बनारस बदल गया है, लोग भी बदल गए हैं

केशव शरण

Benares has changed, people have also changed

आज बनारस के वरिष्ठ कवि केशव शरण जी का फोन आया। प्रेरणा अंशु के जून अंक में लॉकडाउन पर उनकी कविताएं (Keshav Sharan’s poems on lockdown) छपी हैं। लेखकीय प्रतियां मिलते ही फोन किया। फिर लम्बी बात हुई।

उनसे पता चला कि केडी यादव अब बनारस में नहीं हैं। वे कहां गए केशवजी को नहीं मालूम।

वे इलाहाबाद से हमारे मित्र हैं। यूनिवर्सिटी में वे पीएसओ में सक्रिय थे। सांस्कृतिक गतिविधियों में भी।

2001 में मित्र राजीव कुमार की फ़िल्म की शूटिंग में नैनीताल के सारे रंगकर्मी फिल्म वाले बनारस में जुटे तो फ़िल्म यूनिट के वे लोकल मैनेजर थे। मैंने फ़िल्म की स्क्रिप्ट, सम्वाद और स्क्रीनप्ले लिखी थी। शूटिंग के दौरान काशीनाथ सिंह जी और ज्ञानेंद्र पति भी आये थे। निर्मल जोशी भी। तब आंच की शूटिंग भी बनारस में चल रही थी। नाना पाटेकर और रघुवीर यादव भी वहीं थे।

फ़िल्म में गिरबल्लभ यानी गिरदा और ज़हूर आलम की मुख्य भूमिकाएं थीं। सत्यजीत रे की फ़िल्म कंचनजंघा की अभिनेत्री अलकनन्दा जी आचार्य की पत्नी की भूमिका में थी। बांग्ला अभिनेता रविकिशन, अभिनेत्रियां स्मिता चटर्जी और अरुंधति डे के साथ इदरीस मल्लिक, केडी शर्मा, नीरज शाह और युगमंच के नए पुराने कलाकार थे। टीन एजर बांग्ला कवि और फिल्मकार अरफूज़ सहायक निदेशक थे।

हमारे साथ बनारस के रंगकर्मी भी थे।

शूटिंग के दौरान बहुत मज़ा आया। हम लोग नैनीताल के बाद पहली बार बनारस में एक साथ थे। आंच की शूटिंग के बीच निर्मल जोशी भी आ जाते थे। गिरदा और निर्मल आज हमारे बीच नही हैं।

गिरदा पहलीबार फ़िल्म कर रहे थे। इदरीस की फ़िल्म चांदनी हिट हो चुकी थी और ज़हूर फिल्में कर चुके थे। जबरदस्त रंगकर्मी और एंकर गिरदा का आत्मविश्वास जवाब दे रहा था। उनकी हम सभी मिलकर खिंचाई भी खूब कर रहे थे और उनके सम्मान में पार्टी भी। रोज़ नए साथी आ धमकते थे और मुझे और राजीव को उनके लिए स्पेस बनाने के लिए पटकथा और सम्वाद में बदलाव करने होते थे।

ज़हूर आलम भी एकबार डगमगा गए। फ़िल्म में मुझे बनारस का नाई बनकर उनके बाल काटने थे। मेरी कैंची इधर-उधर चल रही थी। अभिनय भूलकर ज़हूर चिल्ला रहे थे, साले, मेरे कान मत काट देना। उनके कान की खातिर बार-बार कट और फुटेज खराब।

फ़िल्म के अंतिम दृश्य में आचार्य जी के शिष्य को उनकी वसीयत के मुताबिक पिंजड़े से तोते को उड़ाना था। तोता उड़ा नही। जबर्दस्ती गिरदा ने उड़ाना चाहा, हाथ से उसे निकलने की कोशिश की तो तोता ने गिरदा की उंगलियों को चोंच से लहूलुहान कर दिया। गिर्दा जैसे दिलेर आदमी की हालत देखने लायक थी।

ज़िंदगी में गुज़रा हुआ वक्त कभी लौटता नहीं है। फिर भी हम लोगों ने बनारस में एकबार फिर सत्तर का दशक दोबारा जिया था। राजीव कुमार के सौजन्य से, जो छात्र जीवन में युगमंच से जुड़े थे।

तब सांची के रास्ते केडी यादव के कार्यस्थल को देखने का मौका मिला। वे युवा कलाकारों को लेकर कम्मुन चला रहे थे। उन्होने गंगा के घाट पर फ़िल्म के बेहतरीन लोकेशन तय करने में हमारी मदद की।

यादव के निधन के बाद अरसा बीत गया। खबर आज मिली।

केशव जी से बनारस के साहित्यिक सांस्कृतिक परिदृश्य (Literary cultural scenario of Banaras) पर भी बातें हुईं।

इसी गंगा घाट पर अस्सी से चलकर दशाश्वमेध घाट पर ज्ञानेंद्र पति के साथ गंगा आरती देखने के बाद घाट पर और गंगा की गोद में नाव पर गंगाघाट पर उनकी कविताएं सुनी। हम फ़िल्म के लोकेशन से करीब तीन किमी पैदल चलकर वहां पहुंचे थे। नाव पर बनारस के हिंदी उर्दू के कवि शायर भी साथ थे, जिन्होंने अपनी रचनाएँ सुनाईं।

केशव जी ने बताया, वह बनारस बदल गया है। लोग भी बदल गए है।

ऐसा कोलकाता में भी हुआ है।

इलाहाबाद में भी ऐसा ही हुआ होगा,सोचकर कांप जाता हूँ। 70 के दशक के उन सभी लोगों को नमन, जो जनता के लिए लिखते थे और सत्ता की राजनीति या निजी लाभ नुकसान की नहीं सोचते थे।

फिर भी कुछ लोग सर्वत्र हैं।

हम दिनेशपुर से प्रेरणा अंशु के मोर्चे से उन सभी को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वक्त की चुनौतियों का सामना कर सकें।

पलाश विश्वास

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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