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बर्बरता किसी न्यायपूर्ण समाज का निर्माण नहीं कर सकती

बर्बरता किसी न्यायपूर्ण समाज का निर्माण नहीं कर सकती

हैदराबाद में बलात्कारियों के एनकाउंटर की पूरे देश में भारी प्रतिक्रिया (Reaction to the encounter of rapists in Hyderabad) हुई है। अभी हमारा समाज जिस प्रकार की राजनीति के जकड़बंदी में फंसा हुआ है, उसमें लगता है जैसे आदमी आदिमता के हर स्वरूप को पूजने लगा है। यह जन-उन्माद चंद लेखकों-बुद्धिजीवियों के विवेक पर भी भारी पड़ रहा है। पुलिस के द्वारा किये गये इस शुद्ध हत्या के अपराध को नाना दलीलों से उचित ठहराने की कोशिशें दिखाई दे रही है।

Delayed justice is not justice : Barbarism cannot create a just society

संदर्भ से काट कर कही जाने वाली बात कैसे अपने आशय के बिल्कुल विपरीत अर्थ देने लगती है, इसके बहुत सारे उदाहरण इसमें देखने को मिल रहे हैं। मसलन्, ‘विलंबित न्याय न्याय नहीं होता’, कह कर भी अपराधी को पकड़ कर सीधे मार डालने को सच्चा न्याय बताया जा रहा है। अर्थात्, न्याय के लिये दी जाने वाली दलील से पूरी न्याय प्रणाली की ही हत्या कर देने की सिफारिश की जा रही है।

इस घटना (Hyderabad case) पर अपनी एक प्रतिक्रिया में हमने सऊदी अरब के रियाद शहर के कटाई मैदान, chop chop square का उल्लेख करते हुए वहां के सर्वाधिकारवादी तानाशाही शासन के साथ न्याय की आदिम प्रणाली, और हिटलर की गैर-जर्मन जातियों के लोगों को मसल कर खत्म कर देने के नाजीवादी न्याय दर्शन की चर्चा की तो कुछ मित्र हमें बताने लगे कि सऊदी में इसी आदिम न्याय प्रणाली के चलते बलात्कार नहीं के बराबर होते हैं और अपराध भी काफी कम पाए जाते हैं !

न्याय की प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार की हमेशा ज़रूरत बनी रहेगी, लेकिन तत्काल न्याय का सोच ही एक आदिम सोच है। दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मानवशास्त्री लेवी स्ट्रॉस की “ ‘आदिम’ सोच और ‘सभ्य’ दिमाग” के बीच फर्क की स्थापना को ही एक प्रकार से दोहराते हुए हमने लिखा भी कि एक झटके में सब कुछ हासिल कर लेने का सोच ही आदिम सोच होता है। इसे सर्वाधिकार की आदिमता कहते हैं।

समाज-व्यवस्था के प्रति वैज्ञानिक नजरिया कहीं गहरे और स्थिर निरीक्षण की माँग करता है।

अगर सऊदी तौर-तरीक़ा ही आदर्श होता तो पूरी सभ्य दुनिया में फाँसी की सजा तक को ख़त्म कर देने की बात नहीं उठती। सारी दुनिया में chop chop squares होते। समय के साथ सऊदी में भी इसके खुले प्रदर्शन को सीमित करने की कोशिशें भी यही प्रमाणित करती है कि आदमी की खुली कटाई सजा का वीभत्स रूप है, आदर्श रूप नहीं। वैसे क्रुसीफिकेशन (Crucifixion,) आज भी वहां सजा की एक मान्य प्रणाली है।

न्याय और दंड के स्वरूप किसी भी समाज व्यवस्था के सच को प्रतिबिंबित करते हैं और वे उस समाज में आदमी के स्वातंत्र्य के स्तर को प्रभावित करते हैं। यह आपको तय करना है कि आपको ग़ुलाम आज्ञाकारी नागरिक चाहिए या स्वतंत्र-चेता मनुष्य। ग़ुलाम नागरिक अपनी रचनात्मकता को खो कर अंतत: राष्ट्र निर्माण के काम में अपना उचित योगदान करने लायक़ नागरिक साबित नहीं होता है। प्रकारांतर से वह राष्ट्र की प्रगति के रास्ते में एक बाधा ही होता है।

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लेवी स्ट्रॉस ने अपने विश्लेषण (Levi strauss analysis) में यह भी बताया है कि आदिमता महज आदमी के शरीर की मूलभूत जरूरतों, मसलन् खाद्य और सेक्स आदि से जुड़ी चीज नहीं होती है। ‘टोटेमवाद और जंगली दिमाग’ लेख में उन्होंने यह दिखाया था कि “आदिम जरूरतों के अधीन रहने वाले इन लोगों में भी स्वयं से परे जाकर सोचने की क्षमता होती है। अपने इर्द-गिर्द के संसार, उसकी प्रकृति और अपने समाज को जानने की उनकी भी कोशिश रहती है। यहां तक कि इसके लिये वे बिल्कुल दर्शनशास्त्रियों की तरह बौद्धिक साधनों, अथवा एक हद तक वैज्ञानिक उपायों का भी प्रयोग करते हैं। …लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यह वैज्ञानिक चिंतन के समकक्ष होता है।…यह उससे सिर्फ इसीलिये अलग होता है क्योंकि इसका लक्ष्य उद्देश्य बिल्कुल सरल तरीके न्यूनतम कोशिश से पूरे ब्रह्मांड की न सिर्फ एक सामान्य समझ बल्कि संपूर्ण समझ कायम करने की होती है। अर्थात् वह सोचने का वह तरीका है जिसमें यह मान कर चला जाता है कि यदि आप हर चीज को नहीं समझते है तो आप किसी चीज की व्याख्या मत कीजिए। वैज्ञानिक सोच जो करता है, यह उसके पूरी तरह से विरुद्ध है। वैज्ञानिक चिंतन कदम दर कदम चलता है, हर सीमित परिघटना की व्याख्या की कोशिश करता है, तब आगे की दूसरी परिघटना को लेता है।…इसीलिये बर्बर दिमाग की सर्वाधिकारवादी महत्वाकांक्षाएं वैज्ञानित चिंतन की प्रणालियों से बहुत अलग होती है। यद्यपि सबसे बड़ा फर्क यह होता है कि यह महत्वाकांक्षा सफल नहीं होती है।”

The brutality of capturing and shooting criminals is completely contrary to civilized methods of justice

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

कहना न होगा, अपराधियों को पकड़ कर गोली मार देने की बर्बरता न्याय के सभ्य तौर-तरीकों के सर्वथा विपरीत है। यह कभी भी किसी न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में सफल नहीं हो सकती है। दुनिया में राजशाही का इतिहास बर्बर नादिरशाही संस्कृति का भी इतिहास रहा है जब जनता में खून के खेल का उन्माद भरा जाता था। इसका सबसे जंगली रूप देखना हो तो नेटफ्लिक्स के ‘स्पार्टकस’ सीरियल को देख लीजिए। कैसे साधारण लोग और राजघरानों के संभ्रांतजन साथ-साथ आदमी के शरीर से निकलने वाले खून के फ़व्वारों का आनंद लिया करते थे। कैसे मार्कोपोलो सीरियल में कुबलाई खान लोगों की कतारबद्ध कटाई करके उनके अंगों को कढ़ाई में उनके ही खून में उबाला करता था।

आधुनिक तकनीक के युग में राजशाही का नया रूप नाजीवाद और फासीवाद भी राष्ट्रवाद के नाम पर ऐसे ही खूनी समाज का निर्माण करता है।

सभी प्रकार के बर्बर शासन तलवारों और बम के गोलों से मनुष्यों के विषयों के निपटारे पर यक़ीन करते रहे हैं।

जनतंत्र इसी बर्बरता का सभ्य प्रत्युत्तर है। तलवार के बजाय क़ानून के शासन की व्यवस्था है। राजा की परम गुलामी की तुलना में नागरिक की स्वतंत्रता और उसे अधिकार की व्यवस्था है।

अरुण माहेश्वरी

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