Home » Latest » चौर्योन्माद के डीएनए वालों के घोटाले का नया पासवर्ड ; मंदिर
Badal saroj Narendra Modi

चौर्योन्माद के डीएनए वालों के घोटाले का नया पासवर्ड ; मंदिर

राम मंदिर घोटाले की भागवत कथा

घोटाले के अयोध्या काण्ड की खबर पुरानी हो गयी है मगर बटुकों की भागवत कथा अभी शुरू ही हुयी है इसलिए दोहराने की आवश्यकता बनी हुयी है।

जिसे बिना किसी शक के आजाद भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक, न्यायिक घोटाला और इतिहास का पिंडदान कहा जा सकता है वह; अयोध्या में कथित रूप से रामजन्मभूमि बताई जाने वाली जगह पर बनाया जाने वाला राम मंदिर अभी बनना शुरू भी नहीं हुआ था कि स्वयंभू रामभक्त पूरे प्राणपण के साथ उसे एक ऐतिहासिक आर्थिक घोटाला बनाने में भी जुट गए।

दस्तावेजी सबूतों के साथ खबर आयी है कि मंदिर क्षेत्र के लिए बने राम जन्म भूमि न्यास द्वारा खरीदी गयी जमीन की कीमत सिर्फ 5 मिनट के अंदर 2 करोड़ से बढ़कर 18.5 करोड़ रूपये हो गयी। जमीन के दामों में इतनी तेजी यकीनन चमत्कारी थी। दुनिया में भावों के इतनी जल्दी इतने भारी उछलने की कोई दूसरी मिसाल नहीं थी।

घटना का संक्षिप्त सार कुछ यूँ है ।

मार्च की 18 तारीख की शाम 7 बजकर 10 मिनट पर कुसुम और हरीश पाठक ने 12080 वर्ग मीटर जमीन रविमोहन तिवारी और सुलतान अंसारी को दो करोड़ रूपये में बेची। इस सौदे के गवाह बने अयोध्या के महापौर और पक्के स्वयंसेवक ऋषिकेश उपाध्याय और कोई अनिल मिश्रा। सौदे पर की गयी दस्तखतों की स्याही अभी ढंग से सूखी भी नहीं होगी कि इसी 18 मार्च की इसी शाम ठीक 5 मिनट बाद इसी जमीन को रविमोहन तिवारी और सुलतान अंसारी ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट के 18 करोड़ 50 लाख में बेच दिया। इसके भी गवाह वही दोनों थे। इतनी तेज रफ़्तार के साथ इतने सारे नोट किसी एटीएम से निकलना तो दूर रहा, 5 मिनट में इतनी करेन्सी तो बैंक नोट छापने वाली आधुनिकतम मशीन भी नहीं छाप सकती।

जैसे ही यह असाधारण घोटाला उजागर हुआ वैसे ही पूरी संघी ब्रिगेड और उनका पारस्परिक पालन पोषण करने वाला कारपोरेट मीडिया पूरे जी जान के साथ एग्रीमेंट – सौदे – बैनामे – बिक्रीनामे के नाम पर न्यास के संघी सचिव चम्पत राय द्वारा बनाई जा रही बचाबों-बहानों की जलेबियों की हाट लगाकर बैठ गया।

इस बीच जमीन के बढ़े बाजार मूल्य के दावे किये जाने लगे। मगर इनकी सफाई और स्पष्टीकरण के झूठ की पोल खुद न्यास द्वारा इन्हीं कुसुम और हरीश पाठक से खरीदी गयी 10370 वर्ग मीटर को 8 करोड़ रुपयों में खरीदे जाने के दस्तावेजों ने खोल कर रख दी। खासतौर से तब जब कि पहले वाले सौदे में खरीदी गयी जमीन दूर दराज के इलाके में थी जबकि उससे आधे से भी कम पर खरीदी गयी लगभग उतनी ही यह भूमि सड़क किनारे एकदम मौके की जगह पर थी।

राम के नाम पर जनता से जुटाए गए चंदे में सेंध लगाकर उसे चम्पत करने वाले इसके बाद चुप्प लगाए बैठे हैं – बहुत मुमकिन है कि अगले किसी ज्यादा बड़े दांव के सौदे कर रहे हों।

इसी बीच यह भी दावा किया गया है कि “मंदिर मस्जिद बैर कराते – मेल कराता घोटाला” की मिसाल पेश करने वाले तिवारी और अंसारी ने जो जमीन राम जन्मभूमि न्यास को बेची है वह दरअसल वक़्फ़ की संपत्ति है। मतलब यह कि भाई लोगों को जिसे बेचने का उन्हें कोई अधिकार ही नहीं था उन्होंने वह जमीन बेच मारी।

 यूँ तो “छल अनन्त घोटाला अनन्ता” वाले इस संघ गिरोह के इस तरह के कारनामों से पोथी-पत्राएं भरी पड़ी हैं, लेकिन शंकालु से शंकालु लोगों को भी लगता था कि ये ताबूत से राफेल तक, बैंक बेचने से सारी सार्वजनिक सम्पत्ति का भट्टा बिठाकर देश को चूना लगाने जैसा भले जो भी अपकर्म कर लें लेकिन कम से कम राम के नाम पर घोटाला तो नहीं ही करेंगे। मगर बंधुओं ने उन्हें भी गलत साबित कर दिया और राम की लोकप्रियता के जनक गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई ;

बंचक भगत कहाई राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥

तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरम ध्वज धंधक धोरी॥”

(जो खुद को राम के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करने वाले, धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले दम्भी और कपट के धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है।)

को चरितार्थ कर खुद को सबसे बड़ा ठग, झूठा और कपटी साबित कर दिखाया।

दिक्कत यह है कि यह घपलों घोटालों और अमानत में खयानत का अंत नहीं, आरम्भ है। राम मंदिर के नाम पर श्रद्धालु जनता को धर्म से और असहमत जनता को दूसरे तरीकों से डरा कर वसूली गयी रकम बेहद विराट है। जिलों जिलों में उगाहे गए इस चंदे में स्थानीय भाई साहबों द्वारा अपना हिस्सा दबा लिए जाने के बावजूद राम जन्मभूमि न्यास के स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के बैंक खाते में 31 मार्च 2021 तक 5457.94 करोड़ रूपये जमा हो चुके थे। यह रकम “भव्य” राम मंदिर और उसके साथ पूरा काम्प्लेक्स बनाये जाने की कुल अनुमानित लागत से चार गुना ज्यादा है। मगर पैसे का आना रुका नहीं है। अप्रैल से जून के बीच बाद कितने हजार करोड़ रुपये और आये इसकी जानकारी सामने आना बाकी है। लिहाजा राम का नाम बदनाम करने की अभी अपार संभावनाएं शेष हैं।

भाई लोगों को ऐसे घोटाले रोकने और पारदर्शी बनाने का पारम्परिक तरीका यदि पाश्चात्य और गैर-हिन्दुत्वी लगता था तो तो भी एक रास्ता तो था ही जिसे इन्ही की यूपी सरकार ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए खरीदी जाने वाली जमीनों के लिए तय किया हुआ है। एक मूल्य आंकलन समिति  (वैल्यूएशन कमेटी) गठित कर ऐसी खरीद फरोख्त के नियम कायदे निर्धारित किये जा सकते थे। मगर ऐसा करते तो फिर पंजीरी और प्रसाद कहाँ से पाते ?

विचारधाराओं के साथ एक खासियत होती है; वह अपने अनुरूप व्यक्तित्व ढालती है। समाज को आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध विचारधारा में निस्पृह, निस्वार्थ, समर्पित, सादगी से जीवन जीने वाले बाहुल्य में होते हैं। कम्युनिस्ट इसकी “हाथ कंगन को आरसी क्या” जैसी जीती जागती मिसाल है। सीपीआई (एम) में ऊपर से नीचे तक, कश्मीर से उत्तराखण्ड, हिमाचल होते हुए केरल से कन्याकुमारी तक प्रायः सभी ठीक इसी तरह के, कबीर के शब्दों में “कबीरा खड़ा बजार में लिए लकुटिया हाथ/जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ” को जीने वाले मिलेंगे। खुद को दीपक और मशाल बनाते, बाकी सबको रास्ता दिखाते व्यक्तित्व मिलेंगे। वहीँ फासिस्ट विचारधारा भी असर – ठीक इसका उलटा असर – दिखाती है। वह अपने मानने वालों को बर्बरता, धूर्तता और निर्लज्जता के साथ जिस एक और बीमारी का शिकार बनाती है उसका नाम अंग्रेजी में क्लेप्टोमेनिया है; इसके लिए हिंदी शब्द चौर्योन्माद है मतलब चोरी करने की बीमारी !! इसके उदाहरण अनेक हैं। यहां सिर्फ तीन लेते हैं ; इसी परिवार के एक अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण अपनी अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठकर एक लाख रुपये लेते हुए कैमरे में कैद हो चुके हैं। इसके एक और बड़े नेता दिलीप सिंह जूदेव का रिश्वत लेते हुए बोला गया संवाद “पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा कसम खुदा से कम भी नहीं है” जनता के बीच खासा लोकप्रिय हो चुका है। इस पैसे नाम के खुदा को अपना बनाने और कमाई के असाधारण और अजीबोगरीब रिकॉर्ड कायम करने में बाद के लोगों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। वर्तमान भाजपा के नेतृत्व की गिनती जिस दो नम्बर पर पूरी हो जाती है उन दो नम्बरी नेता पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह के सुपुत्र अयोध्या जमीन खरीदी से भी ज्यादा तेज गति का उदाहरण पेश कर चुके हैं। उनकी कम्पनी ने उनके अपने पिता के भाजपा अध्यक्ष और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मात्र 50 हजार रूपये की रकम से शुरू हो कर केवल एक वर्ष – 201415 से 2015-16 – में 80 करोड़ 50 लाख पर पहुँच जाने, यानी 16 हजार गुना कमाई का कीर्तिमान स्थापित किया। दिलचस्प बात यह है है कि ऐसा कारनामा कर दिखाने वाली उनकी कंपनी का नाम मंदिर के नाम पर ही; टेम्पल एंटरप्राइज लिमिटेड था। गरज यह कि घोटाला करेंगे भी तो उसमें धार्मिक तड़का जरूर लगाएंगे। मंदिर बनाएंगे मगर उसके नाम पर पैसा पहले बनाएंगे।

इस मामले में इस गिरोह को स्वार्थी कहना गलत होगा। लूट के मामले में संघी-भाजपाई खुद को अकेला नहीं रखते – देश की पंगत सजाकर उसकी दावत उड़ाने और खेती-किसानी-मजदूरी इत्यादि की लूट के 56 तरह के व्यंजनों का भोग लगाने के मामले में वे गिद्धों और भेड़ियों के साथ साझेदारी जरूर करते हैं। भले उसके लिए खेती से लेकर थाली तक और बैंकों. अस्पतालों, विश्वविद्यालयों से लेकर बन्दूक, तोप, टैंक और बम बनाने वाली आयुध निर्माणी ही क्यों न परोसनी पड़ें। कोरोना महामारी के विनाशकाल में अम्बानी की हर घण्टे 90 करोड़ और अडानी की हर घण्टे करीब 112 करोड़ रूपये की कमाई इसी सहजीविता और लूट में हिस्सेदारी का नमूना है। जो राम मंदिर निर्माण की राजनीतिक बाजीगरी और इसके बीच के रिश्ते को नहीं समझते वे असल में कुछ भी नहीं समझते।

बहरहाल, इस सबके बीच खैरियत की बात यह है कि इस दौरान कुछ भी न समझने वालों की तादाद तेजी से कम हुयी है। बहुत कुछ समझने वालों की संख्या बढ़ी भी है – उसने मुखर होना भी शुरू किया है। चूंकि कुछ भी अनायास या अपने आप नहीं होता इसलिए यह भी अचानक नहीं हुआ है। इसके पीछे मेहनतकश जनता की वे लड़ाईयां हैं जिसने डर और भय, जुल्म और आतंक के कुहासे को चीरा है। एक नया उजाला पैदा किया है।

दिल्ली बॉर्डर्स पर बैठ पूरे देश को जगाने की कोशिशों में सात महीने से ज्यादा पूरा कर चुका किसान आंदोलन इसका एक कारण है। जेल काटकर जमानत पर बाहर आते ही मुट्ठियाँ तानकर लड़ाई जारी रखने का संकल्प दोहराने वाली नताशा नरवाल, देवांगना कलिता. आसिफ इक़बाल तनहा जैसे युवक-युवतियां इस रोशनी की चमक हैं। डॉ. आंबेडकर के पौत्र दामाद डॉ. आनंद तेलतुंबड़े सहित जेल काट रहे अनेकों प्रखर बौद्धिक एक्टिविस्ट इस प्रकाश का वृत्त और परिधि हैं। जिस देश में प्रतिरोध की इतनी प्रचुरता हो उसमे चौर्योंन्मादी फासिस्टों और उनके सहयोगी कारपोरेटों की राह आसान नहीं है। बस सिर्फ एक काम है जो किया जाना है और वह बहुत कुछ समझने वालों को सब कुछ समझने वाला बनाने का काम है। इसे सायास और योजनाबद्ध तरीके से ही किया जा सकता है।

बादल सरोज Badal Saroj

सम्पादक लोकजतन

संयुक्त सचिव, अखिल भारतीय किसान सभा

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

Check Also

jagdishwar chaturvedi

हिन्दी की कब्र पर खड़ा है आरएसएस!

RSS stands at the grave of Hindi! आरएसएस के हिन्दी बटुक अहर्निश हिन्दी-हिन्दी कहते नहीं …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.