बुरी तरह से डरी हुई सरकार राष्ट्र के अस्तित्व पर संकट के अशनि संकेत दे रही

बुरी तरह से डरी हुई सरकार राष्ट्र के अस्तित्व पर संकट के अशनि संकेत दे रही

आरएसएस के लोगों के द्वारा ‘देशद्रोहियों’ के सफ़ाए का उत्तेजक प्रचार देश के सर्वनाश का कारण बनता हुआ नज़र आता है।

Badly scared government proving signs of crisis over the existence of the nation

सारे संकेत बता रहे हैं कि सरकार के पास दैनंदिन खर्च के लिये पैसों की कमी पड़ सकती है, अन्यथा आज के काल में मोबाइल और पेट्रोल जैसी इफ़रात में उपलब्ध और आम लोगों के रोज़मर्रा के प्रयोग तथा आर्थिक गति की मूलभूत सामग्रियों से ज्यादा से ज़्यादा कर वसूलते जाने की कल्पना भी नहीं की जाती।

अचानक ही कोरोना वायरस के रोगियों और इससे मरने वालों के परिवार को दी जाने वाली राहतों को केंद्र सरकार ने विपदा से निपटने के कदमों की अधिसूचना से चुपके से हटा लिया है।

सरकार का विदेशी मुद्रा कोष अपने चरम पर लगभग पाँच सौ बिलियन डालर पर चला गया है।

यह सब एक बुरी तरह से डरी हुई सरकार का संकेत है जो अपने आपातकाल के लिये पागल की तरह सिर्फ धन इकट्ठा कर रही है; जनता को राहत देने के और अर्थ-व्यवस्था को चंगा रखने के लिए खर्च करने से परहेज़ कर रही है।

अर्थनीति में यह मनोदशा धन को अंतत: कोरी अस्थि का रूप देने का कारण बनती है। तमाम निवेश रुक जाते हैं, जो आगे आमदनी में कमी का कारण (Loss of income) बन कर संकट को और तीव्र और गहरा करता है। इससे संकट से मुक्ति में मदद की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

पता नहीं क्यों, यह स्थिति हमें तो अजीब सी अराजकता का कारण बनती दिखाई दे रही है। ख़ास तौर पर तब और भी जब सरकार का ध्यान सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर केंद्रित है।

ऐसा ही चला तो वह समय दूर नहीं होगा, जब समूचा विपक्ष व्यापक जनता के साथ मिल कर सड़कों पर इस सरकार को हटाने की मुहिम शुरू कर देगा।

उत्तर प्रदेश में योगी और उनके मंत्रियों को आतंकवादी बताने वाला जवाबी बैनर, अलीगढ़ में मोहम्मद तारीक की भाजपा के नेता विनय वार्ष्णेय द्वारा हत्या पर जन रोष की तरह की घटनाएँ भी इसी बात का संकेत दे रही हैं।

ऐसे समय में आरएसएस के लोगों के द्वारा ‘देशद्रोहियों’ के सफ़ाए का उत्तेजक प्रचार देश के सर्वनाश का कारण बनता हुआ नज़र आता है।

अरुण माहेश्वरी

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