दलित कविता के तीन तत्व हैं- अनुभव, आक्रोश और अधिकार बोध- बजरंग बिहारी तिवारी

Bajrang Bihari Tiwari

अलवर (राजस्थान). 19 जुलाई 2020. नोबल्स स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामगढ़, अलवर (राज ऋषि भर्तृहरि मत्स्य विश्वविद्यालय, अलवर) से संबद्ध एवं भर्तृहरि टाइम्स पाक्षिक समाचार पत्र, अलवर के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय स्वरचित काव्यपाठ/मूल्यांकन ई-संगोष्ठी-3 का आयोजन किया गया, जिसका विषय ‘दलित संदर्भ’ था।

इस संगोष्ठी में देश भर से 15 युवा कवि-कवयित्रियों ने भाग लिया। संगोष्ठी में 23 राज्यों एवं 3 केंद्र शासित प्रदेशों से संभागी जुड़े।

इस संगोष्ठी के मूल्यांकनकर्ता वरिष्ठ दलित साहित्य-मर्मज्ञ एवं चिंतक दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु महाविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी थे।

कार्यक्रम के शुरुआत में डॉ. सर्वेश जैन (प्राचार्य, नोबल्स स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामगढ़, अलवर) ने अतिथि का स्वागत करते हुए कहा कि एसोसिएट प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी भारतीय दलित आंदोलन और साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। उनका परिचय देते हुए बताया कि उनकी अब तक 9 किताबें आ चुकी हैं। अभी हाल में बहुत चर्चित एवं प्रसिद्ध किताब ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’ पर आई है जो बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक है। इस किताब को सभी को पढ़ना चाहिए।

डॉ. जैन ने सभी कवि-विद्वतजनों, सहभागियों और श्रोताओं का भी स्वागत किया।

काव्य पाठ के उपरांत टिप्पणीकार बजरंग बिहारी तिवारी ने सभी युवा कवि और कवयित्रियों की कविताओं का मूल्यांकन करते हुए अपनी टिप्पणी में कहा कि जब आप बोलना शुरू करते हैं तो परिष्कार की संभावना बननी शुरू होती है। आप कहना शुरू करते हैं तो सुधार की गुंजाइश शुरू हो जाती है। चलते हुए में अभिव्यक्ति होती है, रुके हुए में नहीं। कविता में भी व्याकरण की जरूरत होती है, जो आप कह रहे हैं, वह ठीक-ठीक प्रेषित हो।

दलित आंदोलन में कविता की बड़ी भूमिका है | Poetry has a big role in the Dalit movement

उन्होंने दलित आंदोलन पर बोलते हुए कहा कि जो दलित आंदोलन है उसमें कविता की बड़ी भूमिका है, दलित कवियों की केंद्रीय भूमिका है। दलित कविता बाबासाहब अम्बेडकर के विचारों से प्रेरित है। उनकी कविता में एक्टिविज्म और रचना-प्रक्रिया दोनों चीजें साथ-साथ आती हैं। उन्होंने दलित कविता के तीन तत्व बताए- अनुभव, आक्रोश और अधिकार बोध। पहला, अनुभव- दलित कविता दलित अनुभवों से रची जाती है। दूसरा, दलित कविता का अनिवार्य तत्व है- आक्रोश। जो यातना उन्हें झेलनी पड़ी है, उस यातना को याद करके कविता में जो बातें निकलती हैं वह उनके आक्रोश से जुड़ी रहती हैं। तीसरा- अधिकार बोध जो इस जमीन पर संसाधन हैं, उस पर सबका बराबर अधिकार हो।

काव्य पाठ करने वालों में प्रदीप माथुर (अलवर, राजस्थान) ने ‘उनकी स्थिति और अधिकार’, प्रीति शर्मा (बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश) ने ‘मैं भी दुनिया के आडंबरों से निकल कर जीना चाहती हूँ’, के. कविता (पुडुचेरी) से ‘दलित-चिरकालीन पीड़ात्मक तत्व क्यों?’, डॉ. मंजुला (पटना, बिहार) ने ‘जात नहीं जज्बात हैं’, डॉ. सरिता पांडे (मध्य प्रदेश) ने ‘आशा के नवगीत लिखेंगे’, के. इंद्राणी (नमक्कल, तमिलनाडु) ने ‘क्या कुसूर क्या है हमारा’, डॉ. मंजूमणि शईकीया (असम) ने ‘वह विश्राम क्यों लेगी’, रजनीश कुमार अम्बेडकर (वर्धा, महाराष्ट्र) ने ‘आरक्षण’, जोनाली बरुवा (असम) ने ‘प्रथा जो मरती नहीं’, आकांक्षा कुरील (वर्धा, महाराष्ट्र) ने ‘इंसान’, जेडी राणा (अलवर, राजस्थान) ने ‘विश्व विज्ञान दिवस’, सुषमा पाखरे (वर्धा, महाराष्ट्र) ने ‘मां धरती की पुकार’, वैशाली बियानी (जालना, महाराष्ट्र) ने ‘स्वर्ग सा मेरा हिंदुस्तान’, अंजनी शर्मा (गुरुग्राम, हरियाणा) ने ‘मैं भी जिंदा हूं’, कमलेश भट्टाचार्य (करीमगंज, असम) ने ‘भगवान’ कविताएँ पढ़ीं।

कार्यक्रम का संचालन कादम्बरी (संपादक, भर्तृहरि टाइम्स, पाक्षिक समाचार-पत्र, अलवर) ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मंजू (सहायक आचार्य, नोबल्स स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामगढ़, अलवर) ने किया।

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