी फ़ौज़ों की सहायता लेने की रणनीति पर काम कर रहे थे तो दूसरी ओर सावरकर अंग्रेज़ शासकों को उनके ख़िलाफ़ प्रत्यक्ष सैनिक समर्थन देने में व्यस्त थे।

ब्रिटिश सरकार को था खुला समर्थन

सावरकर और हिंदू महासभा ब्रिटिश सरकार के समर्थन में खुलकर मैदान में खड़े थे। यह वही सरकार थी जो आज़ाद हिंद फौज के बहादुर सैनिकों को मारने और उनका विनाश करने में जुटी थी। अंग्रेज़ शासकों की भारी प्रशंसा करते हुए सावरकर ने मदुरा में अपने अनुयायियों से कहा कि चूँकि जापान एशिया को यूरोपीय प्रभाव से मुक्त करने के लिए सेना के साथ आगे बढ़ रहा है, ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार को अपनी सेना में बड़ी संख्या में भारतीयों की जरूरत है और हिंदू महासभा को उसकी मदद करनी चाहिए। 

सावरकर ने अंग्रेजों की जमकर प्रशंसा करते हुए कहा कि

“हमेशा की तरह दूरदर्शितापूर्ण ब्रिटिश राजनीति ने पहले हो समझ लिया था कि जब भी जापान के साथ युद्ध छिड़ेगा, भारत ही युद्ध की तैयारियों का केंद्र बिंदु होगा…। संभावना यह है कि जापानी सेनाएँ जितनी तेज़ी से हमारी सीमाओं की ओर बढ़ेंगी, उतनी ही तेज़ी से (अंग्रेज़ों को) 20 लाख की सेना भारतीयों को ले कर, भारतीयों अधिकारियों के नेतृत्व में खड़ी करनी होगी।” 

सावरकर ने लाखों हिंदुओं को ब्रिटिश सेना में कराया भर्ती

अगले कुछ वर्षों तक सावरकर ब्रिटिश सेनाओं के लिए भर्ती अभियान चलाने, शिविर लगाने में जुटे रहे, जो बाद में उत्तर-पूर्व में आज़ाद हिंद फ़ौज़ के बहादुर सिपाहियों को मौत की नींद सुलाने और क़ैद करने वाली थी। हिंदू महासभा के मदुरा अधिवेशन में सावरकर ने प्रतिनिधियों को बताया कि पिछले एक साल में हिंदू महासभा की कोशिशों से लगभग एक लाख हिंदुओं को अंग्रेजों की सशस्त्र सेनाओं में भर्ती कराने में वे सफ़ल हुए हैं। इस अधिवेशन का समापन एक ‘फ़ौरी कार्यक्रम’ को अपनाने के प्रस्ताव के साथ हुआ जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि ब्रिटिश “थल सेना, नौ सेना और वायु सेना में ज़्यादा से ज़्यादा हिंदू सैनिकों की भर्ती सुनिश्चित की जाए। 

सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के युद्ध प्रयासों में शरीक होने पर जोर देते हुए अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि

“आज की हमारी स्थितियों में जितना संभव हो अंग्रेजों के साथ इस अपरिहार्य सहयोग को अपने देश के हित में लाभ उठाने की कोशिश में बदलें। इसको कभी नहीं भूला जाना चाहिए कि जो लोग सशस्त्र हमले के बावजूद पाखंडी और दिखावटी पूर्ण अहिंसा और असहयोग के लिए अपनी कायरतापूर्ण सनक या केवल नीतिगत कारणों से सरकार से सहयोग न करने और उसके युद्ध प्रयासों में सहायता न करने के दावे करते हैं वे सिर्फ़ अपने आपको धोखा दे रहे हैं और आत्म-तुष्टि से ग्रस्त हैं”। 

ब्रिटिश सशस्त्र सेनाओं में भर्ती होने वाले हिंदुओं को सावरकर ने जो निम्नलिखित निर्देश दिया, उसे पढ़कर उन लोगों को निश्चित ही शर्म से सिर झुका लेना चाहिए जो सावरकर को महान देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी बताते हैं। सावरकर ने कहा,

“इस सिलसिले में अपने हित में एक बिंदु जितनी गहराई से संभव हो समझ लेना चाहिए कि जो हिंदू भारतीय (ब्रिटिश) सेनाओं में शामिल हैं, उन्हें पूर्ण रूप से आज्ञाकारी होना चाहिए और वहाँ के सैनिक अनुशासन और व्यवस्था का पालन करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए बशर्ते वह हिंदू अस्मिता को जान-बूझ कर चोट न पहुँचाती हों।” 

आश्चर्य की बात यह है कि सावरकर को कभी यह महसूस नहीं हुआ कि ब्रिटिश सेना में भर्ती होना ही अपने आप में स्वाभिमानी और देशभक्त हिंदू ही नहीं किसी के लिए भी घोर शर्म की बात थी।
‘महासभा और महान युद्ध’ का प्रस्ताव 

दमनकारी अंग्रेज़ सरकार के साथ हिंदू महासभा द्वारा सैनिक सहयोग की खुलेआम वकालत करने वाला एक ‘महासभा और महान युद्ध’ नामक प्रस्ताव सावरकर ने स्वयं तैयार किया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि चूँकि

“भारत को सैनिक हमले से बचाना ब्रिटिश सरकार और हमारी साझा चिंता है और चूँकि दुर्भाग्य से हम इस स्थिति में नहीं हैं कि यह काम बिना सहायता के कर सकें, इसलिए भारत और इंग्लैंड के बीच खुले दिल से सहयोग की बहुत ज़्यादा गुंजाइश है।” 

सावरकर ने अपने 59वें जन्मदिन के आयोजनों को हिंदू महासभा के इस आह्वान को प्रचारित करने का माध्यम बनाया कि हिंदू बड़ी संख्या में ब्रिटिश सेनाओं में भर्ती हों।

युद्ध के संचालन के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय युद्ध समितियों की बात करें तो यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं थी कि वे सब सावरकर के संपर्क में थीं। इन समितियों में सावरकर द्वारा प्रस्तावित लोगों को भी शामिल किया गया था। यह ब्रिटिश सरकार के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के लिए सावरकर द्वारा भेजे गए एक तार (टेलीग्राम) से भी स्पष्ट है।

भिडे [सावरकर के सचिव] की पुस्तक के अनुसार,

“बैरिस्टर वी. डी. सावरकर, अध्यक्ष हिंदू महासभा ने (1) कमांडर इन चीफ़ जनरल बावेल (2) भारत के वायसराय को, 18 जुलाई 1941 को यह तार भेजा: महामहिम द्वारा अपने कारिंदों की सदस्यता वाली रक्षा समिति की घोषणा का स्वागत है। इसमें सर्वश्री कालिकर और जमनादास मेहता की नियुक्ति पर हिंदू महासभा विशेष प्रसन्नता व्यक्त करती है।” 

दिलचस्प बात यह है कि इस राष्ट्रीय स्तर की रक्षा समिति में मुसलिम लीग द्वारा स्वीकृत नाम भी शामिल थे। यहाँ इस सच्चाई को भी जानना ज़रूरी है कि जब हिंदू महासभा और मुसलिम लीग मिलकर अंग्रेजों को युद्ध में विजयी बनाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे, उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन का नारा था कि साम्राज्यवादी युद्ध के लिए न एक भाई, न एक पाई (नॉट ए मैन, नॉट ए पाई फ़ॉर दि वॉर)। और इस नारे को बुलंद करते हुए हजारों हिंदुस्तानियों ने ब्रिटिश सरकार का भयंकर उत्पीड़न सहा था।

अँगरेज़ सेना में भर्ती कराने के लिए आरएसएस ने सावरकर की मदद ली

नेताजी के साथ ग़द्दारी और अंग्रेज़ों की दलाली की योजना में केवल सावरकर और उनके नेतृत्व वाली हिन्दू महासभा ही नहीं थी। भिड़े के अनुसार आरएसएस ने 40 से ज़्यादा अपने महत्तपूर्ण आयोजनों में सावरकर को आमंत्रित किया ताकि वे उस से जुड़े नौजवानों को अपने भाषन द्वारा अंग्रेज़ी सेना में भर्ती के लिए प्रेरित कर सकें।    

आरएसएस या इसके वरिष्ठ स्वयंसेवक, प्रधान मंत्री मोदी को कोई अधिकार नहीं है कि वे नेताजी और आज़ाद हिन्द फ़ौज के महान आज़ादी के लड़ाकुओं पर कोई बात करें।  उनको तो कोलकाता पहुंच कर सिर्फ एक काम करना चाहिए और वह यह है कि हिन्दुत्ववादी टोली ने नेताजी और आज़ाद हिन्द फ़ौज के खिलाफ जो अपराध किये थे उनके बारे में पूरे देश से माफ़ी मांगें।

शम्सुल इस्लाम

January 23, 2021.

REVISITING THE BACK-STABBING OF NETAJI Subhas Chandra Bose BY HINDUTVA GANG ON HIS 125TH BIRTH ANNIVERSARY

शादी की संस्था औरतों और मर्दों दोनों के ख़िलाफ़ है, लेकिन औरत को ज्यादा भुगतना पड़ता है, इस घर में तो कुत्ता भी मर्द है : किश्वर नाहीद

Shamsul Islam's conversation with Kishwar Naheed in Hindi.

भारतीय उपमहाद्वीप का प्रगतिशील बुद्धिजीवी बहुत बेईमान है

किश्वर नाहीद से शम्सुल इस्लाम की बात-चीत

Shamsul Islam‘s conversation with Kishwar Naheed in Hindi.

[किश्वर नाहीद पाकिस्तान ही नहीं, भारतीय उपमहाद्वीप की एक प्रसिद्ध एक्टिविस्ट लेखक, कवि, नाटककार, आलोचक हैं। किश्वर नाहीद का परिवार मूल रूप से बुलंदशहर (दिल्ली से लगभग 100 किलोमीटर) का रहने वाला था और 1949 में पाकिस्तान जाने का फैसला किया था। किश्वर नाहीद का साक्षात्कार, जो यहाँ पेश है, वह उन से मई 4, 1995 के दिन नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में लिया गया था जिस की ज़बान उर्दू थी, जबकि कुछ terms का ज़िक्र अंग्रेज़ी में भी किया गया था । उस समय इस के कुछ अंश हिंदी और अंग्रेज़ी में छपे थे लेकिन सम्पूर्ण साक्षात्कार टेप में सुरक्षित था जिसे अब पाठकों के लिए पेश है। किश्वर नाहीद से यह बात-चीत लगभग 25 साल पुरानी है लेकिन जिन विषयों और सवालों पर चर्चा की गयी है वे आज भी बहुत प्रासंगिक हैं, भारत और पाकिस्तान दोनों जगह। किश्वर नाहीद पाकिस्तान के नेशनल कौंसिल ऑफ़ आर्ट (इस्लामाबाद) की उपाध्यक्ष रही हैं ।]   

सवाल : कुछ ख़ानदान सम्बन्धी तफ़सीलात जानना चाहूँगा।

जवाब : मेरा ख़ानदान बुलंदशहर से पाकिस्तान गया था। मेरी पैदाइश की असली तारीख़ 18 जून, है जबकि दस्तावेज़ों में 3 फ़रवरी दर्ज हो गयी है। मैं सात साल की थी जब पार्टीशन हुआ। हम अप्पर-कोट मुहल्ला क़ानूनगो इलाक़े में रहते थे। और बचपन की धुँधली यादें लिए जब 1984 मैं में आई तो काली नदी पर उतर गई और इस घर और गली तक इन ही धुँधली यादों के तवस्सुत से पहुंच गई। बस ख़राबी यह हो गई कि जब मैंने अपने पुराने घर के दरवाज़े पर दस्तक दी तो उन लोगों ने भी बस इस लिए पहचान लिया कि एक रात पहले मेरा इंटरव्यू टीवी पर आ गया था। मैं बग़ैर शनाख़्त के वहाँ जाना चाहती थी, लेकिन शनाख़्त हो गई तो मज़ा किरकिरा गया। बहरहाल, जैसा दोनों मुल्कों में हाल है कि कुछ भी नहीं तबदील हुआ।

पार्टीशन के बाद 1984 मैं पहली बार हिंदुस्तान आयी थी। पार्टीशन से पहले वालिद साहिब की बसें चलती थीं बुलंदशहर और दिल्ली के दरमियान। हमारी अम्मां ने जो सय्यद ख़ानदान की पहली औरत थीं, जिन्होंने अपनी लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया। हमारे नाना और कोई भी उनसे नहीं मिलता था। 1947 में अब्बा को मुस्लिम लीग का लीडर होने की वजह से जेल में रखा गया। 1949 तक जेल में रहे और जब जेल से बाहर आए तो जाने का फ़ैसला हुआ। यह सब मैंने अपनी सवानिह उमरी [आत्म-कथा] ‘बुरी औरत की कथा’ में लिखा है।

सारी पढ़ाई लाहौर में लड़कियों के कॉलेज, गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में (अर्थ-शस्त्र में एमए) हुई। एमए के दरमियान ही शादी की। उसे ख़ुशी या मजबूरी जो भी कहें, यूसुफ़ कामरान जो मेरे क्लास फ़ेलो थे, शायर थे। मशाइरों में आना जाना था, यह रिवायती (परम्परागत) ख़ानदान को पसंद नहीं था और हमने अपने इन्क़िलाबी अंदाज़ में उन्हें बताया कि जब मास्टर्ज़ कर लेंगे तो शादी करेंगे और मुलाज़मत करेंगे, अपना घर ख़ुद बनाएँगे। दहेज़ नहीं लेंगे। शादी में जो लेकर गई, एक बोरी में इनामात थे जो मुझे मिले थे और दूसरी बोरी में मेरी किताबें थीं।

सवाल : औरत और मर्द के रिश्तों की बुनियाद के बारे में क्या सोचती हैं?

जवाब : मैंने बचपन से देखा अपने पूरे ख़ानदान में और ख़ानदान से भी आगे कि औरत के सामने मर्द अपनी हर कोताही या अपनी ग़लती की पशेमानी दूर करने को किसी ज़ेवर, किसी लत्ते, किसी कपड़े के बहाने माज़रत (माफ़ी मांगना) कर देता था। मैंने भी तय किया कि लत्ता मैं नहीं पहनूँगी, ज़ेवर नहीं पहनूँगी, चूड़ियाँ भी नहीं, गोटे के कपड़े नहीं पहनूँगी। यह उस वक़्त तय किया जब मैं बस 7-8 साल की थी। तब मैंने ज़ाहिर है मार्क्स वग़ैरा को नहीं पढ़ा था। यह सब घर का माहौल देखकर ही नहीं हुआ था, बल्कि पार्टीशन में जिस तरह से औरतों के अग़वा (अपहरण) हुए, उन पर मज़ालिम (अत्याचार) हुए, इस ने मेरे बचपन के ज़ेहन को बहुत मुतास्सिर (प्रभावित) किया। औरतों का बुरी तरह मजरूह (ज़ख़्मी) होना देखा, घर में दो भाइयों के बीच की बहन थी। मार मुझे पड़ती थी, कहा मुझे जाता था भाइयों को नहीं, मसाला पीसने को मुझे कहा जाता था, बर्तन धोने को मुझे कहा जाता था। मैं कहती थी उन इन भाईयों को क्यों नहीं कहती हो जो मेरे साथ के हैं। इस पर मुझे मार पड़ती थी तो यह सारे Retaliations (प्रतिशोध) हुए।

सवाल : लेकिन क्या शादी करके आपको बराबर के हुक़ूक़ मिले?

जवाब : यह अलग कहानी है। आप एक ही क़दम में पूरी सीढ़ी चढ़ लेना चाहते हैं। (हँसती हैं)

सवाल : आपको नहीं लगता कि शादी का Institution (संस्था) औरत के ख़िलाफ़ है?

जवाब : Institution of marriage is against both woman and man (शादी की संस्था औरतों और मर्दों दोनों के ख़िलाफ़ है।). मुसावात (समानता) किसी के लिए नहीं है, लेकिन औरत को ज़्यादा भुगतना पड़ता है। यह सच है कि मुझे 35 बरस नौकरी करते हो गए। गुज़िश्ता (बीते) 30 बरस से High position (उच्च-पदों) पर काम कर रही हूँ और Decision Making सतह (निर्णय लेने वाली जगहों) पर काम कर रही हूँ, लेकिन आज भी मज़ाक़ उड़ाते हुए बात करने वाले मेरे सामने आ जाते हैं। आज भी इस बात का मज़ाक़ उड़ाने वाले लोग होते हैं कि औरत ने क्या काम करना है। हाँ, आपके तो आगे पीछे कोई नहीं है इसलिए आप काम कर लेती हैं।

[क्योंकि मेरे दोनों बेटे बड़े हो गए हैं। एक स्पेन में है और दूसरा अमरीका में है। उन्हें इसलिए वहाँ भेजा गया था क्योंकि मार्शल लॉ के दौरान माओं और वालिदैन (माता-पिता) के फ़ैसलों को बदलवाने के लिए, उनके फ़लसफ़े को बदलवाने के लिए, बच्चों को Torture करेंगे (यातनाएं देंगें), उन को गिरफ़्तार करेंगे।]

सवाल : क्या आपको यह लगता है कि कितने भी बराबरी के दावों के साथ शादी की जाए, कितने भी Idealism (आदर्शवाद) के साथ ब्याह हो, औरत को नंबर दो का ही शख़्स हो कर रहना पड़ता है?

जवाब : यह तो रहना पड़ता है। वह तो इसलिए रहना पड़ता है कि हमारी माओं ने और हम माओं ने बेटों को कम से कम बरेसग़ीर (उपमहाद्वीप ) में यह कह के परवरिश नहीं किया कि तुम इस तरह के मर्द हो जैसी कि औरत है। मैंने तो लिखा भी है कि जब बेटा 8-9 साल का था और मैं बातें करती थी तो वह मेरे रवैये को देखकर कहा करता था कि अम्मां, क्या बात करती हो, इस घर में तो कुत्ता भी मर्द है। यह बातें किसी एक शख़्स के बदलने से नहीं बदला करतीं। एक बात जिसमें मैं यक़ीन रखती हूँ, एक मुकम्मल दीवार में से एक ईंट निकालने की कोशिश करें तो दीवार कमज़ोर हो जाती है और ईंटें निकालना आसान हो जाता है, लेकिन वह जो पहली ईंट निकालना है, वह मुश्किल होता है। जैसे एक बूँद के पीछे बहुत सी बूँदें आ जाती हैं, लेकिन पहली बूँद कहाँ से आती है, यह बहुत अहम है।

सवाल : किया मुस्लमानों के नाम पर हुकूमत मिल जाने पर मुस्लमान औरत को हुक़ूक़ हासिल हुए?

जवाब : औरत को ही किया 85 फ़ीसद मुआशरे [society] को कुछ नहीं मिला। ये वो लोग हैं जिन्हें हम बे-इख़्तियार [अधिकारों से वंचित] लोग कहते हैं। औरत के साथ तो दोहरा अज़ाब है। औरत के ख़िलाफ़ तशद्दुद [हिंसा] सिर्फ़ यह नहीं है कि उसको पीटने और धमकाने की इजाज़त देने वाला लिटरेचर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बिक रहा है, बल्कि जो अदब और Advertisement [विज्ञापन] औरत को कितना ख़ूबसूरत होना चाहिए, यह सब बिक रहा है, दिखाया जा रहा है, वह भी इतना ही ख़तरनाक है। मैंने जब घटिया मज़हबी लिटरेचर के ख़िलाफ़ लिखा जो औरत को मारने की तरफ़दारी करता है, तो लोग मेरे दुश्मन हो गए।

सवाल : क्या यह सच नहीं है कि पाकिस्तान में Fundamentalism [बुनियाद परस्ती] को सभी हुकमरानों ने चाहे, वे मिलिट्री हुक्मराँ रहे हों, दाएं बाज़ू के रहे हों, या भुट्टो साहिब या उनकी बेटी रही हों, बढ़ाया, placate [दिलासा देना] किया?

जवाब : [कुछ सोचते हुए] दुनिया में जहाँ भी Fundamentalism आया, चाहे इस्लाम में, चाहे Judaism में, चाहे हिंदुओं में, वह ख़ुद ही नहीं आया, उसे Promote किया गया। उसे Imperialist [साम्राज्यवादी] ताक़तों ने Promote [प्रोत्साहित] किया।

सवाल : क्या सिर्फ़ Imperialism [साम्राज्यवाद] को ज़िम्मेदार ठहराने से काम चल जाएगा? क़ादियानीयों को ग़ैर-मुस्लिम तो भुट्टो ने क़रार दिया।

जवाब : यह कुछ फ़ोर्सिज़ [ताक़तों], कुछ लोगों को ख़ुश करने के लिए रखा जाता है और वह periphery [परिधि] पर होते हैं, लेकिन इस तरह की मदद से वह centre stage पर आ जाते हैं। यह बताते हुए बड़ा दुख होता है कि हमारे यहाँ एक फ़ौजी आमिर [तानाशाह] था अय्यूब ख़ां, जिसने Family Laws [निजी क़ानून] दिए, जिसने औरत को काफ़ी हुक़ूक़ दिलाए, मौलवियों की मुख़ालफ़त के बावजूद। मुसलमान औरत की मुसावात [समानता] की लड़ाई में इससे बहुत मदद मिली, लेकिन हमारे अपने जो लोग थे (उनका इशारा भुट्टो की तरफ़ है) इन्होंने National assembly [पाकिस्तानी संसद] में औरतों की सीटों का कोई Permanent [स्थायी] इंतिज़ाम न करके एक Ordinance [अध्यादेश] के ज़रिये रखा और जब Ordinance ख़त्म हुआ तो सब ख़त्म हो गया। हमारे बर्रे-सग़ीर [भारतीय उपमहाद्वीप] का प्रोग्रेसिव [प्रगतिशील] दानिश्वर [बुद्धिजीवी] बहुत बेईमान है। हमारे प्रोग्रेसिव मूवमेंट ने किसान की बात की, देहात की बात की, मज़दूर की बात की, उसने जलसों में आने को खद्दर पहना लेकिन ख़ुद इस क्लास में उतरा नहीं। यह सच है और इस में मैं डाक्टर मुबारक अली से इत्तिफ़ाक़ रखती हूँ, कि पाकिस्तान और इस बर्रे-सग़ीर [भारतीय उपमहाद्वीप] के दूसरे मुल्कों के प्रोग्रेसिव लोगों ने अपने अपने मुल्कों में जो भी अवाम के ख़िलाफ़ धाराएँ चलती रहीं, उनका साथ दिया। चाहे वह बाहर कितने भी इन्क़िलाबी बनते हों।

लेकिन हम तारीख़ पर बात न करें, बुत तो टूटा ही करते हैं]

सवाल: मार्क्सइज़्म के मुस्तक़बिल [भविष्य] के बारे में किया सोचती हैं?

जवाब : जो लोग बहुत गुल मचा रहे हैं ख़ुशी से ढोल बजा रहे हैं कि मार्क्सइज़्म ख़त्म हो गया है, वह बेवक़ूफ़ हैं। नज़रिए [विचार/दर्शन] मुल्कों से नहीं जड़े होते हैं। बहुत से मुल्कों में ग़ुर्बत है, जहालत है तो मार्क्सइज़्म रहेगा। ऐसा बेवक़ूफ़ ही कह सकते हैं।

सवाल : पाकिस्तान में उर्दू का मुस्तक़बिल क्या होगा?

जवाब : देखिए, पहली बात तो यह है कि एक वक़्त में यह कोशिश की गई कि हमारे मुल्क में जो इलाक़ाई ज़बानें हैं इनको क़ौमी धारे से निकाल दिया जाए। तो जब भी आप ऐसी कोशिश करोगे तो रद्दे-अमल [प्रतिक्रिया] का शिकार होगे ही। इसलिए जब इस कोशिश के जवाब में जो रद्दे-अमल हुआ वह बहुत ख़राब था। हमें यह समझना चाहिए कि उर्दू एक राबते [संपर्क] की ज़बान है और बाक़ी सारी इलाक़ाई ज़बानों की बराबर एहमीयत है। हमें यह नहीं फ़रामोश करना चाहिए कि वो कौमें जो अपने बच्चों को अपनी मादरी ज़बान [मातृभाषा] में तालीम नहीं देतीं, वो बहुत ख़तरनाक खेल खेल रही होती हैं। अंग्रेज़ों ने भी अपने बच्चों को उर्दू हिन्दी या फ़्रांसीसी में तालीम नहीं दी। अमरीकीयों ने मैक्सीकन में तालीम नहीं दी, फ़्रांसीसियों ने फ़ारसी में अपने बच्चों को तालीम नहीं दी। यह सारी दुनिया में सिर्फ़ हमारे बर्रे-सग़ीर [भारतीय उपमहाद्वीप] में है कि अपनी मादरी ज़बान की जगह दूसरी ज़बान में तालीम देकर बड़े मुतमइन रहते हैं और बड़े मग़रूर भी रहते हैं। उर्दू पाकिस्तान में 12 करोड़ में से 3-4 करोड़ की मादरी ज़बान है। ज़बानें दरबार में पैदा नहीं होतीं, उनका रिश्ता ज़मीन से होता है। उनको कोई ख़त्म नहीं कर सकता।

सवाल : आपने पहला शेअर कब कहा होगा?

जवाब : मैंने 15 साल की उम्र में पहला शेअर [नज़्म की की 2 पंक्तियाँ] कहा था। एक तरही [कविता लिखने का एक नमूना] मुशायरा था, जिसके लिए मैंने ग़ज़ल कही थी और वह शायद मजाज़ [उर्दू के प्रसिद्द क्रांतिकारी कवि असरारुल हक़ मजाज़ लखनवी 1911-1955 ] का मशहूर मिसरा [पंक्ति] था “सब के तो गरीबां सी डाले अपना ही गरीबां भूल गए”। इस दौर में आप शायरी करने के लिए क्लासिकी शायरी से रूशनास [परिचित] हुए बग़ैर कुछ नहीं कर सकते थे।

सवाल : आपके उस्ताद कौन थे?

जवाब : मैंने किसी उस्ताद से शागिर्दी का राबता [सम्बन्ध] नहीं रखा। इस ज़माने में यह हो ही नहीं सकता था । हम तो औरत थे और औरत यह कैसे करती, अलबत्ता कॉलेज के ज़माने में जब मैंने शायरी शुरू की तो तमाम बड़े असातिज़ा [उस्ताद] शायर थे। जैसे आबिद अली ‘आबिद’, फ़ैज़ साहब, सूफ़ी साहब, बुख़ारी साहब, एहसान दानिश साहब। इन सबसे मिलने का मौक़ा मिला। इनकी महफ़िलों में जाकर बैठना, इनसे सीखने का मौक़ा मिला।

सवाल : इन महफ़िलों में जाने की इजाज़त थी?

जवाब : नहीं! छुप कर जाती थी, कोई बहाना बनाकर जाती थी।

सवाल : पुरानी पीढ़ी की उर्दू शायरी में आपके सबसे पसंदीदा शायर कौन हैं?

जवाब : इस सवाल का जवाब बड़ा मुश्किल है। पसंदीदा शायर का होना तो मुश्किल होता है, लेकिन अशआर [काव्य] ज़रूर पसंदीदा होते हैं। वैसे ग़ालिब को जब भी पढ़ो तो ग़ालिब नया ही लगता है। अच्छे शेअर की ख़ुसूसियत यह होती है कि अशआर के मआनी की नई सतह हर-रोज़ दरयाफ़्त होती है और उसकी कोई हद नहीं होती, इस दरयाफ़्त की। और इस मुलाक़ात की जैसे आप नए शेर लिखते हो तो इसलिए लिखते हो कि आपको नए ख़यालात से मिलने का शौक़ होता है। इसी तरीक़े से कहीं कहीं ‘ग़ालिब’, ‘मोमिन’ और ‘मसहफ़ी’ है। मुझे लगता है अगर Sensous [भावमय] शायरी देखनी हो तो मसहफ़ी जैसा शायर कोई नहीं है। दरयाफ़त करने के अमल में जब आप ख़ुद को दरयाफ़त करते हैं तो कई मर्तबा पुराने शायरों को भी आप अपने अंदर दरयाफ़्त कर लेते हैं।

सवाल : आप उर्दू शायरी की अज़ीम विरासत में से किस के क़रीब अपने आपको महसूस करती हैं?

जवाब : असल में आज भी अगर मैं ग़ज़ल लिखती हूँ तो तीन चीज़ों पर ग़ौर करती हूँ। मेरी ग़ज़ल क़तई क्लासिकी होती है क़तई। और ऐसी ग़ज़ल कहना मुझे पसंद है।

सवाल : लोग कहते हैं कि आप ग़ज़ल के ख़िलाफ़ कोई तहरीक चलाए हुए हैं?

जवाब : यह बिलकुल ग़लत है। मैं ग़ज़ल के ख़िलाफ़ किसी तहरीक में शामिल नहीं हूँ। यह तो हो भी नहीं सकता। मैं तो आपको ख़ुद बता रही हूँ कि मैं क्लासिकी ग़ज़ल ही लिखती हूँ, लेकिन अंदाज़ मेरा अपना ही होता है। मसलन अगर में यह कहती हूँ कि

   “’बर्फ़ की मानिंद जीना उम्र-भर

   रेत की सूरत मगर तपना बहुत”

   तो मेरा अपना अंदाज़ है या

   “’घर के धंधे निपटते ही नहीं नाहीद

   मैं निकलना भी अगर शाम को घर से चाहूँ”।

   जब मैं आज़ाद नज़्म पर आती हूँ तो इसमें मेरे साथ दो बड़े लोग हैं जो हमेशा मेरी रहनुमाई करते हैं और मेरे क़रीब हैं। मीम सिद्दीक़ी और नून मीम राशिद। दोनों के लिखने का अंदाज़ मुझे पसंद है, बल्कि मेरी पहली किताब ‘बेनाम मुसाफ़त’ जो नज़्मों का मजमूआ है, इसमें आपको बहुत जगह महसूस होगा कि कहाँ से पढ़ी चल रही हूँ। [ग़ज़लों की पहली किताब ‘लबे-गोया’]

इस के बाद जब मैं आती हूँ अपने तीसरे पड़ाव नस्री [गद्य] नज़्म पर तब मुझे यह पता चलता है कि मैं जिस Sensibility [संवेदनशीलता] मैं ज़िंदा हूँ, जिस Sensibility की शायरी पढ़ रही हूँ, जिस Experience [अनुभूति] से मैं गुज़र रही हूँ, उसकी बहुत सी तहें मुझे आज़ाद नज़्म और ग़ज़ल नहीं कहने देतीं।

सवाल : आज़ाद नज़्म को आप तकनीकी तौर पर नस्री नज़्म से कैसे अलग करती हैं?

जवाब : वहाँ वज़न होता है, लेकिन नस्री नज़्म में वज़न नहीं होता।

सवाल : Feminism [नारीवाद] के बहुत से Trends [धाराएं] हैं, दुनिया में भी और पाकिस्तान में भी, आप किस Trend की हमदर्द हैं?

जवाब : कुछ लोग Feminism से मुराद यह लेते हैं कि जो काम मर्द करता रहा है, जो ज़ुल्म मर्द करता रहा है, वह सब औरत करने लगे। कुछ यह समझते हैं कि औरत का जो रिवायती रोल है उसे ख़त्म कर दिया जाए, तो वह Feminism है। कुछ लोग यह समझते हैं कि सारे इक़्तिदार [राज करने] के रिश्ते औरत को मिल जाएं और साइकिल उलट जाए। मैं सिर्फ़ इतना समझती हूँ कि किसी औरत को इज़हारे-राय [अभिव्यक्ति] का हक़ मिले और इज़्ज़त के साथ जीने का वह हक़ मिले जो मुआशरे [समाज] ने तो उसको कभी नहीं दिया। और तीसरी बात यह कि औरत को अपने नाम से जीने की आज़ादी हो। हमारे मुआशरे ने औरत को रिश्तों के हवालों से याद किया है। वह माँ है, बहन है, बेटी है, बीवी है, वह ख़ुद क्या है उसे कभी नहीं कहा गया। उसे बताया ही नहीं गया। पहले नाम लिखे जाते थे ज़ौजा [पत्नी] मुहम्मद हुसैन, वालिदा [माँ] इफ़्तिख़ार ज़ैदी। आज भी वह मिस्टर फ़लाँ-फ़लाँ, श्रीमती फ़लाँ-फ़लाँ, बेगम फ़लाँ-फ़लाँ है। बड़ी शान से कई बार यह कहा जाता है कि औरत तो घर की मालकिन होती है, लेकिन घर पर जो मिल्कियत की तख़्ती लगी रहती है, वह शौहर ही के नाम की होती है। यही मेरा [नारीवाद] है।

सवाल : पाकिस्तान में औरतों के हुक़ूक़ को लेकर जो तहरीकें चल रही हैं, उनका कुछ नतीजा निकला है या कुछ नया करना पड़ेगा?

जवाब : वैसे तो जो तहरीकें चल रही हैं उन्होंने पहली मंज़िल पूरी की है, Consciousness [चेतना] को फैलाने और बढ़ाने में मदद की है, वह थोड़ी बहुत तो आती है, लेकिन कुछ और करना पड़ेगा, क्योंकि अभी तक हमने यह सोचा कि औरतों को उन के हुक़ूक़ के बारे में आगाही दी जाए और यह भूल गए कि जब तक आप मर्द को बाशुऊर [प्रबुद्ध] नहीं करेंगे और उसको यह नहीं समझाएँगे कि यह मानने का हौसला करो कि औरत की भी एक शख़्सियत है। उसको नौकरानी मत मानो कि शादी करके बीवी के रूप में एक नौकरानी ले आए। उस वक़्त तक हालात सुधरेंगे नहीं ।

सवाल : क्या आपको लगता है कि किसी भी धार्मिक राष्ट्र में औरत को उसके हुक़ूक़ मिल सकते हैं? भारत को लोग धार्मिक राष्ट्र बनाना चाह रहे हैं और पाकिस्तान तो है ही।

जवाब : यह Fallacy [भ्रम] है कि जब सर पर पड़ेगी, तब देखेंगे।

सवाल : क्या पाकिस्तान एक Theocratic State [ धर्मशासित राज्य] है?

जवाब : नहीं, पाकिस्तान एक Theocratic State नहीं है। पाकिस्तान एक इस्लामी जम्हूरी [प्रजातांत्रिक] रियासत है।

सवाल : कैसी जम्हूरी रियासत है? दो औरतें मिलकर एक मर्द नौकर के बराबर होती हैं।

जवाब : यह सारे क़वानीन ख़त्म करने की तहरीक जारी है और मुसलसल है। आठवीं तरमीम [8वां संशोधन] ख़त्म होगी तो यह भी हो जाएगा।

सवाल : पाकिस्तानी उर्दू शायरी और हिन्दुस्तानी उर्दू शायरी में कुछ फ़र्क़ है या एक जैसी ही है?

जवाब : काफ़ी फ़र्क़ है। एक तो यह है कि पाकिस्तान में दो Distinct [अलग] ट्रेंड हैं। एक तो यह कि जो Feminism [नारीवाद] है, इसकी वजह से उर्दू शायरी का लहजा, ज़ाविया [कोण] और मंज़रनामा [परिदृश्य] बदला। इससे परुष कवि भी मुतास्सिर [प्रभावित] हुए और महज़ Romantic [रूमानी] शायरी नहीं रही, बल्कि हक़ीक़त पसंदी की तरफ़ आए। और दूसरी चीज़ जिसने मदद की कि शायरी को और बेहतर कर सकें, वह एक तो हमारे ऊपर हब्स [क़ैद] की जो रात 11 बरस जारी रही, मार्शल लॉ की शक्ल में । दूसरे वह तराजुम [अनुवाद] हमारे यहाँ फ़िलस्तीनी, लातीनी, अफ़्रीक़ी, अमरीकी, शायरों के हुए इस से हमारी शायरी में बड़ी ताज़ा हवा के झोंके आए। इस शायरी को सियासी शायरी तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसका ज़िंदगी से गहरा ताल्लुक़ है। दूसरी चीज़ यह है कि हिन्दुस्तान में सिवाए चंद शायरों के उर्दू शायरी के साथ यह हुआ कि रिवायती शायरी या तग़ज़्ज़ुल [ग़ज़ल की विशेषता] को बरक़रार रखा। शायद यहाँ मुशायरे ज़्यादा होते हैं, इसलिए ऐसा हुआ । इस रिवायती अंदाज़ की वजह से नज़्म और ग़ज़ल में वह मुख़्तलिफ़ पैराहन [लिबास] नहीं आए जो पाकिस्तान में आए, जबकि उसके मुक़ाबिल पाकिस्तान में तन्क़ीद [आलोचना] में वो सारे लहजे नहीं आए जो हिन्दुस्तान में आ गए। हिन्दुस्तान में तख़लीक़ी तन्क़ीद [सृजनात्मक आलोचना] जिसको Creative criticism कहते हैं, वह हिन्दुस्तान में बहुत अच्छा हुआ, लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं हुआ।

सवाल : क्या आपका यह कहना है कि पाकिस्तानी उर्दू शायरी ज़िंदगी के ज़्यादा रूबरू खड़ी रही?

जवाब : खड़ी रही, लेकिन इस का बेहतर तजज़िया [विश्लेषण] हिन्दुस्तान में हुआ। यहाँ तक कि हमारी नस्र निगारी [गद्य लेखन] का भी बेहतर तन्क़ीदी जायज़ा [आलोचनात्मक अध्ययन] हिन्दुस्तान ही में लिया गया। हमारे यहाँ जो अफ़साना लिखा गया उसका बेहतर तजज़िया [विश्लेषण] हिन्दुस्तान में हुआ। पाकिस्तान में निसाबी [किताबी] तन्क़ीद होती रही। वो सारे लेक्चरर जो उर्दू से प्रोफ़ेसर हुए थे, निसाबी अंदाज़ में मज़मून लिखते रहे। शायद क़रीब रह कर तजज़िया करना मुश्किल होता हो कि मारने आ जाएगा। दूर रहने से यह डर नहीं होता होगा। ग़ैर-मुल्की तर्जमों ने हमारी इस दौर में मदद की जब हमपर ज़बरदस्त ज़ोर-ज़बरदस्ती की जा रही थी। मुँह पर ताले थे। उन दिनों में हमने इन तर्जमों के ज़रिये से अपना दुख-दर्द बयान करने की कोशिश की। यह तर्जमे मक़बूल हुए और फिर फ़िलस्तीनी, लातीनी, अफ़्रीक़ी शायरी के अंदाज़ और मिज़ाज उर्दू शायरी ने भी इख़्तियार कर लिया और इस रंग में रंग गई और यह पहली बार हुआ। आज़ादी से पहले उर्दू कहानी का अंदाज़-ओ-लहजा तभी बदला था जब तुर्की कहानियों के तर्जमे उर्दू में हुए या Eliot के उर्दू में छपने से उर्दू की आज़ाद नज़्म का लहजा बदला था।

   इस तरह पाकिस्तानी उर्दू शायरी और तन्क़ीद का यह एक Stream   [धारा] है और दूसरा Stream भुट्टो साहब की फांसी के बाद पनपा। उसने बहुत से Symbols [प्रतीकों] को ज़िंदा किया। कर्बला का Symbol सूली, जल्लाद, यज़ीद [कर्बला के जनसंहार को अंजाम देने वाला] उर्दू शायरी में आए, नए मआनी [अर्थ] के साथ। आप अगर पिछले दस साल की फ़राज़, इफ़्तिख़ार आरिफ़ या परवीन शाकिर की शायरी देखें तो यह सब ख़ूब मिलेगा, या फ़ैज़ साहब की शायरी।

अगर शायरी अपनी ज़मीन से नहीं जुड़ी होगी तो इसका कोई असर नहीं होगा। हमारा एक शायर है सलीम शाहिद, उसने एक शेर लिखा “पर जो घर से निकाले तो मैं बाज़ार में था”। हमारे जो छोटे-छोटे घर हैं और इसका जो मंज़र है इससे बेहतर किसी मिसरे में नहीं आ सकता। या फिर “बाहर जो मैं निकलूँ तो बरहना [नंगा] नज़र आऊँ—बैठा हूँ मैं घर में दरो-दीवार पहन कर”। इनसानी ग़ुर्बत का इस से शानदार अंदाज़े-बयाँ क्या हो सकता है? मीर की ग़ज़ल का अंदाज़, यह शायर लाहौर का ठेठ पंजाबी बोली वाला बंदा है। या एक शायर है जिसने कहा “दीवार क्या गिरी मिरे कच्चे मकान की—लोगों ने मेरे सेहन में रस्ते बना लिए”। या फिर जमाल एहसानी ने कहा : “चिराग़ सामने वाले मकान में भी न था”।

कैफ़ी साहब पाकिस्तानी उर्दू शायरी की जो कैफ़ीयत बयान करते हैं वह ठीक नहीं है, क्योंकि उन्होंने पुराने शायरों को पढ़ा है और आज की शायरी से वाक़िफ़ नहीं । उन्हें मौक़ा ही नहीं मिला है। किताबें भी नहीं जातीं । दोनों मुल्कों के हालात ही कुछ ऐसे हैं।

सवाल : आपके यहाँ मुशायरे नहीं होते?

जवाब : होते हैं। मेला मवेशियान [पशु] में होते हैं। वाक़ई मुशायरे हमारे यहाँ मेला मवेशियान का हिस्सा हैं। मवेशियों के मेले बहुत होते हैं और इसके साथ मुशायरे भी बहुत होते हैं। मुशायरे हैं, शायरों की तहज़ीब है, लेकिन जैसे आपके यहाँ मुशायरे होते हैं। आपके यहाँ तो बला के मुशायरे होते हैं, वहाँ तो गाने वाले चलते हैं, शेर नहीं चलता। लेकिन यह भी सच है कि जो ठीक-ठाक मुशायरे होते हैं वह आपके यहाँ से बेहतर होते हैं। आपके यहाँ तो सिर्फ़ गाना चलता है, शायर नहीं चलता। मैंने 10 बरस पहले एक मुशायरा पढ़ा था यहाँ आ के और तब ही से तौबा कर ली थी कि आइन्दा मुशायरा नहीं पढ़ूँगी, क्योंकि अगर मैंने गाना ही सुनना है तो फिर मैं किसी बड़े गाने वाले से सुनूँगी, उनसे क्यों सुनूँगी? वह शायर भी नहीं हैं और फिर भी गा रहे हैं। वह ज़्यादा अच्छा होगा।

सवाल : ऐसा क्यों हो रहा है?

जवाब : जब दस-दस और पच्चास-पच्चास हज़ार लोग मुशायरे में आएँगे तो वो कलाम थोड़ी सुनने आएँगे, वो तो तमाशा देखने आएँगे। उनको शेअर और शायरी से क्या लेना है।

सवाल : पाकिस्तानी शायरों और गुलूकारों [गायकों] की ग़ज़लें जो हिन्दुस्तान में ख़ूब मक़बूल हो रही हैं। इस की वजह?

जवाब : इस का ज़्यादातर क्रेडिट पाकिस्तान के गाने वालों को जाता है। असल बात यह है कि हिन्दुस्तान में बेगम अख़्तर के बाद ग़ज़ल गायकी पर किसी ने Touch [छुआ] नहीं किया, और किसी के पास आई नहीं। मेहदी हसन और ग़ुलाम अली ने इस रिवायत को आगे बढ़ाया। यही वजह है कि हिन्दुस्तान में जो गा रहे हैं इनको ही नक़ल कर रहे हैं। एक बात और है जो आप ने परवरिश नहीं की, हालाँकि अब फिल्मों के ज़रिये आ रही है। आपने हमारे यहाँ की तरह Folk [लोक संगीत] को बढ़ावा नहीं दिया । हमारे यहाँ अगर रेशमा आई तो Folk के ज़रिये आई। हमारे यहाँ अगर आबिदा परवीन आईं तो ओ Folk के ज़रिये आई। अगर हमारे यहाँ अल्लन फ़क़ीर आया तो Folk के ज़रिये आया। अताउल्लाह भी आया तो Folk के ज़रिये आया, जबकि आपके यहाँ Rich folk [समृद्ध लोक संगीत] होने के बावजूद आपने उसे बढ़ावा नहीं दिया। मुझे पता नहीं वुजूह [कारण का बहुवचन] क्या हैं, हमारे Folk ने कई बार बहुत बहादुरी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाई। जब हमारे यहाँ मार्शल लॉ था, उस दौर में जब बहुत सी चीज़ें सेंसर होती थीं, आबिदा परवीन तब सूफ़ियाना कलाम गाती थीं जिसमें मौलवियों के लत्ते [नंगा करना] लिए होते थे, तो उसे कोई ban [पाबंदी] नहीं कर सकता था। यह सब टीवी पर भी आता था। आपके यहाँ इतना बड़ा folk होते हुए भी, इसकी इतनी अज़ीम रिवायत होते हुए भी इसका कुछ इस्तेमाल नहीं हुआ। सिर्फ़ हिन्दी फिल्मों में फ़ुहश [अश्लील] गीत गाने के लिए उस का इस्तेमाल हुआ।

सवाल : फ़ैज़ पंजाबी थे, इक़बाल पंजाबी थे। इन्होंने पंजाबी में शायरी क्यों नहीं की?

जवाब : फ़ैज़ ने तो पंजाबी में भी शायरी की है, लेकिन यह कोई ज़रूरी नहीं होती है। एक बात तो यह थी कि पंजाबी ज़बान लिखने और निसाब [पाठ्यक्रम] में तो ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होती थी और इल्म जिस ज़बान में हासिल हो, उसी में तख़य्युल [कल्पना] की परवाज़ होती है।

सवाल : क्या इस्लामी शायरी भी होती है आपके यहाँ?

जवाब : ऐसी कोई चीज़ नहीं होती है। नअत [पैग़म्बर मोहम्मद की शान में लिखा गया काव्य] तो लिखी जाती है, जैसे भजन लिखा जाता है।

सवाल : हिन्दुस्तान कितनी बार आ चुकी हैं?

जवाब : चार-पाँच बार।

सवाल : और मुशायरों में भी रही हैं?

जवाब : सिर्फ़ एक मर्तबा।

सवाल : भारत के Literary और Cultural [सांस्कृतिक, साहित्यिक] सीन पर आप की राय?

जवाब : जैसा कि मैंने कहा था कि आपके यहाँ उर्दू शायरी ने जो Gain [हासिल] नहीं किया, वह यह है कि भारत के इलाक़ाई अदब जैसे कि कन्नड़ अदब, बंगाली अदब, उड़िया अदब हैं। उर्दू अदब ने गुजराती अदब, पंजाबी अदब से रिश्ता नहीं रखा। यह सब बहुत पावरफ़ुल अदब हैं। उर्दू अदब को इससे अपने आप को मुताल्लिक़ [जोड़ना] करना होगा और मुताल्लिक़ करना चाहिए।

सवाल : क्या इसकी वजह उर्दू में लिखने वालों का Superiority complex [श्रेष्ठता का भाव] है?

जवाब : शायद, या उर्दू वाले पढ़ते ही नहीं हैं इन सब अदब को। वो सोचते हैं कि कहीं इससे उन की Originality [मौलिकता] मजरूह न हो जाए।

सवाल : ग़ैर-मुल्की अदब की भरमार से आप परेशान हैं क्या?

जवाब : मुझे लगता है कि दरवाज़े और खिड़कियाँ खुली रखने से अच्छा ही होता है। कहीं के भी अदब से सीखा जा सकता है। यूरोप से आने वाली चीज़ों से भी कोई हरज नहीं। नेरुडा को को पढ़कर फ़ैज़ साहब ने ‘तेरी समुन्दर आँखें’ लिखा। Originality [मौलिकता] कोई मशीनी चीज़ नहीं है। यह सिफ़र से शुरू नहीं होती है। यह आप दूसरों से सीखते हैं और अपने अंदाज़ में बयान करते हैं।

आपके यहाँ बहुत अच्छी कहानियां लिखी गईं। बहुत अच्छी तन्क़ीद [आलोचना] हुई, अलबत्ता शायरी बहुत अच्छी कम हुई। शायद इस वजह से कि यहाँ से ख़वातीन शाएरात [महिला कवि] नहीं मिलती हैं। पाकिस्तान में ख़वातीन शायर एक से एक हैं। हालाँकि इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। Going through the mill [बहुत मुश्किल हालात से गुज़ारना] हमारे साथ हुआ है। जब आपके पाँव पर दूसरे का पांव पड़ता है तो चीख़ तो निकलती है।

सवाल : उर्दू का मुस्तक़बिल [भविष्य] पाकिस्तान में?

जवाब : किसी भी ज़बान का मुस्तक़बिल तब तक महफ़ूज़ होता है जब तक उसमें अच्छा लिखने वाले मौजूद हों, उसे पढ़ने वाले मौजूद हों, उसके अंदर हालात को बयान करने की सलाहियत हो। जो इलाक़ाई रुजहान चल रहे हैं उनसे उर्दू को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। किसी भी मुल्क में एक से ज़्यादा ज़बानें हों तो एक-दूसरे को क़ुव्वत देती हैं।

सवाल : और कौन सी शायरा हैं पाकिस्तान में?

जवाब : फ़हमीदा रियाज़, इशरत आफ़रीन, परवीन शाकिर और सारा शगुफ़्ता का तो इंतिक़ाल हो गया। नसीर अंजुम भट्टी। नए लिखने वालों में फ़ातिमा हसन हैं, शाहिदा हसन हैं, अज़्रा अब्बास हैं। लिखने वाले तो उस वक़्त तक आते रहेंगे जब तक ज़बान है और मसाइल [समस्या का बहु-वचन] हैं।

सवाल : बर्रे-सग़ीर [भारतीय उपमहाद्वीप] की तक़सीम से उर्दू अदब का नुक़्सान हुआ क्या?

जवाब : कोई नुक़्सान नहीं हुआ, बल्कि फ़ायदा हुआ, वह इस तरह कि जो अदीब सिर्फ़ बुनियादी तौर पर रोमानियात तक महदूद रहते थे, उनके सामने दूसरे मसाइल [समस्या का बहुवचन] आए। दोबारा दोबारा घर बसाने का, आबाद होने का, नई सक़ाफ़त [संस्कृति] से रूशनास [परिचय] होने का, उन contradictions [विरोधाभासों] को resolve [हल] करने का, जिन से कभी वास्ता नहीं पड़ा था, चैलेंज सामने आया। उर्दू अदब और गहराई तक पहुंचा। अगर यह सब न होता तो ‘परमेश्वर सिंह’ कैसे लिखा जाता? ‘गड़रिया’ कैसे लिखा जाता? आपके यहाँ अमृता प्रीतम कैसे बनतीं, वह बनीं इसी लिए। वह वही रूमानी शायरा रहतीं। आपके यहाँ बलवंत सिंह ने जो लिखा, राजिंदर सिंह बेदी ने जो लिखा वह कहाँ से आया। अज़ीम अदब को बनने के लिए जो कसक दरकार होती है, वह उसने पैदा की।

सवाल : उर्दू अदब को मग़रिबी [पश्चिमी] एशिया की शायरी या अदब ने भी मुतास्सिर किया?

जवाब : जी हाँ, फ़िलस्तीनी मुज़ाहमती [प्रतिरोधी] शायरी ने बहुत मुतास्सिर [प्रभावित] किया। बाक़ी दूसरे अरब ममालिक [मुल्कों] से तो अदब हमारे यहाँ पहुंचा ही नहीं।

सवाल : आपका तस्लीमा नसरीन के बारे में क्या ख़याल है?

जवाब : असल में सहाफ़ीयों [पत्रकारों] की एक बहुत बुरी आदत होती है catchy phrasing [लुभावने शब्द] और catchy नामों को उठाकर बहुत बातें करते हैं। किसी ने पढ़ा नहीं उस को। ‘लज्जा’ बहुत कमतर दर्जे का नॉवेल है। She is too young [वह बहुत छोटी है]। उसके बारे में बात करना फ़ुज़ूल है। वह कुछ काम करे तो उसके बारे में बात करें। उसने अभी कोई काबिले-ज़िक्र काम ही नहीं किया। हम लोग किसी को Sensationalism [सनसनीख़ेज़ियत] पर न लिया करें, बल्कि उस की माहियत पर लिया करें। उसने कोई काम किया नहीं है। काम करेगी तो बात करेंगे। उसकी जो चीज़ें छपी हैं वो अभी इस क़ाबिल नहीं हैं कि उनपर बात की जा सके। उसे सियासी तौर पर बड़ा किया गया। अभी उसे एक अदीब के तौर पर बड़ा होने दें।

सवाल : हमारे यहाँ एक बहुत मज़बूत Stream [धारा] है, जिसे हम दलित शायरी कहते हैं। क्या आपके यहाँ भी ऐसा कुछ है?

जवाब : जी हाँ यक़ीनन आपके यहाँ ऐसा है, लेकिन हमारे यहाँ ऐसा कुछ नहीं है, क्यों कि आपके यहाँ Caste System [जातिवाद] है। बहुत ज़ुल्म है और हमारे यहाँ ऐसा नहीं है। वैसे हमारे यहाँ भी ऐसी शायरी है, किताबें छपी हैं। इस तरह की शायरी के तर्जमे रज़िया आबिदी और डाक्टर मुबारक ने मिलकर किए हैं। उसे हम दलित शायरी नहीं कहते हैं, बल्कि उसे Grass-root [ज़मीन से जुडी] शायरी कहते हैं और यह मुसलसल लिखी जा रही है। यह शायरी उन लोगों की है जो बे-इख़्तियार [अधिकारों से वंचित] हैं, जिनकी कोई नहीं सुनता, वो सब मज़लूम हैं। यह मज़लूम शायरी के नाम से भी मारूफ़ है। सिंधी, पंजाबी, पश्तो और बलूची में तो इस तरह की शायरी बहुत ही लिखी जाती है। हमारे यहाँ का नाटक भी इसी तरह का है। बुनियाद-परस्ती के ख़िलाफ़ है। बचपन की शादी के ख़िलाफ़ है, rape [बलात्कार] के ख़िलाफ़ है।

सवाल : पाकिस्तान में उर्दू अदीब [लेखक], पंजाबी, पश्तो, हिन्दी, बलूची अदीबों के साथ मिलकर बैठते हैं?

जवाब : जी हाँ, बग़ैर तंज़ीम [संगठन] के भी ख़ूब interaction [पारस्परिक सम्बन्ध] हैं। कोई तंज़ीम नहीं है। हमारे यहाँ उर्दू की दादागीरी नहीं चलती, बल्कि वो सब में रह लेते हैं। बलूची और पश्तो में ख़वातीन [महिलाऐं] लिखने वाली न होने के बराबर हैं, जबकि बाक़ी सब ज़बानों में ख़ूब हैं और बड़ी Militant [लड़ाका] ख़वातीन अदीब हैं।

सवाल : पाकिस्तान की नुक्कड़ नाटक तहरीक पर जिस तरह NGO’s हावी हो रही हैं, आपकी इस बारे में क्या राय है?

जवाब : नुक्कड़ नाटक की दिक्कत यह है कि हर Adventure [साहसिक कार्य] की एक हद होती है और फिर पेट तो सामने आता ही है। NGO’s से पैसा लेना ख़राब नहीं है, अगर आपका मक़सद ठीक है। हमारा एक है पंजाब लोक रहस जिसके लिए सब मेंबर अपनी कमाई का 15 फ़ीसद देते हैं। वो कोई मदद नहीं लेते, लेकिन इतने बड़े उसूल रखने वाले बच्चों को सलाम ही कर सकती हूँ।

सवाल : आपकी किताबें?

जवाब : 8-9 मजमूए [संकलन] तो शायरी के हैं। 5 मजमूए ख़वातीन पर हैं, उनकी तहरीक पर ‘औरत ख़ाब-ओ-ख़ाक के दरमयान’, ‘औरत ज़बाने-ख़लक़ से ज़बाने-हाल तक’, ‘Woman and reality’, ‘औरत एक नफ़सियात’, ‘औरत दर्द का रिश्ता’, ‘आ जाओ अफ़्रीक़ा’। मैं रज़ाकाराना [स्वैच्छिक] तौर पर औरतों की मदद के लिए एक इदारे में self-employment [खुद-रोज़गार] के लिए काम करती हूँ। उस का नाम है ‘हव्वा असोसिएट’। इसके लिए मैंने किताबें लिखी हैं। शायरी की। 5 किताबें ‘लबे-गोया’, ‘बेनाम मुसाफ़त’, ‘मलामातों के दरमियान’, ‘बे-ख़याल शख़्स से मुक़ाबला’, ‘स्याह शीशे में गुलाबी रंग’।

सवाल : Top [उच्च पद] पर रहते हुए और ईमानदारी से काम करते हुए घुटन नहीं होती?

जवाब : होती है तभी तो शायरी करती हूँ और इसके बाद औरतों के लिए काम करती हूँ, इसलिए घुटन को साफ़ करने के लिए रोज़ झाड़ू साथ रखती हूँ और साफ़ किए जाती हूँ। अपने हिस्से का रास्ता साफ़ कर लेती हूँ। तो जो पीछे आ रहे होते हैं उनको भी कुछ सहूलियात मिल जाती हैं।

सवाल : हिन्दुस्तान में आकर अपनी अदीबी बिरादरी से मुलाक़ात हुई?

जवाब : यक़ीनन। उर्दू, हिन्दी और दूसरी ज़बानों के तमाम अदीबों से ख़ूब मुलाक़ातें, नशिस्तें [अदबी महफ़िलैं] हुयी हैं, बैठकें होंगी, दोस्तों से मिलना अच्छा लगता है।

शम्सुल इस्लाम

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

काकोरी के शहीदों ने हिन्दू-मुस्लमान कट्टर धार्मिक संगठनों को बताया था अँगरेज़ हुक्मरानों के प्यादे

Ashfaqulla Khan and Ram Prasad Bismil

काकोरी के शहीदों की 93वीं बरसी पर | 93RD ANNIVERSARY OF KAKORI MARTYRS 

REMEMBERING THEIR EGALITARIAN-SECULAR IDEOLOGY AND JOINT MARTYRDOMS CAN BE A BULWARK AGAINST THE HINDUTVA ONSLAUGHT

उनकी समतामूलक-धर्मनिरपेक्ष और साझी शहादतों की विरासत को आत्मसात करके ही हम हिन्दुत्ववादी हमलों को विफल कर सकते हैं

अगस्त 9, 1925 के दिन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Republican Association) (HRA) से सम्बंधित इंक़लाबियों के एक समूह ने, जिस में चंद्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंदर लाहिरी, रोशन सिंह, मन्मथनाथ गुप्त, सचिन्द्र बख़्शी, केशब चक्रवर्ती, बनवारी लाल और मुकंदी लाल शामिल थे, एक सवारी रेलगाड़ी को काकोरी रेल-स्टेशन (लखनऊ से लगभग 40 किलोमीटर) के पास रोक कर अँगरेज़ सरकार के ख़ज़ाने को लूट लिया था।

अँगरेज़ शासकों और उनके हिंदुस्तानी दलालों ने इस वारदात को कुछ गर्म-दिमाग़ के आतंकवादी नौजवानों द्वारा एक डकैती की संज्ञा दी थी जिनका उद्देश्य हथियारों और गोलाबारूद हासिल अराजकता फैलाना था।

जबकि इंक़लाबियों के समकालिक वृतान्त बताते हैं कि इस सरकारी ख़ज़ाने को इस लिए लूटा गया था ताकि बड़े पैमाने पर समाजवादी साहित्य छपवाया जाए जिसे नौजवानों, मेहनतकशों और बुद्धिजीवियों के बीच वितरित किया जाए ताकि उनकी राजनैतिक सोच विकसित हो और वे अँगरेज़ विरोधी संघर्ष में सक्रिय हों।

यह इंक़िलाबी अपने अनुभवों से सीख कर आतंकवादी सोच से उबर कर परिपक्व क्रांतिकारी सोच को आत्मसात कर चुके थे जिसकी अब यह समझ थी कि बिना व्यापक जनता को जोड़े अँगरेज़ राज को उखाड़ फेंका नहीं जा सकता। इस का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1928 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दया गया था। बात बहुत साफ़ थी कि अब कोई वैचारिक भ्रम नहीं था।  

अंग्रेज़ हुक्मरानों ने इन इंक़िलाबियों पर काकोरी षड़यंत्र नाम से मुकदमा चलाया और बहुत जल्दबाज़ी करते हुए अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान (जन्म: 22 October 1900) राम प्रशाद बिस्मिल (जन्म:11 June 1897), राजेंदर लाहिरी (जन्म: 23 June 1901) और ठाकुर रोशन सिंह (जन्म: 22 January 1892) को फांसी की सज़ा सुनायी गयी। 17 दिसंबर 1927 को राजेंदर लाहिरी को गोंडा जेल और 19 दिसंबर को राम प्रशाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल (उत्तर प्रदेश), अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान को फ़ैज़ाबाद जेल और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद जेल (सभी जेलें पूर्वी उत्तर प्रदेश में) में फांसी दी गयी।       

काकोरी के यह महान शहीद समग्रता में भारतीय नौजवानों का प्रतिनिधित्व करते थे; उम्र में सब से बड़े ठाकुर रोशन सिंह 35 वर्ष और सब से छोटे राजेंद्र लाहिरी केवल 26 वर्ष के थे। काकोरी के यह शहीद हे इन्हीं बल्कि इंक़लाबी तहरीक में शामिल नौजवान देश के हर कोने से आते थे, मिसाल के तौर पर भगत सिंह और सुखदेव पंजाब, राजगुरु महाराष्ट्र, ज्योतिष चंद्र पाल ओडिशा के रहने वाले थे। यह सब एक साथ एक ही उद्देश्य से जान तक क़ुर्बान करने के लिए एक साथ आए  थे और वह था अंग्रेज़ी राज को उखाड़ फेंकना और एक समता-मूलक तथा धर्म-निरपेक्ष आज़ाद देश का निर्माण।    

समाजवादी आज़ाद देश : काकोरी के शहीदों का सपना

यह प्रतिबद्धता काकोरी के शहीदों में से एक अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान के लेखन में साफ़ तौर पर देखी जा सकती है। फांसी के फंदे को चूमने से कुछ घंटे पहले ‘देशवासियों के नाम सन्देश’ जिसे वे जेल से बाहर भेजने में सफल हुए, में उन्होंने बहुत स्पष्ट रूप से देश में एक समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने का आह्वान किया। देश के कम्युनिस्टों का ज़िक्र करते हुए उन्हों ने लिखा:   

“मैं तुम से काफ़ी तौर पर मुत्तफ़िक़ (सहमत) हूँ और कहूंगा कि मेरा दिल ग़रीब किसानों के लिए और दुखिया मज़दूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं ने अपने आयाम-ए-फ़रारी (पुलिस से छुपकर रहने वाला काल) में भी अक्सर इनके हालात देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इन के साथ दिन गुज़रने का मौक़ा मिला है। मुझ से पूछो तो मैं कहूंगा कि मेरा बस हो तो मैं दुनिया की हर चीज़ इन के लिए वक़्फ़ (सुरक्षित) कर दूँ। हमारे शहरों की रौनक़ इन के दम से है। हमारे कारख़ाने इन की वजह से आबाद और कम कर रहे हैं। हमारे पम्पों से इन के हाथ ही पानी निकलते हैं, ग़रज़ की  दुनिया का हर एक काम इन की वजह से हुआ करता है। ग़रीब किसान बरसात के मूसलाधार पानी और जेठ-बैसाख की तपती दोपहर में भी खेतों पर जमा होते हैं और जंगल में मंडराते हुए हमारी खुराख का समान पैदा करते हैं।

“यह बिल्कुल सच है कि वह जो पैदा करते हैं, जो वह बनाते हैं,  उनमें उनका हिस्सा नहीं होता, हमेशा दुखी और मुफ़लिस-उल-हाल (दरिद्र) रहते हैं। मैं इत्तेफ़ाक़ करता हूँ कि इन तमाम बातों के ज़िम्मेदार हमारे गोरे आक़ा और उनके एजेंट हैं…मेरे दिल में तुम्हारी इज़्ज़त है और मैं मरते हुए भी तुम्हारे सियासी मक़सद से बिल्कुल मुत्तफ़िक़ हूँ। मैं  हिन्दोस्तां की ऐसी आज़ादी का ख्वाहिशमन्द था जिसमें ग़रीब खुश और आराम से रहते। ख़ुदा! मेरे बाद वह दिन जल्द आए जबकि छत्तर-मंज़िल लखनऊ में लोकोवर्कशॉप के अब्दुल्लाह मिस्त्री और धनिया चमार, किसान भी मिस्टर ख़ालिक़-उज़-ज़मां और जगत नारायण मुल्ला व राजा साहेब महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे नज़र आएं। 

“मेरे कॉमरेडों, मेरे रेवोलुशनरी भाईयों, तुम से मैं क्या कहूं, तुमको क्या लिखूं, बस यह तुम्हारे लिए क्या कुछ कम मुसर्रत (ख़ुशी) की बात होगी, जब सुनोगे कि तुम्हारा एक भाई हँसता हुआ फांसी पर चला गया और मरते-मरते खुश था। मैं  ख़ूब जानता हूँ कि जो स्प्रिट (जज़्बा) तुम्हारा तबक़ा (कम्युनिस्ट ग्रुप)  रखता है–क्योंकि मुझको भी फ़ख़्र (गर्व) है और अब बहुत ज़्यादा फ़ख़्र है कि एक सच्चा रेवोलूशनरी हो कर मर रहा हूँ।”

हिन्दू-मुस्लमान कट्टर धार्मिक संगठन अँगरेज़ हुक्मरानों के प्यादे : अशफ़ाक़ुल्लाह

अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान अपने दुसरे इंक़लाबी साथियों की तरह इस सच से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच धार्मिक बंटवारा अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई में सब से बड़ा बाधक था। यह सांप्रदायिक विभाजन विदेशी हुक्मरानों के ज़ालिम राज को बनाए रखने का सब से बड़ा कारण  था। उन्हों ने हिन्दू और मुस्लमान राष्ट्रवाद के ठेकेदारों को बेनक़ाब करते है लिखा:

“ओह! हम अपने वर्तमान समय का आनंद कैसे ले सकते हैं, जब हमारा राजनीतिक नेतृत्व आपसी झगड़ों में उलझा हो? एक अगर तब्लीग (इस्लाम का प्रचार) का दीवाना है तो दूसरे को मुक्ति केवल और केवल शुद्धि में दिखाई पड़ती है। उधर सरकारी गुप्तचर विभाग के कर्मचारी धर्म प्रचार के लिए धन उपलब्ध करा रहे हैं… उनका उद्देश्य धर्म का प्रचार-प्रसार या इसमें मदद करना कतई नहीं है, बल्कि वे तो [स्वतंत्रता संघर्ष की] चलती गाड़ी की राह में बाधा खड़ी करना चाहते हैं। मेरे पास वक्त नहीं है, न ही मुझे इसका मौका मिला कि मैं इस सांप्रदायिक साजिश को पूरी तरह उजागर कर पाता, जिसकी जानकारी मुझे फरारी काटने के दौरान व उसके बाद वाले दिनों में हुई… मैं अपने हिंदू व मुस्लिम भाइयों से कहना चाहता हूं कि यह ढोंग सीआईडी के गुप्त धन से रचे जा रहे हैं।”

देश के हिंदू व मुसलमानों के सामने अपना दिल खोल कर रख देने के बाद वह उन्हें सतर्क करते हैं :

“भाइयों! तुम्हारा आपस में इस तरह लड़ना, तुम्हारे आपसी मतभेद तुम में से किसी के भी काम न आएंगे। यह असंभव है कि सात करोड़ मुसलमान (शुद्धि के द्वारा) हिंदू धर्म अंगीकार कर लें, इसी तरह यह सोचना भी निरर्थक है कि (तब्लीग करके) 22 करोड़ हिंदुओं को मुसलमान बनाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में (अगर वे इसी तरह एक-दूसरे से लड़ते रहे तो) यह आसान होगा और बहुत आसान होगा कि वे सब अपने हाथों से अपने गले में तौक (कैदियों के गले में डाली जाने वाली लोहे की हंसली) डाल लें।”

“चाहे तुम कांग्रेसी हो या स्वराजवादी, तब्लीग पर चलने वाले हो या शुद्धि के समर्थक, कम्यूनिस्ट हो या क्रांतिकारी, अकाली हो या बंगाली, मेरा संदेश मेरे देश के हर व्यक्ति के लिए है। मैं धर्म व मान-मर्यादा के नाम पर हर किसी से मुखातिब हूं, चाहे वह अनीश्वरवादी हो या किसी भी ईश्वर को मानने वाला कि हम पर कृपा करो, जो काकोरी केस के लिए अपनी जान दे रहे हैं तथा भारत को 1920-21 (असहयोग आंदोलन) के दौर का भारत बना दो। एक बार फिर अहमदाबाद कांग्रेस (1921) वाली ‘एकता और भाईचारा’ दिखा दो, बल्कि उससे भी ज्यादा। जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी हमें संपूर्ण स्वतंत्रता का आह्वान कर के श्वेत स्वामियों (अंगरेजों) को यह बता देना चाहिए कि हम काले (भारतीय) अब किसी मंतर के जाल में नहीं फंसने वाले।

“तब्लीग और शुद्धि के पथ पर चलने वालों, खुदा के लिए अपनी आंखें खोलो और देखो कि तुम क्या थे और क्या हो गए। क्या किसी हिंदू या मुसलमान को आज वह धार्मिक स्वतंत्रता हासिल है, जो उसे पहले प्राप्त थी? क्या एक गुलाम देश का कोई धर्म होता है? (इस तरह की परिस्थितियों में) तुम कैसे अपने धर्मों का विकास कर सकते हो? आपसी एकता के साथ एकजुट हो कर रहो। वरना देश के पतन के तुम खुद जिम्मेदार होगे तथा देश को गुलामी की ओर धकेलने की जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही होगी।”

एक शेर में उन्होंने हिंदू व मुसलमान दोनों को मुखातिब करते हुए कहा कि वे अपने अनावश्यक मतभेद भुला दें:

यह झगड़े और बखेड़े मिटा कर आपस में मिल जाओ

अबस तफ़रीक़ है तुम में यह हिंदू और मुसलमां की275

अबस – अकारण, व्यर्थ / तफ़रीक़ – भेदभाव

शहीद राम प्रशाद बिस्मिल का बेलाग सन्देश

अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान के सब से क़रीबी इंक़लाबी और साथ में शहीद होने वाले राम प्रशाद बिस्मिल ने भी शहादत प्राप्त करने से पहले बिलकुल इसी तरह के विचार व्यक्त किए।  उन्होंने शहादत से केवल तीन दिन पहले देश के आम लोगों के लिए ‘अंतिम समय की बातें’ शीर्षक के अंतर्गत  जो सन्देश छोड़ा वह हमेशा याद रखा जाएगा :

“आज 16 दिसम्बर 1927 ई० को निम्नलिखित पंक्‍तियों का उल्लेख कर रहा हूं, जबकि 19 दिसम्बर 1927 ई० सोमवार (पौष कृष्‍णा 11 सम्वत् 1984 वि०) को 6 बजे प्रातःकाल इस शरीर को फांसी पर लटका देने की तिथि निश्‍चित हो चुकी है।

“क्योंकि मेरा जन्म-जन्मान्तर उद्देश्य रहेगा कि मनुष्य मात्र को सभी प्रकृति पदार्थों पर समानाधिकार प्राप्‍त हो। कोई किसी पर हकूमत न करे। सारे संसार में जनतन्त्र की स्थापना हो। वर्तमान समय में भारतवर्ष की अवस्था बड़ी शोचनीय है। अतःएव लगातार कई जन्म इसी देश में ग्रहण करने होंगे और जब तक कि भारतवर्ष के नर-नारी पूर्णतया सर्वरूपेण स्वतन्त्र न हो जाएं।

“मैं प्राण त्यागते समय निराश नहीं हूं कि हम लोगों के बलिदान व्यर्थ गए। मेरा तो विश्‍वास है कि हम लोगों की छिपी हुई आहों का ही यह नतीजा हुआ कि लार्ड बर्कनहेड के दिमाग में परमात्मा ने एक विचार उपस्थित किया कि हिन्दुस्तान के हिन्दू मुसलिम झगड़ों का लाभ उठाओ और भारतवर्ष की जंजीरें और कस दो। गए थे रोजा छुड़ाने, नमाज गले पड़ गई ! भारतवर्ष के प्रत्येक विख्यात राजनैतिक दल ने और हिन्दुओं के तो लगभग सभी तथा मुसलमानों के अधिकतर नेताओं ने एक स्वर होकर रायल कमीशन की नियुक्‍ति तथा उसके सदस्यों के विरुद्ध घोर विरोध व्यक्त किया है, और अगली कांग्रेस (मद्रास) पर सब राजनैतिक दल के नेता तथा हिन्दू मुसलमान एक होने जा रहे हैं।

“वाइसराय ने जब हम काकोरी के मत्युदण्ड वालों की दया प्रार्थना अस्वीकार की थी, उसी समय मैंने श्रीयुत मोहनलाल जी को पत्र लिखा था कि हिन्दुस्तानी नेताओं को तथा हिन्दू-मुसलमानों को अगली कांग्रेस पर एकत्रित हो हम लोगों की याद मनानी चाहिए। सरकार ने अशफ़ाक़ुल्लाह को रामप्रसाद का दाहिना हाथ करार दिया। अशफ़ाक़ुल्लाह कट्टर मुसलमान होकर पक्के आर्यसमाजी रामप्रसाद का क्रान्तिकारी दल के सम्बन्ध में यदि दाहिना हाथ बनते, तब क्या नये भारतवर्ष की स्वतन्त्रता के नाम पर हिन्दू मुसलमान अपने निजी छोटे छोटे फायदों का ख्याल न करके आपस में एक नहीं हो सकते? मरते ‘बिस्मिल’ ‘रोशन’ ‘लहरी’ ‘अशफाक’ अत्याचार से/होंगे पैदा सैंकड़ों इनके रुधिर की धार से ॥”

इस से ज़्यादा दुखद क्या बात हो सकती है कि हमारे देश के हुक्मरानों, मुख्यधारा के बुद्धिजीवियों और मीडिया ने एक संयोजित ढंग से इस महान जनपक्षीय विरासत को छुपाए रखने की दिन-रात कोशिश की है जिस में वे सफल भी हुए हैं।

आज भारत की प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष राज्यव्यवस्था किस तरह हिन्दुत्ववादी ख़ूनी पंजे के शिकंजे में है उस की बड़ी वजह काकोरी के शहीदों की क़ुर्बानियों और जिन उद्देश्यों के लिए उन्हों ने क़ुर्बानियां दी थीं को भुला दिया जाना है।

अब भी वक़्त है कि हम सब मिलकर इन शहीदों की समतामूलक-धर्मनिरपेक्ष और साझी शहादतों की विरासत को आत्मसात करें ताकि राष्ट्र और समाज विरोधी हिन्दुत्ववादी मंसूबों को शिकस्त दी जा सके।

शम्सुल इस्लाम

19-12-2020

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

अयोध्या में इतिहास की ग़लती सुधारी गई : अब मोदी सरकार पुरी का जगनाथ मंदिर बौद्धों को सौंपे!

Ram Janm Bhoomi Poojan

आरएसएस के प्रचारक, धुर-संघी नरेन्द्र मोदी के निजी नेतृत्व में चल रही आरएसएस-भाजपा की मौजूदा सरकार 138 करोड़ भारतीयों (जिनमें से लगभग 80 प्रतिशत हिंदू हैं) को रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और शांति देने में तो बुरी तरह से नाकामयाब है, लेकिन देशवासियों का मन बहलाने के लिए 5 (2020) अगस्त को उसके पास एक शुभ समाचार था। किसी मध्यकालीन राजा की वेशभूषा में, एक हिन्दू ऋषि दिखने की कामना लिए, केसरिया लबादा लपेटे प्रधानमंत्री ने अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखते हुए ऐलान किया कि दुनिया भर के हिंदुओं की चिरप्रतिक्षित अभिलाषा आखिरकार पूरी हुई, भगवान राम की जन्मभूमि जिसे नष्ट करने के लिए सैकड़ों साल से कोशशें की जा रही थीं, आखिरकार वह मुक्त हो गयी।

बकौल मोदी के मंदिर की नींव में जिस क्षण आधारशिला रखी जा रही थी, भारत  एक “सुनहरा अध्याय” लिख रहा था।

यह समझना जरा भी मुश्किल नहीं था कि भारत से मतलब ख़ुद वे थे।  उन्होंने ऐलान किया कि “आज, राम जन्मभूमि सदियों से चले आ रहे विध्वंस और पुनरुत्थान के चक्र से मुक्त हो गई।”

[ Https://indianexpress.com/article/india/ram-mandir-bhumi-pujan-full-text-of-pm-narendra-modis-speech-in-ayodhya/ ]

गोस्वामी तुलसीदास पर प्रश्नचिन्ह

हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर झूठ बोलते पाये जाते हैं। बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए राम जन्म-स्थान मंदिर के विध्वंस को लेकर भी उन्होंने झूठ का सहारा लिया। उन्होंने इस बारे में जो कहा वह आरएसएस की शाखाओं में गढ़े ‘सच’ हैं जिनका इतिहास के समकालीन ‘हिन्दू’ दस्तावेज़ों और स्रोतों में भी वर्णन नहीं है। उन के अनुसार, अयोध्या ने राम मंदिर को लेकर हिंदू और मुसलमानों के बीच लगभग पांच शताब्दियों तक लगातार युद्ध चला आ रहा था।

विरोधियों (मुसलमानों) पर जीत की शेखी बघारते समय, मोदी ने अवधी भाषा में रचित, गोस्वामी तुलसीदास के महाकाव्य ‘श्रीरामचरितमानस’ को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। यह वही महाकाव्य है, जिसने भगवान राम की कहानी को लोकप्रिय करके हर हिंदू के मन-मंदिर में प्रतिष्ठित किया है, विशेषकर उत्तरी भारत में। गोस्वामी तुलसीदास ने 1575-76 में इस महाकाव्य की रचना की थी। हिंदुत्ववादियों के दावे के अनुसार राम जन्म-स्थान मंदिर 1538-1539 के दौरान नष्ट किया गया था। तब, राम जन्मस्थान मंदिर के कथित विध्वंस के लगभग 37 साल बाद लिखे गए ‘श्रीरामचरितमानस’ में इस विध्वंस का उल्लेख होना चाहिए था। लेकिन ‘श्रीरामचरितमानस’ में ऐसा कोई जिक्र नहीं है।

यह सब करके क्या हिंदुत्व के ठेकेदार, जिन की अगुवाई मोदी कर रहे हैं, यह जतलाने की कोशिश कर रहे हैं कि राम और उनके ‘दरबार’ के सबसे बड़े कथाकार और भक्त तुलसीदास ने अपनी इस ऐतिहासिक रचना में जानबूझ कर सत्य नहीं बताया ? क्या यह गोस्वामी तुलसीदास की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की कोशिश नहीं है?

क्या हिंदुत्व के ठेकेदार यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि गोस्वामी तुलसीदास राम के जन्म-स्थान पर मंदिर के विध्वंस के विषय पर किसी प्रच्छन्न उद्देश्य से मौन रह गये?

यहाँ यह जानना भी मुनासिब होगा कि गोस्वामी तुलसीदास के 3 क़रीबी लोगों ने उनकी जीवनियां लिखीं हैं, लेकिन उनमें भी राम जन्म-स्थान पर किसी मस्जिद के बनाए जाने का ज़िक्र नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की अवमानना | Contempt of Supreme Court decision

राम जन्मभूमि “विध्वंस और पुनरुत्थान की सदियों पुरानी श्रृंखला से मुक्त हुर्इ”, यह दावा करके प्रधानमंत्री अयोध्या पर 9 नवंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले की खुले-आम धज्जियाँ उड़ा रहे थे। अपने इस निर्णय में न्यायालय ने कहा है, बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी भी मंदिर को ध्वस्त कर नहीं किया गया था। 22/23 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि को राम लला की मूर्ति रखना गैरकानूनी था और 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस “कानून के शासन का उद्दंड उल्लंघन” था।

इसी फैसले में यह तथ्य भी रेखांकित किया गया है कि “मुसलमानों को गलत तरीके से एक मस्जिद से वंचित किया गया है जो 450 साल पहले बाकायदा निर्मित की गर्इ थी”।

दरहकीकत, अयोध्या में प्रधानमंत्री के भाषण के लिए न्यायालय में उनके खिलाफ न्यायिक अवमानना का मुकदमा चल सकता है।

[ Https://scroll.in/article/943337/no-the-supreme-court-did-not-uphold-the-claim-that-babri-masjid-was-built-by-demolishing-a-temple  ]

हमने देखा कि कैसे एक बेबुनियाद और ग़ैर-ऐतिहासिक मनगढ़ंत कथा के आधार पर बाबरी मस्जिद की जगह भव्य राम मंदिर बनाया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी की आरएसएस-भाजपा सरकार का दावा है कि वह अतीत की गलतियों को दुरुस्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस से जुड़े कई गंभीर पहलू हैं जिन को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है।

इस की सब से बड़ी समस्या यह है कि भारतीय सभ्यता, जिसे खुद आरएसएस कम-से-कम 5000 साल पुरानी बताता है, उसमें से केवल 700-800 का काल [जब भारत पर शासन/आक्रमण करने वाले मुस्लिम नामधारी रहे हैं या ‘मुस्लिम, काल] को ग़लतियां सुधारने के लिए चुना गया है। जैसे कि शेष 4200-4300 सालों में जब मुसलमान भारत नहीं पहुंचे थे सब ठीक था।

आइए हम देश के इतिहास में की गयी नाइंसाफ़ियों के बारे में स्वयं ‘हिन्दू’ स्रोत क्या बताते हैं उनका जायज़ा लेते हैं।

इस सन्दर्भ में आरएसएस/हिंदुत्व के सबसे महत्वपूर्ण विचारक और आरएसएस के दूसरे प्रमुख, एम. एस गोलवलकर ने महमूद गजनी द्वारा 1025-26 में सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने के बारे में क्या लिखा था उसे जानना ज़रूरी है, उनके अनुसार :

‘‘एक हजार वर्ष पहले हमारे लोगों ने हम पर आक्रमण करने के लिए विदेशीयों को आमंत्रित किया। आज भी ऐसा ही खतरा हमारे ऊपर मंडरा रहा है। कैसे सोमनाथ के भव्य मंदिर को अपवित्र किया गया एवं ध्वस्त किया गया, यह तो इतिहास की बात हो चुकी है। महमूद गाजी ने सोमनाथ की संपत्ति एवं वैभव के बारे में सुना था। उसने ख़ैबर दर्रे को पार किया और सोमनाथ की संपदा को लूटने के लिए भारत में अपना पैर रखा। उसे रेगिस्तान के भारी जंगल को पार करना पड़ा। एक ऐसा समय भी था जब उसके पास अपनी सेना के लिए और अपने लिए भी भोजन एवं पानी नहीं था, उसे अपनी नियति पर छोड़ दिया गया होता तो वह खत्म हो गया होता और राजस्थान के जलते बालू (रेत) ने उसकी हड्डियों को जलाकर ख़ाक कर दिया होता। लेकिन नहीं, महमूद गज़नी ने स्थानीय सरदारों को यह विश्वास दिला दिया कि सौराष्ट्र के शासक उनके खिलाफ विस्तारवादी इरादा रखते हैं, उन्होंने अपनी मूर्खता तथा संकीर्णता के चलते उस पर विश्वास कर लिया और वे उसके साथ हो लिये। जब महमूद गाजी ने महान मंदिर पर हमला किया तो वे हिन्दू थे, हमारे रक्त के रक्त, हमारे हाड़-मांस, हमारी आत्मा की आत्मा जो उसकी सेना के हिरावल थे। सोमनाथ को हिन्दुओं के सक्रिय सहयोग से अपवित्र किया गया। ये इतिहास के तथ्य हैं।”

 [MS Golwalkar’s speech in Madurai cited in ‘Organiser’ dated January 4, 1950, pp. 12, 15.]

यदि आरएसएस-भाजपा सरकार भारत के अतीत में की गर्इ धार्मिक नाइंसाफियों को दुरुस्त करने को लेकर सचमुच संजीदा हैं, तो उन्हें पुरी में जगन्नाथ मंदिर को बौद्धों को सौंपने के लिए काम तत्काल शुरू कर देना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद को आरएसएस हिंदुत्व की राजनीति और पुनरुत्थानवादी हिंदू भारत का पथप्रदर्शक मानता है। भारत के महान अतीत के बारे उन्होंने बहुत कुछ बताया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों कहा है कि पुरी का जगन्नाथ मंदिर मूल रूप से एक बौद्ध मंदिर था। उनकी स्वीकारोक्ति के अनुसार,

“किसी भी व्यक्ति के लिए जो भारतीय इतिहास के बारे में जानता है…जगन्नाथ एक प्राचीन बौद्ध मंदिर है। हमने इसे और अन्यों को अपने नियंत्रण में ले लिया एवं उनका हिन्दूकरण कर दिया। हमें अभी उसकी तरह के अनेक काम करने होंगे।”

[Swami Vivekananda, ‘The Sages of India’ in The Complete Works of Swami Vivekananda, Vol. 3, Advaita Ashram, Calcutta, p. 264.]

हिंदुत्व टोली के एक और बहुत प्यारे बंकिम चंद्र चटर्जी [‘आनंदमठ’ और ‘वंदे मातरम’ के लेखक] हैं जो इसी तथ्य को पुष्ट करते हैं। उनके अनुसार, जगन्नाथ मंदिर का एक अभिन्न हिस्सा ‘रथ यात्रा’, मूल रूप से एक बौद्ध अनुष्ठान था जिसे बौद्ध मंदिर के हिन्दुकरण के बाद भी जारी रखा गया। बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा :

“जनरल कनिंघम द्वारा ‘भिल्सा टॉप्स’ नामक अपने ग्रंथ में रथ उत्सव (जगन्नाथ मंदिर से संबंधित) की उत्पत्ति के बारे में जो विवरण दिया है उस संदर्भ में मुझे एक और अत्यंत प्रमाणित कथा ज्ञात है। इसमें वे बौद्धों के इसी प्रकार के उत्सव के बारे में बताते हैं, जिसमें बौद्ध धर्म के तीन प्रतीक, बुद्ध, धर्ममा और संघ, इसी रूप में एक वाहन में दर्शाए गए थे, और मैं समझाता हूं कि समय भी वही है, जब रथ (यात्रा) निकलती है। इस व्याख्या के समर्थन में एक तथ्य है कि जगन्नाथ, बालराम, और सुभद्रा, जिनकी झांकी अब रथ में प्रदर्शित होती हैं, बुद्ध, धर्ममा और संघ की ही लग-भग नक़ल हैं।”

[Chatterjee, Bankim Chandra, ‘On the origin of Hindu festivals’ in Essays & Letters, Rupa, Delhi, 2010, pp. 8-9.]

दरअसल, केवल पुरी मंदिर ही नहीं है जिस का हिन्दुकरण किया गया। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में शंकराचार्य का यशगान करते हुए बताया:

“दस वर्ष उन्होंने (शंकराचार्य ने) देश भ्रमण किया, जैन धर्म का खंडन किया और वैदिक धर्म का प्रसार किया। धरती में से जो भी खंडित मूर्तियां खोद कर निकाली जाती हैं, शंकर के काल में तोड़ी गयी थीं और खुदाई के दौरान जहां अखंडित मूर्तियां यहाँ-वहां निकलती हैं, तोड़े जाने के डर से जैनियों (जैन धर्म छोड़ चुके) ने ही जमीन में गाड़ दी थीं।”

(SATYARTH PRAKSHBY Swami Dayanand Sarswati, chapter  xi, p. 347.)

हिंदुत्ववादी शासक, जो बौद्ध और जैन धर्म जैसे धर्मों को स्वदेशी मानकर अपनत्व जतलाया करते हैं, उन्हें चाहिए कि जैन मंदिरों और बौद्ध विहारों को जल्द से जल्द उनके धर्मावलंबियों को सौंपने की शुरुआत करें।

शम्सुल इस्लाम