क्योंकि मार्क्सवादी भी सवर्णवादी हैं ! इसीलिए मोदी देश बेच पा रहे हैं

एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  

Because Marxists are also upper-caste!

Savarnism is many times more frightening and barbaric than capitalism in India.

फेसबुक पर रह-रह कर ऐसे कुछ पोस्ट दिख जाते हैं, जिन पर विस्तार से राय दिये बिना रहा नहीं जाता। ऐसा ही एक पोस्ट मुझे 21 मार्च देखने को मिला। लिखेने वाले एक रिटायर्ड प्रोफेसर हैं, जो विचार से मार्क्सवादी प्रतीत हो रहे हैं। उन्होने लिखा है-: ‘वामपंथ मरा नहीं है, मर ही नहीं सकता। यह समता स्वतंत्रता इंसाफ़ समाजवाद की राह है। उठना गिरना सम्हलना सब चलेगा। पूँजीवाद एक विकृत अमानवीय शोषण आधारित व्यवस्था है। वहाँ मनुष्य नहीं मुनाफा तय करता है सब कुछ।अपनी समझ पर खुद कुल्हाड़ी न मारें।विशलेषण करें।सीखें लेकिन सच समझ कर भी झूठ से उम्मीद न करें।‘

इस पोस्ट मैंने फेसबुक पर कमेन्ट लिखा, किन्तु संतुष्टि न मिल पाने के कारण उस पर यह लेख  लिख रहा हूँ।

भारत में पूंजीवाद से भी कई गुना भयावह व बर्बर है सवर्णवाद। हिन्दू ईश्वर और धर्म-शास्त्रों के सौजन्य से सवर्णवादी शक्ति के समस्त स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक ) पर सम्पूर्ण कब्जा कायम करना अपना दैविक अधिकार(divine rights) समझते हैं। इस कारण ही उनकी नजरों में दलित, आदिवासी और पिछड़े दैविक सर्वस्व-हारा (divine proletariats) हैं, जिनका जन्म सिर्फ उनकी निःशुल्क सेवा के लिए हुआ है। हिन्दू ईश्वर-शास्त्रों द्वारा दैविक गुलाम (divine slaves ) में तब्दील किए गए बहुजनों को शक्ति-सम्पन्न करने की जरूरत हिंदुओं के प्रभुवर्ग के किसी भी साधु-संत, लेखक-पत्रकार- राजनेता ने कभी महसूस ही नहीं की। इस मामले में धर्म को अफीम घोषित करने वाले मार्क्सवादी भी अपवाद न बन सके।

मार्क्सवादियों ने अमीर् – गरीब का दो वर्ग बनाने के चक्कर मे देश के दैविक सर्वस्वहाराओं की समस्या को कभी अलग से एड्रेस करने का प्रयास ही नहीं किया।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि गाँधीवादियों और राष्ट्रवादियों की भांति मार्क्सवादियों ने भी डिवाइन स्लेव्स बहुजनों को संपदा-संसाधनों में उनका हक दिलाने में कोई खास रुचि नहीं ली, बल्कि मेरा तो यहाँ तक मानना है कि बहुजन-हित मे मार्क्सवादियों का रिकॉर्ड उनसे बहुत बेहतर नहीं है।

बहरहाल प्रभुवर्ग के लेखक-पत्रकार-नेतृत्व द्वारा बहुजनों की उपेक्षा परिणाम यह है कि अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों, न्यायपालिका सहित राजनीति की समस्त संस्थाओं, प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षण संस्थाओं, आर्थिक शक्ति के समतुल्य धार्मिक सेक्टर पर सवर्णवादियों का औसतन 80 प्रतिशत कब्जा हो चुका है, जिसे 90 प्रतिशत तक पहुंचाने के लिए मोदी की हिन्दुत्ववादी सरकार अपनी तानाशाही सत्ता का सर्वशक्ति से इस्तेमाल किए जा रही है। इस सरकार की पूरी कोशिश है कि बहुजन उस स्टेज मे पहुँच जाएँ जिस स्टेज मे अंबेडकर के उदय पूर्व दैविक सर्वस्व-हारा थे। हिन्दू धर्म शास्त्रों और ईश्वर द्वारा शक्ति के स्रोतो से बहिष्कृत शूद्रातिशूद्र आज आंबेडकर रचित संविधान के ज़ोर से डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर,लेखक राजनेता इत्यादि बनकर हिन्दू धर्म और 33 करोड़ देवी-देवताओं को भ्रांत प्रमाणित कर रहे हैं।

इस स्थिति का भान संघ प्रशिक्षित प्रधानमंत्री को है इसलिए वह हिन्दू धर्म-संस्कृति को पुनःप्रतिष्ठित करने के लिए ऐसी नीतियाँ अख़्तियार कर रहे हैं, जिससे हिन्दू ईश्वर के जघन्य अंग(पैर) से जन्मे लोग पुनः शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत होकर उस स्थिति मे पहुँच जाएँ जिस स्थिति में  ‘मनु लॉं’ के प्रभावी दौर में रहे। इस कारण ही वह उन समस्त क्षेत्रों को निजी हाथों मे देने के लिए इस हद तक आमादा दिख रहे है कि ट्रम्प के पिछले भारत दौरे के दौरान एक अमेरिकी सांसद ने यह उद्गार व्यक्त कर दिया, ’लगता है मोदी भारत को बेचना चाहते हैं, अगर ऐसा है तो मैं खरीदने के लिए तैयार हूँ।‘

बहरहाल वर्तमान हिन्दुत्ववादी सरकार हिन्दू धर्म और उसके 33 कोटि देवी-देवताओं की  प्रतिष्ठा के पुनरुद्धार के लिए जो नीतियाँ अख़्तियार कर रही है, उससे शूद्रातिशूद्रों का जीवन भले ही नारकीय बनने जा रहा हो, किन्तु उनकी वर्तमान दुरावस्था ने भारत में वर्ग – संघर्ष का अभूतपूर्व मंच सजा दिया है,

आज हिन्दुत्ववादी सरकार मनुवादी नीतियों से सवर्णवादियों का जिस पैमाने पर शक्ति के स्रोतों पर कब्जा कायम हुआ है, उसकी मिसाल मिलनी दुर्लभ है। आज की तारीख में वैसे तो दुनिया के प्राचीनयुगीन किसी भी सुविधाभोगी वर्ग का धरा पर वजूद नहीं है पर, जिंनका वजूद है उनमें किसी का भारत के सवर्णवादियों जैसा शक्ति के स्रोतों पर बेपनाह कब्जा नहीं है। लेकिन अपनी स्वार्थपरता के तहत सवर्णवादियों ने जिस पैमाने पर सर्वत्र कब्जा कायम किया है,उससे क्रान्ति का ईंधन जुटाने वाली सापेक्षिक वंचना (Relative deprivation) इस लेवेल पर पहुँच गयी है, जिसकी मिसाल ढूँढने की लिए कई घंटे आपको लाइब्रेरियों मे देने होंगे। सापेक्षिक वंचना को तुंग पर पहुंचाने का इतना समान न तो फ्रेच रेवोल्यूशन पूर्व मेरी आन्तोनेत के शासन मे था और न ही लेनिन की वोल्सेविक क्रांति पूर्व जारशाही में।

आज पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें  80 -90  प्रतिशत फ्लैट्स सवर्णवादियों   के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दुकानें इन्हीं की हैं. चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाडियां इन्हीं की होती हैं. देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल्स प्राय इन्ही के हैं. फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद – विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है. मंत्रिमंडलों मंत्रीमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं. शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सुविधाभोगी वर्ग जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में नहीं है। जिन-जिन देशों क्रांतियाँ हुई है, क्या वहाँ शासक वर्गों का शक्ति के स्रोतों इतना वर्चस्व रहा ? शायद कहीं नहीं।

बहरहाल भारत मे सवर्णवादियों की बेहिसाब स्वार्थपरता से क्रांति लायक जो हालात बने हैं, उसे बुलेट नहीं बैलेट के ज़ोर से बड़ी आसानी से अंजाम दिया जा सकता है। इसमें बुलेट का इस्तेमाल,हालात सवर्णवादियों के पक्ष में कर देगा।

लोकतान्त्रिक देश भारत में बुलेट के इस्तेमाल की रत्ती भर भी जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि डेमोक्रेसी में सत्ता परिवर्तन का निर्णायक तत्व  संख्या-बल होता है और मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में वंचितों, मार्क्सवादीय भाषा में सर्वहाराओं का इतना बड़ा संख्या-बल कभी वजूद मे आया नहीं, जो वर्तमान भारत में दिख रहा है। ऐसे में जरूरत इस संख्या-बल को सापेक्षिक वंचना के अहसास से लैस करने की है।

इस काम में गांधीवादियों और राष्ट्रवादियों से कोई प्रत्याशा नहीं, क्योंकि ये विशुद्ध सवर्णवादी हैं। प्रत्याशा वंचितों के आर्थिक कष्टों के निवारण मे न्यूनतम रुचि लेने वाले बहुजनवादियों से भी नहीं की जा सकती, क्योंकि इनकी प्राथमिकता में 1-9 तक जन्मजात वंचितों का आर्थिक बदलाव नहीं, सांस्कृतिक बदलाव है। हाँ, मार्क्सवादियों से प्रत्याशा जरूर की जा सकती है, क्योंकि वे उस मार्क्स के अनुसरणकारी हैं, जिसमें आर्थिक समानीकरण की न सिर्फ अपार चाह रही, बल्कि इसके लिए उसने वर्ग-संघर्ष का निर्भूल क्रांतिकारी सूत्र तक रचा। लेकिन यह तथ्य है कि इतिहास ने भारत में आज क्रान्ति का जो अभूतपूर्व अवसर सुलभ कराया है, उसके सद्व्यवहार के लिए नरम-गरम कई भागों मे बंटे एक भी मार्क्सवादी सामने नहीं आए हैं। वे भयावह सवर्णवादी वर्चस्व की पूर्णतया अनदेखी कर, सिर्फ पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष चलाने की बौद्धिक जुगाली करते रहते हैं।

लेकिन आज जबकि दुनिया के एकमात्र जाति समाज भारत में वर्ण- व्यवस्था का जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग शक्ति के समस्त स्रोतों पर बेहिसाब एकाधिकार जमाकर क्रांति का अभूतपूर्व मंच सजा दिया है, तब क्रान्ति के पर्याय भारत के मार्क्सवादी उनकी बात भूलकर आज भी उस पूंजीवाद को प्रधान शत्रु घोषित कर रहे हैं, जिस पूंजीवाद का लाल कार्पेट बिछाकर स्वागत करने में ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे बाघा-बाघा मार्क्सवादियों ने कोई कमी नहीं की। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि सवर्णवादियों को छोड़कर आज भी भारत के मार्क्सवादी पूंजीवाद को निशाने पर लेने में क्यों तत्पर रहते हैं? ऐसा इसलिए कि भारत के मार्क्सवादी भी सवर्णवादी हैं।

-एच एल दुसाध

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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