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बस्तर का दण्डकारण्य : चर्चित धरोहर भोंगापाल

भारत के उत्तरी एवं दक्षिणी भागों को जोड़ने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाता आया है बस्तर का दण्डकारण्य

Bastar’s Dandakaranya has played an important role in connecting the northern and southern parts of India.

बौद्ध चैत्यगृह तथा मंदिरों के भग्नावशेष बस्तर में बौद्ध भिक्षुओं के आवागमन तथा निवास के प्रमाणों को पुष्टि प्रदान करते हैं। बस्तर का दण्डकारण्य (Bastar Dandakaranya) भारत के उत्तरी एवं दक्षिणी भागों को जोड़ने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाता आया है। बस्तर की इन आदिम संस्कृतियों में बौद्ध विहार एवं प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेषों का प्राप्त होना हमें यह बताता है कि इस घने वन प्रांत के क्षेत्र में भी 5वीं, 6वीं शताब्दी ईस्वी में स्थापत्य कला (Architecture) विकसित रही होगी। चैत्य एवं मंदिरों के भग्नावशेष न केवल हमारी अमूल्य पुरातात्विक धरोहर (Archaeological heritage) है अपितु इतिहास के शोध छात्रों के लिए गहन शोध का विषय है।

बस्तर चीनकाल से ही संस्कृति और चेतना का केन्द्र रहा है

Bastar has been the center of culture and consciousness since China.

चीनकाल से ही बस्तर संस्कृति और चेतना का केन्द्र रहा है। यहां पर्यटन की दृष्टि से विविधतापूर्ण स्थल है जो नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर है। रहस्य और रोमांच का सृजन करती गुफायें अद्भुत आकर्षण के साथ अपनी ओर खींचती हैं। यहां न जाने कितने प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के अवशेष बिखरे पड़े हैं जो पुरातत्व और इतिहास (Archeology and History) में रुचि रखने वाले शोधार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

बस्तर की नैसर्गिक सुंदरता हमें पचमढ़ी, नैनीताल, मसूरी और कुल्लु मनाली को याद दिलाती है। वन्य प्रणियों का स्वच्छ विचरण भी वन सौंदर्य का वर्द्धन करता है। पुरातत्व की दृष्टि से न जाने कितने प्राचीन मंदिर हैं जो शोध को एक नई दिशा प्रदान करते हैं। ऐसे ही स्थलों में से एक महत्वपूर्ण स्थल है – भोंगापाल। जहां खुदाई में बौद्धकालीन चैत्य मंदिर, सप्त माह का मंदिर और शिव मंदिर के भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं।

यह स्थल गहन वनाच्छादित और दुर्गम है। इस स्थल का भ्रमण करने से ज्ञात होता है कि बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार सुदूर अंचल तक रहा होगा। दुर्गम स्थल होने के कारण स्वाभाविक ही पुरातत्ववेताओं का ध्यान इसकी ओर न गया हो। हल्वी में भोंगा का अर्थ छिद्र, भग्न या खंडित होता है। भोंगा अर्थात जो प्रतिमा खंडित हो, भग्न हो उसे भोंगरा कहते हैं। पाल का अर्थ ग्राम या समूह होता है। अनेक भारतीय भाषाओं में अभी भी पाली या पल्ली ग्राम या समूह का बोधक माना जाता है।

भोंगापाल कहां स्थित है | Where is Bhongapal located

बस्तर जिले के केशकाल और कोंडागांव के मध्य स्थित फरसगांव से 16 किलोमीटर पश्चिम में बड़े डोंगर से आगे ग्राम भोंगापाल स्थित है। भोंगापाल तक गोड़मा कोडपाड और चिंगनार के रास्ते पहुंचा जा सकता है। दूसरा मार्ग कोंडागांव-नारायणपुर मार्ग पर स्थित बैनूर होकर है। भोंगापाल से तीन किलोमीटर दूर तमुर्रा नदी के तट पर एक टीले में विशाल चैत्य मंदिर सप्तमातृका मंदिर और शिव मंदिर के भग्न अवशेष प्रापत हुए हैं। बौद्ध प्रतिमा टीले को यहां के स्थानीय लोग डोकरा बाबा टीला के नाम से भी जानते हैं। सप्त माहका टीला या रानी टीला, बौद्ध प्रतिमा टीला से 200 गज की दूरी पर स्थित है। इसके अतिरिक्त यहां एक बड़ा शिव मंदिर एवं अन्य प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेष हैं, किन्तु उनकी कोई प्रतिमा प्राप्त नहीं हुई है। यहां से प्राप्त बौद्ध चैत्य तथा प्राचीन मंदिर 5-6वीं शताब्दी के हैं।

चैत्य मंदिर का निर्माण एक ऊंचे चतूबरे पर किया गया है। मंदिर पूर्वाभिमुखी है। इसकी लंबाई पूर्व-पश्चिम में 36 मीटर तथा चौड़ाई उत्तर-दक्षिण में 34 मीटर है। इस चबूतरे के मंदिर के भग्नावशेषों का पिछला हिस्सा अर्द्ध-वृत्ताकार है जिस पर मंदिर का गर्भगृह, प्रदक्षिणा पथ, मंडप तथ देवपीठिका के भग्नावशेष हैं। यह कहा जा सकता है कि संभवत: यह बौद्ध भिक्षुओं का निवासस्थल रहा होगा। खुदाई से पहले यहां एक विशाल बौद्ध प्रतिमा प्राप्त हुई थी। यह प्रतिमा प्राचीन होने के साथ-साथ खंडित अवस्था में है। चैत्य मंदिर ईटों से निर्मित है और यह छत्तीसगढ़ का प्रथम व एकमात्र चैत्य मंदिर है जो महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर है।

यहां के स्थानीय सिरहा लोग इस प्राप्त बौद्ध प्रतिमा को तंत्र विद्या के देवता गांडादेव के नाम से संबोधित करते हैं तथा सप्तमातृका को गांडादेव की पत्नियां मानते हैं। भोंगापाल में प्राप्त द्विभुजी बुद्ध की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में है। दोनों हाथ खंडित है। उस्णीस, अर्द्धोन्मीलित नेत्र, विशाल ठोस प्रभामंडल और सिकुड़ा हुआ पेट है। मुखमंडल सौम्य अंडाकार है।

6वीं शताब्दी ईस्वी का माना जाना है मंदिर का निर्माणकाल

सप्तमातृका मंदिर के भग्नावशेष चैत्य मंदिर टीले से दो सौ गज की दूरी पर मिलते हैं। ईंटों से निर्मित एक मंदिर पश्चिमाभिमुखी है। इस मंदिर में मण्डप, गर्भगृह तथा देव पीठिका के दर्शन होते हैं। टीले के सामने एक शिलाखंड पर सात देवियां तथा एक देव मूर्ति स्थापित हैं। ये सात देवी मूर्तियां- ब्राह्मणी, वैष्णवी, नागेश्वरी, चामुण्डा, इंद्राणी, कौमारी, वाराही तथा नरसिंह व देव मूर्ति स्कंध की दिखाई देती हैं। चामुण्डा की मूर्ति विशाल होने के साथ-साथ जटामुकुट धारण किये है। सभी देवी मूर्तियां स्थानक मुद्रा में उत्कीर्ण है तथा प्रतिमा के हाथों में शिशु का अंकन हैं। द्विभुजी प्रतिमायें पैरों में कड़े कानों में कुण्डल धारण किए हैं। मंदिर के गर्भगृह से खड्गधारित किसी प्रतिमा का भुजाखंड भी प्राप्त हुआ है। इस मंदिर का समय 5वीं शताब्दी ईस्वी माना जाता है।

इसके उत्तरी भाग में एक अन्य अत्यंत प्रचीन पूर्वाभिमुखी मंदिर के भग्नावशेष प्राप्त होते हैं जो हमें यह बताते हैं कि यह मंदिर ईटों से निर्मित था, किन्तु यहां कोई प्रतिमा नहीं मिली है। प्राचीन टीले के दक्षिणी भाग में ईटों से निर्मित एक अन्य पूर्वाभिमुखी मंदिर है, जिसे यहां के लोग बड़े शिव मंदिर के नाम से पुकारते हैं। इस मंदिर की लंबाई 10 मीटर तथा चौड़ाई 7.5 मीटर है। इस मंदिर में गर्भगृह है, गर्भगृह में जलहरी युक्त शिवलिंग है। जलहरी धरातल पर स्थित है। शिवलिंग में रेखांकन दिखाई देता है। मंदिर का निर्माण काल 6वी शताब्दी ईस्वी माना गया है।

टीले के उत्तरी भाग में ईटों से निर्मित एक अन्य पश्चिमाभिमुखी छोटे शिव मंदिर के भग्नावशेष प्राप्त हुए है। इस मंदिर में अष्टकोणीय विष्णु भाग तथा ऊपर रुद्र भाग है। मंदिर की स्थापत्य शैली को देखने से ज्ञात होता है कि मंदिर 6वीं शताब्दी ईस्वी के पूर्व का है।

बौद्ध चैत्यगृह तथा मंदिरों के भग्नावशेष बस्तर में बौद्ध भिक्षुओं के आवागमन तथा निवास के प्रमाणों को पुष्टि प्रदान करते हैं। बस्तर का दण्डकारण्य भारत के उत्तरी एवं दक्षिणी भागों को जोड़ने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाता आया है।

बस्तर की इन आदिम संस्कृतियों में बौद्ध विहार एवं प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेषों का प्राप्त होना हमें यह बताता है कि इस घने वन प्रांतर के क्षेत्र में भी 5वीं, 6वीं शताब्दी ईस्वी में स्थापत्य कला विकसित रही होगी। चैत्य एवं मंदिरों के भग्नावशेष न केवल हमारी अमूल्य पुरातात्विक धरोहर है अपितु इतिहास के शोध छात्रों के लिए गहन शोध का विषय है।

अंत में, इतिहास तथा पुरातत्व में रुचि रखने वाले शोधार्थियों के लिए भोंगापाल के ये पुरातात्विक धरोहर आदर्श पर्यटनस्थल के रूप में दर्शनीय है, यहां नैसगिक सौंदर्य के साथ-साथ कल-कल प्रवाहित होती पहाड़ी नदी तमूरा और उसके निकट की पर्वत शृंखलाएं एवं सघन वन किसी भी आने वाले का मन मोह लेते हैं।

कैसे पहुंचें भोंगापाल | How to reach Bhongapal  Village

भोंगापाल का मार्ग अपेक्षाकृत बीहड़ है, परन्तु कच्ची सडक़ मार्ग होने के कारण दोपहिया या चार पहिया वाहन से आसानी से यहां पहुंचा जा सकता है। ग्रीष्म ऋतु या शीत ऋतु पर्यटन के लिए उपयुक्त है। भोंगापाल के वन क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहां विश्राम एवं भोजन व्यवस्था का अभाव है। भोंगापाल का चैत्य तथा अन्य मंदिर आदर्श शोध स्थल है। राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा इस स्थल को संरक्षण प्रदान है।

डॉ. मोना जैन

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