जेएनयूएसयू का देश की राजनीति में क्या योगदान है?

जेएनयूएसयू का देश की राजनीति में क्या योगदान है?

लोकतंत्र, विवेक और आनंद का सौंदर्यलोक जेएनयू-1

What is the contribution of JNUSU to the politics of the country?

मैं 1980-81 में जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव में कौंसलर पद पर एक वोट से जीता था। वी. भास्कर अध्यक्ष चुने गए। उस समय जेएनयू के वाइस चांसलर वाय. नायडुम्मा साहब (Prof.Y.Nayudamma or Dr. Yelavarthy Nayudamma) थे, वे श्रीमती गांधी के भरोसे के व्यक्ति थे विश्वविख्यात चमड़ा विशेषज्ञ थे। स्वभाव से बहुत ही शानदार, उदार और वैज्ञानिक मिज़ाज के थे। बीएचयू से पढ़े थे।

भास्कर के साथ पूरी यूनियन उनसे मिलने गयी, सबने उनको अपना परिचय अंग्रेज़ी में दिया मैंने हिन्दी में दिया, क्योंकि मैं अंग्रेज़ी में परिचय देना नहीं जानता था। नायडुम्मा साहब अंग्रेज़ी में परिचय सुनते हुए एकाग्र हो चुके थे मैंने ज्योंही हिन्दी में परिचय दिया सारा माहौल बदल गया, वे तुरंत टूटी फूटी हिन्दी में शुरू हो गए और बोले आज मैं कई दशक बाद हिन्दी बोल रहा हूँ। तुमने मेरी बीएचयू की यादें ताज़ा कर दीं।

इसके बाद मैं उनसे विभिन्न समस्याओं को लेकर अनेक बार मिला वे भास्कर को बीच में टोकते और कहते जगदीश्वर को बोलने दो, मुझे हिन्दी सुनना अच्छा लगता है, कहते इसके बहाने मैं काशी में लौट जाता हूं।

नायडुम्मा जानते थे मैं सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से सिद्धांत ज्योतिषाचार्य कर चुका हूं, मेरा बनारस से संबंध है। उन्होंने कहा जेएनयू में तुम मेरे हिन्दी और बनारस के सेतु हो।

मैं पान बहुत खाता था, नायडुम्मा को बहुत पसंद था। जेएनयू में नामवरजी के बाद वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझसे पान खाने के लिए माँगा। नायडुम्मा साहब ने कहा जिस दिन अगलीबार आओ तो बिना समस्या के आना, पान लेकर आना बैठकर बातें करेंगे।

मैं एकदिन पान लेकर उनके पास गया और जमकर बातें कीं। अंत में बोले कोई काम हो तो बोलो, मैंने कहा जेएनयू में बडे पैमाने पर जाली इन्कम सर्टिफ़िकेट दाख़िले के समय जमा हो रहे हैं आप दुस्साहस करके छात्रों के कमरों में छापे डलवा दें और रेण्डम तरीक़े से इन्कम सर्टिफ़िकेट की जाँच करवा दे। वे बोले यूनियन के लोगों के यहाँ भी छापे पड़ेंगे। तुम वायदा करो बाहर कहोगे नहीं, आय सर्टिफ़िकेट भी जांच के लिए भेजे जाएँगे। परिणाम झेलोगे। मैंने कहा हम तैयार हैं। छात्रों के कमरों की तलाशी हुई बडे पैमाने पर कई छात्रों के कमरों से नक़ली मोहरें बरामद हुईं और बड़े पैमाने पर जेएनयू की लाइब्रेरी से चुरायी गयी किताबें बरामद हुईं। आय प्रमाणपत्रों की जाँच के बाद अनेक छात्रों के सर्टिफ़िकेट जाली पाए गए उनको विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया। हमने विश्वविद्यालय प्रशासन का इस मामले में साथ दिया।

जेएनयू में मेरा पहला मुकाबला नामवरजी से हुआ और यह बेहद मजेदार, शिक्षित करने वाला था।

जेएनयू में सन् 1979 में संस्कृत पाठशाला की अकादमिक पृष्ठभूमि से आने वाला मैं पहला छात्र था। मेरे शास्त्री यानी स्नातक में मात्र 50फीसदी अंक थे। संभवतः इतने कम अंक पर किसी का वहां दाखिला नहीं हुआ था, मैंने प्रवेश परीक्षा और इंटरव्यू बहुत अच्छा दिया और मुझे दाखिला मिल गया।

कक्षाएं शुरू होने के 10 दिन बाद पहला टेस्ट घोषित हो गया, उसके लिए गुरूवर नामवरजी ने दो विषय दिए, पहला, जॉन क्रो रैनसम का न्यू क्रिटिसिज्म (John Crowe Ransom New Criticism), दूसरा, संस्कृत काव्यशास्त्र में रूपवाद (Morphism in Sanskrit Poetry)

संभवतः पहलीबार नामवरजी ने संस्कृत काव्यशास्त्र पढाया। खैर, मैंने परीक्षा दी और अपने लिए न्यू क्रिटिसिज्म को चुना। उत्तर सही दिया। लेकिन गुरूदेव का दिल नहीं जीत पाया। उन्होंने मुझे बी-प्लस ग्रेड दिया। मैं खैर खुश था, चलो फेल तो नहीं हुआ।

कक्षा में उत्तर पुस्तिका दी गयी, सभी छात्र अपनी पुस्तिका पर नामवरजी के कमेंटस पढ़ रहे थे। मेरी उत्तर पुस्तिका पर लालपैन से सही का निशान था और नामवरजी का कोई कमेंटस नहीं था, सिर्फ बी प्लस ग्रेड लिखा था।

बातचीत में नामवरजी प्रत्येक छात्र को एक-एक करके बता रहे थे कि उसके लेखन में क्या कमी है, ऐसे नहीं वैसे लिखो, दिलचस्प बात यह थी कि जिस छात्र को ए प्लस दिया था उसकी उत्तर पुस्तिका में काफी कांट-छांट की थी।

मेरा नम्बर आया तो मैंने व्यंग्य में कहा, सर, आपने बहुत ज्यादा अंक दिए हैं ! इतने नम्बर तो पहले कभी नहीं मिले ! वे तुरंत बोले मैं आपसे नाराज हूँ, मैंने पूछा क्यों, बोले आपने संस्कृत काव्यशास्त्र में रूपवाद वाले सवाल पर क्यों नहीं लिखा, मैंने संस्कृत काव्यशास्त्र आपके लिए खासतौर पर तैयार करके पढ़ाया था।

मैंने कहा सर, मैं संस्कृत पढ़ते हुए बोर गया था इसलिए न्यू क्रिटिसिज्म पर लिखा। बोले, मैं परेशान हूँ कि अंग्रेजी नहीं जानते हुए न्यू क्रिटिसिज्म पर कैसे लिख सकते हो !

मैंने झूठ कहा कि सर आपके क्लास नोट्स से तैयारी करके परीक्षा दी है। वे बोले नहीं, मैंने ‘तोड़ती पत्थर कविता’ का उदाहरण कक्षा में नहीं बताया था, लेकिन आपने लिखा है।

मैंने पूछा, सर, यह बताइए जो लिखा है वह सही है या गलत लिखा है।

वे बोले सही लिखा है।

मैंने फिर पूछा जो उदाहरण दिया है वह सही है या गलत।

बोले सही है।

मैंने पूछा कि फिर समस्या कहां पर है ॽ

वे बोले ‘न्यू क्रिटिसिज्म’ किताब पढ़ कैसे सकते हो ॽ

मैंने कहा, उस किताब को मित्र कुलदीप कुमार ने पढ़कर सुनाया वह किताब कुलदीप कुमार के पास है, उसने टेस्ट के पहली वाली रात को सारी रात जगकर ‘न्यू क्रिटिसिज्म’ को मुझे सुनाया और मैंने सुबह जाकर परीक्षा दे दी। इसके बाद गुरूदेव चुप थे।

मैंने कहा सर, मैंने कहा था अंग्रेजी समस्या नहीं है, समझ में नहीं आएगा तो मित्रों से समझ लेंगे। इस तरह मेरे लिए अंग्रेजी मित्रभाषा आज भी बनी हुई है।

मैंने अपने छात्र जीवन में अंग्रेजी न जानते हुए इराकी, ईरानी, फ्रेंच, फिलिस्तीनी, अफ्रीकी, मणिपुरी, नागा आदि जातियों के छात्रों के साथ गहरी मित्रता की और उनका दिल जीता।

मेरा जेएनयू में पहला रूममेट एक दक्षिण अफ्रीकी छात्र था, मैं और वो एक ही साथ न्यू सोशल साइंस बिल्डिंग ( आज की पुराने सोशल साइंस इमारत) में जो कि 1979 में बनकर तैयार हुई थी, उसमें एक साथ रहे।

उसके बाद दूसरे सेमिस्टर में सतलज होस्टल में मेरा रूममेट एक नागा लड़का था। यानी एमए का पहला वर्ष इन दोनों के साथ गुजरा। दोनों हिन्दी नहीं जानते थे, अंग्रेजी भी बहुत कम जानते थे।

अफ्रीकी छात्र कालांतर में नेल्सन मंडेला के मंत्रीमंडल में मंत्री बना, नागा लडका बड़ा नागा नेता बना। इनके अलावा जो फिलिस्तीनी लड़का सबसे अच्छा मित्र था वह लंबे समय तक फिलीस्तीनी नेता यासिर अराफात का निजी सचिव था। इन सबके साथ रहते हुए भाषा कभी समस्या के रूप में महसूस नहीं हुई।

मैंने जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के लिए सन् 1984 में चुनाव लड़ा तो उस समय कुछ तेलुगूभाषी छात्रों ने कहा कि वे मुझे वोट नहीं देंगे। हमारे पूर्वांचल में रहने वाले मित्रों ने संदेश दिया कि 20-25 तेलुगूभाषी छात्र हैं जो मेरे हिन्दी में बोलने के कारण नाराज हैं और वोट नहीं देंगे।

मैंने कहा कि मेरी उनसे मीटिंग तय करो, मैं बैठकर सुनता हूँ, फिर देखते हैं,उनका मन बदलता है या नहीं। मेरी उन सभी तेलुगूभाषी छात्रों के साथ मीटिंग तय हुई। एक कमरे में हम बैठे, मेरी मदद के लिए तेलुगूभाषी कॉमरे़ड थे जिससे भाषा संकट न हो लेकिन तेलुगूभाषी छात्रों ने कहा कि वे मुझसे अलग से और बिना किसी भाषायी मददगार के बात करेंगे। उन्होंने सभी तेलुगू भाषी कॉमरेडों को कमरे के बाहर ही रोक दिया।

अंदर कमरे में तेलुगूभाषी थे और मैं अकेला। मेरी मुश्किल यह थी कि मैं हिन्दी के अलावा कोई भाषा नहीं जानता था, वे लोग हिन्दी एकदम नहीं जानते थे। बातचीत शुरू हुई मैंने टूटी- फूटी अंग्रेजी में शुरूआत की, गलत-सलत भाषा बोल रहा था, वे लगातार सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे और मैं धारावाहिक ढंग से हर सवाल का अंग्रेजी में जवाब दे रहा था, मेरी अंग्रेजी बेइंतिहा खराब, एकदम अशुद्ध लेकिन संवाद अंग्रेजी में जारी था।

तकरीबन एक घंटा मैंने उनसे टेलीग्राफिक अंग्रेजी में अपनी बात कही और उनसे अनुरोध किया कि आप लोग एसएफआई को पैनल वोट दें, मुझे वोट जरूर दें। कमरे के बाहर तमाम कॉमरेड खडे थे और परेशान थे, बातें कर रहे थे कि मैं अंग्रेजी नहीं जानता फलतः राजनीतिक क्षति करके ही लौटूँगा।

मैं बातचीत खत्म करके बाहर हँसते हुए आया तेलुगूभाषी छात्र भी हँसते हुए बाहर निकले, बाहर खड़े तेलुगूभाषी कॉमरेडों ने उनसे पूछा अब बताओ किसे वोट दोगे, वे बोले रात को मेरा भाषण सुनने के बाद बताएंगे, उन लोगों से दूसरे दिन सुबह पूछा गया कि अब बताओ जगदीश्वर को वोट दोगे या नहीं, सभी तेलुगूभाषी लड़कों ने कहा हम उसे जरूर वोट देंगे।

तेलुगूभाषी कॉमरेड ने कहा आश्चर्य है मैंने समझाया तो वोट देने को राजी नहीं हुए और जगदीश्वर से बात करने के बाद उसे वोट देने को राजी कैसे हो गए, इस पर एक छात्र ने कहा कि उसकी सम्प्रेषण शैली और दिल जीतने की कला ने हम सबको प्रभावित किया। उससे बात करने के बाद पता चला कि भाषा भेद की नहीं जोड़ने की कला है।

JNU में कईबार वाम हारा है, लेकिन उसने हार को सम्मान और सभ्यता के साथ स्वीकार किया है।

मैं दो बार छात्रसंघ के उपाध्यक्ष पद के चुनाव में हारा लेकिन हार के कारणों की खोज करके अपने को दुरूस्त किया है। दोनों बार मेरे खिलाफ जो लड़के जीते उनमें एक संजीव चोपड़ा शानदार आईएएस बना। संजीव से 18वोट से हारा, दूसरा वेणु आर. विदेश सेवा में गया इन दिनों नीदरलैंड में राजदूत है, उल्लेखनीय है। वेणु से 28 वोट से हारा। जबकि पैनल में मुझे अध्यक्ष से भी अधिक वोट मिले थे। जेएनयू में सब छात्र वाम नहीं थे। आज भी नहीं हैं।  

यह वाकया सन् 1984 का है,उन दिनों मैं जेएनयू में छात्र संघ अध्यक्ष था, उपकुलपति पीएन श्रीवास्तव थे, प्रशासन मेरे खिलाफ एक्शन लेने के लिए परेशान था। अचानक उन्होंने बहाना खोज निकाला, मेरे नाम से प्रकाशित एक पर्चे में से कुछ पंक्तियां चुनकर मेरे खिलाफ एक्शन का ब्लू प्रिंट बना लिया गया।

उन दिनों रेक्टर थे एम एस अगवानी, बड़े जालिम प्रशासक थे, वीसी के साथ मिलकर उन्होंने ही व्यूह रचना की और मेरे खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी करने का फैसला किया। संयोग की बात थी कि वीसी के निजी सचिव से मेरा संपर्क बढ़िया था, उसने कारण बताओ नोटिस के आने के पहले ही मुझे सब बातें बता दीं। मैंने तुरंत हाथ से एक नोटिस लिखा जिसमें उन विवादित शब्दों का जिक्र करते हुए एक संशोधन संदेश तुरंत हरेक होस्टल के मैस के काउंटर पर लंच के बाद पिछली तारीख का हवाला देकर लगवा दिया। मुझे तीन बजे कारण बताओ नोटिस मिला, दंडात्मक कार्रवाई की धमकी के साथ, मैंने तुरंत खंडन करते पत्र दे दिया, साथ में संशोधन बुलेटिन का जिक्र किया। मैंने मात्र यह कहा कि चूंकि मैंने मूल पर्चा हिंदी में लिखा था, अत: वह अनुवाद में गड़बड़ी हो गयी थी और कुछ समय बाद उस संशोधन को भी जारी कर दिया गया।

वीसी ने बुलाया और कहा आपने कोई संशोधन जारी नहीं किया था। मैंने कहा आप झूठ बोल रहे हैं मैंने संशोधन बुलेटिन जारी किया था आप चलकर देख लें, हर मैस में चिपका हुआ है। वीसी ने तुरंत पीआरओ और रजिस्ट्रार को मौके पर मेरे साथ भेजा। सभी मैस में संशोधन काउंटर पर चिपका हुआ था। उसके कैमरे से फोटो लिए गए। हरेक काउंटर से लौटकर अधिकारियों ने वीसी को बताया संशोधन चिपका है और उस पर पर्चे के दिन की ही तारीख लिखी है।

वीसी और अगवानी का मुंह देखने लायक था, अगवानी थर्ड ग्रेड आदमी था। मैंने गुस्से में कहा, अगवानी साहब, मेरे खिलाफ एक्शन लेने के लिए कई जन्म लेने पड़ेंगे, फिर भी हाथ नहीं आऊंगा। वीसी-रेक्टर अपनी पराजय पर क्षुब्ध थे और मैं खुश ! मैं उन चंद छात्र नेताओं में था जिसके खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई।  

जेएनयू सच्चे अर्थ में ग्लोबल विश्वविद्यालय है,

जेएनयू में भारत के प्रत्येक इलाके और हर संस्कृति के छात्र पढ़ते हैं, वहां 145देशों के विदेशी छात्र पढ़ते हैं। वह कोई लोकल वि वि नहीं है। राष्ट्रीय वि.वि. है। यहां विद्या का संचय होने के साथ विद्या के गौरव का प्रकाश भी महसूस कर सकते हैं। यहां ज्ञान ही महान है, इस धारणा पर जोर दिया जाता है। यहां के विद्यार्थियों में ज्ञान, साधना, लोकतंत्र और चरित्र इन चारों का विलक्षण संगम मिलता है। यहां विद्यार्थी को नए लोकतांत्रिक मिज़ाज़ में रूपान्तरित करके नागरिक बनाया जाता है। यहां महज डिग्री नहीं मिलती, बल्कि डिग्री का उतना महत्व भी नहीं है जितना ज्ञान और नए नागरिक निर्माण का। जीवन के बेहतरीन चारित्रिक गुणों का जेएनयू में निर्माण किया जाता है। पुराने भारतीय विश्वविद्यालयों की श्रेष्ठतम परंपरा है प्रति गंभीर श्रद्धा। नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला तीनों विश्वविद्यालयों में यह गुण था। जेएनयू ने इस गुण को अपने चरित्र का मूल तत्व बनाया। यही वजह है जेएनयू के छात्रों में मनुष्यत्व और लोकतंत्र के सवाल हमेशा केन्द्रीय सवाल रहे हैं। वे मनुष्य के हकों को लेकर हमेशा सक्रिय रहे हैं। इसके विपरीत कारपोरेट घरानों और बुर्जुआ नजरिए से चलाए जा रहे विश्वविद्यालयों में डिग्री के सवाल प्रमुख रहे हैं। सामाजिक सरोकारों में वहां के छात्रों की न्यूनतम शिरकत भी नजर नहीं आती।

जेएनयू रीयलसेंस में रवीन्द्रनाथ टैगोर के सपनों का वि वि है।

विश्व विद्यालय कैसा हो, टैगोर कहते हैं- वि.वि. सर्वसाधारण की उदार, अकुंठित, अकृत्रिम श्रद्धा को अभिव्यंजित करे। जेएनयू में यह गुण कूट-कूटकर भरे पड़े हैं।

रवीन्द्र नाथ टैगोर की भाषा में कहें, इसका उद्देश्य है सर्वसाधारण के चित्त का उद्दीपन, उद्बोधन और चरित्र-सृष्टि करना। भारत के मन में परिपूर्ण मनुष्यत्व का बोध पैदा करना। इसका लक्ष्य सिर्फ बुद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका लक्ष्य आर्थिक-राजनीतिक और पारमार्थिक भी है।

जेएनयू में सब वाम नहीं है। अधिकांश छात्र वाम को नहीं मानते थे। वाम यहां नोट, सरकार, जाति और लट्ठ के बल पर चुनाव नहीं लड़ता, बल्कि विचारधारा और संघर्ष के इतिहास के आधार पर चुनाव लड़ता रहा है।

जेएनयूएसयू के बिना छात्रचेतना कैसी होगी, राजनीतिक चेतना कैसी होगी, इसे आसानी से कैंपस के बाहर जाकर महसूस कर सकते हैं। यह छात्रों का मात्र संगठन नहीं है। यह कोई मात्र पॉलिटिकल यूनियन नहीं है। यह कोई सामान्य छात्रसंघ नहीं है। यह असामान्य छात्रसंघ है। यह छात्र आंदोलन की लोकतांत्रिक अस्मिता का आदर्श मानक है। यह समाजवाद या कम्युनिस्टों की प्रयोगशाला भी नहीं है।

जेएनएसयू का मतलब मार्क्सवादी या क्रांतिकारी होना नहीं है। जेएनयू में पढ़ने का अर्थ मार्क्सवादी होना या किसी वाद का हिमायती होना नहीं है।

यहाँ छात्र भारत की विभिन्न संस्कृतियों और जातीयताओं से आते हैं। वे अपने विभिन्न किस्म के सामाजिक और राजनीतिक संस्कार लेकर आते हैं। लेकिन जेएनयू में आने के बाद प्रच्छन्न तरीके से छात्रसंघ की गतिविधियां और कैंपस का माहौल उनको तराशना आरंभ करता है। वे एक बड़ी चीज संस्कार में लेकर जाते हैं वह लोकतांत्रिक भावबोध और मानवाधिकारों के प्रति अटूट आस्था।

छात्रसंघ का ढांचा कुछ इस तरह का है कि वह विभिन्न विचारधारा को मानने वाले छात्र संगठनों को भी लोकतांत्रिक आचार-व्यवहार और संस्कार सीखने के लिए मजबूर करता है।

यह ऐसा छात्रसंघ है जो लोकतांत्रिक संस्कारों का निर्माण करता है। इसके कारण आम छात्रों में अन्य के बारे मे सोचने की आदत पैदा होती है।

मजेदार बात है कि हम सब आते हैं अपने कैरियर के लिए लेकिन आने के बाद पता चलता है कि अपने अलावा भी दुनिया है और बड़ी दुनिया है जिसके बारे में सोचना चाहिए। एक ऐसी दुनिया है जिसको हम नहीं जानते और फिर धीरे-धीरे हम इस अनजानी दुनिया में अन्य के सरोकारों को लेकर कंसर्न महसूस करने लगते हैं। पहले ये कंसर्न छात्रसंघ के पर्चे, जुलूस, प्रदर्शन आदि के रूप में सामने आते हैं। हम कैंपस में रहते हुए अपने बारे में कम और अन्य(हाशिए के लोगों) के बारे में ज्यादा सोचते हैं। इस अर्थ में जेएनयूएसयू एक बड़ी सेवा करता है वह अन्य के बारे में सोचने को मजबूर करता है। ऊपर से लगता है हम विचारधारा विशेष से संचालित होकर सोच रहे हैं, विचारधारा के आधार पर फैसले ले रहे हैं, विचारधारा के आधार पर बहसें कर रहे हैं लेकिन इस क्रम में विचारधारा गौण हो जाती है और लोकतांत्रिक चेतना प्रधान हो जाती है। हर छात्र विचारधारा से आरंभ तो करता है लेकिन विचारधारा का अतिक्रमण कर जाता है।

यहां लोकतांत्रिक परंपराओं की इतनी मजबूत आधारशिला रखी गयी है कि इसमें लोकतंत्र के अलावा और कोई विचारधारा रह ही नहीं जाती। जेएनयू से जब आप निकलते हैं तो लोकतंत्र के उपासक होकर निकलते हैं। लोकतांत्रिक भावबोध में सभी किस्म के भावबोध समाहित हो जाते हें।

कहने का अर्थ यह कि जेएनएसयू हमें खुद के बारे में कम और अन्य के बारे में ज्यादा सोचने का सबक देता है। यही वजह है कि हम सब देश-विदेश की समस्याओं से ज्यादा परेशान रहते हैं और इस क्रम में दूसरी महत्वपूर्ण बात ज़ेहन में बैठ जाती है कि लोकतंत्र और लोकतांत्रिक चेतना का कोई विकल्प नहीं है। इस समूची प्रक्रिया में छात्र के मन में लोकतांत्रिक विवेक और लोकतांत्रिक भावबोध आधार बनाने लगता है। इससे यहां के छात्र की स्वतंत्र पहचान बनती है।

जेएनयूएसयू का देश की राजनीति में क्या योगदान है, इस पर बहुत कुछ कहा गया है लेकिन एक पक्ष है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। जेएनयूएसयू की राजनीतिक शिक्षा और राजनीतिक चेतना देशप्रेमी बुद्धिजीवी-नागरिक निर्मित करती है। यहां के छात्रों में अधिकांश इसी देश में विभिन्न पदों पर रहकर काम कर रहे हैं। बहुत कम संख्या में छात्र हैं जो यहां से पढ़कर विदेश में जाकर बस गए। जेएनयू वाला जिला प्रशासक से लेकर कॉलेज अध्यापक तक के पदों पर देश में काम करता हुआ मिल जाएगा। जेएनयू के बहुत कम शिक्षक हैं जो जेएनयू की नौकरी छोड़कर विदेश जाकर बस गए हों। देशप्रेम यहां के छात्रों के संस्कार में घुलामिला है। खासकर मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग के छात्रों को बौद्धिक तौर पर सम्मानित बुद्धिजीवी पद यहां का माहौल देता है।  

जेएनयू के बारे में बातें करना आसान है लेकिन जेएनयू को व्यवहार में जीना आसान नहीं है। जेएनयू की आंतरिक संरचनाएं और माहौल छात्रों की आंतरिक गांठें खोलता है। जेएऩयू में आएं और मन की न करें यह हो नहीं सकता। मन की करते समय जेएनयू में कोई झिझक या संकोच या लज्जा का अहसास नहीं होता। देश में विश्वविद्यालय अनेक हैं लेकिन मन को खोलने वाला विश्वविद्यालय यह अकेला है। मन को खोले बिना न तो स्वयं को समझ पाते हैं और न अन्य को ही समझ पाते हैं। मन खुले इसकी पहली शर्त है बात करने का माहौल बनाया जाय। बात करने वालों की पीढ़ी तैयार की जाय। जेएनयू के छात्र इसी अर्थ में बातों के धनी होते हैं।

बात करना या संवाद करना यहां के माहौल की निजी विशेषता है। आप जरा जेएनयू के बाहर निकलकर जाइए आपको संवाद का वातावरण नहीं मिलेगा। मेरी पहली शिक्षा यही हुई कि बातें करो और जिंदा रहो। संवाद नहीं तो जीवन नहीं। जेएनयूएसयू छात्रों के संवाद का सबसे बड़ा अस्त्र है।

जेएनयू का दूसरा मजेदार पहलू है यहां की प्रशासनिक संरचनाएं इन संरचनाओं में प्रशासन-प्रशासक कम और समुदायबोध ज्यादा काम करता है।

मैं जब यहां पढ़ने आया था तो अपने साथ संस्कृत पाठशाला के संस्कार लेकर आया था। सिद्धांत ज्योतिष से आचार्य करके आया था। यहां आने के पहले एसएफआई से मेरा संपर्क हो चुका था। लेकिन जब यहां आया तो एक विलक्षण माहौल देखने को मिला। अंग्रेजी एकदम नहीं जानता था। अधिकांश किताबें अंग्रेजी में हुआ करती थीं। अंग्रेजी यहां की प्राणवायु थी लेकिन मैं अंदर ही अंदर महसूस करता था कि अंग्रेजी यहां अपनी अंतिम सांसें गिन रही है।

यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि अंग्रेजीयत का जिस तरह का वर्चस्व था यहां पर, उसमें अंग्रेजी से मुक्त किसी माहौल की कल्पना करना आसान नहीं था। मेरी जिद थी मैं हिन्दी में ही लिखूँगा और बोलूँगा। मैंने चाहकर भी अंग्रेजी नहीं सीखी। मुझे अंग्रेजी से नफरत नहीं थी लेकिन परेशानियां हो रही थीं। इसके बारे में मैंने काफी दिमाग खर्च किया और पाया कि यदि छात्रसंघ की गतिविधियों में अंग्रेजी के साथ हिन्दी शामिल हो जाए तो बेहतर होगा। इससे हिन्दी के कम्युनिकेशन और प्रसार का आधार तैयार होगा। इसी मंशा से मैंने छात्रसंघ की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भागलेना आरंभ किया।

सन् 1980 में मैं संभवतः पहला कौंसलर था जो छात्रसंघ के लिए चुना गया और अंग्रेजी एकदम नहीं जानता था। यह मेरे लिए बदलाव की बेला थी साथ ही यहां छात्रसंघ और आंदोलन के लिए भी। इस परिवर्तन का आरंभ सन् 1980-81 के छात्रसंघ चुनाव के समय ही हो गया था। यहां एक परंपरा थी कि एसएफआई के सैंट्रल पैनल में जो लोग हैं वे मुख्य भाषणकर्ता होते थे और बाहर से प्रकाश कारात, डीपीटी, सीताराम येचुरी आदि। मुख्यवक्ता के रूप में एक हिन्दी स्पीकर होना जरूरी है यह बात मैंने एसएफआई में रखी और सभी कॉमरेडों ने माना कि सही है रहेगा और उसके बाद से उसी साल से मैंने कौंसलर पद के उम्मीदवार होते हुए मुख्य वक्ताओं के साथ हिन्दी में हरेक मीटिंग में भाषण दिया।

मजेदार बात यह है कि यहां ऐसे छात्रनेताओं की कमी नहीं थी जो हिन्दी न जानते हों, वे हिन्दी में भाषण भी देना जानते थे। वे अधिकांश समय अंग्रेजी में बोलते थे और कुछ समय हिन्दी में भाषण देते थे।

मैं अंग्रेजी नहीं जानता और सिर्फ हिन्दी जानता हूँ यह बात पहले मेरे संगठन ने जानी बाद में सब जान गए और यह मेरी कमजोरी नहीं शक्ति थी। मैं कह सकता हूँ हिन्दी का छात्रसंघ चुनाव में अनिवार्यभाषा के रूप में प्रयोग सर्वस्वीकृत कराने में उस दौर के छात्रों और की बड़ी भूमिका थी।

सब जानते थे कि मैं हिन्दीप्रेमी हूँ और मैं हिन्दी के अलावा कोई और भाषा नहीं जानता। बाद में इसका असर एसएफआई संगठन पर भी हुआ और मैं यहां की एसएफआई यूनिट का कई साल अध्यक्ष रहा। दो बार उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ा और हारा। अंत में सन् 1984-85 में अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और जीता। सभी स्कूलों में मुझे अपने अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा वोट मिले। यहां तक कि जिन स्कूलों में एसएफआई का आधार नहीं था वहां से भी जीता। मेरे संगठन में एक वर्ग था जिसका मानना था कि मैं चूंकि हिन्दी वक्ता हूँ इसलिए चुनाव हार जाऊँगा। लेकिन उल्टा हुआ मैं चुनाव जीत गया और यह जेएनयू में आनेवाला परिवर्तन की सूचना थी कि हिन्दी यहां की राजनीति की मुख्यभाषा है।

यह सच है हिन्दी को यहां के राजनीतिक संघर्ष की मुख्यभाषा बनाने में बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी और बाद में यह मिथ बार-बार टूटा कि छात्रों के नेतृत्व के लिए अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है।

जेएनयूएसयू का मिथ था कि यहां जो अध्यक्ष बनता था या जो एसएफआई का सचिव –अध्यक्ष होता था वो सब कुछ करता था लेकिन पीएचडी नहीं कर पाता था। मैंने छह साल में यहां से एमए, एमफिल और पीएचडी किया है और जमकर यहां राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया। मैं पहला जेएनयूएसयू प्रेसीडेंट था जिसने पीएचडी जमा की और इस मिथ को तोड़ा। इसके बाद अनेक अध्यक्षों ने पीएचडी की। हमारा नारा था पढ़ाई और लडाई। यह आज भी है। यहां से दो सेमिस्टर का कोर्सवर्क खत्म होते ही एमफिल जमा किया। कभी किसी छात्र नेता ने दो सेमीस्टर का कोर्सवर्क खत्म होते ही एमफिल जमा नहीं की थी। तीसरे सेमिस्टर के प्रथम दिन मैंने मैंने एमफिल का लघु शोध प्रबंध जमा किया। यह जेएनयू में विरल घटना थी।

जेएनयू में रहते हुए सभी छात्रों की मानवाधिकारों को लेकर जिस तरह की शिक्षा छात्रसंघ के जरिए होती है वह सबसे मूल्यवान है। दूसरी मूल्यवान चीज है अपनी चीजों से प्यार करना। जेएनयूवाले को निजी और सार्वजनिक का बोध यहीं से मिलता है। प्राइवेसी में हस्तक्षेप न करने की जितनी सुंदर शिक्षा यहां मिलती वह अन्यत्र नहीं मिलती।

जगदीश्वर चतुर्वेदी की आत्मकथा (Autobiography of Professor Jagadishwar Chaturvedi) का किंचित् संपादित अंश   

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